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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र २५ २४९

अध्याय १ ब्राह्मण ३ मन्त्र २५ २४९
एष उ एव बृहस्पतिर्वाग्वै बृहती तस्या एष पतिस्तस्मादु बृहस्पतिः ॥ २० ॥
प्राण को ही बृहस्पति कहा गया है, क्योंकि वाणी बृहती है और उसके पति बृहस्पति हैं ॥ २० ॥
एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग् वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः ॥ २१ ॥
यह ही ब्रह्मणस्पति है। वाणी ही ब्रह्म है और प्राण वाणी का स्वामी है, इसलिए प्राण ही ब्रह्मणस्पति है ॥
एष उ एव साम वाग् वै सामैष सा चामश्चेति तत्साम्नः सामत्वं यद्वेव समः प्लुषिणा
समो मशकेन समो नागेन सम एभिस्त्रिभिर्लोकैः समोऽनेन सर्वेण तस्माद्वेव सामाश्नुते
साम्नः सायुज्यं सलोकतां जयति य एवमेतत्साम वेद ॥ २२ ॥
यही (प्राण) साम है। यह वाक् ही 'सा' और यह प्राण ही 'अम' है। 'सा' और 'अम' के संयोग
से ही 'साम' बनता है। साम का सामत्व भी यही है, क्योंकि यह (प्राण) मक्खी जैसा है, मच्छर जैसा
है, हाथी जैसा है और तीनों लोकों के तुल्य है। इसी कारण वह साम है। जो इस प्रकार साम के विषय में
जानता है, वह साम के सायुज्यत्व और सालोक्यत्व को प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
एष उ वा उद्गीथः प्राणो वा उत्प्राणेन हीदँ सर्वमुत्तब्धं वागेव गीथोच्चगीथा
चेति स उद्गीथः ॥ २३ ॥
इसी प्राण को उद्गीथ कहते हैं। प्राण के द्वारा ही सब कुछ धारण किया हुआ होने से इसे 'उत्'
कहा गया है। वाक् अर्थात् वाणी ही गीथा (गीत) है, प्राण ही उत् है और गीथा भी, इसीलिए इसे
'उद्गीथ' कहते हैं ॥ २३ ॥
तद्धापि ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयो राजानं भक्षयन्नुवाचायं त्यस्य राजा मूर्धानं विपातयता-
द्यदितोऽयास्य आङ्गिरसोऽन्येनोद्गायदिति वाचा च ह्येव स प्राणेन चोद्गायदिति ॥ २४ ॥
(प्राण के विषय में) एक प्रसिद्ध आख्यायिका यह भी है कि चैकितानेय ब्रह्मदत्त ने सोमपान करते
समय यह कहा कि यदि मैंने मुख में निवास करने वाले अङ्गों के रस को प्राणों से अलग जानकर उद्गान
(उद्गीथगान) किया हो, तो सोमदेव मेरा सिर गिरा दें (अर्थात् मेरा अपमान कर दें अथवा मेरा सोमपान
व्यर्थ कर दें)। इससे स्पष्ट होता है कि उसने प्राण और वाक् द्वारा ही उद्गान किया था ॥ २४ ॥
[ मुख से - वाणी से जो व्यक्त है, वह यदि प्राणों के स्पन्दन से युक्त नहीं तो व्यर्थ है- ढोंग है। केवल रटकर
बोले गये शब्दों में अनुभूतिजन्य प्राणों का संचार न होने से वे निस्तेज-निष्प्रभावी होते हैं। प्राण एवं वाक् का
संयोग जीवन साधना में अनिवार्य है।]
तस्य हैतस्य साम्नो यः स्वं वेद भवति हास्य स्वं तस्य वै स्वर एव स्वं तस्मादार्त्विज्यं
करिष्यन्वाचि स्वरमिच्छेत तया वाचा स्वरसंपन्नयार्त्विज्यं कुर्यात्तस्माद्यज्ञे स्वरवन्तं दिदृक्षन्त
एवाथो यस्य स्वं भवति भवति हास्य स्वं य एवमेतत्साम्नः स्वं वेद ॥ २५ ॥
जो व्यक्ति इस साम के 'स्वर' से यथार्थ रूप से विज्ञ है, वह निश्चित ही धन-ऐश्वर्य से सम्पन्न होता
है। स्वर (कण्ठ की मधुरता) ही उसका धन है। अतः ऋत्विक्-कर्म सम्पादित करने वाले को स्वर में
माधुर्य का समावेश करना चाहिए। उत्कृष्ट स्वर युक्त वाणी में ऋत्विक्-कर्म सम्पादित करना चाहिए;
क्योंकि यज्ञ में मधुर स्वर युक्त उद्गाता का दर्शन करने की सभी इच्छा करते हैं। जो व्यक्ति साम के धन
को जानता है, वह उस धन (मधुर स्वर) को अवश्य ही प्राप्त करता है ॥ २५ ॥

२५० बृहदारण्यकोपनिषद्
तस्य हैतस्य साम्नो यः सुवर्णं वेद भवति हास्य सुवर्णं तस्य वै स्वर एव सुवर्णं
भवति हास्य सुवर्णं य एवमेतत्साम्नः सुवर्णं वेद ॥ २६ ॥
जो इस साम के सुवर्ण (मधुर-स्वर या धन) को जानता है, उसे सुवर्ण (मधुर स्वररूपी धन) मिलता
है; क्योंकि मधुर स्वर ही साम का सुवर्ण है। जो साम के सुवर्ण को इस प्रकार जानता है, वह निश्चित ही
सुवर्ण प्राप्त करता है ॥ २६ ॥
तस्य हैतस्य साम्नो यः प्रतिष्ठां वेद प्रति ह तिष्ठति तस्य वै वागेव प्रतिष्ठा वाचि हि
खल्वेष एतत्प्राणः प्रतिष्ठितो गीयतेऽन्न इत्यु हैक आहुः ॥ २७॥
जो व्यक्ति साम की प्रतिष्ठा के विषय में जानते हैं, वे प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। व्यक्ति की वाणी ही प्रतिष्ठा
स्वरूप है (उसी से प्रतिष्ठा मिलती है)। प्राण ही निश्चित रूप से वाणी में प्रतिष्ठित होकर गाया जाता है। कुछ
विद्वानों का कथन है कि वह प्राण अन्न में प्रतिष्ठित होकर (अन्न की शुद्धि के साथ) गाया जाता है ॥ २७ ॥
अथातः पवमानानामेवाभ्यारोहः स वै खलु प्रस्तोता साम प्रस्तौति स यत्र
प्रस्तुयात्तदेतानि जपेदसतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर्मामृतं गमयेति स
यदाहासतो मा सद्गमयेति मृत्युर्वा असत्सदमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह
तमसो मा ज्योतिर्गमयेति मृत्युर्वै तमो ज्योतिरमृतं मृत्योर्मामृतं गमयामृतं मा कुर्वित्येवैतदाह
मृत्योर्मामृतं गमयेति नात्र तिरोहितमिवास्ति। अथ यानीतराणि स्तोत्राणि
तेष्वात्मनेऽन्नाद्यमागायेत्तस्मादु तेषु वरं वृणीत यं कामं कामयेत तं०स एष एवंविदुद्गातात्मने
वा यजमानाय वा यं कामं कामयते तमागायति तद्धैतल्लोकजिदेव न हैवालोक्यताया
आशास्ति य एवमेतत्साम वेद ॥ २८ ॥
अब आगे पवमान-स्तोत्रों का पाठ करने का विधान वर्णित किया जाता है- प्रस्तोता (प्रस्तोता नामक
ऋत्विज्) यज्ञकर्म में सामगान प्रारम्भ करने से पहले इन मंत्रों का जप करे- 'असतो मा सद्गमय,'
'तमसो मा ज्योतिर्गमय', 'मृत्योर्माऽमृतं गमय' अर्थात् हमें असत् से सत् की ओर ले चलो, हमें
अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो, हमें मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो। प्रस्तोता जब यह कहता है,
मुझे असत् से सत् की ओर ले चलो, तब उसका अभिप्राय होता है- मृत्यु ही असत् और अमृत ही सत् है
और मुझे मृत्यु से बचाकर अमर कर दो। जब वह यह कहता है कि मुझे तमस् से प्रकाशोन्मुख करो, तब
उसका अभिप्राय होता है कि मृत्यु ही अंधेरा और अमृत ही प्रकाश है और मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर
ले चलो। जब वह (प्रस्तोता) यह कहता है कि मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो, तो इस कथन में
तो कुछ छुपी बात है ही नहीं अर्थात् कथन स्पष्ट ही है। अन्य स्तोत्रों में उद्गाता को अपने लिए अन्न
(पोषक तत्त्वों) का उद्गान करना चाहिए। इन स्तोत्रों के द्वारा यजमान इच्छित भोगों की याचना करे। इस
तथ्य को जानने वाला उद्गाता अपने या यजमान के निमित्त जिस वस्तु या भोग की कामना करता है, उसी
का उद्गान करता है। यह प्राण दर्शन समस्त लोकों को प्राप्त करने का साधन है। जो ज्ञानी इस साम को इस
प्रकार से जानता है, उसे कुछ भी प्राप्त करने के लिए निराश होने की आवश्यकता नहीं है ॥ २८ ॥