Skip to content
SarvaKosh
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 392 of 505

Read in context
Page 392

३१२ मैत्रायण्युपनिषद्
समाधि के द्वारा जिसके मल का परिशोधन हो गया है तथा जो आत्मा में विलीन हो गया है, ऐसा
'चित्त' ही आनन्दानुभूति की प्राप्ति कर सकता है। तब उसका वर्णन वाणी के द्वारा करने में कोई भी समर्थ
नहीं है, उसको तो मात्र अन्तःकरण के द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है ॥ झ॥
अपामपोऽग्निरग्नौ वा व्योम्नि व्योम न लक्षयेत्।
एवमन्तर्गतं चित्तं पुरुषः प्रतिमुच्यते ॥ ञ ॥
जैसे जल में जल, अग्नि में अग्नि और आकाश में आकाश का विलय हो जाने पर उसके सभी
भिन्न-भिन्न रूप परिलक्षित नहीं होते, वैसे ही चित्त का (आत्मा में) विलय हो जाने पर 'पुरुष' मुक्ति को
प्राप्त कर लेता है ॥ ञ ॥
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतमिति ॥ ट ॥
'मन' ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त हुआ मन ही बन्धन का
कारण है तथा विषयों से रहित अर्थात् विषयों में आसक्त न रहने वाला 'मन' ही मुक्ति का कारण है ॥ ट ॥
अथ यथेयं कौत्सायनिस्तुतिः-त्वं ब्रह्मा त्वं च वै विष्णुस्त्वं
रुद्रस्त्वं प्रजापतिः। त्वमग्निर्वरुणो वायुस्त्वमिन्द्रस्त्वं निशाकरः ॥ ठ॥
इसी प्रकार कौत्सायनि ऋषि की भी प्रशंसोक्ति है-'तुम ब्रह्मा हो, विष्णु हो, रुद्र हो। तुम प्रजापति
हो, तुम अग्नि हो, तुम वरुण हो, तुम वायु हो, तुम इन्द्र हो और तुम्हीं निशाकर (चन्द्रमा) हो' ॥ ठ॥
त्वं मनुस्त्वं यमश्च त्वं पृथिवी त्वमथाच्युतः।
स्वार्थे स्वाभाविकेडर्थे च बहुधा तिष्ठसे दिवि ॥ ड ॥
तुम मनु हो, तुम यम हो, तुम पृथ्वी हो, तुम अच्युत हो, तुम्हीं अपने विषय रूप में स्वाभाविक अर्थ
हो तथा तुम्हीं स्वयं अपने-आप में भी विभिन्न रूपों में प्रतिष्ठित रहते हो ॥ ड ॥
विश्वेश्वर नमस्तुभ्यं विश्वात्मा विश्वकर्मकृत् ।
विश्वभुग्विश्वमायस्त्वं विश्वक्रीडारतिः प्रभुः ॥ ढ ॥
हे सर्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। आप ही सम्पूर्ण विश्व की आत्मा हैं, विश्व के समस्त कार्यों को
करने वाले हैं। सभी के भरण-पोषण करने वाले हैं। सब प्रकार की माया को धारण करने वाले, सर्वत्र
विश्व-क्रीड़ा में प्रेम रखने वाले आप सभी के प्रभु हैं॥ ढ॥
नमः शान्तात्मने तुभ्यं नमो गुह्यतमाय च।
अचिन्त्यायाप्रमेयाय अनादिनिधनाय चेति ॥ ण ॥ ४ ॥
हे शान्त आत्मा वाले! आपको नमस्कार है। अतिशय गूढ़, अचिन्त्य, प्रमाणों से न जान सकने योग्य
एवं आदि-अन्त रहित आपके लिए नमन-वंदन है॥ ण॥ ४॥
तमो वा इदमेकमास तत्पश्चात्त्तत्परेणेरितं विषयत्वं प्रयात्येतद्वै रजसो रूपं तद्रजः
खल्वीरितं विषमत्वं प्रयात्येतद्वै तमसो रूपं तत्ततः खल्वीरितं तमसःसंप्रास्रवत्येतद्वै सत्त्वस्य
रूपं तत्सत्त्वमेवेरितं तत्सत्त्वात्संप्रास्रवत्सोंऽशोऽयं यश्चेतनमात्रः प्रतिपुरुषं क्षेत्रज्ञः
संकल्पाध्यवसायाभिमानलिङ्गः प्रजापतिस्तस्य प्रोक्ता अग्यास्तनवो ब्रह्मा रुद्रो