१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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रहस्योपनिषद्व्रह्म ध्यातं येन विपश्चिता। तीर्थैर्मन्त्रैः श्रुतैर्जप्यैस्तस्य किं पुण्यहेतुभिः॥
जिस तत्त्वदर्शी विचारक ने इस रहस्योपनिषद् में वर्णित ब्रह्म का चिन्तन-मनन किया है, उसे
पुण्यदायक कारणों तीर्थ-सेवन, मन्त्र-पाठ, वेद-पाठ तथा जप आदि करने से क्या प्रयोजन है ? ॥ १८ ॥
वाक्यार्थस्य विचारेण यदाप्नोति शरच्छतम्। एकवारजपेनैव ऋष्यादिध्यानतश्च यत्॥
सौ शरद्-ऋतुओं (वर्षों) तक महावाक्यों के अर्थों पर विचार करने से जिस फल की प्राप्ति होती है,
वह फल इन वाक्यों के ऋष्यादि के स्मरण सहित एक बार जप करने से ही प्राप्त होता है ॥ १९ ॥
ॐ अस्य श्रीमहावाक्यमहामन्त्रस्य हंस ऋषिः। अव्यक्तगायत्री छन्दः। परमहंसो
देवता। हं बीजम्। सः शक्तिः। सोऽहं कीलकम्। मम परमहंसप्रीत्यर्थे महावाक्यजपे
विनियोगः। सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। नित्यानन्दो ब्रह्म तर्जनीभ्यां स्वाहा।
नित्यानन्दमयं ब्रह्म मध्यमाभ्यां वषट्। यो वै भूमा अनामिकाभ्यां हुम्। यो वै भूमाधिपतिः
कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। सत्यं ज्ञानमनन्तं
ब्रह्म हृदयाय नमः। नित्यानन्दो ब्रह्म शिरसे स्वाहा। नित्यानन्दमयं ब्रह्म शिखायै वषट्।
यो वै भूमा कवचाय हुम्। यो वै भूमाधिपतिः नेत्रत्रयाय वौषट्। एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म
अस्त्राय फट्। भूर्भुवःसुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ २० ॥
ॐ इस महावाक्य महामंत्र के हंस ऋषि हैं, अव्यक्त गायत्री छन्द है, परमहंस देवता हैं, हं बीज मंत्र
है, सः शक्ति है, सोऽहं कीलक है। परमहंस देवता की प्रीति के लिए महावाक्य जपने हेतु मेरे द्वारा
विनियोग है। करन्यास के लिए ब्रह्म सत्य, ज्ञानमय और अनन्त है, उसे नमस्कार है- अँगूठे का स्पर्श ब्रह्म
नित्य (शाश्वत) आनन्द स्वरूप है, उसे नमन है- तर्जनी अँगुली का स्पर्श। ब्रह्म नित्यानन्दमय है, उसे
नमन है- मध्यमा अँगुली का स्पर्श। जो अति- विस्तृत है (वह ब्रह्म है), उसे नमन है- अनामिका अँगुली
का स्पर्श। जो अतिविस्तृत का (भी) अधिपति है (वह ब्रह्म है), उसे नमन है- कनिष्ठिका अँगुली का
स्पर्श। ब्रह्म एक एवं अद्वितीय है, उसे नमन है- करतल एवं कर पृष्ठ का स्पर्श। ब्रह्म सत्य, ज्ञानमय एवं
अनन्त है उसे नमन है- हृदय (स्थान) का स्पर्श। ब्रह्म नित्य आनन्द स्वरूप है, उसे नमस्कार है, सिर का
स्पर्श। ब्रह्म नित्य आनन्दमय है, उसे नमन है- शिखा का स्पर्श। जो विस्तृत है (वह ब्रह्म है), उसे नमन
है- दायें -बाँयें कन्धे का स्पर्श। जो विस्तृत का अधिपति है, (वह ब्रह्म है), उसे नमन है- दोनों नेत्रों का
स्पर्श। ब्रह्म एक और अद्वितीय है, उसे नमन है- दायें हाथ को सिर के ऊपर से घुमाकर बायें हाथ पर
ताली बजाएँ। ॐ (परब्रह्म) भूः (भू), भुवः (अन्तरिक्ष) और स्वः (द्युलोक) में संव्यास है, उसे
नमस्कार है- सभी दिशाओं से रक्षा का विधान ॥ २० ॥
ध्यानम्-
नित्यानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्। एकं
नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ॥ २१ ॥
ध्यान-जो सदा ही आनन्दरूप, श्रेष्ठ सुखदायी स्वरूप वाले, ज्ञान के साक्षात् विग्रह रूप हैं। जो
संसार के द्वन्द्वों (सुख-दुःखादि) से रहित, व्यापक आकाश के सदृश (निर्लिप्त) है तथा जो एक ही
परमात्म तत्त्व को सदैव लक्ष्य किये रहते हैं। जो एक हैं, नित्य हैं, सदैव शुद्ध स्वरूप है, ( झंझावातों में)