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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ८ खण्ड ६ मन्त्र १ १८७

अध्याय ८ खण्ड ६ मन्त्र १ १८७
तद्य एवैतं ब्रह्मलोकं ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष ब्रह्मलोकस्तेषाग् सर्वेषु लोकेषु
कामचारो भवति ॥ ३ ॥
इस प्रकार से जो मनुष्य ब्रह्मचर्य के माध्यम से इस ब्रह्मलोक को भली-भाँति समझ लेते हैं। उन
लोगों को इस ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। उन्हीं की सम्पूर्ण लोकों में इच्छानुसार गति हो जाती है॥ ३ ॥
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
अथ यद्यज्ञ इत्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव यो ज्ञाता तं विन्दतेऽथ
यदिष्टमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवेष्ट्वात्मानमनुविन्दते ॥ १ ॥
इस प्रकार जिसको 'यज्ञ' अर्थात् श्रेष्ठ पुरुषार्थ का साधन कहते हैं, वही ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जो ज्ञाता
है, ब्रह्मचर्य के माध्यम से उस ब्रह्मलोक को प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मचर्य को 'इष्ट' भी कहा गया है। वह
(इष्ट) भी ब्रह्मचर्य है; क्योंकि ब्रह्मचर्य द्वारा ही पूजित हुआ मनुष्य इच्छानुसार आत्मा को प्राप्त होता है॥
अथ यत्सत्त्रायणमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येव सत आत्मनस्त्राणं
विन्दतेऽथ यन्मौनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तद्ब्रह्मचर्येण ह्येवात्मानमनुविद्य मनुते ॥ २ ॥
जिसे 'सत्त्रायण' शब्द से जाना जाता है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि यज्ञ और इष्ट की भाँति
ब्रह्मचर्यरूप साधन द्वारा भी मनुष्य सत्रूप परमात्मा से अपनी रक्षा करता है। इसके अतिरिक्त जिसको मौन
कहा जाता है, वह भी ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य द्वारा ही आत्मा को जानकर मनुष्य मनन करता है॥ २॥
अथ यदनाशकायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तदेष ह्यात्मा न नश्यति यं ब्रह्मचर्येणा-
नुविन्दतेऽथ यदरण्यायनमित्याचक्षते ब्रह्मचर्यमेव तत्तदरश्च ह वै ण्यश्चार्णवौ ब्रह्मलोके
तृतीयस्यामितो दिवि तदैरं मदीयग् सरस्तदश्वत्थः सोमसवनस्तदपराजिता पूर्ब्रह्मणः
प्रभुविमितग् हिरण्मयम् ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् जिसे 'अनाशकायन' (कृच्छ्र चान्द्रायण आदि व्रत या नष्ट न होना) कहते हैं, वह भी
ब्रह्मचर्य है, क्योंकि जिसे (साधक को) ब्रह्मचर्य द्वारा प्राप्त होता है, ऐसा यह आत्मा विनाश को नहीं प्राप्त
होता। जिसको 'अरण्यायन' (वनवास) कहते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि ब्रह्मलोक में 'अर' एवं
'ण्य' नामक दो समुद्र हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ से तृतीय द्युलोक में 'ऐरंमदीय' (हर्षोत्पादक) नाम वाला
सरोवर विद्यमान है। वही सोमसवन नामक अश्वत्थ (अमृत स्त्रावि वृक्ष) है, वहाँ पर ब्रह्मा की अपराजिता
नाम की पुरी है तथा वहाँ ही प्रभु के द्वारा विशेष रूप से रचित स्वर्ण के समान मण्डप विद्यमान है॥ ३ ॥
तद्य एवैतावरं च ण्यं चार्णवौ ब्रह्मलोके ब्रह्मचर्येणानुविन्दन्ति तेषामेवैष
ब्रह्मलोकस्तेषाग् सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति ॥ ४ ॥
वहाँ उस ब्रह्मलोक में जो भी मनुष्य ब्रह्मचर्य के माध्यम से 'अर' तथा 'ण्य' नामक दोनों समुद्रों को प्राप्त करते
हैं, उन्हीं को इस ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। उन मनुष्यों की समस्त लोकों में इच्छानुसार गति हो जाती है॥४॥
॥ षष्ठः खण्डः ॥
अथ या एता हृदयस्य नाड्यस्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य
लोहितस्येत्यसौ वा आदित्यः पिङ्गल एष शुक्ल एष नील एष पीत एष लोहितः ॥ १ ॥

१८८ छान्दोग्योपनिषद्
जो (कमलाकार वाले) हृदय से सम्बन्धित नाड़ियाँ हैं, ये सब पिंगल नामक एक वर्ण विशेष से युक्त सूक्ष्म
रस से सम्पन्न हैं। ये (सभी) शुक्ल, नीली, पीली और लोहित रस से युक्त हैं, क्योंकि यह आदित्य पिङ्गल वर्ण का
है। यही आदित्य शुक्ल है तथा यही नील वर्ण का है। यही पीला है और यही लोहित वर्ण भी है ॥ १ ॥
[इसी उपनिषद् में अध्याय ३ के खण्ड १ से ५ तक आदित्य के विभिन्न वर्णों, पक्षों तथा उससे सम्बद्ध
अमृत प्रवाहों का वर्णन किया गया है। यहाँ उस वर्णन की संगति बैठती है। स्पष्ट है कि यह आदित्य सूर्य से भिन्न
कोई सर्वत्र संचरित स्व प्रकाशित आत्मतत्त्व सदृश ही कुछ है।]
तद्यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छतीमं चामुं चैवमेवैता आदित्यस्य रश्मय
उभौ लोकौ गच्छन्तीमं चामुं चामुष्मादादित्यात्प्रतायन्ते ता आसु नाडीषु सृप्ता आभ्यो
नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ताः ॥ २॥
प्रस्तुत विषय में यह उल्लेख है- जिस तरह से कोई विशाल महापथ इस (समीप) एवं उस (दूर)
दोनों ग्रामों को पहुँच जाता है, ठीक उसी प्रकार से सूर्य की ये समस्त किरणें इस (मनुष्य) में और उस
(आदित्य मण्डल) में (दोनों लोकों में) प्रवेश करती हैं। वे (रश्मियाँ) सदैव इस आदित्य से ही निःसृत
होकर समस्त नाड़ियों में व्याप्त हो जाती हैं और जो इन नाड़ियों से निःसृत होती हैं, वे सभी इस आदित्य
में व्याप्त हो जाती हैं ॥ २ ॥
तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः संप्रसन्नः स्वप्नं न विजानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति तन्न
कश्चन पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा संपन्नो भवति ॥ ३ ॥
इस प्रकार जब सुप्तावस्था में अच्छी तरह से तल्लीन हुआ व्यक्ति प्रसन्न होकर स्वप्न नहीं देखता, उस
समय यह इन नाड़ियों में गमन कर जाता है, ऐसी स्थिति में इसे अन्य कोई पाप स्पर्श नहीं करता। यह
(व्यक्ति) तेज से सम्पन्न हो जाता है ॥ ३ ॥
अथ यत्रैतदबलिमानं नीतो भवति तमभित आसीना आहुर्जानासि मां जानासि
मामिति स यावदस्माच्छरीरादनुत्क्रान्तो भवति तावज्जानाति ॥ ४ ॥
जिस समय यह मनुष्य शरीर से बलरहित होता है, उस समय उसके चारों ओर बैठे हुए समस्त स्वजन
सम्बन्धी कहते हैं- क्या तुम मुझे पहचानते हो ? क्या तुम मुझे पहचानते हो ? वह जब तक शरीर से बाहर
उत्क्रमण नहीं करता, तब तक उन (सम्बन्धियों) को पहचानता रहता है ॥ ४ ॥
अथ यत्रैतदस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यथैतैरेव रश्मिभिरूर्ध्वमाक्रमते स ओमिति वा होद्वा
मीयते स यावत्क्षिप्येन्मनस्तावदादित्यं गच्छत्येतद्वै खलु लोकद्वारं विदुषां प्रपदनं निरोधोऽविदुषाम्॥
तत्पश्चात् जब वह जीव शरीर से बाहर निकलता है, तब इन रश्मियों से ही ऊर्ध्व की ओर गमन
करता है। वह 'ॐ' इस प्रकार कहकर आत्मा का ध्यान करता हुआ ऊर्ध्व अथवा अधोलोक की ओर
गमन करता है। वह (जीवात्मा) आदित्य नामक लोक में उतनी ही देर में पहुँच जाता है, जितनी देर में
मन गमन करता है। निश्चित ही यह आदित्य ही समस्त लोकों का द्वार है। यह साधक मनीषियों के लिए
ब्रह्मलोक की प्राप्ति का द्वार और अज्ञानियों को रोकने वाला है ॥ ५ ॥
तदेष श्लोकः। शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्‍ङन्या उत्क्रमणे भवन्त्युत्क्रमणे भवन्ति ॥ ६ ॥
इस सम्बन्ध में एक मन्त्र उल्लिखित है- हृदय में एक सौ एक नाड़ियों का समावेश है। उन नाड़ियों