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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

षष्ठ लम्बक ६११

षष्ठ लम्बक ६११
'संसार में धन देना ही सबसे महान् तप है। अर्थ देनेवाला प्राणदाता कहा जाता है
क्योंकि प्राण धन में कीलित हैं॥९॥
करुणा से व्याकुलचित्त बुद्ध ने अपनी आत्मा को भी तृण के समान दे डाला। तब
अकिंचन जन की क्या कथा ॥१०॥
ऐसे धैर्ययुक्त तप से निरीह बुद्ध ने दिव्य ज्ञान प्राप्त कर बुद्धत्व लाभ किया ॥११॥
इसलिए सभी प्रिय पदार्थों से आशा को हटाकर बुद्धिमान् व्यक्ति को भलीभाँति
ज्ञान की प्राप्ति के लिए आजीवन प्राणियों का हित करना चाहिए' ॥१२॥
सात राजकुमारियों की कथा
पूर्व समय में कृक नाम के किसी राजा की क्रम से अति सुन्दरी सात कन्याएँ उत्पन्न
हुईं॥१३॥
बाल्यकाल में ही वे कन्याएँ वैराग्य से पिता का घर छोड़कर श्मशान का सेवन करने
लगीं और अपने कुटुम्बियों से कहने लगीं—॥१४॥
'यह सारा विश्व असार है। उसमें भी यह तुच्छ शरीर सर्वथा असार है उसमें भी
अपनी प्रिय वस्तुओं या प्राणियों का मिलना स्वप्न सा-सा भ्रम है॥१५॥
ऐसे असार संसार में दूसरों का हित करना ही एक मात्र सार है। इसलिए हमलोग इस
शरीर से भी परहित कर रही हैं॥१६॥
इस जीते हुए सुन्दर शरीर को हम श्मशान में फेंक देती हैं जिससे यह मांस खानेवाले
पशु-पक्षियों के उपयोग में आ सके। अन्यथा इस सुन्दर शरीर का क्या उपयोग है?' ॥१७॥
एक विरक्त राजकुमार की कथा
और भी सुनो। पूर्वकाल में एक राजपुत्र था। वह सुन्दर युवा होने पर भी
परिव्राजक बन गया ॥१८॥
वह भिक्षु किसी वैश्य के घर कभी भिक्षा लेने के लिए गया। कन्दर्प के समान
बड़े-बड़े नेत्रवान् उस भिक्षुक को उस वैश्य की युवती स्त्री ने देखा और वह उसके
आँखों के लावण्य पर आसक्त होकर बोली—'राम सुन्दर तुमने यह कष्टकर व्रत क्यों धारण
किया॥१९-२०॥
वह स्त्री धन्य है जो तुम्हारे इन नयनों से देखी जाती है। उसके इस प्रकार कहने
पर भिक्षु ने अपनी आँख फोड़ ली। ॥२१॥
१ ऐसी ही दन्तकथा महाकवय कवि सूरदास के सम्बन्ध में प्रचलित है। आयर-
लैण्ड के आरक्षी बीजीड के सम्बन्ध में भी ऐसी दन्तकथा प्रचलित है।—अनु.

६३२ कथासरित्सागर

६३२ कथासरित्सागर
अनेन च हस्ते कृत्वा तन्मातः पश्येदमीदृशम् ।
जुगुप्सितमसृङ्मांसं गृह्यतां यदि रोचते ॥२२॥
ईदृगेव द्वितीयं च वद रम्यं किमेतयोः ।
इत्युक्ता तेन तद्दृष्ट्वा व्यषीदत्सा वणिग्वधूः ॥२३॥
उवाच च हहा ! पापं मया कृतमभव्यया ।
यदहं हेतुतां प्राप्ता लोचनोत्पाटने तव ॥२४॥
तच्छ्रुत्वा भिक्षुरवदन्माभूद्व्यथा तव भव्या ।
मम त्वया ह्युपकृतं यत् शृणु निदर्शनम् ॥२५॥

एकस्य तपस्विनः राज्ञश्च कथा

आसीत्कोऽपि पुरा कान्ते कुत्राप्युपवने यतिः ।
मनुजाङ्गत्वपि वैराग्यनिश्चयेनिकयेच्छया ॥२६॥
तपस्यतश्च कोऽप्यस्य राजा तत्रैव दैवतः ।
विहर्तुमागतः साकमवरोधवधूजनैः ॥२७॥
विहृत्य पानसुप्तस्य पार्श्वादुत्थाय तस्य च ।
नृपस्य चापलाद्राज्ञीसमस्तदुद्याने किलाभ्रमन् ॥२८॥
दृष्ट्वा तत्रैकदेशे च तं समाधिस्थितं मुनिम् ॥
अतिष्ठन्परिवार्यैनं किमेतदिति कौतुकात् ॥२९॥
चिरस्थितासु तास्वत्र प्रबुद्धः सोऽथ भूपतिः ।
अपश्यन् दयिताः पार्श्वे तत्र बभ्राम सर्वतः ॥३०॥
ददर्श चात्र राज्ञीस्ताः परिवार्य मुनिं स्थिताः ।
कुपितश्चेर्ष्यया तस्मिन्खड्गेन प्राहरन्मुनौ ॥३१॥
ऐश्वर्यमीर्ष्यानिर्बुद्ध्यं क्षीबस्य निर्विवेकिता ।
एकैकं किं न यत्कुर्यात् पञ्चाङ्गिरवे तु का कथा ॥३२॥
ततो गते नृपे तस्मिंस्तादृशमपि तं मुनिम् ।
अमूर्तं प्रकटीभूय काप्युवाचात्र देवता ॥३३॥
महात्मन्येन पापेन क्रोधेनैतत्कृतं त्वयि ।
स्वशक्त्या तमहं हन्मि मन्यते यदि तद्भवान् ॥३४॥

षष्ठ लम्बक ६३३

षष्ठ लम्बक ६३३
और, उन आँखों को हथेली में रखकर कहा—देखो माता यह ऐसी है। यह घृणित
रक्त और मांस है। यदि अच्छा लगता है तो इसे ले लो॥२२॥
इसी प्रकार की दूसरी भी आँख है। बताओ इनमें कौन अधिक सुन्दर है। भिक्षु के
इस प्रकार कहने पर वैश्यवधू खिन्न हो गई॥२३॥
और कहने लगी 'हाय हाय अभागिन मैंने यह क्या पाप कर डाला! मैं तुम्हारी आँखों
के उखाड़ने का कारण बनी!॥२४॥
यह सुनकर भिक्षुक बोला—'माता तुम्हें कष्ट न होना चाहिए। तुमने मेरा उपकार
किया है। इस प्रसंग में उदाहरण सुनो॥२५॥
एक तपस्वी और राजा की कथा
प्राचीन समय में गंगा के किसी तट पर स्थित एक सुन्दर उपवन में वैराग्य के कारण
सब कुछ त्यागने की इच्छा से एक यति रहता था॥२६॥
उसके तपस्या करते हुए कोई राजा अपने रनिवास की रानियों के साथ घूमने के लिए
वहाँ आया॥२७॥
विहार करने के पश्चात् मद्यपान करके सोए हुए उस राजा के पास से उठकर चंचल
रानियाँ उद्यान में चारों ओर घूमने लगीं॥२८॥
उस उद्यान के एक ओर समाधि में बैठे हुए मुनि को देखकर 'यह क्या है' इस प्रकार
के कौतुक से वे उसे घेर कर बैठ गईं॥२९॥
विलम्ब हो जाने के कारण जागने पर राजा ने उन्हें देखने के लिए चारों ओर
चक्कर लगाना प्रारम्भ किया॥३०॥
ढूँढ़ते हुए उसने जब मुनि को घेरकर बैठी हुई रानियों को देखा तब राजा ने डाह से
जलती हुई तलवार निकालकर उससे मुनि पर प्रहार कर दिया॥३१॥
ऐश्वर्य, डाह, निर्दयता, मदोन्मत्तता और विवेक-शून्यता इनमें एक ही क्या अनर्थ
नहीं कर सकता? यदि पाँचों अनियाँ एकत्र हों तो क्या कहना॥३२॥
राजा के चले जाने पर कटे हुए अंगोंवाले क्रोध रहित मुनि के सामने प्रकट होकर किसी
देवी ने कहा—॥३३॥
'हे महात्मन्! जिस पापी ने क्रोध से तुम्हारे प्रति यह अत्याचार किया है, उसे मैं
अपनी शक्ति से मार देती हूँ यदि तुम चाहो तो'॥३४॥
८

११४ कथासरित्सागर

११४ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा स जगावैतद्देवि मा स्मैवमादिशः ।
स हि धर्मसहायो मे न विप्रियकृत् पुनः ॥३५॥
तत्प्रसादात्क्षमाधर्मं भगवत्याप्तवानहम् ।
कस्य क्षमय किं देवि नैव घोरं समाचरेत् ॥३६॥
न कोपो नदवरस्यास्य देहस्यार्थे मनस्विनः ।
प्रियाप्रियेपु साम्येन क्षमा हि ब्रह्मणः पदम् ॥३७॥
इत्युक्ता मुनिना साभ्रं तपसा तस्य तोषिता ।
अङ्गानि देवता कृत्वा निर्व्रणानि तिरोदधे ॥३८॥
तदद्या सोऽपि तस्यैवैपकारी मतो नृप ।
: नेत्रोत्खननहेतोस्त्वं तपोवृद्ध्या तथास्य मे ॥३९॥
इत्युक्त्या स वशी भिक्षुर्विनम्रां तां वणिग्वधूम ।
शान्तेऽपि वपुषि स्वस्मिन्नतास्थः सिद्धये ययौ ॥४०॥
सम्माद्यालेऽपि रम्येऽपि यः काये गत्वरे ग्रहः ।
सस्योपचारस्वतन्मात्रैः प्राज्ञस्य दास्यते ॥४१॥
तदिमा वयमेतस्मिन्निसर्गसुभगर्द्धयनि ।
श्मशाने प्राणिनामर्थे विक्षिप्यामः शरीरकम् ॥४२॥
इत्युक्त्वा परिवारं ता मन्त्रं राजकुमार्किका ।
तयैव यत्र प्रापुश्च मन्सिद्धिं परां ततः ॥४३॥
एवं निस्त्रे शरीरेऽपि ममत्वं नास्ति धीमताम् ।
कि पुन गतदाराग्निपरिग्रहवृणेष्विह ॥४४॥
इत्याकर्ण्य स नृपः श्रुत्वा विहारे धर्मशाटवान् ।
बुद्धिमन्तो भीत्या स विप्रं प्रायात् स्वमन्दिरम् ॥४५॥
तत्रात्तवाप्यमातङ्गः कल्याणप्रभायाः पुनः ।
स राजा शृण्वन् चैनाप्यम् द्विजन्मना ॥४६॥
राजन् कि वञ्चकाग्रस्तप्रमनाः परितप्यसे ।
गुरुम्योऽप्युत्तमाः सन्तः निबन्धेह परत्र च ॥४७॥
: गज्जत्सत्त्वं का तत्त युक्तेरात्मा महीभृताम् ।
यं भक्षयन्ति जना यत्र भाटका इव ॥४८॥
नृपान्तु श्रुतिमात्राद्या मुख्यश्चिन्त्यतया गुणैः ।
तीर्णा दुस्तरदुर्गाश्च प्रभूतिक्षमः पशमदम् ॥४९॥

षष्ठ लम्बक ११५

षष्ठ लम्बक ११५
यह सुनकर वह ऋषि बोला- देवि ऐसा न करो। वह राजा मेरे धर्म में सहायक है
विरोधी नहीं ॥३५॥
हे भगवति उसकी कृपा से मुझे क्षमा-धर्म मिला। यदि वह ऐसा न करे, तो किस पर
क्षमा की जाय ॥३६॥
मनस्वी जन इस नश्वर शरीर के लिए कोप नहीं करते। मित्र और शत्रु पर समान रूप
से क्षमा करना ही ब्राह्मण का धर्म है ॥३७॥
इस प्रकार मुनि से कही गई और उसकी तपस्या से सन्तुष्ट वह देवी यति के अंगों को
अक्षत (पूर्ण) करके अन्तर्धान हो गई ॥३८॥
अतः जैसे वह राजा उस ऋषि का उपकारी बना उसी प्रकार आँखें उखाड़ लेने के
कारण मेरे तप को बढ़ाकर हे माता तुमने भी उपकार किया है ॥३९॥
ऐसा कहकर वह यती भिक्षु प्रणाम करती हुई उस वैश्य-वधू के मग्न होने पर अपने सुन्दर
शरीर का भी ध्यान न देकर सिद्धि के लिए चला गया ॥४०॥
यह कथा सुनकर राजकन्याएं बोलीं—इसलिए चारु और सुन्दर होने पर भी नष्ट होने
वाले शरीर पर क्या आग्रह ? इसलिए प्राणिमात्र के प्रति उपकार करना ही एक मात्र
बुद्धिमान् के लिए प्रशंसनीय कार्य है ॥४१॥
इसलिए हम सातों कन्याएं स्वाभाविक सुख के घर इस श्मशान में प्राणियों के उपकार
के लिए क्षुद्र शरीर को दे रही हैं॥४२॥
अपने परिवारवालों को इस प्रकार कहकर उन सातों राजकुमारियों ने ऐसा ही
किया और उससे परमसिद्धि प्राप्त की ॥४३॥
बुद्धिमानों को अपने शरीर पर भी ममता नहीं होती। पुत्र-दारा आदि घास-फूस की
तो बात ही क्या ॥४४॥
उस राजा ने विहार में धर्मोपदेशक से यह सब बातें सुनकर दिन व्यतीत किया और
सायंकाल अपने भवन में आकर फिर भी कन्या-जन्म के शोक में मग्न हो गया। इतने पर
घर के किसी बूढ़े ब्राह्मण ने आकर राजा से कहा—हे राजन् ! कन्यारत्न के जन्म से क्यों
इतना सन्तप्त हो रहे हो। कन्याएँ तो पुत्र से भी उत्तम होती हैं और इहलोक तथा परलोक
में भी कल्याण देनेवाली होती हैं ॥४५-४७॥
राज्य के लोभी पुत्रों में राजाओं का कैसा प्रेम जो बन्दरों के समान पिता को नोच
खाते हैं॥४८॥
कुन्तिभोज आदि राजा कुन्ती आदि कन्याओं के कारण ही दुःसह दुर्वासा आदि के
शाप से बच गये ॥४९॥

१६६ कथासरित्सागर

१६६ कथासरित्सागर
फल यच्च सुतादानात् कृत पुत्रात् परत्र यत्।
सुलोचनाख्यामत्र किञ्च यन्मि निशम्यताम् ॥५०॥
सुषेणनृपते कथा
आसीद्राजा सुषेणाख्यश्चित्रकूटाचले युवा।
कामोऽन्य इव यो धात्रा निर्मितस्त्र्यम्बकेर्ष्या ॥५१॥
स चक्रे दिव्यमारामं मूले तस्य महागिरे ।
सुराणां नन्दनोद्यानवासवैरस्यदायिनम् ॥५२॥
तन्मध्ये च चकारैकां वापीमुत्फुल्लपङ्कजाम्।
लक्ष्मीलीलाारविन्दानां नवाकरमहीमिव ॥५३॥
सस्यास्तस्थौ स सद्रत्नसोपानायास्तटे सदा।
पत्नीनां स्वानुरूपाणामभावादवधूसखः ॥५४॥
एकदा तेन मार्गेण नभसा सुरसुन्दरी।
रम्भा जम्भारिभवनादाजगाम यदृच्छया ॥५५॥
सा तं ददर्श राजानं तत्रोद्याने विहारिणम्।
साक्षा मधुमिवोत्फुल्लपुष्पकाननमध्यगम् ॥५६॥
वापिकापद्मपतितां दिवोऽनु पतितां श्रियम्।
चन्द्रं किमेष नैसद् वा क्षीरस्य ह्यनपायिनी ॥५७॥
नूनं पुष्पोपद्यानं पुष्पेक्षुः सोऽयमागतः।
किं तु सा रतिरेतस्य क्व गता सहचारिणी ॥५८॥
इत्यौत्सुक्यकृताश्लेषा सावतीर्ण मभोन्तरात्।
रम्भा मानुषरूपेण राजानं तमुपागमत् ॥५९॥
उपेतां तां च महसा दृष्ट्वा राजा सविस्मय ।
अचिन्तयदहो नेयमसंभाव्यवपुर्भवेत् ॥६०॥
न तावन्मानुषी येन पादौ मास्य रजःस्पृशौ।
न चक्षुः सनिमेषं वा तस्माद्दिव्यैव साप्सरो ॥६१॥
प्रष्टव्या तु मया नयं पलायेत हि जातुचित्।
रतिभेनासहा प्रायो दिव्याः कारणक्रुताः ॥६२॥
इति ध्यायन् स नृपतिः कृतसम्भाषणस्तया।
वरक्रमणेय हरकार तत्कथापदमाप्तवान् ॥६३॥

राजा सुषेण और सुलोचना की कथा

षष्ठ स्तम्बक १३७
कन्यादान से परलोक में जो सुख मिलता है वह पुत्रों से कहाँ मिल सकता है ?
राजा सुषेण और सुलोचना की कथा
मैं इस सम्बन्ध में सुलोचना की कथा कहता हूँ सुनो ॥५० ॥
चित्रकूट^१ पर्वत पर सुषेण नाम का एक युवा राजा था। उसे ब्रह्मा ने मानों शिवजी
की ईर्ष्या से नवीन कामदेव के समान निर्मित किया था। उस राजा ने उस विशाल पर्वत की
तलहटी में एक सुन्दर उद्यान बनवाया जो देवताओं के नन्दन वन के विहार में विरसता उत्पन्न
करता था। अर्थात् उसने अपनी सुन्दरता से नन्दन वन को भी तिरस्कृत कर दिया था ॥५१-५२॥
उस उद्यान के मध्य उस राजा ने विकसित कमलों वाली एक सुन्दर बावली बनवाई
थी जो मानों लक्ष्मी के लीला कमलों के लिए नये खजाने के समान थी ॥५३॥
अच्छ रत्नों से जड़ी हुई सीढ़ियोंवाली उस बावली के किनारे पत्नियों के अभाव में
वह अकेला ही बैठा रहता था। एक बार उसी के आकाशमार्ग से जाती हुई रम्भा इन्द्र-भवन
से अकस्मात् वहीं आ गई ॥५४-५५॥
रम्भा ने उद्यान में बैठे हुए राजा को इस प्रकार देखा मानों प्रफुल्ल पुष्प-वन में मूर्ति
मान् वसन्त विराजमान हो ॥५६॥
उसे देखकर रम्भा सोचने लगी बावली के कमलों पर गिरी हुई क्या यह स्वयं की लक्ष्मी
है ?^२ अथवा साक्षात् चन्द्रमा है ? क्या यह इसकी स्थायी शोभा है अथवा पुष्पधन्वा कामदेव
स्वयं ही पुष्प-चयन करने यहाँ उपस्थित हुआ है। किन्तु यदि वह है तो उसकी सहचारिणी
रति यहाँ कहाँ है। उत्सुकता के कारण इस प्रकार तर्क-वितर्क करती हुई रम्भा मनुष्य के
रूप में राजा के समीप आई ॥५७-५९॥
समीप आई हुई उसे देखकर राजा सोचने लगा कि यह असम्भव शरीरवाली कौन
स्त्री है ? यह मानुषी तो नहीं है क्योंकि इसके चरण भूमिस्यर्श नहीं करते और आँखें भी अपलक
हैं। अतः यह अवश्य ही कोई दिव्या स्त्री है ॥६०-६१॥
पूछने पर कदाचित् यह भाग न जाय इसलिए इससे पूछना नहीं चाहिए। कारण में
शंकित दिव्य स्त्रियाँ प्राय रति का भेद (रहस्य खुलना) सहन नहीं करतीं ॥६२॥
ऐसा सोचते हुए उस राजा ने उससे बात करते हुए समझ उसी समय उस सूखे से
सङ्ग किया ॥६३॥
१ किसी-किसी पुस्तक में त्रिकूटाचल पर्वत का नाम आया है। यह हिमालय का एक
भाग है, जिसके शिखर, सोने चान्दी और लोहे के बने हुए हैं। श्रीमद्भागवत के आठव स्कन्ध
में इसका कथन है।
२ इस वाक्य में उत्प्रेक्षालंकार है।

१२८ कथासरित्सागर

१२८ कथासरित्सागर
चिक्रीड च चिरं सोऽत्र साकमप्सरसा तया।
दिवं सापि न सस्मार रम्यं प्रेम न जन्मभूः ॥६४॥
तत्सखीयक्षिणीवृष्टेरुपरी स्वर्णराशिभिः।
सास्यभूमिर्नरेन्द्रस्य धौतैश्शिखरैरिव ॥६५॥
कालेन चास्य राज्ञ सा सुवेगस्य वराप्सराः।
असूतानन्यसदृशीं धृतगर्भा सती सुताम् ॥६६॥
प्रसूतमात्रैव च सा जगादेनं महीपतिम्।
राजञ्शापोऽयमीवृद्धमे क्षीणो जात' स चाधुना ॥६७॥
अहं हि रम्भा नाकस्त्री त्वयि दृष्टेऽनुरागिणी।
जाते च गर्भे मुक्त्वा तं गच्छामस्तत्क्षणं वयम् ॥६८॥
समयो हीदृशोऽस्माकं तद्रक्षे कन्यकामिमाम्।
एतद्विवाहाज्ञाके नो भूयो भावी समागमः ॥६९॥
एवमुक्त्वाप्सरा रम्भा विवशा सा तिरोदधे।
तद्दुःखान्न च स राजाभूत्तदा प्राणव्ययोद्यतः ॥७०॥
निरास्थेनापि किं त्यक्तं विश्वामित्रेण जीवितम्।
मेनकायां प्रयातायां प्रसूयैव शकुन्तलाम् ॥७१॥
इत्यादि सचिवैरुक्तो ज्ञातार्थः स नृपो धृतिम्।
शनैरादत्त कन्यां च पुनस्सङ्गमकारणम् ॥७२॥
तां च बालां सवेगाग्र पिता सर्वाङ्गसुन्दरीम्।
सोऽतिलोचनसौन्दर्यान्नाम्ना चक्रे सुलोचनाम् ॥७३॥
कालेन यौवनप्राप्तामुद्यानस्थां ददर्श ताम्।
युवा यदृच्छया भ्राम्यन्वत्सस्य काश्यपो मुनिः ॥७४॥
स तपोराशिरूपोऽपि दृष्ट्वैवैतां नृपात्मजाम्।
अनुरागरसोऽभूदिति धाम व्यचिन्तयत् ॥७५॥
अहो रूपं किमप्यस्याः कन्यायाः परमाद्भुतम्।
नेमां प्राप्नोति चेद् भार्या किमन्यत्तपसः फलम् ॥७६॥
इति ध्यायन् मुन्युवा स सुलोचनया तया।
अददर्शि प्रज्वलत्तेजा विधूम इव पावकः ॥७७॥
तं वीक्ष्य सापि सप्रेमा साक्षसूत्रकमण्डलुम्।
शान्तश्च कमनीयश्च कोऽयं स्यादित्यचिन्तयत् ॥७८॥

षष्ठ स्तबक ६६१
तदनन्तर वह राजा चिरकाल तक इस उद्यान में उस अप्सरा के साथ क्रीड़ा करता रहा।
रम्भा भी स्वर्ग को भूल गई। सच है, प्रेम प्यारा होता है, जन्मभूमि नहीं॥१४॥
जैसे आकाश सुभट के स्वर्ण-शृंगों से भर जाता है, उसी प्रकार रम्भा की सखी यक्षिणी ने
राजा की वह भूमि मान की वर्षा से भर दी॥१५॥
कुछ समय पश्चात् सुरत के समागम से गर्भवती रम्भा ने असाधारण सुन्दरी कन्या
उत्पन्न की॥१६॥
कन्या प्रसव करते ही रम्भा राजा से बोली—'राजन्, मुझे इतने दिनों का शाप प्राप्त था।
अब वह क्षीण हो गया। मैं रम्भा नाम की स्वर्गाङ्गना हूँ। तुम्हें देखने पर प्रेम से आकृष्ट
हो गई थी। तदुपारन्त गर्भ हो जाने पर इसे यहीं छोड़कर अभी ही जा रही हूँ॥१७-१८॥
हमारी मर्यादा ही ऐसी है। तुम इस कन्या की रक्षा करना। इसके विवाह से स्वर्ग
में हम दोनों का पुनः समागम होगा'॥१९॥
ऐसा कहकर वह विवश रम्भा अन्तर्धान हो गई। उसके वियोग-दुःख से राजा प्राण देने
के लिए तैयार हो गया॥२०॥
'इसी प्रकार शकुन्तला को उत्पन्न करके ही स्वर्ग चली गई। मेनका के लिए क्या विश्वा-
मित्र ने प्राण दे दिये थे?' मन्त्रियों की इस प्रकार की बातों से धीरज दिलाया गया वह राजा
किसी प्रकार धीरे-धीरे धीरज रख सका और उस रम्भा से पुनर्मिलन की आशा के कारण उसने
कन्या को ग्रहण किया॥२१-२२॥
उस सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या का राजा ने एकाधिपत्य से पालन प्रारम्भ किया और उसके
लोचनों के अत्यन्त सुन्दर होने के कारण उसका नाम सुलोचना रखा॥२३॥
समग्र यौवन में आई हुई और उद्यान में विचरण करती हुई उसे अकस्मात् कश्यप
ऋषि के पुत्र वत्स्य ने देखा॥२४॥
तपोबलि होने पर भी वत्स्य मुनि उस कन्या को देखकर प्रेमरस (ज्ञाता) रसिक होकर
सोचने लगा॥२५॥
'अहा! इस बालिका का कैसा अद्भुत रूप है! यदि इसे पत्नी के रूप में प्राप्त न
कर सके तो मेरे तप का और दूसरा फल ही क्या होगा॥२६॥
इस प्रकार सोचता हुआ उस मुनि वत्स्य को सुलोचना ने जलती हुई ज्वालावाला निर्धूम
अग्नि के समान देखा॥२७॥
उस मुनि को देखकर प्रणमयी वह कन्या भी 'स्फटिक-माला और कमण्डलु लिए हुए
शान्त और सुन्दर यह युवक कौन है?' इस प्रकार सोचने लगी॥२८॥

६४ कथासरित्सागर

६४ कथासरित्सागर
वरण्यायैष घोपेरय नयनात्पलमालिकाम् ।
क्षिपन्ती तस्य वपुषि प्रणाममकरोन्मुने ॥७९॥
पति समाप्नुहीत्याशीस्तस्मास्तेनाम्यधीयत ।
सुरासुरखुल्लद्धभ्यं मथाज्ञावद्यात्मना ॥८०॥
ततोऽसामान्यतद्रूपलोभलुण्ठितलज्जया ।
तयाप्यूचे स विनमद्वक्त्रया मुनिपुङ्गवः ॥८१॥
एषा यदिच्छा भवतो नर्मालापो न चेदयम् ।
तद्देव दाता नृपतिः पिता मे याच्यतामिति ॥८२॥
यथाम्बयं परिजनान्मुनिस्तस्या निशम्य सः।
गत्वा नृपं तत्पितरं सुपर्णं तामयाचत ॥८३॥
सोऽपि तं वीक्ष्य तपसा वपुषा चातिभभिगम् ।
उवाच रचितातिथ्यो राजा मुनिकुमारकम् ॥८४॥
जाताप्सरसि रम्भायां कन्येषा भगवन्मम ।
अस्या विवाहाभावे मे तया भावी समागमः ॥८५॥
एव तया व्रजन्त्या द्यां रम्भयैव ममोदितम् ।
एतत्कथं महाभाग भवेदिति निरूप्यताम् ॥८६॥
सच्छ्रुत्वा मुनिपुत्रोऽसौ क्षणमेवमचिन्तयत् ।
किं पुरा मेनकोद्भूता सर्पदष्टा प्रमद्वरा ॥८७॥
दत्त्वायुषोऽर्धं मुनिना न भार्या रुरुणा कृता ।
त्रिशङ्कुः किं न नीतो द्यां विश्वामित्रेण लुब्धयप ॥८८॥
तद्दिवं स्वतपोमागभ्यात् किं न करोम्यहम् ।
इत्यान्लोच्य न भारोऽयमित्युक्त्वा सोऽब्रवीन्मुनिः ॥८९॥
हे देवतातपोर्द्धेन मदीनेन भूपतिः ।
सशरीरो दिवं यातु रम्भाम्भोगसिद्धये ॥९०॥
इत्युक्ते तेन मुनिना शृण्वन्त्यां राजसंसदि ।
एवमस्त्विति भव्यस्था दिव्या वागदमलत् ॥९१॥
तत्र सन्तोषतो हर्म्यं मनये कादयपाय ताम् ।
वत्साय दत्वा तनयां स राजा दिवमुद्ययौ ॥९२॥
तत्र दिव्यत्वमासाद्य तया शत्रनिपुन्तया ।
स रेमे रम्भया सार्द्धं भूयो दिव्याशुभावया ॥९३॥

षष्ठ लम्बक १४१

षष्ठ लम्बक १४१
वरण करने के लिए ही मानों नेत्रकमलों की माला उसके शरीर पर डालती हुई कन्या
सुलोचना ने उसे प्रणाम किया ॥७९॥
सुर और असुरों के लिए भी असह्य कामदेव की आज्ञा से वश किये गये उसने भी
पति को प्राप्त करो—ऐसे आशीर्वाद से उसका अभिनन्दन किया ॥८० ॥
मुनि के असाधारण सौन्दर्य से सटी हुई अतएव लज्जा के कारण मुंह नीचे को हुई
उस कन्या ने मुनि से इस प्रकार कहा—देव यदि यह आपकी सच्ची इच्छा है, हँसी या विनोद
की बात नहीं है तो आज मेरे दाता पिता से मुझे मांगो ॥८१॥
इसके पश्चात् उसका कुल गोत्र परिचय आदि पूछकर उस मुनि ने जाकर उसके पिता
नृपति से उसे माँगा ॥८२॥
उस राजा ने भी शरीर और तप से अत्यन्त उच्चकोटि पर पहुँचे हुए उस मुनिकुमार
को देखकर उसका आतिथ्य-सत्कार करके कहा ॥८३॥
'भगवन् ! यह मेरी कन्या रम्भा नामक अप्सरा से उत्पन्न हुई है। इसके विवाह से
स्वर्ग में मेरा और रम्भा का पुनः समागम होगा ॥८४॥
स्वयं जाती हुई रम्भा ने ऐसा मुझसे कहा है—यह कैसे सम्भव हो इस पर आप
विचार कीजिए' ॥८५॥
यह सुनकर मुनि क्षण-भर के लिए विचारमग्न हो गया और सोचने लगा। क्या पहले
समय में मेनका से उत्पन्न अप्सरा प्रमद्वरा जब साँप के काटने से मर गई, तब रुरु ऋषि ने अपने
आयुष्य का आधा भाग देकर उसे जीवित नहीं कर दिया था ? क्या विश्वामित्र ने चांडाल
त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग में नहीं पहुँचा दिया था ? तो क्या मैं अपने तप के कुछ भाग का व्यय
करके यह कार्य नहीं कर सकता ? ऐसा सोचकर मुनि ने राजा से कहा—'यह कोई बड़ा भार
नहीं है ॥८६-८७॥
'हे देवगण यह राजा मेरे तप के अंश से रम्भा के साथ सम्भोग प्राप्त करने के लिए
सशरीर स्वर्ग को जाय'॥ ॥
उस मुनि के ऐसा कहने पर और सारी सभा के सुनते रहने पर आकाशवाणी हुई—
'ऐसा ही हो' ॥ १॥
तब वह राजा उस सुलोचना नाम की कन्या को मुनि कश्य के लिए देकर स्वयं चला
गया ॥ २॥
वहाँ देवत्व प्राप्त करके इन्द्र द्वारा नियत की गई प्रभावशालिनी रम्भा के साथ
वह रमण करने लगा ॥ ३॥
८१

कथासरित्सागर

१४२
कथासरित्सागर
इत्थ कृतार्थतां देव ! सुषेणः प्राप कन्यया।
कन्या युष्मादृशां गेहेष्वीदृश्याऽवतरन्ति हि ॥९४॥
तदषा कापि दिव्या ते जाता शापच्युता गृहे।
कन्या नूनमतो मा गाः शुचं तज्जन्मना विभो ॥९५॥
इति श्रुत्वा कथां राजा गृहवृद्धाद्विजन्मनः।
कलिङ्गदत्तं नृपतिर्जहौ चिन्तां सुतोष च ॥९६॥
तां स चक्रे निजसुता नयनानन्ददायिनीम्।
नाम्ना कलिङ्गसेनेति बालामिन्दुकलोपमाम् ॥९७॥
सापि तस्य पितुर्गेहे राजपुत्री शनैः क्रमात्।
कलिङ्गसेना ववृधे वयस्यामध्यवर्तिनी ॥९८॥
विजहार च हर्म्येषु सा गृहेषु वनेषु च।
क्रीडारसमयस्येव लहरी शैशवाम्बुधेः ॥९९॥
कलिङ्गसेना सखित्वे सोमप्रभाया आगमनम्
कदाचिदथ हर्म्यस्थां केलिसक्तां ददर्श ताम्।
मयासुरसुता यान्ती व्योम्ना सोमप्रभाभिधा ॥१००॥
सा तामालोक्य रूपेण मुनिमानसमोहिनीम्।
सोमप्रभा नभःस्थैव जातप्रीतिरचिन्तयत् ॥१०१॥
सेयं किमेन्दवी मूर्तिः कान्तिस्तस्या दिवा कुतः।
रतिर्वा यदि कामः क्व कन्यका तदवैम्यहम् ॥१०२॥
अत्र राजगृहे कापि दिव्या शापच्युता भवेत्।
जाने जन्मान्तरे चाभून्नूनं सख्यं ममैतया ॥१०३॥
एतद्धि मे यदस्यामस्तिस्नेहाह्वयं मनः।
तद्युक्तं कत्तुमेतां मे स्वयवरसगीं पुनः ॥१०४॥
इति सञ्चिन्त्य याणायास्तस्या नेत्राभनन्दूया।
सोमप्रभा सा गगनादङ्गणितमवातरत् ॥१०५॥
मनुष्यकन्यकाभावमाश्रित्येवाप्तकारणम् ।
सास्या कलिङ्गसेनायाः शनैरुपससर्प च ॥१०६॥
दृष्ट्वा राजसुता सापि स्वयमप्यद्भूताकृतिः।
अमी गतागता पार्श्वमचितयं शशी मम ॥१ ०७॥
इति सहर्शनानेव विविस्मयोत्थाय चादरात्।
वलिङ्गमवाप्यामिन्द्रसा तां सोमप्रभां तदा ॥१०८॥

षष्ठ लम्बक ६४३

षष्ठ लम्बक ६४३
इसी प्रकार वे दिव्य रमणियाँ तुम्हारे समान पुरुषों के घरों में अवतार लेती हैं ॥ ९४ ॥
'हे देव सुषेण इसी प्रकार कन्या के कारण ही सफल हुआ। आपके समान उच्च महा
पुरुषों के यहाँ ऐसी ही कन्याएँ उत्पन्न होती हैं। अतः यह कन्या भी कोई दिव्य स्त्री है जो
शापच्युत होकर तुम्हारे घर में उत्पन्न हुई है। इसलिए हे स्वामी ! चिन्ता न करो' ॥ ९५ ॥
इस प्रकार घर के वृद्ध ब्राह्मण द्वारा कही गई कथा को सुनकर राजा कलिङ्गदत्त
चिन्ता छोड़कर प्रसन्न हुआ ॥ ९६॥
उस राजा ने चन्द्रकला के समान आँखों को आनन्द देनेवाली उस कन्या का नाम
कलिङ्गसेना रखा ॥ ९७ ॥
वह राजकुमारी कलिङ्गसेना अपनी सखियों के साथ क्रमशः बड़ी होने लगी ॥ ९८ ॥
क्रीड़ा करते बालसमुदाय की लहरी के समान वह कन्या पिता के गृह में भवन
में घरों में और उद्यानों में बिहार करती थी ॥ ९९ ॥
कलिङ्गसेना के पास सोमप्रभा का आगमन
एक बार वह कलिङ्गसेना राजभवन की छत पर खेल रही थी। उसी समय आकाश-
पथ से जाती हुई मायासुर की बेटी सोमप्रभा ने उसे उड़ते-उड़ते देखा और दूर से देखते ही उससे
उसका प्रेम हो गया ॥ १ १ ॥
सोमप्रभा उसे देखकर सोचने लगी 'क्या यह चन्द्रकला है ? किन्तु दिन में उसकी
इतनी कान्ति कहाँ ! यदि यह रति है, तो काम कहाँ है ? अतः यह अवश्य ही अभी कुमारी है
ऐसा समझती हूँ ॥ १ २॥
सम्भव है कि कोई दिव्य स्त्री शाप से पतित होकर राजघराने में उत्पन्न हुई हो।
मैं समझती हूँ कि पूर्वजन्म में इसकी और मेरी मित्रता रही है ॥ १ ३॥
क्योंकि अत्यन्त स्नेह से व्याकुल मेरा मन बरबस इसकी ओर खिंच रहा है। तो अब
यह उचित है कि मैं इससे स्वयं मिलकर सखी के रूप में इसका वरण करूँ ॥ १ ४॥
सोमप्रभा यह सोचकर कि बालिका भयभीत न हो अप्रत्यक्ष रूप से नीचे उतर
आई ॥ १ ५॥
उसके विश्वास के लिए वह मनुष्य-कन्या का रूप बनाकर धीरे-धीरे कलिङ्गसेना के पास
पहुँची ॥ १ ६॥
'दैवयोग से यह कोई अद्भुत रूपवाली राजकुमारी मेरे पास आ रही है यह मेरी
सखी होने के योग्य है'—ऐसा सोचकर उसे देखते ही वह कलिङ्गसेना भी उठकर उससे लिपट
गई ॥ १ ७-१ ८॥

ततः कथाक्रमेणैव वाचा सख्यमबध्यत।

उपवेश्य च पप्रच्छ क्षणादन्वयनामनी।
वक्ष्यामि सखि तिष्ठेति तां च सोमप्रभाब्रवीत् ॥१०९॥
ततः कथाक्रमेणैव वाचा सख्यमबध्यत।
ताभ्यामुभाभ्यामन्योन्यहस्तग्रहपुरःसरम् ॥११०॥
अथ सोमप्रभावादीत्सखि त्वं राजकन्यका।
राजपुत्रैः समं सख्यं कृच्छ्रादप्यतिवाह्यते ॥१११॥
अल्पेनाप्यपराधेन ते हि कुप्यन्त्यमात्रया।
राजपुत्रवणिग्पुत्रकथां शृण्वत्र वच्मि ते ॥११२॥

राजपुत्रवैश्यपुत्रयोः कथा

नगर्यां पुष्करावत्यां गूढसेनाभिधो नृपः।
आसीत्तस्य च जातोऽभूदेक एव किलात्मजः ॥११३॥
स राजपुत्रो दृप्तः सन्नेकपुत्रतया भृशम्।
अशुभं वापि यच्चक्रे पिता तस्यासहिष्ट तत् ॥११४॥
भ्राम्यन्नुपवने जातु दृष्टस्तेनैकपुत्रकः।
वणिजो ब्रह्मदत्तस्य स्वतुल्यविभवाकृतिः ॥११५॥
दृष्ट्वा च सद्यः सोऽनेन स्वयंवृतसुहृत्कृतः।
तयोश्च चैकरूपौ तौ जाता राजवणिग्सुतौ ॥११६॥
स्यातुं न शेकतुः क्षिप्रं तावन्योन्यमदर्शनम्।
आशु बध्नाति हि प्रेम प्राग्जन्मान्तरसंस्तवः ॥११७॥
नोपभुङ्क्ते स्म तं भोगं राजपुत्रः कदाचन।
वणिग्पुत्रस्य यस्तस्य नान्नेवोपकरिष्यतः ॥११८॥
एकदा सुहृदस्तस्य निश्चित्योद्वाहमादितः।
अहिच्छत्रं विवाहाय स प्रतस्थे नृपात्मजः ॥११९॥
मित्रेण तेन सार्धं च गजारूढः ससैनिकः।
गच्छन्विशमतीतीरं प्राप्य सायं समाससत् ॥१२०॥
तत्र चन्द्रोदये पानमासेव्य शयनं स्थितः।
अर्थितो निजया धात्र्या कथां वक्तुं प्रचक्रमे ॥१२१॥
उपशान्तकथां जह्रौ धात्रीं मत्तश्च निद्रया।
धात्री च तद्वत्सोऽप्यासीत् स्नेहाज्जाग्रद्वणिग्सुतः ॥१२२॥
ततः सुप्तेषु वार्येषु स्त्रीणामिव मिथः कथा।
गगने शुश्रुवे तेन वणिग्पुत्रेण जाग्रता ॥१२३॥

षष्ठ लम्बकः ६४५

षष्ठ लम्बकः ६४५
तदनन्तर उसे अपने पास बैठाकर उससे उसका कुल और नाम आदि पूछने लगी।
उत्तर में सोमप्रभा ने कहा 'सब कहती हूँ ठहरो। एवंक्रमेण उन दोनों की बात ही बात में
मित्रता हो गई। यह मित्रता दोनों ने परस्पर हाथ से हाथ मिलाकर की॥११११॥
तब सोमप्रभा ने कहा—'सखि तुम तो राजकुमारी हो। राजसन्तानों के साथ मित्रता
करना कठिन कार्य है। वे लोग छोटे-से ही अपराध से अधिक क्रुद्ध हो जाते हैं। इस विषय में
राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा कहती हूँ सुनो॥१११-११२॥
एक राजपुत्र और वैश्यपुत्र की कथा
पुष्करावती नगरी में गृहसेन नाम का राजा था। उसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह घमंडी
राजकुमार, जो भी भला या बुरा करता था राजा उसे सहन करता था क्योंकि वह उसका
एकमात्र बालक था॥११३॥
किसी समय उद्यान में भ्रमण करते हुए राजकुमार ने अपने ही समान रूप और वयवाले
उसे दत्त नामक बनिये के पुत्र को देखा। उसे देखते ही राजकुमार ने स्वयं वरण किया हुआ मित्र
बना लिया तभी से राजपुत्र और वैश्यपुत्र दोनों एकरूप (अभिन्न मित्र) हो गये॥११४-११६॥
उन दोनों में एक दूसरे को देखे बिना नहीं रह सकता था। पूर्व जन्म का संचित प्रेम
शीघ्र ही बाँध लेता है॥११७॥
राजपुत्र ऐसी किसी भी वस्तु का उपभोग नहीं करता था जिसके कि एक भाग को वैश्य
पुत्र के लिए नहीं रख लेता था॥११८॥
एक बार उस मित्र का विवाह पहले ही निश्चित करके वह राजकुमार अपने विवाह के
लिए अहिच्छत्रा नगरी को चला॥११९॥
उस मित्र के साथ हाथी पर सवार सैनिकों से युक्त राजकुमार यात्रा करते हुए सायंकाल
इक्षुमती नदी के तट पर ठहर गया॥१२०॥
वहाँ चन्द्रोदय होने पर मद्यपान करके शय्या पर लेटा हुआ राजकुमार, अपनी सेविका
से प्रार्थना किये जाने पर कहानी सुनाने लगा॥१२१॥
मद्य से आक्रान्त राजकुमार कहानी प्रारम्भ करते ही निद्रामग्न हो गया। किन्तु सेविका
और वह वैश्यपुत्र दोनों स्नेह के कारण जागते रह गये॥१२२॥
तदनन्तर सब के सो जाने पर वैश्यपुत्र जागता रह गया और उसने आकाश में स्त्रियों की
धी बातें सुनी॥१२३॥

१४६ कथासरित्सागर

१४६ कथासरित्सागर
अनाख्याय कथां सुप्तः पापोऽयं तञ्छपाम्यहम्।
परिदृश्यत्यसौ हारं प्रातस्तं चेद् ग्रहीष्यति॥१२४॥
कण्ठलग्नेन तेनैष तत्क्षणं मृत्युमाप्स्यति।
इत्युक्त्वा विररामैका द्वितीया च ततोऽब्रवीत्॥१२५॥
अतो यद्ययमुत्तीर्णस्तद्व्रक्ष्यत्याग्रपादपम्।
बियोक्ष्यते फलान्यस्य सद्यः प्राणैर्विमोक्ष्यते॥१२६॥
इत्युक्त्वा व्यरमत्सापि तृतीयाभिबधे ततः।
यद्येतदपि तीर्णोऽस्य तद्विवाहकृते गृहम्॥१२७॥
प्रविशन्नेतदेवास्त्य हस्तु पृष्ठे पतिष्यति।
उक्तेति न्यवृत्तसापि चतुर्थी व्याहरत्ततः॥१२८॥
अतोऽपि यदि निस्तीर्णस्तद्भक्तं वासवेश्मनि।
प्रविष्टः शतकृत्वोऽयं क्षुतं सद्यः करिष्यति॥१२९॥
शतकृत्वोऽपि यद्यस्य जीवेति न वदिष्यति।
कश्चिदत्र ततश्चैव मृत्योर्वशमुपैष्यति॥१३०॥
येन चैव श्रुतं सोऽस्य रक्षार्थं यदि वक्ष्यति।
तस्यापि भविता मृत्युरित्युक्त्वा सा न्यवर्त्तत॥१३१॥
वणिक्सुतश्च तत्सर्वं श्रुत्वा निर्घातदारुणम्।
स तस्य राजपुत्रस्य स्नेहोद्विग्नो व्यचिन्तयत् ॥१३२॥
उपक्रन्तामनाख्यातां धिक्कथां यद्यरुक्षिताः।
देवताः श्रोतुमायाताः सपन्त्यस्तु कुतूहलात्॥१३३॥
स्रवेत्तस्मिन्मृते राजसुते कोऽर्थो ममासुभिः।
अतोऽयं रक्षणीयो मे युक्त्या प्राणसमः सुहृत्॥१३४॥
वृत्तान्तोऽपि न वाच्योऽस्य मा भूद्द्रोषो ममाप्यतः।
इत्यालोच्य निशां निन्ये स कृच्छ्रेण वणिक्सुतः॥१३५॥
राजपुत्रोऽपि स प्रातः प्रस्थितस्तत्सखः पथि।
ददर्श पुरतो हारं तमादातुमिषेष च॥१३६॥
ततोऽब्रवीद् वणिक्पुत्रो हारं मास्म ग्रहीः सखे।
मायैयमन्यथा नैते पदयेयुः सैनिकाः क्वचित्॥१३७॥

षष्ठ लम्बक १४७

षष्ठ लम्बक १४७
'यह दुष्ट राजपुत्र कहानी कहे बिना ही सो गया। अतः मैं इसे शाप देती हूँ कि यह
प्रातःकाल एक हार देखेगा उसे देखकर यदि ले लेगा तो गले में डालते ही इसकी मृत्यु हो
जायगी। इतना कहकर एक स्त्री चुप हो गई और दूसरी कहने लगी ॥१२४-१२५॥
'इससे भी यदि बच जाय तो आगे जाकर आम के एक वृक्ष को देखेगा यदि उसके फल
तोड़ेगा तो इसके प्राण निकल जायेंगे। ॥१२६॥
ऐसा कहकर जब दूसरी स्त्री चुप हो गई तब तीसरी ने कहना प्रारम्भ किया—'यदि इससे
भी बच जाय तो जब यह विवाह के लिए घर में प्रवेश करेगा तब घर गिर जायगा और यह दब
कर मर जायगा। तीसरी के इस प्रकार कहने पर चौथी बोली—॥१२७-१२८॥
'यदि इससे भी बच गया तो रात को शयनागार में जाकर यह सौ बार छींकेगा। उतनी
ही बार हर छींक पर यदि कोई व्यक्ति 'जीवो' नहीं कहेगा तो यह मर जायगा। और, जिसने
हमारी ये बातें सुनी हों तथा जो उसकी रक्षा के लिए उससे कह देगा उसकी भी मृत्यु हो जायगी।
इतना कह लेने पर वह भी चुप हो गई ॥१२९-१३१॥
बनिये के पुत्र ने वज्रपात के समान भीषण ये बातें सुनीं और राजकुमार के स्नेह से व्याकुल
होकर वह सोचने लगा ॥१३२॥
प्रारम्भ की गई और पूरी न कही गई ऐसी कहानी को धिक्कार है जिसे सुनने के लिए
देवियाँ भी आईं और शाप देती हैं ॥१३३॥
तो मुझे इस राजपुत्र के मर जाने पर इन प्राणों से क्या प्रयोजन ? इसलिए किसी भी
उपाय से प्राणों के समान इस मित्र की रक्षा करनी चाहिए ॥१३४॥
उसे यह समाचार भी नहीं कहना है कि जिससे मेरी ही मृत्यु हो जाय। ऐसा सोचते
सोचते वैश्यपुत्र ने रात्रि व्यतीत की ॥१३५॥
राजपुत्र भी प्रातःकाल उठकर उसके साथ मार्ग में चला। उसने सामने पड़े हुए हार को
देखा और उसे लेने की इच्छा की ॥१३६॥
तब वैश्यपुत्र बोला—मित्र इसे मत लो। यह केवल मायाजाल है। नहीं तो इसे ये सैनिक
क्यों नहीं देखते? ॥१३७॥

१४८ कथासरित्सागर

१४८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा तं परित्यज्य गच्छन्नग्रे ददर्श सः ।
आम्रवृक्षं फलायस्य भोक्तुं चैच्छन्नृपात्मजः ॥१३८॥
वणिक्पुत्रेण च प्राप्तस्ततोऽपि स निवारितः ।
सान्तःस्वेदं शनैर्गच्छन्नाप श्वशुरवेश्म तत् ॥१३९॥
तत्रोद्वाहकृते वेश्म विशन्द्धाराधिवर्त्तितः ।
तैनेव सख्या यावच्च तावत्पतितं गृहम् ॥१४०॥
ततः कथञ्चिदुत्तीर्णः किञ्चित्सम्प्रत्ययो निधिः ।
निवासके विवेशान्ये राजपुत्रो वधूसखः ॥१४१॥
तत्र तस्मिन्वणिक्पुत्रे प्रविश्यारक्षितस्थिते ।
ससङ्करवं क्षुतं चक्रे शयनीयाश्रितोऽप्यसौ ॥१४२॥
शतकृत्वोऽपि तस्मान्न नीचैर्जीवेत्युदीर्य सः ।
कृतकार्यो वणिक्पुत्रो हृष्टः स्वैरं वहिर्ययौ ॥१४३॥
निर्यान्तं तमपश्यच्च राजपुत्रो वधूसखः ।
ईर्ष्याविस्मृततत्स्नेहः क्रुद्धो द्वाःस्थानुवाच च ॥१४४॥
पापात्मायं रहस्यस्य प्रविष्टोऽन्तःपुरं मम ।
तद्बद्ध्वा स्थाप्यतां यावत्प्रभातेऽसौ निगृह्यते ॥१४५॥
तदुक्त्वा रक्षिभिर्बद्धो निशां निन्ये वणिक्सुतः ।
प्रातर्वध्यभुवं तैश्च नीयमानोऽब्रवीत्स तान् ॥१४६॥
आदौ नयत मां तावद्राजपुत्रान्तिकं यतः ।
वक्ष्यामि कारणं किञ्चित्ततः कुरुत मे वधम् ॥१४७॥
इत्युक्तैस्तेन तैर्गत्वा विज्ञप्तः स नृपात्मजः ।
सचिवैर्योषितश्चान्यैस्तस्यानयनमाविशत् ॥१४८॥
आनीतः सोऽब्रवीत्तस्मै वृत्तान्तं राजसूनवे ।
प्रत्ययाद्गृहपालोत्थाम्मेमे सत्यं च सोऽपि तत् ॥१४९॥
ततस्तुष्टः समं सख्या वधमुक्तेन तेन सः ।
आययौ राजतनयः कृतदारो निजां पुरीम् ॥१५०॥
तत्र सोऽपि सुहृत्तस्य कृतदारो वणिक्सुतः ।
स्तूयमानगुणः सर्वजनैरासीद्यथामुदम् ॥१५१॥
एवमप्यदृढदृशा मूर्खाः स्वमिमन्तप्रमाथिनः ।
राजपुत्रा न मन्यन्ते हितं भर्ता गजा इव ॥१५२॥

षष्ठ लम्बक ६४९

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षष्ठ लम्बक ६४९

यह सुनकर आगे जाने पर उसने आम का वृक्ष देखा और उसके फल खाने की इच्छा
प्रकट की। वैश्यपुत्र ने पहले के ही समान उसे रोका। उससे मन-ही-मन खिन्न हुआ राजकुमार
धीरे-धीरे रङ्गपुर-गृह में पहुँचा। वहाँ पर विवाह के लिए निर्मित गृह में प्रवेश करते हुए राजकुमार
को वैश्यपुत्र ने रोक दिया। उसके रोकते ही वह मकान गिर गया॥१३८-१४०॥

वहाँ से किसी प्रकार बचकर निकला और कुछ विश्वस्त हुआ राजपुत्र रात को पत्नी
के साथ दूसरे घर में गया। वहाँ भी वह वैश्यपुत्र छिपकर जा बैठा। राजकुमार पलँग पर बैठते ही
छींकने लगा और सौ बार पलँग के नीचे छिपा हुआ वैश्यपुत्र सौ बार 'जीओ जीओ'
कहता रहा! इस प्रकार अपना कार्य समाप्त कर के प्रसन्न वह वैश्यपुत्र धीरे से बाहर
निकला॥१४१-१४३॥

बाहर जाते हुए उसे वधू के साथ राजपुत्र ने देख लिया। फलतः ईर्ष्या से स्नेह को भुला
कर कोपावेश में उसने द्वारपालों से कहा ॥१४४॥

'यह पापी एकान्त में मेरे शयनागार में घुस आया। इसलिए इसे रात भर बाँधकर रखो।
प्रातःकाल इसे फाँसी दी जायगी' ॥१४५॥

यह सुनकर पहरेदारों द्वारा बाँधे हुए उस वैश्यपुत्र ने रात व्यतीत की। प्रातःकाल
फाँसी पर ले जाये जाते हुए उसने सिपाहियों से कहा ॥१४६॥

'पहले मुझे उस राजपुत्र के समीप ले चलो मैं उसे कुछ कारण बताऊंगा तब मेरा वध
करना' ॥१४७॥

उनसे इस प्रकार कहे गये सिपाहियों मन्त्रियों एवं अन्य लोगों द्वारा समझाये जाने पर
राजपुत्र ने उसे लाने की आज्ञा दी ॥१४८॥

वहाँ लाये गये बनिये के पुत्र ने राजकुमार से सारा वृत्तान्त कह सुनाया। विवाहवाले
घर के गिर जाने की घटना से विश्वास करके राजपुत्र ने उसकी बात सच मान ली॥१४९॥

तब वध से मुक्त उस वैश्यपुत्र के साथ राजपुत्र अपनी पत्नी-सहित प्रसन्न चित्त से अपनी
नगरी को लौट आया। वहाँ आकर वैश्यपुत्र भी विवाह करके सभी जनों से प्रशंसा किया जाता
हुआ सुखपूर्वक रहने लगा ॥१५०-१५१॥

इसी प्रकार राजपुत्र मदोन्मत्त हाथी के समान अपने नियन्ता (महावत) की बातें न मान
पर उसे भी मार डालते हैं और अपना हित नहीं समझते ॥१५२॥
८२

३५० कथासरित्सागर

३५० कथासरित्सागर
वेतालैस्तैश्च का मैत्री ये विहस्य हरन्त्यसून।
तद्राजपुत्रि सख्यं मे मा स्म व्यभिचर सदा ॥१५३॥
इति श्रुत्वा कथामेतां हर्म्ये सोमप्रमामुखात्।
कलिङ्गसेना सस्नेहं तां सखीं प्रत्यभाषत ॥१५४॥
एते पिशाचा न त्वेते राजपुत्रा मया सखि।
पिशाचदुग्रहकथामहमाख्यामि ते श्रृणु ॥१५५॥
पिशाचब्राह्मणयोः कथा
यज्ञस्थलारव्ये कोऽप्यासीदग्रहारे पुरा द्विजः।
स जातु दुर्गसः काष्ठा न्यायाहुतुमटवीं ययौ ॥१५६॥
तत्र काष्ठं कुठारेण पाटद्यमानं द्विधेर्वधात्।
व्यापत्य तस्य जङ्घायां भित्त्वान्तः प्रविवेश खत् ॥१५७॥
ततः स प्रस्रवद्रक्तो दृष्ट्वा केनापि मूर्च्छितः।
उत्क्षिप्यानीयत गृहं पुंसा प्रत्यभिजानता ॥१५८॥
तत्र विह्वलया पत्न्या तस्य प्रक्षाल्य शोणितम्।
आश्वास्य तस्य जङ्घायां निबद्धो व्रणपट्टकः ॥१५९॥
छतश्चिकित्स्यमानः सन् प्रशस्तस्य दिने दिने।
न परं न रुरोहैव यावन्नाडीत्वमाययौ ॥१६०॥
ततो नाडीव्रणात् खिन्नो दरिद्रो मरणोद्यतः।
अभ्येत्य सख्या विप्रेण केनापि जगदे रहः ॥१६१॥
सखा मे यज्ञदत्ताख्यश्चिरं भूत्वातितुर्गतः।
पिशाचसाधनं कृत्वा धनं प्राप्य सुखी स्थितः ॥१६२॥
तच्च तत्साधनं तेन ममाप्युक्तं त्वमप्यतः।
पिशाचं साधय सखे स ते रोषयिता व्रणम् ॥१६३॥
इत्युक्त्वारव्यातमग्नोऽथाबुवाचास्य क्रियामिमाम्।
उत्थाय पश्चिमे यामे मुक्तकेशो दिगम्बरः ॥१६४॥
अनाचान्तश्च मुष्टी द्वे तण्डुलानां यथाक्रमम्।
द्वाभ्यामादाय हस्ताभ्यां जपन् गच्छेदचतुष्पथम् ॥१६५॥
तत्र तण्डुलमुष्टी द्वे स्थापयित्वा ततः सखे।
मौनेनैव त्वमागच्छेर्मा वीक्षिष्ठाश्च पृष्ठतः ॥१६६॥