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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

षष्ठ लम्बक १४७
'यह दुष्ट राजपुत्र कहानी कहे बिना ही सो गया। अतः मैं इसे शाप देती हूँ कि यह
प्रातःकाल एक हार देखेगा उसे देखकर यदि ले लेगा तो गले में डालते ही इसकी मृत्यु हो
जायगी। इतना कहकर एक स्त्री चुप हो गई और दूसरी कहने लगी ॥१२४-१२५॥
'इससे भी यदि बच जाय तो आगे जाकर आम के एक वृक्ष को देखेगा यदि उसके फल
तोड़ेगा तो इसके प्राण निकल जायेंगे। ॥१२६॥
ऐसा कहकर जब दूसरी स्त्री चुप हो गई तब तीसरी ने कहना प्रारम्भ किया—'यदि इससे
भी बच जाय तो जब यह विवाह के लिए घर में प्रवेश करेगा तब घर गिर जायगा और यह दब
कर मर जायगा। तीसरी के इस प्रकार कहने पर चौथी बोली—॥१२७-१२८॥
'यदि इससे भी बच गया तो रात को शयनागार में जाकर यह सौ बार छींकेगा। उतनी
ही बार हर छींक पर यदि कोई व्यक्ति 'जीवो' नहीं कहेगा तो यह मर जायगा। और, जिसने
हमारी ये बातें सुनी हों तथा जो उसकी रक्षा के लिए उससे कह देगा उसकी भी मृत्यु हो जायगी।
इतना कह लेने पर वह भी चुप हो गई ॥१२९-१३१॥
बनिये के पुत्र ने वज्रपात के समान भीषण ये बातें सुनीं और राजकुमार के स्नेह से व्याकुल
होकर वह सोचने लगा ॥१३२॥
प्रारम्भ की गई और पूरी न कही गई ऐसी कहानी को धिक्कार है जिसे सुनने के लिए
देवियाँ भी आईं और शाप देती हैं ॥१३३॥
तो मुझे इस राजपुत्र के मर जाने पर इन प्राणों से क्या प्रयोजन ? इसलिए किसी भी
उपाय से प्राणों के समान इस मित्र की रक्षा करनी चाहिए ॥१३४॥
उसे यह समाचार भी नहीं कहना है कि जिससे मेरी ही मृत्यु हो जाय। ऐसा सोचते
सोचते वैश्यपुत्र ने रात्रि व्यतीत की ॥१३५॥
राजपुत्र भी प्रातःकाल उठकर उसके साथ मार्ग में चला। उसने सामने पड़े हुए हार को
देखा और उसे लेने की इच्छा की ॥१३६॥
तब वैश्यपुत्र बोला—मित्र इसे मत लो। यह केवल मायाजाल है। नहीं तो इसे ये सैनिक
क्यों नहीं देखते? ॥१३७॥