१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
प्रपाठक ५ मन्त्र ६ ३९५
प्रपाठक ५ मन्त्र ६ ३९५
सभी को प्रादुर्भूत करने वाला है। वह नाम तथा रूप से युक्त है, निद्रारहित और वृद्धावस्था से रहित हैं, मृत्यु
रहित हैं। इस प्रकार से उसे पाँच भागों (रूपों) में जानना चाहिए। वह हृदय रूप गुफा में ही निवास करता
है, ऐसा श्रुति का मत है। इस ॐकार रूप परमात्मा का मूल ऊर्ध्व की ओर और जहाँ तक ब्रह्म है, वहाँ
तक इसकी शाखाएँ फैली हुई हैं। वे समस्त शाखाएँ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी आदि के रूप
में हैं। इस एक ही तत्त्व के माध्यम से यह सभी कुछ प्राप्त किया जा सकता है। वही ब्रह्म है। यह समस्त
विश्व उस (ॐकार) का ही स्वरूप हैं। यह सूर्य भी ॐकार का ही रूप है। अतः ॐकार के द्वारा उस
(सूर्य) की सदा प्रार्थना करनी चाहिए। इसी एकमात्र ॐकार से ही उसके रस का बोध किया जा सकता
है, ऐसा श्रुतियों का मत हैं। यही पवित्र 'अक्षर रूप ब्रह्म है', इसी ॐकाररूप अक्षर का बोध करके मनुष्य
जो भी चाहे, इच्छानुसार प्राप्त कर सकता है ॥ ४ ॥
अथान्यत्राप्युक्तं स्तनयत्येषास्य तनूर्या ओमिति स्त्रीपुंनपुंसकमिति लिङ्गवत्-
येषाथाग्निर्वायुरादित्य इति भास्वत्येषाथ रुद्रो विष्णुरित्यधिपतिरित्येषाथ गार्हपत्यो
दक्षिणाग्निराहवनीय इति मुखवत्येषाथ ऋग्यजुःसामेति विज्ञानात्येषाथ भूर्भुवः स्वरिति
लोकवत्येषाथ भूतं भव्यं भविष्यदिति कालवत्येषाथ प्राणोऽग्निः सूर्य इति प्रतापवत्येषा-
थान्नमापश्चन्द्रमा इत्याप्यायनवत्येषाथ बुद्धिर्मनोऽहंकार इति चेतनवत्येषाथ प्राणोऽपानो
व्यान इति प्राणवत्येके त्यजामीत्युक्तैताह प्रस्तोतार्पिता भवतीत्येवं ह्याहैतद्वै सत्यकाम परं
चापरं च यदोमित्येतदक्षरमिति ॥ ५ ॥
पुनः इसके पश्चात् अन्यत्र कहा गया हैं कि इस (ब्रह्मा) का शरीर जो शब्द उच्चारित करता हैं, उसे
ॐ कहते हैं। यह (ॐकार) स्त्री-पुरुष एवं नपुंसक इन तीनों लिङ्गों से युक्त है। अग्नि, वायु एवं सूर्य के
रूप में यह प्रकाश देने वाला है तथा ब्रह्मा, रुद्र और विष्णु के रूप में अधिपति स्वरूप है। गार्हपत्य,
दक्षिणाग्नि और आहवनीय ये ही तीनों अग्नियाँ उसके तीन मुख हैं तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद को
भी वह जानने में समर्थ है। भूः, भुवः और स्वः ये तीन लोक भी इसी के रूप हैं। उस ॐकार रूप ब्रह्म
के भूत, भविष्यत् और वर्तमान तीन काल हैं। प्राण, अग्नि और आदित्य उसके प्रताप हैं। अन्न, जल और
चन्द्रमा उसके पोषक तत्त्व हैं। बुद्धि, मन और अहंकार ये तीनों उसकी चेतना हैं तथा प्राण, अपान एवं
व्यान उसके प्राण हैं। ऐसा ही अनेकों ने कहा है। यह स्तुति करने वाला तथा स्वयं अर्पित करनेवाला कहा
गया है, ऐसा श्रुति का वचन है। हे सत्य कामना वाले ! यही (ॐकार) पर एवं अपर रूप ब्रह्म हैं। यह
ॐकार ही अक्षर है ॥ ५ ॥
अथ व्यात्तं वा इदमासीत्सत्यं प्रजापतिस्तपस्तप्त्वा अनुव्याहरद्भूभुर्वः स्वरित्येषा
हाथ प्रजापतेः स्थविष्ठा तनूर्वा लोकवतीति स्वरित्यस्याः शिरो नाभिर्भुवो भूः पादा
आदित्यश्चक्षुरायत्तः पुरुषस्य महतो मात्राश्चक्षुषा ह्ययं मात्राश्चरति सत्यं वै
चक्षूरक्षिण्युपस्थितो हि पुरुषः सर्वार्थेषु वदत्येतस्माद्भूभुर्वः स्वरित्युपासीतान्नं हि प्रजापति-
र्विश्वात्मा विश्वचक्षुरिवोपासितो भवतीत्येवं ह्याहैषा वै प्रजापतिर्विश्वभृत्तनूरेतस्यामिदं
सर्वमन्तर्हितमस्मिंश्च सर्वस्मिन्नेषान्तर्हितेति तस्मादेषोपासीतेति ॥ ६ ॥
इसके अनन्तर इस (ॐकाररूप ब्रह्म) ने जो विस्तार किया, वही सत्य है। प्रजापति ने कठोर तप
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करके उन तीन व्याहृतियों भूः, भुवः और स्वः का उच्चारण किया। यही (व्याहृतियाँ) प्रजापति का स्थूल
शरीर है। इसका निर्माण लोकों के द्वारा हुआ है। स्वः उसका मस्तक है, भुवः नाभि है, भूः पैर हैं और
आदित्य उसके नेत्र हैं। यह सब उसके अधीन है। महापुरुषों की ये मात्राएँ (अंश) हैं। यह (पुरुष) नेत्रों
के द्वारा इन मात्राओं में गमन करता है। सत्य ही नेत्र हैं। नेत्र में स्थित पुरुष ही सभी पदार्थों के विषय में
बतलाता है। अतः भूः, भुवः और स्वः इस विधि के अनुसार ही उपासना करनी चाहिए। अन्न ही प्रजापति
है। वह सभी का आत्मा तथा सभी का चक्षु है, वह उपास्य है, ऐसा वेद भी कहते हैं। यह प्रजापति ही
समस्त विश्व को धारण करने वाला शरीर है, इसमें वह सभी कुछ स्थित है तथा वह इन सभी में विद्यमान
है। अतः इसी श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करनी चाहिए ॥ ६ ॥
तत्सवितुर्वरेण्यमित्यसौ वा आदित्यः सविता स वा एवं प्रवरणाय आत्मकामेनेत्या-
हुर्ब्रह्मवादिनोऽथ भर्गो देवस्य धीमहीति सविता वै तेऽवस्थिता योऽस्य भर्गः कं
संचिन्तयामीत्याहुर्ब्रह्मवादिनोऽथ धियो यो नः प्रचोदयादिति बुद्धयो वै धियस्ता योऽस्माकं
प्रचोदयादित्याहुर्ब्रह्मवादिनोऽथ भर्ग इति यो ह वा अस्मिन्नादित्ये निहितस्तारकेऽक्षिणि
वैष भर्गाख्यो भाभिर्गतिरस्य हीति भर्गो भर्जति वैष भर्ग इति रुद्रो ब्रह्मवादिनोऽथ भ
इति भासयतीमाँल्लोकान् र इति रञ्जयतीमानि भूतानि ग इति गच्छन्त्यस्मिन्नागच्छन्त्य-
स्मादिमाः प्रजास्तस्माद्भरगत्वाद्वर्गः। शश्वत्सूयमानत्वात्सूर्यः सवनात्सविताऽऽदाना-
दादित्यः पवनात्पावमानोऽथायनादादित्य इत्येवं ह्याह खल्वात्मनात्मामृताख्यश्चेता मन्ता
गन्ता स्रष्टाऽऽनन्दयिता कर्ता वक्ता रसयिता घ्राता स्पर्शयिता च विभुर्विग्रहे संनिविष्ट
इत्येवं ह्याहाथ यत्र द्वैतीभूतं विज्ञानं तत्र हि शृणोति पश्यति जिघ्रति रसयते चैव स्पर्शयति
सर्वमात्मा जानीतेति यत्राद्वैतीभूतं विज्ञानं कार्यकारणनिर्मुक्तं निर्वचनमनौपम्यं निरूपाख्यं
किं तदङ्ग वाच्यम् ॥ ७॥
'तत्सवितुर्वरेण्यं' यही उस सविता का प्रकाश है अथवा स्वयं ही यह आदित्य है और यही समस्त
प्राणि-समुदाय को उत्पन्न करने वाला 'सविता' है। ऐसा जानकर आत्मतत्त्व की इच्छा रखने वाले को,
उसी को ग्रहण करने के लिए तत्पर रहना चाहिए। ऐसा ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले कहते हैं। अब 'भर्गो
देवस्य धीमहि' इस पद का विवेचन करते हैं; इसके अनुसार क्योंकि वह 'भर्ग' सम्मुख ही उपस्थित रहता
है। उनका जो 'भर्ग' है, वह बुद्धि (ज्ञान) को प्राप्त करता रहता है। ब्रह्मवादी प्रायः प्रश्न करते रहते हैं कि
हम किसका चिंतन करें ? तो इसका उत्तर यह है कि हम उस 'भर्ग शक्ति' का ही ध्यान करें। अब 'धियो
यो नः प्रचोदयात्' की विवेचना करते हैं। इसके अनुसार बुद्धि को ही 'धी' कहते हैं। 'जो हमारी बुद्धि
को प्रेरणा प्रदान करता है - सन्मार्ग की ओर उन्मुख करता है' ऐसा ब्रह्मवादी कहते हैं। 'भर्ग' वही है,
जो सूर्य में निहित है। आँख की पुतली में भी 'भर्ग' स्थित है। इसकी कान्ति से मनुष्य गति करता है, अतः
यह 'भर्ग' है अथवा यह सभी को तप्त करता है, इस कारण से यह 'भर्ग' कहलाता है। यह रुद्र को ब्रह्म
मानने वालों के विचार हैं। 'भ' अर्थात् लोकों को प्रकाशित करने वाला, 'र' अर्थात् समस्त प्राणियों का
रञ्जन करने वाला एवं 'ग' अर्थात् प्राणियों-प्रजाओं के गमनागमन का आधार स्वरूप, इस प्रकार भ, र,
ग होने से भर्ग है। निरन्तर प्रसव (जन्म देने) के कारण सूर्य कहलाता है, सबको प्रादुर्भूत करने के कारण