१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ३ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ २८५
अध्याय ३ ब्राह्मण ३ मन्त्र १ २८५
आर्तभाग ने पुनः प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! मरने के समय इस पुरुष के प्राण उत्क्रमण (बहिर्गमन)
करते हैं या नहीं ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- नहीं ऐसा नहीं है। उस पुरुष के प्राण मृत्यु के पश्चात् यहीं
विलीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है (वायु को अन्दर खींचता है) और मृत होकर वहीं शयन करता है॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै
नामानन्ता विश्वेदेवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥
आर्तभाग ने फिर पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! मृत्यु के उपरान्त पुरुष का कौन परित्याग नहीं करता ? ऋषि
ने उत्तर दिया- मृत्यु के पश्चात् 'नाम' पुरुष का परित्याग नहीं करता। नाम अनन्त है और विश्वेदेवा भी
अनन्त हैं, अतः पुरुष अनन्तलोक पर विजय प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥
यज्ञवल्क्येति होवाच यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणश्चक्षुरादित्यं
मनश्चन्द्रं दिशः श्रोत्रं पृथिवीग्ं शरीरमाकाशमात्मौषधीलॊमानि वनस्पतीन्केशा अप्सु लोहितं
च रेतश्च निधीयते क्कायं तदा पुरुषो भवतीत्याहर सोम्य हस्तमार्तभागावामेवैतस्य वेदिष्यावो
न नावेतत् सजन इति तौ होत्क्रम्य मन्त्रयांचक्राते तौ ह यदूचतुः कर्म हैव तदूचतुरथ
यत्प्रशशग् सतुः कर्म हैव तत्प्रशशग् सतुः पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेनेति
ततो ह जारत्कारव आर्तभाग उपरराम ॥ १३ ॥
जारत्कारव आर्तभाग ने पुनः पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जिस समय इस पुरुष की वाक् अग्नि में विलीन
हो जाती है, प्राण वायु में, चक्षु आदित्य में, मन चन्द्रमा में, श्रोत्र दिशाओं में, शरीर पृथ्वी में, आत्मा
आकाश में, लोम समूह ओषधियों में, केश वनस्पतियों में लीन हो जाते हैं और रक्त तथा रेतस् का जल में
स्थापन हो जाता है, उस समय वह पुरुष कहाँ निवास करता है ? याज्ञवल्क्य बोले- हे सोम्य आर्तभाग ! तुम
मुझे अपना हाथ पकड़ाओ, हम दोनों को ही इस प्रश्न का उत्तर समझना होगा; किन्तु इस जनसभा के बीच
यह उचित नहीं है। (हम दोनों बाहर चलें) दोनों ने उठकर बाहर (एकान्त में) जाकर चिन्तन किया और
लौटकर दोनों कर्म के विषय में प्रशंसा करने लगे। निश्चित ही पुण्य कृत्यों से पुण्य और पाप कृत्यों से पाप
प्राप्त होता है। इसके अनन्तर जारत्कारव आर्तभाग मौन हो गये ॥ १३ ॥
[ यहाँ स्पष्ट हो जाता है कि ऋषियों के वार्तालाप जिज्ञासा समाधान के लिए, सत्य शोध के लिए ही होते थे।
जो तथ्य सुनिश्चित रूप से पता था, वे वही कहते थे, जिन तथ्यों को परामर्श द्वारा स्पष्ट किया जाना है, उनके बारे
में स्पष्ट रूप से सुपात्र के साथ विचार मंथन किया जाता था।]
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
अथ हैनँ भुज्युर्लाह्यायनिः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच मद्रेषु चरकाः पर्यव्रजाम
ते पतञ्चलस्य काप्यस्य गृहानैम तस्यासीद्दुहिता गन्धर्वगृहीता तमपृच्छाम कोऽसीति सोऽब्र-
वीत्सुधन्वाऽऽङ्गिरस इति तं यदा लोकानामन्तानपृच्छामाथैनमब्रूम क्व पारिक्षिता अभवन्निति
क्व पारिक्षिता अभवन् स त्वा पृच्छामि याज्ञवल्क्य क्व पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥
२८६ बृहदारण्यकोपनिषद्
इसके बाद भुज्यु लाह्यायनि (लाह्य के पुत्र) ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! हम लोग
मद्र प्रदेश में व्रताचरण (भ्रमण) करते हुए विद्यार्थी के रूप में कपि गोत्र में उत्पन्न पतञ्चल काप्य के घर
गये। काप्य की पुत्री गन्धर्व (से आवेशित) गृहीत थी। हमारे उससे यह पूछने पर कि तुम कौन हो ? वह
(गन्धर्व जो काप्यसुता पर आवेशित था) बोला- मैं आङ्गिरस सुधन्वा हूँ। तदुपरान्त लोकों के अन्त के
सम्बन्ध में प्रश्न करते हुए हमने उससे यह भी पूछा कि पारिक्षित कहाँ रहे ? पारिक्षित कहाँ रहे ? अतः हे
याज्ञवल्क्य ! हम आप से भी पूछते हैं कि पारिक्षित कहाँ रहे ? ॥ १ ॥
स होवाचोवाच वै सोगच्छन्वै ते तद्यत्राश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति क्व न्वश्वमेधयाजिनो
गच्छन्तीति द्वात्रिंशतं वै देवरथाह्नान्यान्वयं लोकस्तं समन्तं पृथिवी द्विस्तावत्पर्येति तां
समन्तं पृथिवीं द्विस्तावत्समुद्रः पर्येति तद्यावती क्षुरस्य धारा यावद्वा मक्षिकायाः पत्रं
तावानन्तरेणाकाशस्तानिन्द्रः सुपर्णो भूत्वा वायवे प्रायच्छत्तान्वायरात्मनि धित्वा
तत्रागमयद्यत्राश्वमेधयाजिनोऽभवन्नित्येवमेव वै स वायुमेव प्रशशंस तस्माद्वायुरेव
व्यष्टिर्वायुः समष्टिरप पुनर्मृत्युं जयति य एवं वेद ततो ह भुज्युर्लाह्यायनिरुपरराम ॥ २ ॥
ऋषि याज्ञवल्क्य बोले- उस गन्धर्व ने अवश्य ही यह उत्तर दिया होगा कि पारिक्षित वहीं चले गये,
जहाँ अश्वमेध सम्पन्न करने वाले जाते हैं। भुज्यु ने पूछा- अश्वमेध सम्पादक कहाँ जाते हैं ? ऋषि बोले-
एक दिन और रात्रि में आदित्य का रथ जितने स्थान में चलता है, उतने को 'आह्नय' कहते हैं। ऐसे बत्तीस
आह्नय परिमाण वाला वह लोक है। उस लोक को चारों ओर से पृथिवी और उस पृथिवी से दुगुना समुद्र
उसे घेरे हुए है। उन अण्ड कपालों के बीच में छुरे की धार अथवा मक्खी के पंख जितना चौड़ा आकाश
(अथवा प्रवेश मार्ग) है। इन्द्र ने उन्हें (पारिक्षित को) वायु को प्रदान किया और वायुदेव उन्हें अपने में
स्थापित करके वहाँ ले गये, जहाँ अश्वमेध सम्पन्न करने वाले रहते हैं। इस प्रकार उस गन्धर्व ने वायुदेव की
सराहना की। अस्तु, वायु ही व्यष्टि और समष्टि है। इस प्रकार ज्ञान रखने वाला पुनर्मृत्यु को जीत लेता है।
यह सुनकर भुज्यु लाह्यायनि भी चुप हो गये ॥ २ ॥
॥ चतुर्थ ब्राह्मणम् ॥
अथ हैनमुषस्तश्चाक्रायणः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा
सर्वान्तरस्तं मे व्याचक्ष्व इत्येष त आत्मा सर्वान्तरःकतमो याज्ञवल्क्य सर्वान्तरो यः प्राणेन प्राणिति
स त आत्मा सर्वान्तरो योऽपानेनापानीति स त आत्मा सर्वान्तरो यो व्यानेन व्यानिति स त आत्मा
सर्वान्तरो य उदानेनोदानिति स त आत्मा सर्वान्तर एष त आत्मा सर्वान्तरः ॥ १ ॥
इसके पश्चात् चक्रपुत्र उषस्त ने ऋषि याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! जो प्रत्यक्ष और
साक्षात् ब्रह्म है तथा सबके अन्तर में स्थित आत्मा है, उसका मेरे लिए वर्णन कीजिए। ऋषि याज्ञवल्क्य ने
उत्तर दिया- तुम्हारी आत्मा ही सबके अन्तर में विराजमान है। जब उषस्त ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! सर्वान्तर
कौन है ? तब ऋषि ने कहा- जो प्राण के द्वारा प्राणन प्रक्रिया करता है (श्वास लेता है), वही तुम्हारा