१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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अचल रहने वाले, सबकी बुद्धि में अधिष्ठित, सब प्राणियों के साक्षीरूप, राग-आसक्ति आदि भावों से दूर,
लोभ, मोह, अहंकार जैसे सामान्य त्रिगुणों से रहित हैं, उन सद्गुरु को हम नमस्कार करते हैं ॥ २१ ॥
अथ महावाक्यानि चत्वारि । यथा ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ १ ॥ ॐ अहं ब्रह्मास्मि ॥ २ ॥
ॐ तत्त्वमसि ॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म ॥ ४ ॥ तत्त्वमसीत्यभेदवाचकमिदं ये जपन्ति
ते शिवसायुज्यमुक्तिभाजो भवन्ति ॥ २२ ॥
अब चार महावाक्य दिये जाते हैं। ॐ प्रज्ञानम् ब्रह्म (प्रकृष्ट ज्ञान ब्रह्म है) ॥ १ ॥ ॐ अहं
ब्रह्मास्मि (मैं ब्रह्म हूँ) ॥ २ ॥ ॐ तत्त्वमसि (वह ब्रह्म तुम्हीं हो) ॥ ३ ॥ ॐ अयमात्मा ब्रह्म (यह आत्मा
ब्रह्म है) ॥ ४ ॥ इनमें से यह 'तत्त्वमसि' महावाक्य ब्रह्म से अभेद का प्रतिपादन करता है। जो साधक
इसका जप (चिन्तन-मनन) करते हैं, वे भगवान् शिव की सायुज्य मुक्ति का फल प्राप्त करते हैं ॥
आगे 'ॐ तत्त्वमसि' महावाक्य के 'तत्' पद के षडंग विनियोग एवं दिग्बन्ध सहित ध्यान का विवरण
प्रस्तुत किया गया है-
तत्पदमहामन्त्रस्य । हंस ऋषिः । अव्यक्तगायत्री छन्दः । परमहंसो देवता । हं
बीजम् । सः शक्तिः । सोऽहं कीलकम् । मम सायुज्यमुक्त्यर्थे जपे विनियोगः । तत्पुरु-
षाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ईशानाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । अघोराय मध्यमाभ्यां वषट् ।
सद्योजाताय अनामिकाभ्यां हुम् । वामदेवाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । तत्पुरुषेशानाघोर-
सद्योजातवामदेवेभ्यो नमः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः
सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ २३ ॥
तत्पुरुष को नमस्कार है- अँगूठे का स्पर्श। ईशान को नमन - तर्जनी का स्पर्श। अघोर को नमन-
मध्यमा अँगुली का स्पर्श। सद्योजात को नमन- अनामिका का स्पर्श। वामदेव को नमन- कनिष्ठिका का
स्पर्श तत्पुरुष, ईशान, अघोर, सद्योजात और वामदेव को नमन है- करतल-करपृष्ठ का स्पर्श। इसी प्रकार
हृदयादि न्यास का क्रम है। ॐ (परमात्मा) भूः (भूलोक), भुवः (अन्तरिक्ष लोक) एवं स्वः (द्युलोक)
में संन्यास है- उसे नमस्कार है- सभी दिशाओं से रक्षा का विधान ॥ २३ ॥
ध्यानम् -
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यादतीतं शुद्धं बुद्धं मुक्तमप्यव्ययं च ।
सत्यं ज्ञानं सच्चिदानन्दरूपं ध्यायेद्देवं तन्महो भ्राजमानम् ॥ २४ ॥
वह ज्ञानरूप, जानने योग्य है एवं ज्ञानगम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध रूप, बुद्धिरूप, मुक्तरूप,
अविनाशी रूप है। वही सत्य, ज्ञान, सच्चिदानन्दरूप ध्यान करने योग्य है। हमें उस महातेजस्वी देव का
ध्यान करना चाहिए ॥ २४ ॥
आगे 'ॐ तत्त्वमसि' महावाक्य के 'त्वम्' पद के षडङ्ग विनियोग एवं दिग्बन्ध सहित ध्यान का विवरण
प्रस्तुत किया गया है-
त्वंपदमहामन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः । गायत्रीछन्दः । परमात्मा देवता । ऐं बीजम् । क्लीं
शक्तिः । सौः कीलकम् । मम मुक्त्यर्थे जपे विनियोगः । वासुदेवाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
संकर्षणाय तर्जनीभ्यां स्वाहा । प्रद्युम्नाय मध्यमाभ्यां वषट् । अनिरुद्धाय अनामिकाभ्यां
हुम् । वासुदेवाय कनिष्ठिकाभ्यां वौषद् । वासुदेवसंकर्षणप्रद्युम्नानिरुद्धेभ्यः करतलकर-
पृष्ठाभ्यां फट् । एवं हृदयादिन्यासः । भूर्भुवः सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥ २५ ॥