१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
॥ षष्ठ काण्डका ॥
॥ षष्ठ काण्डका ॥
धियो यो नः प्रचोदयादिति सावित्र्यास्तृतीयः पादो दिवा साम समदधात्सा-
म्नाऽऽदित्यमादित्येनरश्मीन् रश्मिभिर्वर्षं, वर्षेणौषधिवनस्पती-नोषधिवनस्पतिभिः
पशून् पशुभिः कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्राह्मणेन व्रतं
व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवत्यशून्याभवत्यविच्छिन्नः ॥ १ ॥
'धियो यो नः प्रचोदयात्'- यह सावित्री का तृतीय चरण है। उन देव सविता ने द्युलोक के साथ साम को
संयुक्त किया। साम के साथ आदित्य को, आदित्य के साथ रश्मियों को, रश्मियों के साथ वर्षा को, वर्षा के साथ
ओषधियों एवं वनस्पतियों को, ओषधियों एवं वनस्पतियों के साथ पशुओं को, पशुओं के साथ कर्म को, कर्म के
साथ तप को, तप के साथ सत्य को, सत्य के साथ ब्रह्म को, ब्रह्म के साथ ब्राह्मण को, ब्राह्मण के साथ व्रत को
संयुक्त किया। व्रत से ही ब्राह्मण तेजस्वी, परिपूर्ण और अविच्छिन्न होता है ॥ १ ॥
भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं
सावित्र्यास्तृतीयं पादं व्याचष्टे ॥ २ ॥
जो विद्वान् इस प्रकार सावित्री के तृतीय चरण (प्रेरणा प्रदायक) को जानता है और उसे जानकर
उसकी व्याख्या करता है, उसका वंश और उसका जीवन अविच्छिन्न रहता है ॥ २ ॥
॥ सप्तमी कण्डिका ॥
तेन ह वा एवं विदुषा ब्राह्मणेन ब्रह्माभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टम् ॥ १ ॥
उस विद्वान् (सावित्री के तीनों चरणों के जानकार) ब्राह्मण द्वारा वह ब्राह्मी (शक्ति) प्राप्त, ग्रसित
(धारित) तथा परामृष्ट (सम्बद्ध-अनुभूति पूर्वक प्रयुक्त) होती है ॥ १ ॥
ब्रह्मणाऽऽकाशमभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टमाकाशेन वायुरभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टो
वायुना ज्योतिरभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टं ज्योतिषाऽपोऽभिपन्ना ग्रसिताः परामृष्टा
अद्भिर्भूमिर्अभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा भूम्याऽन्नमभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टमन्नेन प्राणोऽभिपन्नो
ग्रसितः परामृष्टः प्राणेन मनोऽभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टं मनसा वागभिपन्ना ग्रसिता परामृष्टा
वाचा वेदा अभिपन्ना ग्रसिताः परामृष्टा वेदैर्यज्ञोऽभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टस्तानि ह वा
एतानि द्वादशमहाभूतान्येवं विधिप्रतिष्ठितानि तेषां यज्ञ एव परार्द्धः ॥ २ ॥
ब्रह्म के साथ आकाश प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट (सम्बद्ध) है। आकाश के साथ वायु प्राप्त, ग्रसित
एवं परामृष्ट (सम्बद्ध) है। वायु के साथ ज्योति प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट (सम्बद्ध) है, ज्योति के साथ जल
प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट है। जल के साथ पृथ्वी प्राप्त, ग्रसित और परामृष्ट है। पृथ्वी के साथ अन्न प्राप्त,
ग्रसित एवं परामृष्ट है। अन्न के साथ प्राण प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। प्राण के साथ मन प्राप्त, ग्रसित एवं
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गायत्र्युपनिषद्
परामृष्ट है। मन के साथ वाणी प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। वाणी के साथ वेद प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट हैं।
वेदों के साथ यज्ञ प्राप्त, ग्रसित एवं परामृष्ट है। इस प्रकार जानने वाले विद्वान् में से बारह महाभूत
प्रतिष्ठित होते हैं। उनमें यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है ॥२॥
॥ अष्टमी कण्डिका ॥
तं ह स्मैतमेवं विद्वांसो मन्यन्ते विद्वानमिति याथातथ्यमविद्वांसोऽयं यज्ञो वेदेषु
प्रतिष्ठितो वेदा वाचि प्रतिष्ठिता वाङ् मनसि प्रतिष्ठिता मनः प्राणे प्रतिष्ठितं प्राणोऽन्ने
प्रतिष्ठितो ऽन्नं भूमौ प्रतिष्ठितं भूमिरप्सु प्रतिष्ठितो आपो ज्योतिषि प्रतिष्ठिता ज्योतिर्वायौ
प्रतिष्ठितं वायुराकाशे प्रतिष्ठित आकाशं ब्रह्मणि प्रतिष्ठितं ब्रह्म ब्राह्मणे ब्रह्मविदि प्रतिष्ठितं
यो ह वा एवं वित् स ब्रह्मवित् पुण्यां च कीर्तिं लभते सुरभींश्च गन्धान्
सोऽपहतपाप्मानन्तां श्रियमश्रुते य एवं वेद, यश्चैवं विद्वानेवमेतां वेदानां मातरं
सावित्रीसम्पदमुपनिषदमुपास्त इति ब्राह्मणम् ॥ १ ॥
जो विद्वान् यह मानते हैं कि हम यज्ञ जानते हैं - यथार्थ में वे अज्ञानी हैं। यह यज्ञ वेदों में प्रतिष्ठित
है। वेद वाणी में प्रतिष्ठित है। वाणी मन में प्रतिष्ठित है। मन प्राण में प्रतिष्ठित है। प्राण अन्न में प्रतिष्ठित है।
अन्न भूमि में प्रतिष्ठित है। भूमि जल में प्रतिष्ठित है। जल तेज (अग्नि) में प्रतिष्ठित है। तेज वायु में प्रतिष्ठित
है। वायु आकाश में प्रतिष्ठित है। आकाश ब्रह्म में प्रतिष्ठित है। ब्रह्म ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञानी) में प्रतिष्ठित है। इस
प्रकार (बारहों महाभूतों की गति को) जानने वाला ब्रह्मज्ञानी पुरुष पुण्य एवं कीर्ति को प्राप्त करता है,
सुरभित गन्धादि युक्त जीवन प्राप्त करता है। वह पापों से मुक्त होकर विराट् ऐश्वर्य को ग्रहण करता है ॥१॥
॥ इति गायत्री उपनिषत्समाप्ता ॥
॥ छान्दोग्योपनिषद् ॥
सामवेद की तलवकार शाखा के अन्तर्गत छान्दोग्य ब्राह्मण के अंश को इस उपनिषद् के रूप में मान्यता दी
गई है। उक्त ब्राह्मण में १० अध्याय हैं। उसके अन्तिम ८ (आठ) अध्याय उपनिषद् रूप में लिये गये हैं। यह
विशाल कलेवर वाले उपनिषदों में से एक है।
नाम के अनुरूप इस उपनिषद् का आधार 'छन्दः' है। 'छन्दः' यहाँ साहित्यिक पद्य रचना के प्रकार तक
ही सीमित नहीं है, उसका व्यापक अर्थ है। 'छन्दः' का अर्थ है-आच्छादित करने वाला। कवि जिस सत्य का
साक्षात्कार करता है, वह सत्य, वह भाव हृदयंगम करने के लिए वह साहित्यिक छन्द का प्रयोग करता है। वह सत्य
या भाव जिन अक्षरों, पदों, स्वरों आदि से आच्छादित होता है, वे सब उस साहित्यिक छन्द के अंगोपांग होते हैं।
इसी प्रकार ऋषि इस सृष्टि के मूल सत्य को विभिन्न माध्यमों से व्यक्त होते, प्रकृति के विभिन्न घटकों से आच्छादित
हुआ देखता है। अस्तु, उन सबको उन्होंने छन्द या साम या उद्गीथ के रूप में व्यक्त किया है।
प्रथम अध्याय में ऋचा, साम आदि के सार रूप ॐकार की व्याख्या की गयी है। देवासुर संग्राम के
उपाख्यान से ॐकार-उद्गीथ को केवल स्वर-श्वास आदि तक ही सीमित न रखकर उसे मुख्य प्राणों के स्पन्दन से
जोड़ने का रहस्य समझाया है। फिर ॐकार की आध्यात्मिक, आधिदैविक उपासनाएँ समझाते हुए विभिन्न स्वरूप
स्पष्ट किये गये हैं। दूसरे अध्याय में 'साम' को साधुता-श्रेष्ठता से जोड़ते हुए विभिन्न प्रकार की उपासनाओं का
वर्णन किया गया है। तीसरे अध्याय में आदित्य को देवों का मधु कहकर उसकी विभिन्न दिशाओं से विभिन्न
प्रकार के अमृर्तों की उपलब्धि का वर्णन है। इस मधुविद्या के अधिकारियों का उल्लेख करते हुए गायत्री की
सर्वरूपता सिद्ध करके आदित्य की ब्रह्मरूप में उपासना का निर्देश दिया गया है। चौथे अध्याय में सत्यकाम
जाबाल का वृषभ, अग्नि, हंस एवं मद्ग द्वारा ब्रह्म बोध कराये जाने का तथा उपकौशल को विभिन्न अग्नियों द्वारा
शिक्षित किए जाने का उपाख्यान है। पाँचवाँ अध्याय प्राण विद्या परक है। श्वेतकेतु एवं प्रवाहण संवाद में अप्तत्त्व
का पाँचवीं आहुति में व्यक्तिवाचक बन जाने तथा अश्वपति एवं ऋषियों के संवाद से प्राण की विभिन्न प्रकृतियों
का उल्लेख है। छठवें अध्याय में ईश्वर एवं आत्मा के विभिन्न स्वरूपों को विभिन्न दृष्टान्तों से स्पष्ट किया गया है।
सातवें अध्याय में ब्रह्म की विभिन्न रूपों में उपासना समझायी गई है। आठवें अध्याय में इन्द्र एवं विरोचन के
कथानक द्वारा आत्मतत्त्व और ब्रह्मतत्त्व के साक्षात्कार के लिए तप द्वारा पात्रता अर्जित करने का महत्त्व दर्शाया
गया है। अन्त में आत्मज्ञान की परम्परा एवं उसके फल का वर्णन है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु..... इति शान्तिः (द्रष्टव्य- केनोपनिषद्)
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत, ओमिति ह्युद्गायति तस्योपाख्यानम् ॥ १ ॥
'ॐ' इस अक्षर का यज्ञ में उद्गाता द्वारा सर्वप्रथम उच्चारण किया जाता है। ॐ का उच्चारण करके
उद्गाता सामगान करता है। उसी उद्गीथ साधना की यहाँ व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥
एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसोऽपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो
रसः पुरुषस्य वाग्रसो वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २ ॥
८४ छान्दोग्यापनिषद
सम्पूर्ण प्राणियों अथवा पदार्थों का रस (सार) पृथिवी है। पृथिवी का रस (सारभाग) जल है,
जल का रस ओषधियाँ हैं, ओषधियों का रस पुरुष है। पुरुष का रस वाक् है। वाणी का रस साम
है। साम का रस उद्गीथ ॐकार है॥ २॥
स एष रसानाꣳ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो य उद्गीथः ॥ ३ ॥
यह ॐकार सभी रसों में सर्वोत्तम रस है। यह परमात्मा का प्रतीक होने के कारण उपास्य है। यह
पृथिवी आदि रसों में आठवाँ है॥ ३॥
[ रसों में आठवाँ होने का अपना महत्त्व है। यह सृष्टि सात-सात के वर्गों में विभक्त है, सप्तलोक, सप्तराग,
सप्तरंग, सप्तव्याहृतियाँ आदि। आठवाँ पिछले सप्तक का समापक तथा नये सप्तक का प्रारंभिक होता है। ॐ में सभी
रस समाहित भी होते हैं तथा उसी से सब प्रकट भी होते हैं, गूढ़ार्थ में आठवाँ कहने का यही भाव प्रतीत होता है।]
कतमा कतमर्कतमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥४॥
अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन सा ऋक् है, कौन सा साम है और कौन सा उद्गीथ है॥
वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथस्तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्चर्क् च साम च॥
वाक् ही ऋक् है, प्राण ही साम है और ॐकार ही उद्गीथ है। जो ऋक् रूप वाणी और सामरूप प्राण
है, ये (मिथुन) जोड़े प्रसिद्ध हैं॥ ५॥
[ प्राण ही साम है। सामगान केवल वाणी की कलाकारिता नहीं है, उसमें वाणी के साथ प्राण का स्पन्दन
भी जुड़ा होना चाहिए। यदि प्राण में अन्तः स्फूर्त तरंगें नहीं उठतीं, तो साम गान नहीं बन पाता। सामान्य गायन की
प्रभावोत्पादकता में भी यही तथ्य कार्य करता है।]
तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे सꣳसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै
तावन्योन्यस्य कामम्॥ ६ ॥
जिस प्रकार मिथुन (स्त्री-पुरुष) का मिलन एक दूसरे की कामनाओं की पूर्ति करता है, उसी प्रकार
इस (वाणी और प्राण अथवा ऋचा और साम के) जोड़े के संयोग से ॐकार का संसृजन होता है॥ ६ ॥
आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७ ॥
जो विद्वान् उद्गीथ रूप ॐकार की उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति कराने वाला होता है॥
तद्वा एतदनुज्ञाक्षरं यद्धि किंचानुजानात्योमित्येव तदाह एषा एव समृद्धिर्यदनुज्ञा
समर्धयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ८ ॥
यह ॐकार अनुमति सूचक है। जब कोई किसी को अनुमति देता है, तो ॐकार कहकर उसे प्रकट
करता है। यह अनुमति ही समृद्धिप्रद है। यह जानने वाला जो विद्वान् ॐकार की उपासना करता है, वह
सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति करने वाला होता है॥ ८॥
[ यह सृष्टि ब्रह्म के संकल्प से बनी है। सृष्टि उत्पादन के पीछे उसकी अनुमति, सृष्टि सृजन की संमति ही मूल
कारण है। जिस ऋद्धि-सिद्धि या साधन के लिए ब्रह्म की अनुमति हो जाती है, वही तत्त्व अस्तित्व में आ जाता है।
अस्तु, ब्रह्म की अनुमति ही समृद्धि है, ऋषि का यह कथन बहुत मर्मयुक्त है।]
तेनेयं त्रयी विद्या वर्तत ओमित्याश्रावयत्योमिति शꣳसत्योमित्युद्गायत्ये-
तस्यैवाक्षरस्यापचित्यै महिम्ना रसेन ॥ ९ ॥
ॐ अक्षर से ही त्रयी (वेदत्रयी अथवा त्रिगुणात्मिका सृष्टि की) विद्या (यज्ञादि या सृष्टि सृजन) कर्म
में प्रवृत्त होती है। ॐ कहकर ही अध्वर्यु आश्रावण (आदेश) कर्म करता है। ॐ कहकर ही होता शंसन