१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ खण्ड १ मन्त्र ५ ४७
अध्याय २ खण्ड १ मन्त्र ५ ४७
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः
संभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥
सर्वप्रथम यह जीव पुरुष के शरीर में गर्भरूप से विराजमान रहता है। पुरुष के शरीर में स्थित जो वीर्य
है, वह पुरुष के समस्त अङ्गों से समुत्पन्न तेज है। पहले पुरुष आत्मस्थ तेज को अपने ही अन्दर पोषित
करता है, तदुपरान्त जब वह इस वीर्यरूप तेज का स्त्री में सिञ्चन करके गर्भरूप में स्थित रहता है, यह
इसका (जीव का) प्रथम जन्म है॥ १ ॥
[ वर्तमान प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) भी वीर्य में गुण-सूत्रों (क्रोमोजोम्स) तथा जीन्स (जीवाणुओं)
में व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं का समावेश मानता है। पुरुष के गर्भ में पुरुष का परिपाक यह उपनिषद् की
अपनी दृष्टि है। पदार्थ विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं, ऋषि उसमें चेतना का संकल्पयुक्त तंत्र देखते हैं।]
तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा तस्मादेनां न हिनस्ति।
सास्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति॥ २ ॥
जिस प्रकार स्त्री के अपने ही शरीर के अङ्ग होते हैं, उसी प्रकार पुरुष द्वारा सिञ्चित वह वीर्य भी स्त्री
से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। अस्तु, वह स्त्री को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुँचाता। वह स्त्री अपने
उदर में स्थापित पति के (वीर्यरूप) आत्मा का पोषण करती है ॥ २ ॥
[ सृष्टि के आदि में विराट् पुरुष और प्रकृति संयोग जैसा ही यह संयोग होता है।]
सा भावयित्री भावयितव्या भवति तं स्त्री गर्भं बिभर्ति सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रे
ऽधिभावयति। स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां
सन्तत्या एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥
वह पालनकर्त्री स्त्री पालनीया (अपने पति द्वारा पालन करने योग्य) होती है। गर्भवती स्त्री प्रसव से
पूर्व गर्भस्थ जीव का पालन करती है और वह पुरुष (पिता) प्रसवोपरान्त सर्वप्रथम (जातकर्म आदि
संस्कार से) उस शिशु को सुसंस्कृत करता है। वह जन्मोपरान्त शिशु को इस प्रकार संस्कारित करके,
उसकी उन्नति करके वास्तव में अपनी ही उन्नति करता है; क्योंकि इसी प्रकार लोक (चौदहों भुवन) प्रवृद्ध
होते हैं। यही इस (जीव) का द्वितीय जन्म है ॥ ३ ॥
सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो
वयोगतः प्रैति स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥
इस आत्मा (पिता) का यह पुत्रस्वरूप आत्मा पुण्यों के लिए (पिता के) प्रतिनिधि रूप में प्रतिष्ठित
किया जाता है। तदुपरान्त यह जीव (पितारूप) वयोवृद्ध होकर अपने लौकिक कर्त्तव्यों को पूरा करके इस
लोक से प्रस्थान कर जाता है। इसके पश्चात् उसका पुनर्जन्म होता है। यह इस जीव का तृतीय जन्म है॥ ४॥
तदुक्तमृषिणा- गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा। शतं मा पुर
आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥
४८ ऐतरेयोपनिषद्
यही बात ऋषि (वामदेव) ने इन शब्दों में कही है- मैंने गर्भ की स्थिति में ही (अन्तःकरण,
इन्द्रियादि) देवताओं के जन्मों का रहस्य भली-भाँति जान लिया है। मैं सैकड़ों लौहयुक्त (लोहे की तरह
कठोर) पिंजरों में आबद्ध था। अब मुझे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया है, अतः मैं बाज़ पक्षी के समान (उन
पिंजरों को भेदकर) बाहर आ गया हूँ। इस प्रकार गर्भ में शयन करते हुए ऋषि वामदेव ने यह तथ्य प्रकट
किया था॥ ५॥
[ पदार्थ विज्ञानी पदार्थों की प्रयोगशाला में प्रवेश करके प्रयोगों द्वारा अनुसंधान करते हैं। चेतना विज्ञान के
विज्ञानी ऋषिगण चेतना की प्रयोगशालाओं में संकल्पपूर्वक प्रवेश करके अनुसंधान करते थे। वे परम व्योम तक
अपनी चेतना ले जाकर वेद के रहस्य प्रकट कर सकते थे और प्रकृति के सूक्ष्म घटकों में प्रवेश करके उनकी
विशेषताओं का साक्षात्कार कर लेते थे। ऋषि वामदेव ने अपनी आत्म चेतना को इसी अनुसंधान के लिए
संकल्पपूर्वक गर्भरूप में स्थापित किया तथा पूर्ण जागरूक रहकर चेतना के रहस्यों का अध्ययन किया, यही बात
यहाँ स्पष्ट की गयी है।]
स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे
लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत्॥ ६॥
वे ऋषि वामदेव यह ज्ञान (तत्त्वज्ञान) प्राप्त करके इस शरीर के विनष्ट होने के पश्चात् (इस
लोक से) उत्क्रमण कर (ऊर्ध्वगमन कर) स्वर्ग में समस्त सुखों का उपभोग करते हुए अमृतत्व को
प्राप्त हो गये (अमर हो गये) ॥ ६॥
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन
वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति॥ १॥
जिस आत्मा की हम उपासना-अर्चना करते हैं, वह कौन है? जिसके द्वारा प्राणी देखता है, जिसके
द्वारा श्रवण करता है, जिसके द्वारा गन्धों को सूँघता है, जिसके माध्यम से वाक् शक्ति का विश्लेषण करता
है और जिसके द्वारा स्वादु-अस्वादु का ज्ञान प्राप्त करता है, वह आत्मा कौन सा है? ॥ १॥
यदेतत् हृदयं मनश्चैतत्। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा
जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि
भवन्ति ॥ २॥
जो यह हृदय है, वही मन भी है। संज्ञान (सम्यक् ज्ञान), आज्ञान (आदेश देने की शक्ति), विज्ञान
(विविध रूपों से जानने की शक्ति), प्रज्ञान (तुरन्त जान लेने की शक्ति), मेधा (धारणाशक्ति), दृष्टि, धृति
(धैर्य), बुद्धि, मनीषा (मनन करने की शक्ति), जूति (वेग), स्मृति, संकल्पशक्ति, मनोरथ शक्ति,
भोगशक्ति, प्राणशक्ति ये सभी शक्तियाँ परमात्म सत्ता की ही बोधक हैं ॥ २॥