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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

द्वितीय लम्बक १६१

द्वितीय लम्बक १६१
तदनन्तर कल्याणकारी एवं अनुरक्त प्रजावाले संसार के उदय के लिए उत्पन्न अपने पुत्र
उदयन को राज्य पर बैठाकर राजा सहस्रानीक सचिवों और महारानी के साथ महाप्रस्थान
के लिए हिमाचल की ओर चला गया ॥२१७॥
द्वितीय तरंग समाप्त
तृतीय तरंग
राजा उदयन की कथा
सहस्रानीक के महाप्रस्थान के लिए हिमाचल की ओर चले जाने पर, राजा उदयन वत्स
प्रदेश का शासन प्राप्त करके राजधानी कौशाम्बी में रहकर सुखपूर्वक प्रजा का शासन
करने लगा ॥१॥
राजा उदयन यौगन्धरायण रुमण्वान् आदि मन्त्रियों पर शासन भार छोड़कर एकमात्र
आनन्द लेने में तल्लीन हो गया ॥२॥
राजा के सुख-साधनों में वासुकि द्वारा बाल्यकाल में दी हुई घोषवती वीणा ही प्रमुख
साधन के रूप में थी जिसे वह दिनरात बजाया करता था ॥३॥
राजा उदयन वीणा के तारों के मधुर स्वर-रूपी मोहन-मन्त्र से मदोन्मत्त जंगली हाथियों
को वश में कर और बाँधकर ले आता था यही उसका एक विनोद था ॥४॥
वह वत्सराज उदयन वेश्याओं की मुखचन्द्र की प्रतिमाओं से सुशोभित मदिरा और
मन्त्रियों की मुखकान्ति को साथ-साथ पान करता था ॥५॥
राजा उदयन को केवल एकमात्र यही चिन्ता थी कि मेरे वंश के अनुसार उच्च वंश की
कन्या कहीं नहीं दीखती केवल वासवदत्ता नाम की एक प्रसिद्ध कन्या सुनी जाती है ॥६॥
'वह कैसे मिले'—बस यही एक मात्र चिन्ता उसके मन में थी। उधर वासवदत्ता के
पिता उज्जैन के राजा चण्डमहासेन को भी यह चिन्ता सता रही थी ॥७॥
कि मेरी अनुपम सुन्दरी और गुणवती कन्या के योग्य वर संसार में मिलेगा नहीं।
केवल एक योग्य वर उदयन है किन्तु वह मेरा सदा का विरोधी है ॥८॥
उसके लिये एक उपाय हो कि जिससे वह मेरे वश में आ जाय और मेरा
जामाता भी बन जाय। उदयन प्रायः अकेला ही जंगलों में वीणा बजाकर हाथियों को पकड़ता
फिरता है ॥९॥
वह शिकार का व्यसनी है, अतः अवसर ढूँढ़कर किसी युक्ति से उसे जंगल से
पकड़वाकर वश में किया जाय और यहाँ लाया जाय ॥१० ॥
वह संगीत-शास्त्र का विशेषज्ञ है। अतः अपनी कन्या वासवदत्ता को उसकी संगीत
शिष्या बना दूँगा। इस प्रकार, वासवदत्ता को देखकर वह निस्सन्देह उसका अनुरागी
बन जायगा। फलतः वह मेरा वशीभूत और जामाता बन जायगा ॥११ १२॥
२१

इति सञ्चिन्त्य तत्सिद्धयै स गत्वा चण्डिकागृहम्।
चण्डीमभ्यर्च्य तुष्टाव चक्रेऽप्या उपयाचितम् ॥१३॥
एतत्समत्स्यते राजन्नचिराद् वाञ्छितं तव।
इति शुश्राव सत्रासावशरीरां सरस्वतीम् ॥१४॥
ततस्तुष्टः समागत्य बुद्धवत्तेन मन्त्रिणा।
सह चण्डमहासेनस्तमेवार्थमचिन्तयत् ॥१५॥
मानोद्धतो वीतलोभो रक्तभृत्यो महाबलः।
असाध्योऽपि स सामाद्यैः साम्ना तावन्निरूप्यताम् ॥१६॥
इति सम्मन्त्र्य स नृपो दूतमेकं समादिशत्।
गच्छ मद्द्वचनाद् ब्रूहि वत्सराजमिदं वचः ॥१७॥
मत्पुत्री तव गान्धर्वे शिष्या भवितुमिच्छति।
स्नेहस्त्वस्मासु धत्तस्व तामिहैवैत्य शिक्षय ॥१८॥
इत्युक्त्वा प्रेषितस्तेन दूतो गत्वा न्यवेदयत्।
कौशाम्ब्यां वत्सराजाय सन्देशं तं तथैव सः ॥१९॥
वत्सराजोऽपि तच्छ्रुत्वा दूतानूचित वचः।
यौगन्धरायणस्यैवमेकान्ते मन्त्रिणोऽब्रवीत् ॥२०॥
किमतत्तेन सन्दिष्टं सदर्पं मम भूपुजा।
एवं सन्दिष्टतस्तस्य कोऽभिप्रायो दुरात्मनः ॥२१॥
इत्युक्तो वत्सराजेन तदा यौगन्धरायणः।
उवाचेनं महामन्त्री स स्वामीहितनिष्ठुरः १ ॥२२॥
भुवि व्यसनिताख्यातिः प्ररूढा त रुतेव या।
इह तस्या महाराज! कषायकटुकं फलम् ॥२३॥
स हि त्वां रागिणं मत्वा कन्यारत्नेन लोभयन्।
नीत्वा चण्डमहासेनो बद्ध्वा स्वीकर्तुमिच्छति ॥२४॥
तमुञ्छ व्यसनानि त्वं सूक्ष्नं हि परैर्नृपाः।
सीदन्तस्तेषु गृह्यन्ते खातेष्विव वनद्विपाः ॥२५॥
इत्युक्तो मन्त्रिणा धीरः प्रतिदूतं व्यसर्जयेत्।
स वत्सराजस्तं चण्डमहासननृपं प्रति ॥२६॥
सन्दिदेश च यद्यस्ति वाञ्छा मच्छिष्यतां प्रति।
स्वत्पुत्र्यास्तदिहैवेषा भवता प्रेष्यतामिति ॥२७॥


१ स्वामिनः हिते कथ्याने निष्ठुरः कठिनः, सुदृढ इति भावः, यौगन्धरायणविशेष-
णिदम्।

द्वितीय लम्बक १६३

द्वितीय लम्बक १६३
ऐसा सोचकर चंडमहासेन उस कार्य की सिद्धि के लिए चंडिका के मन्दिर में गया और
वहाँ उसने पूजा तथा स्तुति करके मन्नत मानी ॥१३॥
चंडिका-मन्दिर में राजा ने आकाशवाणी सुनी कि 'हे राजन्! तुम्हारी यह अभिलाषा
पूर्ण होगी ॥१४॥
प्रसन्नचित राजा ने चंडिका-मन्दिर से लौटकर बुद्धिला नामक मन्त्री से इस विषय पर
विचार-विमर्श किया ॥१५॥
राजा ने कहा—'राजा उदयन उच्च आत्माभिमानी निर्भीक अनुगत अनुचरोंवाला
और महाबल (सेना) वान् है! वह साम दाम भेद दंड आदि नीतियों के वश में आनेवाला
नहीं है, उसे शान्ति से ही वश में करना चाहिए ॥१६॥
मन्त्री के साथ इस प्रकार विचार करके राजा ने एक दूत को राजा उदयन के पास भेजा
और यह सन्देश दिया कि तुम मेरे वचनानुसार वत्सराज के पास जाकर यह कहो कि मेरी पुत्री
तुझसे संगीत-विद्या सीखना चाहती है। यदि तुम्हें हमारे प्रति स्नेह है तो तुम उसे यहाँ आकर
शिक्षा दो ॥१७-१८॥
इस प्रकार उस सन्देश के साथ भेजे हुए दूत ने कौशाम्बी नगरी में जाकर अपने स्वामी
का सन्देश वत्सराज उदयन से कह सुनाया ॥१९॥ उदयन ने दूत से उज्जयिनी-नरेश के इस
अनुचित सन्देश को सुनकर एकान्त में मन्त्री यौगन्धरायण से कहा ॥२०॥
'इस कहने में मुझे यह कैसा साभिमान सन्देश भेजा है। तथा सन्देश देते हुए उस दूत
का क्या अभिप्राय है। वत्सराज के ऐसा कहने पर स्वामी के हित में सुदृढ़ और सतर्क
यौगन्धरायण मन्त्री ने राजा से कहा॥ १२१॥

१६४ कथासरित्सागर

१६४ कथासरित्सागर
एव कृत्वा च सन्निमान् वत्सराजो जगाद सः ।
यामि चण्डमहासनमिह बद्धवानयामि तम् ॥२८॥
तच्छ्रुत्वा तमुवाचाप्तो मन्त्री योगन्धरायणः ।
न चैतच्छक्यते राजन् कर्तुं नैव च युज्यते ॥२९॥
स हि प्रभाववान् राजा स्वीकायश्च सव प्रभो ।
तथा च तद्गतं सर्वं शृण्विदं कथयामि ते ॥३०॥
राज्ञश्चण्डमहासेनस्य कथा
अस्तीहोज्जयिनी नाम नगरी भूषणं भुवः ।
हसन्तीव सुधाधौतैः प्रासादैरमरावतीम् ॥३१॥
यस्यां वसति विश्वेशो महाकालवपुः स्वयम् ।
शिथिलीकृतकैलासनिवासव्यसनो हरः ॥३२॥
तस्यां महेन्द्रवर्माख्यो राजाभूद्भूभृतां वरः ।
जयसेनाभिधानोऽस्य बभूव सदृशः सुतः ॥३३॥
जनमेजयस्य तस्याथ पुत्रोऽप्रतिमदोर्बलः ।
समुत्पन्नो महासेननामा नृपतिकुञ्जरः ॥३४॥
सोऽथ राजा स्वराज्यं तत्पालयन्समचिन्तयत् ।
न मे खड्गोऽनुरूपोऽस्ति न च भार्या कुलोद्गता ॥३५॥
इति सञ्चिन्त्य स नृपश्चण्डिकागृहमागमत् ।
तत्रातिष्ठन्निराहारो देवीमाराधयंश्चिरम् ॥३६॥
उत्कृत्याथ स्वमांसानि होमकर्म च चाकरोत् ।
ततः प्रसन्ना साक्षात्सा देवी चण्डी तमभ्यधात् ॥३७॥
प्रीतास्मि ते गृहाणेमं पुत्र ! खड्गोत्तमं मम ।
एतत्प्रभावाच्छत्रूणामजयस्त्वं भविष्यसि ॥३८॥
अपि चाङ्गारवती नाम कन्यां त्रैलोक्यसुन्दरीम् ।
अङ्गारकासुरसुतां शीघ्रं भार्यामवाप्स्यसि ॥३९॥
अतीव चण्डकर्मेदं कृतं चैतद्यतस्त्वया ।
अतश्चण्डमहासेन इत्याख्या ते भविष्यति ॥४०॥
इत्युक्त्वा दत्तखड्गा सा देवी तस्य तिरोऽभवत् ।
राज्ञः सङ्कल्पसम्पत्तिवृष्टिरविर्बभूवुन ॥४१॥

द्वितीय लम्बक १९५

द्वितीय लम्बक १९५
इस प्रकार सन्देश भेजकर राजा उदयन ने मन्त्रियों से कहा—'मैं अभी जाता हूँ और
चंडमहासेन को बाँधकर लाता हूँ' ॥२८॥
राजा के विचार सुनकर मुख्यमन्त्री यौगन्धरायण बोला—'ऐसा करना न तो सम्भव है
और न उचित ही है। वह राजा प्रभावशाली है और उसे तुम्हें अपनाना भी चाहिए। इसके
सम्बन्ध में विस्तार से कहता हूँ सुनो' ॥२९ १/२ ॥
राजा चंडमहासेन की कथा
इस भूलोक में उज्जयिनी नाम की नगरी है जो भूलोक का भूषण है और सुधा-धवल
प्रासाद-पंक्तियों से वह इन्द्रपुरी अमरावती को मानों हँसती है ॥३१॥
जिस नगरी में महाकाल भगवान् शिव कैलास का निवास छोड़कर रहा करते हैं ॥३२॥
इस नगरी में राजाओं में श्रेष्ठ महेन्द्रवर्मा नाम का राजा था और जयसेन नामक उसी
के समान उसका पुत्र हुआ ॥३३॥
उस जयसेन का अनुपम बलशाली पुत्र महासेन हुआ ॥३४॥
उस महासेन ने बहुत दिनों तक शासन करते हुए सोचा कि न तो मेरे पास मेरे योग्य
खड्ग है और न उच्चकुलप्रसूत पत्नी ही है ॥३५॥
ऐसा सोचकर वह राजा महासेन चंडिका के मन्दिर में गया और निराहार रहकर
चिरकाल तक उसकी (चंडिका की) आराधना करने लगा ॥३६॥
अपना मांस काटकर जब उसने देवी के लिए हवन किया तब देवी ने प्रसन्न होकर कहा—
'पुत्र ! मैं तेरी आराधना से प्रसन्न हूँ। यह उत्तम खड्ग लो, इसके प्रभाव से शत्रु तुम्हें जीत न सकेंगे।
तुम उनके लिए अजय हो जाओगे और अंगारकासुर की अङ्गारवती नाम की कन्या है जो त्रैलोक्य
में ललाम सुन्दरी है वह शीघ्र ही तुम्हारी पत्नी बनेगी। तुमने अपना मांस काटकर
बलि देते हुए भयङ्कर यह (उग्र) कार्य किया है अतः तुम्हारा नाम चण्डमहासेन होगा। इतना
कहकर और खड्ग को देकर देवी अन्तर्धान हो गईं और राजा भी मानसिक सङ्कल्प की सफलता
होने का अनुभव करने लगा ॥३७-४१॥

स खङ्गो मत्तहस्तीन्द्रो नडागिरिरिति प्रभो।
द्वे तस्य रत्न शक्रस्य कुलिशैरावणाविव ॥४२॥
तयो प्रभावात् सुसित कदाचित्सोऽथ भूपति।
अगाच्चण्डमहासेनो मृगयायै महाटवीम् ॥४३॥
अतिप्रमाण सत्राक वराह घोरमैक्षत।
मैदा सम इवाकाण्डे दिवा पिण्डत्वमागतम् ॥४४॥
स वराह शरैरस्य तीक्ष्णैरप्यकृतव्रण !
आहृत्य स्यन्दन राज्ञ पराम्य विवरमाविशत् ॥४५॥
राजापि रथमुत्सृज्य तमेवानुसरन् रुधा।
धनुर्द्वितीयस्तत्प्रव प्राविशत्स बिलान्तरम् ॥४६॥
दूर प्रविश्य चापश्यत् कान्त पुरवर महत्।
सविस्मयो न्यवीवच्च तदन्तर्वीधिकातटे ॥४७॥
तत्रस्थ कन्यकामेकामपश्यत् स्त्रीशतान्विताम्।
सञ्चरन्तीं स्मरस्येव धैर्येनिर्मेदिनीमिपुम् ॥४८॥
सापि प्रेमरसामार्वपिणा चक्षुषा मुहु ।
स्नपयन्तीव राजानं शनकैस्तमुपागमत् ॥४९॥
कस्त्व सुभग ! कस्माच्च प्रविष्टोऽसीह साम्प्रतम्।
इत्युक्त स तया राजा यथातथ्यमवर्णयत् ॥५०॥
तच्छ्रुत्वा नेत्रयुगलात् सरागादश्रुसन्ततिम्।
हृदयादीरतां चापि सम कन्या मुमोच सा ॥५१॥
बा रव रोदिषि कस्माच्च पृष्टा तनति भूभृता।
सा त प्रत्यब्रवीद्ब मन्मथाज्ञानुवर्तिनी ॥५२॥
यो वराह प्रविष्टोऽत्र स दैत्योऽङ्गारकाभिधः।
अहं चैतस्य तनया नामाङ्गारवती नृप ॥५३॥
वयमाग्मयदक्षासौ राजपुत्रीरिमा धनम्।
आच्छिद्य गर्ता गहूभ्यः परिवार व्यधायम ॥५४॥
वि चैष राक्षसीभूत पापदोषा महासुरः।
शृप्ताथमात्रदृष्टाच रक्षां प्राप्यापि त्यक्तवानयम् ॥५५॥
इदानीं शान्तबागाहल्पो विधास्यति स्वयम्।
गुप्तोधिगच्छ नियत त्वयि पाप ममाचरेत् ॥५६॥

द्वितीय लम्बकः १६७

द्वितीय लम्बकः १६७
महाराज ! वह खड्ग और महागिरि नाम का हाथी—ये दो उस राजा के उसी प्रकार
के अमूल्य रत्न हैं जिस प्रकार इन्द्र के पास वज्र और ऐरावत हाथी। इन दोनों के प्रभाव से अत्यन्त
सुखी राजा चंडमहासेन एक बार शिकार खेलने के लिए घोर जंगल में गया। वहाँ उसने सहसा
बहुत लम्बा-चौड़ा एक भीषण शूकर को देखा जो दिन में सिमटे हुए रात के अन्धकार के गोले के
समान प्रतीत हो रहा था ॥४२-४४॥
वह शूकर, राजा के तीक्ष्ण बाणों से विद्ध होकर भी आहत न हुआ और राजा के रथ को
टक्कर मारकर एक बिल में जा घुसा ॥४५॥
राजा क्रोध से भरकर और रथ को छोड़कर उसका पीछा करता हुए धनुष के साथ
उसी बिल में चला गया ॥४६॥
बिल में दूर तक जाकर राजा ने एक सुन्दर सजा हुआ नगर देखा। थका हुआ राजा
विश्राम के लिए वहाँ एक बावली के तट पर जा बैठा। राजा ने उस बापी में अनेक सहेलियों
के साथ स्नान करती हुई एक सुन्दरी कन्या को देखा जो धैर्य को नष्ट कर देनेवाले कामदेव के
एक बाण के समान थी ॥४७-४८॥
वह सुन्दरी अपनी दृष्टि से प्रेम-रस बरसाकर मानों राजा को स्नान कराती हुई और रोती
हुई राजा के पास आई और बोली—'हे सौभाग्यशालिन् ! तुम कौन हो ? और इस समय यहाँ
किसलिए आये हो ? यह सुनकर राजा ने उससे सारी सच्ची बात कह दी। राजा की बातें सुनकर,
उस सुन्दरी ने आँखों से अविरल अश्रु-धारा और हृदय से धैर्य को एक साथ ही छोड़ दिया। 'तुम कौन
हो और क्यों रो रही हो ? राजा के इस प्रकार पूछने पर कामदेव से प्रेरित वह बाला बोली—
'जो शूकर इस बिल में घुसा है, वह अंगारकसुर नाम का दैत्य है और मैं अंगारवती नाम की उसकी
कन्या हूँ। यह अंगारकसुर, वज्र के समान बना हुआ अत्यन्त बलवान् है। जिन राजकुमारियों को
तुम यहाँ देख रहे हो इन्हें यह दैत्य राजाओं के महलों से बलपूर्वक छीनकर लाया है। इन्हीं
से इसने मेरा परिवार बनाया है ॥४९-५४॥
यह असुर शाप के कारण राक्षस बन गया है। शाप के कारण ही प्यासा और थका
हुआ इसने तुम्हें देखकर भी छोड़ दिया है। इस समय वह शूकर-रूप को त्याग कर सो रहा है।
सोकर उठते ही वह अवश्य तुम्हें मार डालेगा ॥५५-५६॥
१. कृत्रिम रूपवाले निद्रावस्था में अपने वास्तविक रूप में हो जाते हैं। यह प्राकृतिक
नियम है। —अनु.

इति मे तव कल्याणमपश्यन्त्या गलन्त्यमी।
सन्तापक्वथिताः प्राणा इव बाष्पाम्बुबिन्दवः ॥५७॥
इत्यङ्गारवतीवाक्यं श्रुत्वा राजा जगाद ताम्।
यदि मय्यस्ति ते स्नेहस्तदिदं मद्वचः कुरु ॥५८॥
प्रबुद्धस्यास्य गत्वा त्वं रोदिहि स्वपितुः पुरः।
ततश्च नियतं स त्वां पृच्छेद्बुद्वेगकारणम् ॥५९॥
त्वां सन्निपातयेत्कश्चित्ततो मे का गतिर्भवेत्।
एतद्दुःखं ममेत्येवं स च वाच्यस्त्वया ततः ॥६०॥
एवं कृतेऽस्ति कल्याणं तवापि च ममापि च।
इत्युक्ता तेन सा राज्ञा तथत्यङ्गीचकार तम् ॥६१॥
तं च प्रच्छन्नमवस्थाप्य राजानं पापशङ्किनी।
जगामासुरकन्या सा प्रसुप्तस्यान्तिकं पितुः ॥६२॥
सोऽपि दैत्यः प्रबुबुधे प्रारम्भे सा च रोदितुम्।
किं पुत्रि ! रोदिषीत्येवं स च तामब्रवीत्ततः ॥६३॥
'हन्त्यास्त्वां कोऽपि चेत्तात ! तदा मे का गतिर्भवेत्।
इत्याख्यां तमवादीत्सा स विहस्य ततोऽब्रवीत् ॥६४॥
को मां व्यापादयेत्पुत्रि ! सर्वो वध्यमयो ह्यहम्।
वामहस्तेऽस्ति मे छिद्रं सञ्च चापेन रक्ष्यते ॥६५॥
इत्थमाश्वासयामास स दैत्यस्तां निजां सुताम्।
एतच्च निखिलं तत्र राजा छन्नः शुश्राव ॥६६॥
ततः क्षणादिवोत्थाय कृत्वा स्नानं स दानवः।
कृतमौनः प्रववृते देवं पूजयितुं हरम् ॥६७॥
तत्कालं प्रकटीभूय स राजाकृष्टकार्मुकः।
उपेत्य प्रसमं दैत्यं रणायाह्वयते स्म तम् ॥६८॥
सोऽप्युत्क्षिप्य करं वामं मौनस्थस्तस्य भूपतेः।
प्रतीक्षस्व क्षणं तावदिति संज्ञां तदाकरोत् ॥६९॥
राजापि लघुहस्तत्वात्करं तमेव तत्क्षणम्।
तस्मिन्मर्मणि तं दैत्यं पृषत्केन जघान सः ॥७०॥
स च मर्माहतो घोरं रावं कृत्वा महासुरः।
अगारकोश्याप्तद् भूमौ न्यञ्जीबो जगाद च ॥७१॥
सुषितोऽहं हतो येन स मामवृभिर्न तर्पयेत्।
प्रत्यब्दं यदि तत्तस्य नश्येयुः पञ्च मन्त्रिणः ॥७२॥

द्वितीय लम्बक १९९

द्वितीय लम्बक १९९
इसी कारण आँखों से ये आँसू तुम्हारा कल्याण न देखकर शरीर में प्राणों के समान
निकल रहे हैं' ॥५७॥
राजा अंगारवती की बात सुनकर उससे बोला—"यदि तुम्हें मुझ पर स्नेह है तो तुम
मेरी एक बात मानो ॥५८॥
वह यह कि जब अंगारकासुर सोकर उठे तब तुम उस अपने पिता के सामने खूब
रोओ तब वह अवश्य ही तुम्हारे रोने का कारण पूछेगा ॥५९॥
तब तुम उससे कहना मुझे यह दुःख हो रहा है कि यदि तुम्हें कोई मार डाले तो मेरी
क्या गति होगी ? यही दुःख मेरे रोने का कारण है' ॥६०॥
तुम्हारे ऐसा करने पर मेरा और तुम्हारा दोनों का कल्याण होगा। राजा से यह सुनकर
अंगारवती ने उसी प्रकार करना स्वीकार कर लिया ॥६१॥
अंगारवती ने पिता के भय से राजा को पास ही कहीं छिपा दिया और स्वयं सोये हुए
पिता के निकट चली गई ॥६२॥
वह दैत्य जब जागा तब कन्या रोने लगी। तब दैत्य ने पूछा—'बेटी ! क्यों
रो रही हो ? तब अंगारवती ने कहा—'पिता ! यदि तुम्हे कोई मार डाले तो मेरी
क्या गति होगी। इसी वेदना से मैं रो रही हूँ। उसके ऐसा कहने पर वह दैत्य हँसकर
कहने लगा—॥६३ ६४॥
'बेटी मुझे कौन मारेगा। मेरा सारा शरीर वज्र से बना है। केवल बाईं
हथेली में एक छिद्र (दुर्बलता) है उसकी रक्षा धनुष से हो जाती है। इस प्रकार
दैत्य ने पुत्री को धीरज बँधाया और यह सब पास ही छिपे हुए राजा ने सुन
लिया ॥६५ ६६॥
तदनन्तर कुछ ही समय बाद वह दानव उठा और स्नान करके शिवजी की पूजा-स्तुति
करने लगा ॥६७॥
राजा ने भी उस समय प्रकट होकर दानव को युद्ध के लिए ललकारा ॥६८॥
मौन मुद्रा में बैठा हुआ वह दैत्य बायें हाथ को ऊपर उठाकर 'जरा ठहरो'
इस प्रकार राजा से संकेत करने लगा। राजा बाण-विद्या में सिद्धहस्त तो था ही
उसी समय उसने एक बाण दैत्य के मर्मस्थान (बाईं हथेली) पर मारा। वह दैत्य
मर्मस्थान पर आघात होने के कारण भीषण चीत्कार के साथ प्राणों को त्यागता हुआ
बोला—॥६९-७१॥
'मुझ प्यासे को जिसने मारा है, वह यदि प्रतिवर्ष पानी से मेरा तर्पण न करेगा तो उसके
पाँच मन्त्री मर जायेंगे' ॥७२॥
२२

१७० कथासरित्सागर

१७० कथासरित्सागर
इत्युक्त्वा पञ्चतां प्राप स दैत्यः सोऽपि तत्सुताम्।
तामङ्गारवतीं राजा गृहीत्वान्धमयीं ययौ ॥७३॥
परिणीतवतस्तस्य तत्र तां दैत्यकन्यकाम्।
जातौ द्वौ तनयौ चण्डमहासेनस्य भूपतेः ॥७४॥
एको गोपालको नाम द्वितीयः पालकस्तथा।
तयोरिन्द्रोत्सव आसी जातयोरकरोन्नृपः ॥७५॥
ततस्तं नृपतिं स्वप्ने तुष्टो वक्ति स्म वासवः।
प्राप्स्यस्यन यसपुत्रीं मत्प्रसादात्सुतामिति ॥७६॥
ततः कालेन जातास्य राज्ञः कन्या तु तन्मया।
अपूर्वा निर्मिता धात्रा चन्द्रस्येवापरा तनुः ॥७७॥
कामदेवावतारोऽस्याः पुत्रो विद्याधराधिपः।
भविष्यतीति तत्कालमुदभूद् भारती दिवः ॥७८॥
दत्ता मे वासवेनैषा तुष्टेनेति स भूपतिः।
नाम्ना वासवदत्तां तां तनयामकरोत्तदा ॥७९॥
सा च तस्य पितुर्गृहे प्रदेया सम्प्रति स्थिता।
प्राङ् मन्थादूर्णवस्येव कमला कुक्षिकोटरे ॥८०॥
एवम्बिधप्रभावश्चण्डमहासेनभूपतिः स किल।
देव ! न शक्यो जेतुं यथा तथा दुर्गवेश्मस्थः ॥८१॥
किं च स राजन्वाञ्छति दातुं तुभ्यं सदृशं तनयां ताम्।
प्रार्थ्यते तु स राजा निजपक्ष महोदय मानी ॥८२॥
सा चावश्यं मन्ये वासवदत्ता त्वयैव परिणेया।
स सपदि वासवदत्ताहृतहृदयो वत्सराजोऽभूत् ॥८३॥
इति महाकवि श्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे
कथामुखलम्बके तृतीयस्तरङ्गः।
चतुर्थस्तरङ्गः
अत्रान्तरे स वत्सेशप्रवृत्तस्तदब्रवीत्।
गत्वा प्रतिपदश्चण्डमहासेनाय भूपते ॥१॥

द्वितीय लम्बक १७१

द्वितीय लम्बक १७१
इस प्रकार कहते हुए अंगारकासुर ने प्राण छोड़ दिये और राजा भी उसकी पुत्री अंगारवती
को लेकर उज्जैन चला गया ॥७३॥
उज्जैन में जाकर उस अंगारवती से विवाह करने पर चंडमहासेन राजा के दो पुत्र उत्पन्न
हुए, एक गोपालक और दूसरा पालक ! राजा ने दोनों का जन्मोत्सव खूब धूमधाम के साथ
मनाया ॥७४-७५॥
एक बार सोये हुए राजा को स्वप्न में इन्द्र ने कहा—'राजन् ! तुम मेरी कृपा से अपूर्व
सुन्दरी कन्या प्राप्त करोगे' ॥७६॥
इस प्रकार इन्द्र की कृपा से राजा को नवीन चन्द्रमा के समान सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई।
उसके उत्पन्न होते ही आकाशवाणी हुई कि इस कन्या के गर्भ से कामदेव का अवतार होगा जो सब
विद्याधरों का चक्रवर्ती होगा ॥७७-७८॥
राजा ने प्रसन्न होकर उस कन्या का नाम इसीलिए वासवदत्ता रखा कि उसे वह वासव
अर्थात् इन्द्र के प्रसाद से प्राप्त हुई थी ॥७९॥
वह कन्या इस समय राजा के भवन में उसी प्रकार निवास कर रही है जिस प्रकार
मन्थन से पहले समुद्र-गर्भ में लक्ष्मी निवास करती थी ॥८० ॥
यौगन्धरायण ने कहा—'महाराज ! वह उज्जैन का महाराजा चंडमहासेन इस प्रकार
सुदृढ़ दुर्ग में स्थित महाबलवान् है। वह सहज में ही नहीं जीता जा सकता। साथ ही राजन् ! वह
स्वयं ही तुम्हें कन्या देना चाहता है, किन्तु अत्यन्त आत्माभिमानी होने के कारण अपने पक्ष को
ऊँचा रखना भी चाहता है ॥८१-८२॥
इसलिए उस वासवदत्ता से तुम्हें अवश्य ही विवाह करना चाहिए। राजा उदयन मन्त्री
यौगन्धरायण की बातें सुनकर वासवदत्ता के प्रति अत्यन्त आकृष्ट होकर आत्मविस्मृत-सा हो
गया ॥८३॥
महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के कथामुखलम्बक का
तृतीय तरंग समाप्त
चतुर्थ तरंग
वत्सराज उदयन की कथा (क्रमशः)
इसी बीच कच्छराज के भेजे हुए दूत ने उसका प्रतिसन्देश चंडमहासेन के पास पहुँचा
दिया ॥१॥

सोऽपि चण्डमहासेनस्तच्छ्रुत्वैव व्यचिन्तयत्।
स तावदिह नायाति मानी वत्सेश्वरो भृशम् ॥२॥
कन्या हि तत्र न प्रेष्या भवेदेव हि लाघवम्।
तस्मात् वल्लभं तं युक्त्या नृपमानायाम्यहम् ॥३॥
इति सञ्चिन्त्य सम्मन्त्र्य स राजा मन्त्रिभिः सह।
अकारयत्स्वसंवृत्तं महान्तं यन्त्रहस्तिनम् ॥४॥
तं चान्तर्वीरपुरुषं कृत्वा छन्नैरधिष्ठितम्।
विन्ध्याटव्यां स निदधे राजा यन्त्रमयं गजम् ॥५॥
तत्र तं चारपुरुषाः पश्यन्ति स्म विदूरतः।
गजवन्धरसासक्तवत्सराजोपजीविनः ॥६॥
ते च त्वरितमागत्य वत्सराजं व्यजिज्ञपन्।
देव ! दृष्टो गजोऽस्माभिरेको विन्ध्यवने भ्रमन् ॥७॥
अस्मिन्नियति भूलोके नैव योऽन्यत्र दृश्यते।
वर्ष्मणा व्याप्तगगनो विन्ध्याद्रिरिव जङ्गमः ॥८॥
तत्तच्चारवचः श्रुत्वा वत्सराजो जहर्ष सः।
तेभ्यः सुवर्णलक्षं च प्रददौ पारितोषिकम् ॥९॥
तं चेद् गजेन्द्रं प्राप्स्यामि प्रतिमल्लं नडागिरेः।
ततश्चण्डमहासेनो वश्यो भवति मे ध्रुवम् ॥१०॥
लतां वासवदत्तां तां स स्वयं मे प्रयच्छति।
इति सञ्चिन्त्यसन्न्योज्य राजा सामन्तयष्टिधाम् ॥११॥
प्रातश्च मन्त्रिवचनं व्यङ्क्त्वा गजतृष्णया।
पुरस्कृत्यैव तांश्चारान्ययौ विन्ध्याटवीं प्रति ॥१२॥
प्रस्थानलग्नमस्य फल कन्यालाभः सबन्धनम्।
यद्बूचुर्गणकास्तस्य तरम नैव व्यवारयत् ॥१३॥
प्राप्य विन्ध्याटवीं तस्य गजस्य लोभमोहिताः।
वत्सराजः स सैन्यानि दूरादेव न्यवारयत् ॥१४॥
चारमात्रसहायस्तु वीणां घोषवतीं दधत्।
निजव्यसनविस्तीर्णां तां विवेश महाटवीम् ॥१५॥
विन्ध्यस्य दक्षिणे पार्श्वे दूराच्चारैः प्रदर्शितम्।
गजं मत्तगजाभासं तं ददर्श स भूपतिः ॥१६॥

द्वितीय लम्बक १७३

द्वितीय लम्बक १७३
उदयन के सन्देश को सुनकर चंडमहासेन ने सोचा—कि वह आत्माभिमानी वत्सराज
उदयन यहाँ आना नहीं चाहता। मैं भी कन्या को उसके यहाँ नहीं भेज सकता। इसमें मेरी
लघुता होगी। इसीलिए चतुराई से कैद कर ही उसे यहाँ बुलाता हूँ—ऐसा सोचकर चंड
महासेन ने मन्त्रियों से मन्त्रणा करके अपने हाथी नडागिरि के समान ही एक यन्त्रमय हाथी
बनवाया। उसके पेट में योग्य योद्धाओं को छिपाकर उसे विन्ध्याचल के घोर जंगल में रखवा
दिया॥२—५॥
राजा उदयन के शिकारी भृत्यों ने जंगल में घूमते हुए उस यन्त्र-हस्ती को दूर से देखा और
राजा उदयन से निवेदन किया—'महाराज हमने विन्ध्यारण्य में घूमता हुआ एक महान्
हाथी देखा है। ऐसा हाथी इस विशाल भूमण्डल में नहीं देखा गया। लम्बे-चौड़े एवं विशाल-
काय वह जंगम विन्ध्य पर्वत के समान आकाश में व्याप्त हो रहा है'। शिकारी गुप्तचरों
की बात सुनकर राजा उदयन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें सुवर्ण-मुद्राओं के पुरस्कार
देकर विदा किया॥६—९॥
और सोचा कि मैं नडागिरि के समान उस हाथी को यदि प्राप्त कर लूँगा तो चंडमहासेन
अवश्य मेरे वश में आयेगा और स्वयं ही मुझे वासवदत्ता को प्रदान करेगा। इस प्रकार
सोचते हुए राजा ने किसी प्रकार रात्रि व्यतीत की॥१०-११॥
प्रातःकाल उठकर मन्त्रियों की बात न मानकर राजा उदयन ने हाथी के लोभ में उन
शिकारी गुप्तचरों को आगे करके जंगल में प्रस्थान किया। उसके ज्योतिषियों ने उसकी मृगया
यात्रा का फल बताया था कि कन्या-लाभ तो होगा किन्तु बन्धन (कैद) के साथ। इस बात पर
भी उसने ध्यान नहीं दिया॥१२-१३॥
विन्ध्यारण्य में पहुँचकर राजा उदयन ने सेनाओं को दूर ही रोक दिया कि उनकी भीषण
ध्वनि से हाथी भड़ककर कहीं भाग न जाय केवल शिकारी गुप्तचरों को साथ लेकर राजा
घोषवती वीणा को बजाता हुआ और अपने बचपन की बात स्मरण करता हुआ घोर जंगल में
प्रवेश कर गया॥१४ १५॥
गुप्तचरों द्वारा दूर से दिखाये हुए तथा विन्ध्यवन की दाहिनी ओर घूमते हुए उस कल्पित
हाथी को राजा ने देखा॥१६॥

१७४ कथासरित्सागर

१७४ कथासरित्सागर

एकाकी वादयन्वीणां चिन्तयन् बन्धनानि सः।
मधुरध्वनि गायंश्च शनैरुपजगाम तम् ॥१७॥
गान्धर्वदत्तचित्तत्वात्सन्ध्याध्वान्तवशाच्च सः।
न तं वनगजं राजा मायागजमलक्षयत् ॥१८॥
सोऽपि हस्ती समुत्संतो गीतरसादिव।
उपेत्योपेत्य विचलन् दूरमाकृष्टवान्नृपम् ॥१९॥
ततोऽकस्माच्च निर्गत्य तस्माच्चर्ममयाद् गजात्।
वत्सेश्वरं सं सन्नद्धा पुरुषाः पर्यवारयन् ॥२०॥
तान्‍दृष्ट्वा नृपतिः कोपादाकृष्टच्छुरिकोऽथ सः।
अप्रस्थान् योधयन्नन्यैरेत्य पश्चाद्वगृह्यत ॥२१॥
सङ्केतमिलितैश्चान्यैर्योधास्तैः सैनिकैः सह।
निन्युर्वत्सेश्वरं चण्डमहासेनान्तिकं च तम् ॥२२॥
सोऽपि चण्डमहासेनो निर्गत्याग्रे कृतादरः।
वत्सेशेन समं तेन विवेशोज्जयिनीं पुरीम् ॥२३॥
स तत्र ददृशे पौरैरवमानकलङ्कितः ।
छतीव लोचनानन्दो वत्सराजो नवागतः ॥२४॥
ततोऽस्य गुणरागेण वधमाशङ्क्य तत्र ते।
पौराः सम्भूय सन्नादचक्रुर्मरणनिश्चयम् ॥२५॥
न मे वत्सेश्वरो वध्यो मयेष इति तान् ब्रुवन्।
सांत्व्य चण्डमहासेनः पौरान् क्षोभादवारयत् ॥२६॥
ततो वासवदत्तां तां सुतां तत्रैव भूपतिः।
वत्सराजाय गान्धर्वविद्याहेतोः समर्पयत् ॥२७॥
उवाच चैनं गान्धर्वं स्वसुतां शिक्षय प्रभो।
ततः प्राप्स्यसि कल्याणं मा विषादं वृथा कृथा इति ॥२८॥
तस्य दृष्ट्वा तु तां कन्यां यन्मगजस्य भाननम्।
मया स्नेहात्तमभवन्न यथा मन्युमेशतः ॥२९॥
तस्यानु चागुनमनी सह तं प्रतिजग्मतुः।
हिया सद्युनिवृत्ते मनस्तु न व्यरुध्यत ॥३०॥
अथ वासवदत्तां तां गापयन्गद्गतेक्षणः।
तथ गान्धर्वतायापी वत्सगज उवाच सः ॥३१॥

द्वितीय लम्बक

द्वितीय लम्बक
१७५
अकेले वीणा बजाता हुआ और मधुर स्वर में गाता हुआ साथ ही अपने बन्धन की
बात को भी सोचता हुआ वह राजा धीरे-धीरे हाथी के समीप चला गया॥१७॥
गीत की ओर तन्मय होने और सन्ध्याकालीन अन्धकार के घने होने के कारण राजा उस
काष्ठ के रूप में निर्मित माया-गज को वास्तविक रूप में न पहचान सका॥१८॥
वह हाथी भी मानों गीतरस में मग्न होकर लम्बे-लम्बे कानों को हिलाता हुआ राजा के
समीप आता हुआ-सा धीरे-धीरे उस दूर एकान्त में ले गया। एकान्त में पहुँचते ही उस यान्त्रिक
हाथी के उदर से निकलकर पहले से तैयार कुछ वीर सिपाहियों ने राजा को घेर लिया॥१९-२०॥
उन्हें देखकर क्रुद्ध राजा ने कमर से छुरी खींचकर बगल सिपाहियों से जूझना
प्रारम्भ किया। इतने में ही संकेत पाकर पीछे छिपे हुए अन्य सैनिक भी जंगल से निकल
आये और पीछे से आक्रमण करके बलपूर्वक राजा उदयन को बन्दी बनाकर चण्डमहासेन
के पास ले गये॥२१-२२॥
चण्डमहासेन भी वत्सराज को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने आगे बढ़कर उसका

१७६ | कथासरित्सागर

१७६ | कथासरित्सागर
अङ्के घोषवती तस्य कण्ठे गीतद्युतिस्तथा।
पुरो वासवदत्ता च तस्यै चेतोविनोदिनी ॥३२॥
सा च वासवदत्तास्य परिचर्यापराऽभवत्।
लक्ष्मीरिव तदेकाग्रा वक्षस्याप्यनपायिनी ॥३३॥
अत्रान्तरे च कौशाम्ब्यां वत्सराजानुगे जने।
आवृत्तं तं प्रभुं बुद्ध्वा बद्धं राष्ट्रं प्रचुक्षुभे ॥३४॥
उज्जयिन्यामवस्कन्दं¹ दातुमैच्छंस्तमन्ततः।
वत्सेश्वरानुरागेण क्रुद्धा प्रकृतयस्तथा ॥३५॥
नैव चण्डमहासेनो वत्साध्यो महान्हि सः।
न चैव वत्सराजस्य शरीरं कुशलं भवेत् ॥३६॥
तस्मान्न युक्तोऽवस्कन्दो बुद्धिसाध्यमिदं पुनः।
इति प्रकृतयः क्षोभान्न्यवार्यन्त रुमण्वता ॥३७॥
ततोऽनुरक्तमालोक्य राष्ट्रमव्यभिचारि तत्।
रुमण्वदादीनाहूय स्म धीरो यौगन्धरायणः ॥३८॥
इहैव सर्वैर्यूष्माभिः स्थातव्यं सर्वतोद्यतैः।
रक्षणीयमिदं राष्ट्रं कालो नायमथ विक्रमः ॥३९॥
वसन्तकद्वितीयश्च गत्वाहं प्रज्ञया स्वया।
वत्सेशं मोचयित्वा तामानेष्यामि न संशयः ॥४०॥
जलाहतो विषादेन विद्युतामिव द्युतिः।
आपदि स्फुरति प्रज्ञा यस्य धीरः स एव हि ॥४१॥
प्राकारभञ्जनान् योगांस्तथा निगडभञ्जनान्।
अदर्शनप्रयोगांश्च जानन्नहमृप्ययोगिनः ॥४२॥
इत्युक्त्वा प्रकृतीः कृत्वा हस्तन्यस्ता रुमण्वतः।
यौगन्धरायणः प्रायात्कौशाम्ब्याः सवसन्तकः ॥४३॥
प्रविवेश च तेनैव सह विन्ध्यमहाटवीम्।
स्वप्रज्ञामिव सत्ताढ्यां स्वनीतिमिव दुर्गमाम् ॥४४॥
तत्र वत्सेशमित्रस्य विन्ध्यप्राग्भारवासिनः।
गृहं पुलिन्दकाख्यस्य पुलिन्दाधिपतेरगात् ॥४५॥
तं सज्जं स्थापयित्वा च यथा वचनाभिप्सितं।
वत्सराजस्य रक्षार्थं भूरिसैन्यसमन्वितम् ॥४६॥
१ आक्रमणमिति भावः।

तृतीय लम्बक १७७

तृतीय लम्बक १७७
संगीत-शाला में राजा उदयन के मनोविनोद के लिए गोद में घोषवती वीणा कंठ में संगीत
का स्वर और आँखों के सामने वासवदत्ता-यह सामग्री थी ॥३२॥
उस कैदी राजा की सुस्थिरा लक्ष्मी के समान शिष्या वासवदत्ता राजा की सेवा-शुश्रूषा
में तन्मय रहने लगी ॥३३॥
इसी बीच उधर शिकार से लौटे हुए सैनिकों तथा गुप्तचरों द्वारा वत्सराज उदयन का कैद
होना सुनकर राजा के प्रेम से सारा वत्स राष्ट्र क्षुब्ध हो गया और उज्जयिनी पर आक्रमण की
तैयारियाँ होने लगीं ॥३४-३५॥
जनता को क्षुब्ध देखकर मन्त्री रूमण्वान् ने इस प्रकार उसे शान्त किया कि चंडमहासेन
युद्ध के द्वारा वश में नहीं किया जा सकता। वह महाबलवान् है। और इस प्रकार आक्रमण
करने से वत्सराज की भी खैर न होगी। उसका वध कर दिया जायगा। इसलिए यह कार्य
युद्ध से नहीं प्रत्युत बुद्धि से सिद्ध करने योग्य है ॥३६-३७॥
राष्ट्र में राजानुरक्त प्रजा का क्षोभ देखकर परम बुद्धिमान् प्रधान मन्त्री यौगन्धरायण ने
रुमण्वान् आदि मन्त्रियों तथा राज्याधिकारियों से कहा-॥३८॥
'तुम सबको सर्वदा तैयार रहना चाहिए और इस राजाहीन राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए।
समय आने पर युद्ध के लिए भी तैयार रहना चाहिए और मैं नर्म-सचिव वसन्तक के साथ अपने
बुद्धि-बल से वत्सराज को छुड़ा लाता हूँ इसमें सन्देह नहीं ॥३९-४०॥
अधिक वात-संघर्ष से जैसे अधिक बिजली उत्पन्न होती है, उसी प्रकार भीषण और
गम्भीर संकट के समय जिसकी बुद्धि का स्फुरण होता है वही धीर है ॥४१॥
प्राकारों के ध्वंस करने के योग (उपाय) बेड़ियाँ काटने के योग और अदृश्य हो जाने के योग
(उपाय) भी मैं जानता हूँ। ऐसा कहकर और प्रजा को मन्त्री रूमण्वान् के हाथ सौंपकर
यौगन्धरायण कौशाम्बी से वसन्तक के साथ निकल गया ॥४२-४३॥
साथ ही वसन्तक के साथ अपनी बुद्धि के समान सत्त्वयुक्त तथा अपनी नीति के समान
दुर्गम विन्ध्य महावन में वह गया१ ॥४४॥
वहीं विन्ध्य-सीमा पर निवास करनेवाले पुलिन्द (जंगली) जाति के राजा वत्सराज के
मित्र पुलिन्दक से मिलकर यौगन्धरायण ने उसे प्रबल और बड़ी सेना के साथ तैयार रहने के लिए
कहा जिससे वत्सराज को लेकर लौटते समय यदि पीछे से आक्रमण हो तो पहली युद्धभूमि यही
बन ॥४५-४६॥
१. जंगल के पक्ष में सत्त्व का अर्थ प्राणी है, यौगन्धरायण के पक्ष में मनोबल है। जिस
प्रकार यौगन्धरायण की नीति दुर्गम थी, उसी प्रकार वह जंगल कठिनाइयों से भरा अतएव
दुर्गम था।—अनु.
२३

१७८ कथासरित्सागर

१७८ कथासरित्सागर
गत्वा वसन्तकसखस्ततो यौगन्धरायणः ।
उज्जयिन्यां महाकालश्मशानं प्राप स क्रमात् ॥४७॥
विवेश तच्च बेताल क्रव्यगन्धिभिरावृतम् ।
इतस्ततस्तमश्यामंसंस्थिताभूमैरिवापरः ॥४८॥
तत्रैनं दर्शनप्रीतो मित्रभावाय तत्क्षणम् ।
योगेश्वरसख्यो भूतवानभ्यर्थ्य ब्रह्मराक्षसः ॥४९॥
तेनोपदिष्ट्या युक्त्या सतो यौगन्धरायणः ।
स चकारारमनः सद्यो रूपस्य परिवर्त्तनम् ॥५०॥
बभूव क्षेम विकृतः कुब्जो वृद्धस्य तत्क्षणात् ।
उन्मत्तवेशः सस्वाटो हास्यसञ्जननः परम् ॥५१॥
तयैव युक्त्या स यदा सिरानद्धपृषूदरम् ।
चक वसन्तकस्यापि रूपं दन्तुरमुण्डुलम् ॥५२॥
ततो राजकुलद्वारमादौ प्राप्य ससस्तकम् ।
विवेशोज्जयिनीं तौ स साधुर्यौगन्धरायणः ॥५३॥
नृत्यन्गायश्च तत्रासौ बटुभिः परिवारितः ।
दृष्टः सकौतुकं सर्वैर्ययौ राजगृहं प्रति ॥५४॥
तत्र राजावरोधानां समासो कृतकौतुकः ।
अगाद् वासवदत्तायाः शनैः श्रवणगोचरम् ॥५५॥
सा तमानाययामास घटिनीं प्राप्य सत्वरम् ।
गायनवस्त्रास्तां मर्मेशसादरं हि नवं वयः ॥५६॥
स च तत्र गतो वृद्धः वत्सराजं ददर्श तम् ।
उन्मत्तवन्तो विगलद्बाप्पो यौगन्धरायणः ॥५७॥
चकार तस्य सञ्ज्ञां च वत्सराजाय सोऽपि तम् ।
प्रत्यभिज्ञातवान् राजा वयप्रच्छन्नमागतम् ॥५८॥
ततो वासवदत्तां च तन्पत्नीं प्रति चात्मनः ।
अदर्शनं यस्यित्वाद् व्यपायोगपरायणः ॥५९॥
गजा रक्ष्यो ह्यनेनेति मान्त्वं गर्व्वा गविग्नमयम् ।
बन्धिनि ग्प गतानेस्मादुन्मत्तं क्वाप्यमादिति ॥६०॥
१ अदृश्याञ्जनलेपेनेति भावः।

द्वितीय लम्बक १७९

द्वितीय लम्बक १७९
तदनन्तर यौगन्धरायण बसन्तक को साथ लिये हुए उज्जयिनी के महाकाल श्मशान में
पहुँचा ॥४७॥
वह श्मशान मांस की दुर्गन्धिवाले और चिता-धूम के गुब्बारों के समान काले-काले वेतालों
से भरा हुआ था॥४८॥
वहाँ श्मशान में पहुँचने पर विद्याबल के कारण उसे देखते ही प्रसन्न होकर योगेश्वर नाम
का ब्रह्मराक्षस यौगन्धरायण का मित्र बन गया॥४९॥
उसी योगेश्वर की बताई हुई युक्ति के अनुसार यौगन्धरायण ने तुरन्त अपना
रूप बदल लिया। रूप बदलते ही यौगन्धरायण उसी समय टेढ़े-मेढ़े शरीरवाला कुबड़ा
और चिकनी खोपड़ीवाला बूढ़ा लगने लगा। उसका रूप अत्यन्त हास्यजनक हो
गया ॥५०-५१॥
उसी युक्ति से उसने बसन्तक की बाहर निकली हुई तोंद (पेट) को चमड़े की डोरियों
से बाँधकर बड़े-बड़े और निकले हुए दाँतोंवाला बुरा-सा मुँह बनाकर उसका वेष ही बदल
दिया ॥५२॥
वेष बदलने के अनन्तर बसन्तक को राजभवन के द्वार पर पहले भेजकर यौगन्धरायण भी
स्वयं उसी वेश में चला। नाचता-गाता और बच्चों से घिरा हुआ एवं नागरिकों के लिए तमाशा
सा बना हुआ बसन्तक राजभवन में पहुँचा ॥५३-५४॥
महल में रानियों को तमाशा दिखलाता हुआ बसन्तक वासवदत्ता के कानों में भी
पहुँचा ॥५५॥
वासवदत्ता ने सेविका को भेजकर तमाशा देखने के लिए उसे संगीत-शाला में बुलवाया
क्योंकि नई अवस्था हास्य-विनोद की ओर अधिक आकृष्ट होती है॥५६॥
संगीत-शाला में जाकर पागल-वेष में आँसू बहाते हुए (राजा की दशा पर रोते हुए)
यौगन्धरायण ने कैदी वत्सराज को देखा॥५७॥
और राजा से संकेत भी किया। राजा ने भी वेश बदलकर आये हुए यौगन्धरायण को
पहचान लिया ॥५८॥
उधर कुबड़ा यौगन्धरायण अदृश्य होने की युक्ति से वासवदत्ता और उसकी
सेविकाओं से अदृश्य हो गया। केवल लड़का राजा उत्सव ही उस देश गया। इस
प्रकार उसके अदृश्य होने पर सभी सेविकाएँ आश्चर्य करने लगीं कि वह पागल कहाँ
गया ?॥५९-६०॥

१८ कथासरित्सागर

१८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा तं च दृष्ट्वाग्रे मत्वा योगबलं तत् ।
युक्त्या वासवदत्तां तां वत्सराजोऽब्रवीदिदम् ॥६१॥
गत्वा सरस्वतीपूजामादायागच्छ दारिके ।
तच्छ्रुत्वा सा तथेत्युक्त्वा सवयस्या विनिर्ययौ ॥६२॥
यथोचितमुपेत्याथ ददौ वत्सेश्वराय सः ।
यौगन्धरायणस्तस्मै योगाक्षियङ्मभ्यञ्जनान् ॥६३॥
अस्याम् वासवदत्ताया वीणातन्त्रीनियोजितान् ।
वशीकरणयोगांश्च राज्ञस्तं स समर्पयत् ॥६४॥
व्यजिज्ञपच्च तं राजन्निहायातो वसन्तकः ।
द्वारि स्थितोऽप्यरूपेण तं कुरुष्वान्तिके द्विजम् ॥६५॥
यदा वासवदत्तेयं तव विश्रम्भमेष्यति ।
तदा वक्ष्यामि यदहं तत्कुर्यास्तिष्ठ साम्प्रतम् ॥६६॥
इत्युक्त्वा निर्ययौ शीघ्रं ततो यौगन्धरायणः ।
अगाद् वासवदत्ता च पूजामादाय तत्क्षणात् ॥६७॥
सोऽथ तामवदद्राजा बहिर्द्वारि द्विजः स्थितः ।
सरस्वत्यर्चने सोऽस्मिन् दक्षिणार्थे प्रवेश्यताम् ॥६८॥
सथेति द्वारवेद्यास्तं सत्र वासवदत्तया ।
विरूपामाकृतिं बिभ्रदानाय्यत वसन्तकः ॥६९॥
स चानीतस्तमालोक्य वत्सेशमरुवन्मुचा ।
ततश्चाप्रतिभेदाय स राजा निजगाद तम् ॥७० ॥
हे ब्रह्मन् ! रोगधैरूप्य सर्वमेतदहं तव ।
निवारयामि मा रोदीस्तिष्ठहेह ममान्तिके ॥७१॥
महाम्प्रसावो वेवति स धोवाच वसन्तकः ।
सोऽथ तं विकृतं दृष्ट्वा राजा स्मितमुखोऽभवत् ॥७२॥
तच्चालोक्याशयं बुद्ध्या तस्य सोऽपि वसन्तकः ।
हसति स्माधिकोद्भूतविरूपाननवैकृतः ॥७३॥
तं हसन्तं तथा दृष्ट्वा क्रीडनीयकसन्निभम् ।
तत्र वासवदत्तापि जहासा च तुतोष च ॥७४॥
यत सा नर्मणा बाला तं पप्रच्छ वसन्तकम् ।
किं विप्रान विजानासि भो ब्रह्मन् ! कथ्यतामिति ॥७५॥