१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र १२ ३११
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र १२ ३११
जनक ने प्रश्न किया- यह आत्मा कौन है ? उन्होंने उत्तर दिया- प्राणों में चित्तवृत्तियों के भीतर स्थित,
विज्ञानमय ज्योति पुरुष है, वही समान रूप से दोनों लोकों (इहलोक और परलोक) में संचरित होता है।
वह मानो चिन्तन और चेष्टा करता हो। वह पुरुष (आत्मा) स्वप्न के रूप में इहलोक (देह और इन्द्रियों के
समुच्चय) का अतिक्रमण करता है और मृत्यु के रूपों का भी उल्लंघन करता है ॥ ७ ॥
स वा अयं पुरुषो जायमानः शरीरमभिसंपद्यमानः पाप्मभिः संसृज्यते स उत्क्रामन्
म्रियमाणः पाप्मनो विजहाति ॥ ८ ॥
यह पुरुष जब जन्म लेता है, तब देह के साथ आत्मभाव को प्राप्त होकर पापों से युक्त हो जाता है;
किन्तु जब मृत्यु के उपरान्त ऊर्ध्वगमन करता है, तब पापों को परित्यक्त कर देता है ॥ ८ ॥
तस्य वा एतस्य पुरुषस्य द्वे एव स्थाने भवत इदं च परलोकस्थानं च सन्ध्यं तृतीयं
स्वप्नस्थानं तस्मिन्सन्ध्ये स्थाने तिष्ठन्नेते उभे स्थाने पश्यतीदं च परलोकस्थानं च। अथ
यथाक्रमोऽयं परलोकस्थाने भवति तमाक्रममाक्रम्योभयान् पाप्मन आनन्दांश्च पश्यति
स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतो मात्रामुपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन
भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति ॥ ९ ॥
इस पुरुष के इहलोक और परलोक ये दो ही स्थान हैं। स्वप्न लोक इन दोनों के बीच का लोक है।
इस मध्यवर्ती स्थान में रहकर पुरुष इहलोक और परलोक का दर्शन करता रहता है। परलोक में निवास
करते समय वह पाप और आनन्द दोनों का दर्शन करता है। जब वह शयन करता है, तब अपनी सांसारिक
भावनाओं के बनते-बिगड़ते रहने से अपने ही तेजः स्वरूप और ज्योतिः स्वरूप के कारण स्वप्न देखता है॥
न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान्रथयोगान्पथः सृजते न तत्रानन्दा
मुदः प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान् मुदः प्रमुदः सृजते न तत्र वेशान्ताः पुष्करिण्यः स्रवन्त्यो
भवन्त्यथ वेशान्तान् पुष्करिणीः स्रवन्तीः सृजते स हि कर्ता ॥ १० ॥
उस अवस्था (स्वप्नावस्था) में न रथ होता है, न उनमें जोते जानेवाले अश्व होते हैं और न ही पथ
होता है, परन्तु वह (पुरुष) स्वयं ही इन सबको निर्मित कर लेता है। इसी प्रकार उस स्थिति में आनन्द,
मोद और प्रमोद भी नहीं होते, किन्तु वह उन्हें भी उत्पन्न कर लेता है। वहाँ कुण्ड, सरोवर और नदियाँ भी
नहीं होतीं, किन्तु वह उनका भी निर्माण कर लेता है। वस्तुतः वही उन सबका कर्ता है ॥ १० ॥
तदेते श्लोका भवन्ति। स्वप्नेन शारीरमभिप्रहत्याऽसुप्तः सुप्तानभिचाकशीति।
शुक्रमादाय पुनरेति स्थानं हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ ११ ॥
ये श्लोक इस सन्दर्भ में है- स्वप्न की स्थिति में शरीर को निश्चेष्ट करके यह आत्मा स्वयं शयन नहीं
करता, वरन् समस्त प्रसुप्त पदार्थों को जाग्रत् करता है अर्थात् उन्हें देखता है। वह हिरण्मय पुरुष एकाकी
ही अपने तेज के साथ पुनः जाग्रत् स्थिति को प्राप्त करता है ॥ ११ ॥
प्राणेन रक्षन्नवरं कुलायं बहिष्कुलायादमृतश्चरित्वा। स ईयतेऽमृतो यत्र कामं
हिरण्मयः पुरुष एकहंसः ॥ १२ ॥
३१२ बृहदारण्यकोपनिषद्
वह अनश्वर और हिरण्मय पुरुष अपने शरीररूपी घोंसले की रक्षा करता हुआ, इस शरीर को परित्यक्त
करके बहिर्गमन करता है। वह अमृत पुरुष जहाँ कामना (वासना) होती है, वहीं चला जाता है ॥ १२ ॥
स्वप्नान्त उच्चावचमीयमानो रूपाणि देवः कुरुते बहूनि । उतेव स्त्रीभिः सह मोदमानो
जक्षदुतेवापि भयानि पश्यन् ॥ १३ ॥
वह दिव्य गुण सम्पन्न पुरुष स्वप्न की अवस्था में उच्च-नीच विभिन्न भावों को प्राप्त होकर अनेक रूपों
का निर्माण कर लेता है। वह कभी नारियों के साथ मोद मनाता, कभी मित्रों के साथ आनन्दित होता और
कभी भय उत्पन्न करने वाले दृश्य देखता है ॥ १३ ॥
आराममस्य पश्यन्ति न तं पश्यति कश्चनेति तं नायतं बोधयेदित्याहुः ।
दुर्भिषज्यं हास्मै भवति यमेष न प्रतिपद्यतेऽथो खल्वाहुर्जागरितदेश एवास्यैष इति यानि
ह्येव जाग्रत्पश्यति तानि सुप्त इत्यत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति सोऽहं भगवते सहस्रं
ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीति ॥ १४॥
सभी इस पुरुष के विश्राम स्थल (शरीर) को ही देखते हैं। उसके (वास्तविक स्वरूप) को कोई नहीं
देखता। उस प्रसुप्त पुरुष को अचानक नहीं जगाना चाहिए, ऐसा (वैद्य लोगों का) मत है, क्योंकि एकदम जगाने से
विभिन्न इन्द्रियों में उसकी चेतना न पहुँचने से फिर चिकित्सा करना कठिन हो जाता है। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि
यह स्वप्नावस्था जाग्रत् स्थिति ही है, क्योंकि जो पुरुष (आत्मा) स्वप्नावस्था में देखता है, वही जाग्रत् अवस्था में भी
देखता है, इस स्थिति में यह पुरुष स्वयं प्रकाशपुञ्ज होता है। (यह सुनकर) जनक बोले- मैं आपके निमित्त एक
हजार मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। हे भगवन्! अब मोक्ष सम्बन्धी उपदेश प्रदान करें ॥ १४ ॥
स वा एष एतस्मिन्संप्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष
इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥
(याज्ञवल्क्य बोले-) यह जीव सुषुप्तावस्था में (प्रगाढ़ निद्रा की स्थिति में) अनेक प्रकार से विचरण
करते हुए पाप और पुण्यों का दर्शन करता है। (अर्थात् भले- बुरे दृश्य देखता है)। इसके उपरान्त वह
जिस योनि से गया था, उसी योनि अर्थात् स्वप्नावस्था में ही लौट आता है। फिर भी वह पुरुष सबसे
अनासक्त ही रहता है क्योंकि वह पुरुष स्वतः असङ्ग है। जनक ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! यह तथ्य यथार्थ
है। मैं आपको सहस्र मुद्राएँ प्रदान करता हूँ। आप मेरे लिए मोक्ष विषयक उपदेश करें ॥ १५ ॥
स वा एष एतस्मिन्स्वप्ने रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुनः प्रतिन्यायं
प्रतियोन्याद्रवति बुद्धान्तायैव स यत्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष
इत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १६ ॥
यह पुरुष जब स्वप्न की स्थिति में होता है, तब वहाँ विभिन्न प्रकार की क्रीड़ाओं में विचरण करता
हुआ, अनेक प्रकार के पाप-पुण्यों के दृश्य देखता हुआ लौट जाता है, जहाँ से वह आया था अर्थात् फिर
से जाग्रत् स्थिति में आ जाता है; किन्तु वह उस सबसे अलिप्त ही रहता है, जो कुछ उसने वहाँ देखा था।