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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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१०८ उपनिषद्
[सरल हिन्दी भावार्थ सहित]
ज्ञानखण्ड
*
सम्पादक
वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
*
प्रकाशक :
युग निर्माण योजना
गायत्री तपोभूमि, मथुरा (उ. प्र.)
२००५ मूल्य : १२५ रुपये

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• प्रकाशक
युग निर्माण योजना
गायत्री तपोभूमि, मथुरा (उ. प्र.)
• लेखक
वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
• सर्वाधिकार प्रकाशकाधीन
• मुद्रक
युग निर्माण योजना प्रेस,
गायत्री तपोभूमि, मथुरा

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ॐ
भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
(त्रि० ता० १.१; त्रि० म०; महाना०)


उस प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ,
तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप, परमात्मा को
हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा
हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर
प्रेरित करे।
*

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मैं उपनिषदों को पढ़ता हूँ, तो मेरे आँसू बहने लगते हैं। यह कितना महान् ज्ञान
है ? हमारे लिए यह आवश्यक है कि उपनिषदों में सन्निहित तेजस्विता को अपने जीवन
में विशेष रूप से धारण करें।
-स्वामी विवेकानन्द
मेरे जीवन में गीता ने माँ का स्थान लिया है। वह स्थान तो उसी का है; लेकिन मैं
जानता हूँ कि उपनिषद् मेरी माँ की माँ है। उसी श्रद्धा से मेरा उपनिषदों का मनन,
निदिध्यासन पिछले बत्तीस वर्षों से चल रहा है।

  • आचार्य विनोबा भावे
    मनुष्य की आत्मिक, मानसिक और सामाजिक गुत्थियाँ किस प्रकार सुलझ
    सकती हैं, इसका ज्ञान उपनिषदों से ही मिल सकता है। यह शिक्षा इतनी सत्य, शिव
    और सुन्दर है कि अन्तरात्मा की गहराई तक उसका प्रवेश होता है। जब मनुष्य सांसारिक
    दुःखों और चिन्ताओं से घिरा हो, तो उसे शान्ति और सहारा देने के अमोघ साधन के
    रूप में उपनिषद् ही सहायक हो सकती है।
  • प्रो० जी० आर्क
    सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि कितने दार्शनिकों के ग्रन्थ मैंने ध्यान पूर्वक
    पढ़े हैं, पर जैसी शान्तिमयी आत्मविद्या मैंने उपनिषदों में पायी, वैसी और कहीं देखने
    को नहीं मिली।
  • प्रो०ह्यूम
    मैंने कुरान, तौरेत, इञ्जील, जबुर आदि ग्रन्थ पढ़े, उनमें ईश्वर सम्बन्धी जो वर्णन
    है, उनसे मन की प्यास न बुझी। तब हिन्दुओं की ईश्वरीय पुस्तकें पढ़ीं। इनमें से उपनिषदों
    का ज्ञान ऐसा है, जिससे आत्मा को शाश्वत शान्ति तथा सच्चे आनन्द की प्राप्ति होती है।
    हजरत नवी ने भी एक आयत में इन्हीं प्राचीन रहस्यमय पुस्तकों के सम्बन्ध में संकेत
    किया है।
    -दाराशिकोह
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विषयानुक्रमणिका
क्र० विषय पृष्ठ संख्या से-तक
क. संकेत विवरण ६
ख. भूमिका ७-२६
१. अमृतनादोपनिषद् २७-३३
२. ईशावास्योपनिषद् ३४-३७
३. एकाक्षरोपनिषद् ३८-४०
४. ऐतरेयोपनिषद् ४१-४९
५. कठोपनिषद् ५०-६९
६. केनोपनिषद् ७०-७४
७. गायत्र्युपनिषद् ७५-८२
८. छान्दोग्योपनिषद् ८३-१९६
९. तैत्तिरीयोपनिषद् १९७-२१३
१०. नादबिन्दूपनिषद् २१४-२२१
११. निरालम्बोपनिषद् २२२ २२६
१२. प्रणवोपनिषद् २२७-२२८
१३. प्रश्नोपनिषद् २२९-२४०
१४. बृहदारण्यकोपनिषद् २४१-३५७
१५. मन्त्रिकोपनिषद् ३५८-३६०
१६. माण्डूक्योपनिषद् ३६१-३६३
१७. मुण्डकोपनिषद् ३६४-३७४
१८. मुद्गलोपनिषद् ३७५-३८१
१९. मैत्रायण्युपनिषद् ३८२-३९७
२०. शिवसंकल्पोपनिषद् ३९८-३९८
२१. शुकरहस्योपनिषद् ३९९-४०६
२२. श्वेताश्वतरोपनिषद् ४०७-४२४
२३. सर्वसारोपनिषद् ४२५-४२८
२४. स्कन्दोपनिषद् ४२९-४३०
ग. परिशिष्ट
१. परिभाषा कोश ४३१-४८८
२. मन्त्रानुक्रमणिका ४८९-५१२

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संकेत विवरण


अक्षि० - अक्ष्युपनिषद्तै०ब्रा० - तैत्तिरीय ब्राह्मणमुक्ति० - मुक्तिकोपनिषद्
अथर्व० - अथर्ववेदतै० सं० - तैत्तिरीय संहितामुण्ड० - मुण्डकोपनिषद्
अध्या० - अध्यात्मोपनिषद्त्रि०म० - त्रिपाद्विभूति-महानारायणोपनिषद्मुद्र० - मुद्रलोपनिषद्
अ०पू० - अन्नपूर्णोपनिषद्त्रि०ता० - त्रिपुरा तापिन्युपनिषद्मैत्रा० - मैत्रायण्युपनिषद्
अमृ० - अमृतनादोपनिषद्दे०भा० - देवी भागवतमैत्रे० - मैत्रेय्युपनिषद्
अव्य० - अव्यक्तोपनिषद्द्र० - द्रष्टव्यमै०ब्रा० - मैत्रायणी ब्राह्मण
अ०शिर० - अथर्वशिरोपनिषद्ध्या० बि० - ध्यानबिन्दूपनिषद्यजु० - यजुर्वेद
अष्टा० - अष्टाध्यायीना०प० - नारदपरिव्राजकोपनिषद्या० स्मृ० - याज्ञवल्क्य स्मृति
आत्मो० - आत्मोपनिषद्ना०पु० - नारदीय पुराणयो०कु० - योगकुण्डल्युपनिषद्
आ०बो० - आत्मबोधोपनिषद्ना०बि० - नादबिन्दूपनिषद्यो० चू० - योगचूडामण्युपनिषद्
आरु० - आरुणिकोपनिषद्नारा० - नारायणोपनिषद्यो० त० - योगतत्त्वोपनिषद्
आश्र० - आश्रमोपनिषद्निरा० - निरालम्बोपनिषद्यो०द० - योगदर्शन
आ०श्रौ० - आश्वलायन श्रौतसूत्रनिरु० - निरुक्तयो०शि० - योगशिखोपनिषद्
ईश० - ईशावास्योपनिषद्नृ०उ० - नृसिंहोत्तरतापिन्युपनिषद्रा०उ० - रामोत्तरतापिन्युपनिषद्
ऋ० - ऋग्वेदन्या०द० - न्याय दर्शनरा०मा० - रामचरित मानस
एका० - एकाक्षरोपनिषद्पंच० - पंचदशीरा०र० - राम रहस्योपनिषद्
ऐत० - ऐतरेयोपनिषद्पं० ब्र० - पंच ब्रह्मोपनिषद्वाच० - वाचस्पत्यम्
ऐ०ब्रा० - ऐतरेय ब्राह्मणप०प० - परमहंस-परिव्राजकोपनिषद्वा०रा० - वाल्मीकि रामायण
कठ० - कठोपनिषद्प०पु० - पद्मपुराणवि०चू० - विवेक चूडामणि
क०रु० - कठनरुद्रोपनिषद्पैंग० - पैंगलोपनिषद्वे०परि० - वेदान्त परिभाषा
कलिसं० - कलिसंतरणोपनिषद्प्रण० - प्रणवोपनिषद्वे०सा० - वेदान्त सार
काठ०सं० - काठक संहिताप्रश्न० - प्रश्नोपनिषद्वै०द० - वैशेषिक दर्शन
का०श्रौ० - कात्यायन श्रौतसूत्रबहु० - बह्वृचोपनिषद्शत०ब्रा० - शतपथ ब्राह्मण
कु०सं० - कुमार संभवबृह० - बृहदारण्यकोपनिषद्शब्द० - शब्दकल्पद्रुम
कृष्ण० - कृष्णोपनिषद्ब्र०बि० - ब्रह्मबिन्दूपनिषद्शां० प० - शांतिपर्व
केन० - केनोपनिषद्ब्र०वै०पु० - ब्रह्मवैवर्तपुराणशि०सं० - शिवसंकल्पोपनिषद्
कौ०ब्रा० - कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद्ब्र०सू० - ब्रह्मसूत्रशु०र० - शुकरहस्योपनिषद्
गाय० - गायत्र्युपनिषद्ब्रह्म० - ब्रह्मोपनिषद्श्वेता० - श्वेताश्वतरोपनिषद्
गी० - श्रीमद्भगवद्गीताब्रह्मा०पु० - ब्रह्माण्ड पुराणषड्०ब्रा० - षड्विंश ब्राह्मण
गो०उ० - गोपालोत्तरतापिन्युपनिषद्भा० पु० - भागवत पुराणसंन्या० - संन्यासोपनिषद्
गो० ब्रा० - गोपथ ब्राह्मणमन्त्रि० - मन्त्रिकोपनिषद्संहि० - संहितोपनिषद्
चा०नी० - चाणक्य नीतिम०स्मृ० - मनु स्मृतिस०सा० - सर्वसारोपनिषद्
छान्दो० - छान्दोग्योपनिषद्महा० - महाभारतसां०द० - सांख्यदर्शन
जाबा० - जाबालोपनिषद्महाना० - महानारायणोपनिषद्सुं० कां० - सुंदरकांड
जैमि० - जैमिनीGeneralमहो० - महोपनिषद्सूर्यो० - सूर्योपनिषद्
जै० ब्रा० - जैमिनीय ब्राह्मणमाण्डू० - माण्डूक्योपनिषद्स्कं० - स्कंदोपनिषद्
ते०बि० - तेजोबिन्दूपनिषद्मी० द० - मीमांसा दर्शनस्कं० पु० - स्कन्दपुराण
तै०आ० - तैत्तिरीय आरण्यकह०को० - हलायुध कोश
तैत्ति० - तैत्तिरीयोपनिषद्ह० प्र० - हठयोग प्रदीपिका