कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय लम्बक १७७
संगीत-शाला में राजा उदयन के मनोविनोद के लिए गोद में घोषवती वीणा कंठ में संगीत
का स्वर और आँखों के सामने वासवदत्ता-यह सामग्री थी ॥३२॥
उस कैदी राजा की सुस्थिरा लक्ष्मी के समान शिष्या वासवदत्ता राजा की सेवा-शुश्रूषा
में तन्मय रहने लगी ॥३३॥
इसी बीच उधर शिकार से लौटे हुए सैनिकों तथा गुप्तचरों द्वारा वत्सराज उदयन का कैद
होना सुनकर राजा के प्रेम से सारा वत्स राष्ट्र क्षुब्ध हो गया और उज्जयिनी पर आक्रमण की
तैयारियाँ होने लगीं ॥३४-३५॥
जनता को क्षुब्ध देखकर मन्त्री रूमण्वान् ने इस प्रकार उसे शान्त किया कि चंडमहासेन
युद्ध के द्वारा वश में नहीं किया जा सकता। वह महाबलवान् है। और इस प्रकार आक्रमण
करने से वत्सराज की भी खैर न होगी। उसका वध कर दिया जायगा। इसलिए यह कार्य
युद्ध से नहीं प्रत्युत बुद्धि से सिद्ध करने योग्य है ॥३६-३७॥
राष्ट्र में राजानुरक्त प्रजा का क्षोभ देखकर परम बुद्धिमान् प्रधान मन्त्री यौगन्धरायण ने
रुमण्वान् आदि मन्त्रियों तथा राज्याधिकारियों से कहा-॥३८॥
'तुम सबको सर्वदा तैयार रहना चाहिए और इस राजाहीन राष्ट्र की रक्षा करनी चाहिए।
समय आने पर युद्ध के लिए भी तैयार रहना चाहिए और मैं नर्म-सचिव वसन्तक के साथ अपने
बुद्धि-बल से वत्सराज को छुड़ा लाता हूँ इसमें सन्देह नहीं ॥३९-४०॥
अधिक वात-संघर्ष से जैसे अधिक बिजली उत्पन्न होती है, उसी प्रकार भीषण और
गम्भीर संकट के समय जिसकी बुद्धि का स्फुरण होता है वही धीर है ॥४१॥
प्राकारों के ध्वंस करने के योग (उपाय) बेड़ियाँ काटने के योग और अदृश्य हो जाने के योग
(उपाय) भी मैं जानता हूँ। ऐसा कहकर और प्रजा को मन्त्री रूमण्वान् के हाथ सौंपकर
यौगन्धरायण कौशाम्बी से वसन्तक के साथ निकल गया ॥४२-४३॥
साथ ही वसन्तक के साथ अपनी बुद्धि के समान सत्त्वयुक्त तथा अपनी नीति के समान
दुर्गम विन्ध्य महावन में वह गया१ ॥४४॥
वहीं विन्ध्य-सीमा पर निवास करनेवाले पुलिन्द (जंगली) जाति के राजा वत्सराज के
मित्र पुलिन्दक से मिलकर यौगन्धरायण ने उसे प्रबल और बड़ी सेना के साथ तैयार रहने के लिए
कहा जिससे वत्सराज को लेकर लौटते समय यदि पीछे से आक्रमण हो तो पहली युद्धभूमि यही
बन ॥४५-४६॥
१. जंगल के पक्ष में सत्त्व का अर्थ प्राणी है, यौगन्धरायण के पक्ष में मनोबल है। जिस
प्रकार यौगन्धरायण की नीति दुर्गम थी, उसी प्रकार वह जंगल कठिनाइयों से भरा अतएव
दुर्गम था।—अनु.
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