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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ५ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३२९

अध्याय ५ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ ३२९
दीजिए।' तब उन्हें प्रजापति ने 'द' अक्षर का उपदेश दिया और पूछा- क्या तुमने इसका तात्पर्य समझ
लिया ? तब उन (देवों) ने कहा 'हाँ समझ गये'। आपने हमसे (इन्द्रियों का) दमन करो - इस प्रकार
कहा है। तब प्रजापति बोले- 'ठीक है', तुम समझ गये ॥ १ ॥
अथ हैनँ मनुष्या ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा
३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दत्तेति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति ॥ २ ॥
इसके बाद मनुष्यों ने प्रजापति से कहा- 'आप हमें उपदेश प्रदान करने की कृपा करें।' तदनन्तर
उन मनुष्यों से भी प्रजापति ने 'द' अक्षर का उपदेश देकर पूछा- 'क्या तुम इसका तात्पर्य समझ गये'?
तब समस्त मानवों ने कहा-'हाँ' समझ गये। उन्होंने कहा- आपने हमसे 'दान करो' इस प्रकार कहा है।
प्रजापति ने कहा- हाँ, तुम सब ठीक ही समझ गये ॥ २॥
अथ हैनमसुरा ऊचुर्ब्रवीतु नो भवानिति तेभ्यो हैतदेवाक्षरमुवाच द इति व्यज्ञासिष्टा
३ इति व्यज्ञासिष्मेति होचुर्दयध्वमिति न आत्थेत्योमिति होवाच व्यज्ञासिष्टेति तदेतदेवैषा
दैवी वागनुवदति स्तनयित्नुर्द द द इति दाम्यत दत्त दयध्वमिति तदेतत्तत्रयꣳ शिक्षेद्दमं दानं
दयामिति ॥ ३॥
अन्त में असुरों ने भी प्रजापति से उपदेश करने की प्रार्थना की। प्रजापति ने उनको भी उसी 'द' अक्षर
का उपदेश किया और पूछा-क्या तुम सभी ने इसका अर्थ (भाव) समझ लिया? तब उन असुरों ने कहा-
'हाँ' भगवन् ! समझ गये, आपने हमको 'दया करो' ऐसा उपदेश प्रदान किया है। (तत्पश्चात्) प्रजापति
बोले- हाँ ठीक, तुम समझ गये। प्रजापति के अनुशासन का द. द. द. ............ मेघ गर्जना के रूप में
दैवी वाक् आज भी अनुमोदन करता है अर्थात् दमन करो, दान करो, दया करो। इस कारण से इन तीनों
दमन, दान और दया की ही शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ॥ ३॥
[ प्रजापति के तीनों पुत्रों ने एक ही अक्षर 'द' से अपने लिए अनुकूल भाव ग्रहण कर लिया- प्रजापति
सन्तुष्ट हुए। यह कैसे संभव हुआ? उत्तर है- ब्रह्मचर्य तप से शुद्ध अन्तःकरण के आधार पर यह संभव हुआ;
अन्यथा पूरे वाक्य बोलने पर भी श्रोता अपने विकारों के आवरण में सत्य के स्पन्दन ग्रहण नहीं कर पाते। ऋषि
आग्रह करते हैं कि आज भी हमें प्रजापति के इन तीनों निर्देशों का अनुपालन करना चाहिए। प्रश्न उठता है- हम
मनुष्य हैं, तो तीनों निर्देशों का अनुपालन क्यों करें? समाधान यह है कि यदि हम ब्रह्मचर्य (ब्रह्म के अनुकूल
आचरण) की साधना करें, तो स्पष्ट हो जाता है कि जब अपने 'स्व' में देवत्व का उदय हो, तो उससे उत्पन्न
श्रेष्ठता के अहं से बचने के लिए दमन का सहारा लें, जब मनुष्योचित भाव जागे, तो संकीर्ण स्वार्थों से बचने के
लिए दान करें और जब आसुरी भाव जागे, तो क्रूरता से बचने के लिए दया का आश्रय लें।]
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
एष प्रजापतिर्यद्धृदयमेतद्ब्रह्मैतत्सर्वं तदेतत्त्र्यक्षरꣳहृदयमिति हृ इत्येकमक्षरमभिहर-
न्त्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद द इत्येकमक्षरं ददत्यस्मै स्वाश्चान्ये च य एवं वेद यमित्ये-
कमक्षरमेति स्वर्गं लोकं य एवं वेद ॥ १ ॥

३३० बृहदारण्यकोपनिषद्
यह जो हृदय है, वह प्रजापति है- ब्रह्म है, वह सब कुछ है। यह 'हृदय' तीन अक्षर (वर्णों या क्षरित
न होने वाले गुणों) से युक्त है। 'हृ' यह एक अक्षर है (यह हृञ् धातु से बना है, जिसका भाव हरणशील
होता है), जो यह जानता है, उसके निमित्त अपने और अन्य (प्राण प्रवाह या प्राणी) अभिहरण करते
(अभीष्ट पदार्थ कहीं से प्राप्त करके देते) हैं। एक अक्षर 'द' है ('द' दानार्थ धातु से बना है) जो यह
जानता है, उसके निमित्त अपने और अन्य सभी दान करते (स्नेहपूर्वक अपने पास के पदार्थ देते) हैं। एक
अक्षर 'यम्' है (यह 'इण्' गत्यर्थक धातु से बना है) यह जानने वाला स्वर्ग की प्राप्ति करता है॥ १॥
[हृदय के तीन भाव हैं, जो आवश्यक है और अपने पास नहीं है, उसे प्राप्त करना, जो है उसे श्रेष्ठतर प्रयोगों
के लिए देना तथा अपने श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर गतिशील रहना। तीनों भाव मिलकर मनुष्य को इस लोक एवं अन्य
लोकों के अनुदानों के साथ सद्गति की प्राप्ति कराने में समर्थ होते हैं।]
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
तद्वैतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमाँल्लोकान्
जित इन्न्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यꣳ ह्येव ब्रह्म ॥ १ ॥
यह हृदय ही सत्यरूप है, यही महान् यक्ष है तथा यही ब्रह्म के रूप में प्रसिद्ध है। जो व्यक्ति इस
प्रकार जानता है, वह इन समस्त लोकों को जीत लेता है। जो असत् मानता है, वह उससे पराजय को प्राप्त
होकर नष्ट हो जाता है। जो इस तरह इस महान् यक्ष, आदिपुरुष (पूज्य), प्रथम उत्पन्न हुए 'सत्य ब्रह्म'
को जानता है, (उसको ही उपर्युक्त फल प्राप्त होता है); क्योंकि सत्य ही ब्रह्म रूप है॥ १॥
॥ पञ्चमं ब्राह्मणम् ॥
आप एवेदमग्र आसुस्ता आपः सत्यमसृजन्त सत्यं ब्रह्म ब्रह्म प्रजापतिं
प्रजापतिर्देवाꣳस्ते देवाः सत्यमेवोपासते तदेतत्त्र्यक्षरꣳ सत्यमिति स इत्येकमक्षरं
तीत्येकमक्षरं यमित्येकमक्षरं प्रथमोत्तमे अक्षरे सत्यं मध्यतोऽनृतं तदेतदमृतमुभयतः सत्येन
परिगृहीतꣳ सत्यभूयमेव भवति नैवं विद्वाꣳसमनृतं हिनस्ति ॥ १॥
यह व्यक्त जगत् प्रारम्भिक काल से आपः (मूल क्रियाशील तत्त्व) के रूप में ही था। तत्पश्चात् उस आपः ने
सत्य (यथार्थ भासित होने वाले जगत्) की सर्जना की। इसलिए सत्य ही ब्रह्म का स्वरूप है। ब्रह्म ने प्रजापति को
तथा प्रजापति ने समस्त देवगणों को उत्पन्न किया। वे सभी देवगण ब्रह्मरूप सत्य की उपासना करते हैं। यह 'सत्य'
नाम तीन अक्षरों से युक्त है। 'स' यह प्रथम अक्षर है, 'ती' (उच्चारण सौकर्य हेतु 'त्' को 'ती') यह द्वितीय अक्षर
तथा 'यम्' यह तृतीय अक्षर है। इन तीनों में प्रथम और तृतीय अक्षर ही सत्य रूप है, मध्य का दूसरा अक्षर अनृत है।
यह अनृत (तकार) दोनों तरफ से (सकार-यकार रूप) सत्य से व्याप्त है। अतः 'सत्य'- यह नाम सत्य प्राय ही है।
इस तरह से जानने वाले की अनृत कभी भी हिंसा नहीं करता॥ १॥
[यह नश्वर पदार्थ या जगत् सत्य के सम्पुट में है, अर्थात् सत्य से उत्पन्न है और उसी में लीन होता है। यह जानने वाला
नश्वर पदार्थ का सामयिक उपयोग करते हुए भी उसमें लिप्त होकर नष्ट नहीं होता, यह ऋषि का भाव है।]