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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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षष्ठ लम्बक ६३३
और, उन आँखों को हथेली में रखकर कहा—देखो माता यह ऐसी है। यह घृणित
रक्त और मांस है। यदि अच्छा लगता है तो इसे ले लो॥२२॥
इसी प्रकार की दूसरी भी आँख है। बताओ इनमें कौन अधिक सुन्दर है। भिक्षु के
इस प्रकार कहने पर वैश्यवधू खिन्न हो गई॥२३॥
और कहने लगी 'हाय हाय अभागिन मैंने यह क्या पाप कर डाला! मैं तुम्हारी आँखों
के उखाड़ने का कारण बनी!॥२४॥
यह सुनकर भिक्षुक बोला—'माता तुम्हें कष्ट न होना चाहिए। तुमने मेरा उपकार
किया है। इस प्रसंग में उदाहरण सुनो॥२५॥
एक तपस्वी और राजा की कथा
प्राचीन समय में गंगा के किसी तट पर स्थित एक सुन्दर उपवन में वैराग्य के कारण
सब कुछ त्यागने की इच्छा से एक यति रहता था॥२६॥
उसके तपस्या करते हुए कोई राजा अपने रनिवास की रानियों के साथ घूमने के लिए
वहाँ आया॥२७॥
विहार करने के पश्चात् मद्यपान करके सोए हुए उस राजा के पास से उठकर चंचल
रानियाँ उद्यान में चारों ओर घूमने लगीं॥२८॥
उस उद्यान के एक ओर समाधि में बैठे हुए मुनि को देखकर 'यह क्या है' इस प्रकार
के कौतुक से वे उसे घेर कर बैठ गईं॥२९॥
विलम्ब हो जाने के कारण जागने पर राजा ने उन्हें देखने के लिए चारों ओर
चक्कर लगाना प्रारम्भ किया॥३०॥
ढूँढ़ते हुए उसने जब मुनि को घेरकर बैठी हुई रानियों को देखा तब राजा ने डाह से
जलती हुई तलवार निकालकर उससे मुनि पर प्रहार कर दिया॥३१॥
ऐश्वर्य, डाह, निर्दयता, मदोन्मत्तता और विवेक-शून्यता इनमें एक ही क्या अनर्थ
नहीं कर सकता? यदि पाँचों अनियाँ एकत्र हों तो क्या कहना॥३२॥
राजा के चले जाने पर कटे हुए अंगोंवाले क्रोध रहित मुनि के सामने प्रकट होकर किसी
देवी ने कहा—॥३३॥
'हे महात्मन्! जिस पापी ने क्रोध से तुम्हारे प्रति यह अत्याचार किया है, उसे मैं
अपनी शक्ति से मार देती हूँ यदि तुम चाहो तो'॥३४॥
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