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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥

Page 332Permalink

३३२ बृहदारण्यकोपनिषद्
॥ सप्तमं ब्राह्मणम् ॥
विद्युद्ब्रह्मेत्याहुर्विदानाद्विद्युद्विद्यत्येनं पाप्मनो य एवं वेद विद्युद्ब्रह्मेति विद्युद्ध्येव ब्रह्म ॥
विद्युत् ही (प्रकाश स्वरूप) ब्रह्म है, इस प्रकार (प्रायः लोग) कहते हैं। पापों का खण्डन अथवा विनाश करने
में सक्षम होने से ब्रह्म ही विद्युत् (प्रकाश) स्वरूप है। जो (व्यक्ति) 'विद्युत् ब्रह्म है' इस प्रकार जानता है, उसके
पापों का (यह विद्युत् ब्रह्म) शमन कर देता है; क्योंकि प्रकाश के रूप में विद्युत् ही ब्रह्म है॥ १ ॥
॥ अष्टमं ब्राह्मणम् ॥
वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चत्वारः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हन्तकारः
स्वधाकारस्तस्या द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हन्तकारं मनुष्याः
स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः ॥ १ ॥
वाणी की, कामधेनु गौ के समान उपासना करे। उस गौ के स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार तथा
स्वधाकार ये चार स्तन हैं। उसके दो स्तन स्वाहाकार और वषट्कार से देवताओं की जीविका चलती है,
हन्तकार से मनुष्य जीवन पाते हैं तथा स्वधाकार से पितृगण जीवित रहते हैं। उस वाणी रूपी धेनु के लिए
प्राण ही वृषभ है और मन ही वत्स (बछड़ा) रूप है॥ १ ॥
॥ नवमं ब्राह्मणम् ॥
अयमग्निवैश्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति
यमेतत्कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषः शृणोति ॥ १ ॥
यह वैश्वानर अग्नि ही है, जो सभी पुरुषों के शरीर में स्थित है। जो अन्न भक्षण किया जाता है, उसका
पाचन शरीर में स्थित यह वैश्वानर अग्नि ही करता है। उसी का ही यह घोष (नाद) होता है, जिसे व्यक्ति
कानों को बन्द करके अनहद नाद की भाँति श्रवण करता है। जिस समय यह प्राण (पुरुष) शरीर से बाहर
निकलने वाला होता है, उस समय इस नाद को नहीं श्रवण कर पाता ॥ १ ॥
॥ दशमं ब्राह्मणम् ॥
यदा वै पुरुषोऽस्माल्लोकात्प्रैति स वायुमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा रथचक्रस्य
खं तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स आदित्यमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा लम्बरस्य खं
तेन स ऊर्ध्व आक्रमते स चन्द्रमसमागच्छति तस्मै स तत्र विजिहीते यथा दुन्दुभेः खं तेन स
ऊर्ध्व आक्रमते स लोकमागच्छत्यशोकमहिमं तस्मिन्वसति शाश्वतीः समाः ॥ १ ॥
जब यह पुरुष इस (मनुष्य) लोक से उन्मुक्त होकर गमन करता है, तब वह सर्वप्रथम वायु लोक को
प्राप्त करता है। (तदनन्तर) वहाँ पर वह वायु उसके लिए छिद्र युक्त होकर मार्ग प्रदान कर देता है, वह छिद्र
रथ के पहिये की भाँति होता है। उस (छिद्र) के द्वारा वह ऊर्ध्व की ओर आरोहण करता है। इसके पश्चात्
वह सूर्यलोक में प्रतिष्ठित होता है। वहाँ पर सूर्य भी उसके लिए लम्बर नामक वाद्ययन्त्र के छिद्र की भाँति
रास्ता प्रदान करता है। वहाँ से वह ऊर्ध्व की ओर आरोहण करते हुए चन्द्रलोक में पहुँचता है। वहाँ चन्द्रमा
भी उसके लिए दुन्दुभि के छिद्र की तरह का मार्ग देता है। उस मार्ग के द्वारा ही वह ऊपर की ओर बढ़ता
है। इसके बाद वह अशोक (अर्थात् मानसिक पीड़ा से रहित ) और अहिम (अर्थात् शारीरिक दुःख से
रहित) नामक लोक में पहुँचकर वहाँ सदा अनन्त वर्षों तक (अनन्तकाल तक) निवास करता है॥ १ ॥