कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय लम्बक १७९
तदनन्तर यौगन्धरायण बसन्तक को साथ लिये हुए उज्जयिनी के महाकाल श्मशान में
पहुँचा ॥४७॥
वह श्मशान मांस की दुर्गन्धिवाले और चिता-धूम के गुब्बारों के समान काले-काले वेतालों
से भरा हुआ था॥४८॥
वहाँ श्मशान में पहुँचने पर विद्याबल के कारण उसे देखते ही प्रसन्न होकर योगेश्वर नाम
का ब्रह्मराक्षस यौगन्धरायण का मित्र बन गया॥४९॥
उसी योगेश्वर की बताई हुई युक्ति के अनुसार यौगन्धरायण ने तुरन्त अपना
रूप बदल लिया। रूप बदलते ही यौगन्धरायण उसी समय टेढ़े-मेढ़े शरीरवाला कुबड़ा
और चिकनी खोपड़ीवाला बूढ़ा लगने लगा। उसका रूप अत्यन्त हास्यजनक हो
गया ॥५०-५१॥
उसी युक्ति से उसने बसन्तक की बाहर निकली हुई तोंद (पेट) को चमड़े की डोरियों
से बाँधकर बड़े-बड़े और निकले हुए दाँतोंवाला बुरा-सा मुँह बनाकर उसका वेष ही बदल
दिया ॥५२॥
वेष बदलने के अनन्तर बसन्तक को राजभवन के द्वार पर पहले भेजकर यौगन्धरायण भी
स्वयं उसी वेश में चला। नाचता-गाता और बच्चों से घिरा हुआ एवं नागरिकों के लिए तमाशा
सा बना हुआ बसन्तक राजभवन में पहुँचा ॥५३-५४॥
महल में रानियों को तमाशा दिखलाता हुआ बसन्तक वासवदत्ता के कानों में भी
पहुँचा ॥५५॥
वासवदत्ता ने सेविका को भेजकर तमाशा देखने के लिए उसे संगीत-शाला में बुलवाया
क्योंकि नई अवस्था हास्य-विनोद की ओर अधिक आकृष्ट होती है॥५६॥
संगीत-शाला में जाकर पागल-वेष में आँसू बहाते हुए (राजा की दशा पर रोते हुए)
यौगन्धरायण ने कैदी वत्सराज को देखा॥५७॥
और राजा से संकेत भी किया। राजा ने भी वेश बदलकर आये हुए यौगन्धरायण को
पहचान लिया ॥५८॥
उधर कुबड़ा यौगन्धरायण अदृश्य होने की युक्ति से वासवदत्ता और उसकी
सेविकाओं से अदृश्य हो गया। केवल लड़का राजा उत्सव ही उस देश गया। इस
प्रकार उसके अदृश्य होने पर सभी सेविकाएँ आश्चर्य करने लगीं कि वह पागल कहाँ
गया ?॥५९-६०॥