१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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इसके अतिरिक्त एक अन्य स्थल पर यह भी संकेत मिलता है कि स्त्री-पुरुष के संयोग से जिस
शरीर का प्रादुर्भाव होता है, वह चेतना शून्य है तथा नरक जैसा प्रतीत होता है। मूत्र द्वार से बहिर्गमन होने
वाला यह शरीर हड्डियों के द्वारा गठित किया गया है। मांस से अनुलिप्त है तथा चर्म के द्वारा आबद्ध किया
गया है। मल, मूत्र, पित्त, कफ, मज्जा, मेद, वसा आदि से युक्त है। इसके अतिरिक्त अन्य कई तरह के मलों
से भी परिपूर्ण है। यह शरीर ऐसा लगता है कि सभी विकार युक्त पदार्थों का कोषागार ही है॥४॥
अथान्यत्राप्युक्तं संमोहो भयं विषादो निद्रा तन्द्री व्रणो जरा शोकः क्षुत्पिपासा
कार्पण्यं क्रोधो नास्तिक्यमज्ञानं मात्सर्यं वैकारुण्यं मूढत्वं निर्व्रीडत्वं निकृतत्वमुद्धतत्वमस-
मत्वमिति तामसान्वितस्तृष्णा स्नेहो रागो लोभो हिंसा रतिर्दृष्टिर्व्यापृतत्वमीर्ष्या काममस्थिरत्वं
चञ्चलत्वं जिहीर्षाऽर्थोपार्जनं मित्रानुग्रहणं परिग्रहावलम्बोऽनिष्टेष्विन्द्रियार्थेषु
द्विष्टिरिष्टेष्वभिषङ्ग इति राजसान्वितैः परिपूर्ण एतैरभिभूत इत्ययं भूतात्मा तस्मान्नाना-
रूपाण्याप्नोतीत्याप्नोतीति॥ ५॥
एक अन्य स्थान में यह भी कहा गया है कि मोह, भय, विषाद, निद्रा, तन्द्रा, वृद्धावस्था, शोक,
दुःख, भूख, प्यास, कार्पण्य (दीनता), क्रोध, नास्तिकता, अज्ञान, मात्सर्य, विकार, मूढ़ता, निर्लज्जता,
उद्धतता, विषमता, कृतघ्नता आदि तमोगुण के विकारों से यह शरीर परिपूर्ण है। इसके अतिरिक्त तृष्णा,
स्नेह, रोग, लोभ, हिंसा, काम-दृष्टि, व्यापार, ईर्ष्या, स्वेच्छाचारिता, चंचलता, किसी की वस्तु को ग्रहण
करने की इच्छा, धनोपार्जन की इच्छा, मित्रों का अनुग्रह, परिग्रह का आश्रय, इन्द्रियों का अप्रिय विषयों से
द्वेष और प्रिय विषयों से आसक्ति आदि रजोगुण से युक्त विकार भी उस भूतात्मा में विद्यमान रहते हैं। इन
सभी विकारों के द्वारा यह भूतात्मा पराभव को प्राप्त होता है तथा पुनः अनेक रूपों को प्राप्त करता है ॥५॥
॥ चतुर्थः प्रपाठकः ॥
ते ह खल्वथोर्ध्वरेतसोऽतिविस्मिता अतिसमेत्योचुर्भगवन्नमस्ते त्वं नः शाधि
त्वमस्माकं गतिरन्या न विद्यत इत्यस्य कोऽतिथिर्भूतात्मनो येनेदं हित्वात्मन्येव सायुज्यमुपैति
तान्होवाच ॥ १ ॥
ब्रह्मा जी के द्वारा दिये हुए उपदेश को सुनकर ऊर्ध्वरेता (अखण्ड ब्रह्मचारी) श्रेष्ठ मुनि वालखिल्य
जी अत्यधिक विस्मित हुए एवं निकट में जाकर कहा- हे भगवन्! आपको नमस्कार है। आप ही हमें शरण
देने वाले हैं। आपके अतिरिक्त अन्य कोई हमारा शरण स्थल नहीं। अतः आप हमें यह समझाएँ कि इस
भूतात्मा का अतिथि कौन है, जिसके लिए यह सर्वस्व त्यागकर आत्मा में ही सायुज्य प्राप्त करता है ? ॥ १॥
अथान्यत्राप्युक्तं महानदीभूरमय इव निवर्तकमस्य यत्पुराकृतं समुद्रवेलेव दुर्निवार्यमस्य
मृत्योरागमनं सदसत्फलमयैर्हि पाशैः पशुरिव बद्धं बन्धनस्थस्येवास्वातन्त्र्यं यमविषयस्थ-
स्येव बहुभयावस्थं मदिरोन्मत्त इवामोदमदिरोन्मत्तं पाप्मना गृहीत इव भ्राम्यमाणं महोरगदष्ट
इव विपद्दष्टं महान्धकार इव रागान्धमिन्द्रजालमिव मायामयं स्वप्न इव मिथ्यादर्शनं कदली-
गर्भ इवासारं नट इव क्षणवेषं चित्रभित्तिरिव मिथ्यामनोरममित्यथोक्तम् । शब्दस्पर्शादयो
येऽर्था अनर्था इव ते स्थिताः । येष्वासक्तस्तु भूतात्मा न स्मरेच्च परं पदम् ॥ २ ॥