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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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१४६ [ २.१.१५२
चीत करता है। मैं इस प्रकार की बात चीत सुनकर जीकर ही क्या करूंगी ?
सांस रोक कर मर जाऊँगी।"
फिर उसने सोचा—
"मेरा इस प्रकार यूँ ही मरना ठीक नही। मेरे भाई आते हैं। उन्हें
कहकर मरूँगी।"
सियार को भी जब उसकी ओर से कोई उत्तर न मिला तो उसने सोचा
यह मुझसे सम्बन्ध नही करेगी। वह अफसोस करता हुआ स्फटिक गुफा में
जाकर पड रहा।
एक सिंह बच्चा भैस वा हाथो में से किसी को मार मास खा, बहन का
हिस्सा लाकर बोला—"मांस खा।"
"भाई ! में मांस नही खाऊँगी। में मरूँगी।"
"क्यो ?"
उसने वह हाल कहा।
"अब वह सियार कहाँ है ?"
उसने स्फटिक गुफा में पड़े हुए सियार को आकाश में हूँ समझा और
बोली—"भाई ! क्या नही देखते हो ? यह रजत पर्वत पर आकाश में
स्थित है।"
सिंह बच्चा नही जानता था कि वह स्फटिक गुफा में लेटा है। उसने उसे
आकाश में लेटा हुआ समझ सोचा "इसे मारूँगा" घोर सिंह-वेग के साथ उछल
कर, स्फटिक गुफा पर छाती से चोट की। उसका हृदय फट जाने से वह मर कर
वही गिर पड़ा।
तब दूसरा आया। उसने उसे भी वैसा ही कहा। उसने भी वैसा ही किया
और मरकर पर्वत के नीचे गिर पड़ा। इस प्रकार छओ भाइयो के मरने पर
सबसे अन्त में बोधिसत्त्व आए। उसने उन्हें भी वह हाल कहा और यह
पूछने पर कि अब वह कहाँ है बताया कि यह रजत पर्वत पर आकाश में
लेटा है।
बोधिसत्त्व ने सोचा—सियार आकाश में नहीं ठहर सकते। यह स्फटिक
गुफा में पड़ा होगा। वे पर्वत के नीचे उतरे तो देखा कि छओ भाई मरे पड़े हैं।
वे समझ गए कि अपनी मूर्खता के कारण विचार न कर सकने के कारण स्फिटल-