जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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गुफा न जानने से उसी से हृदय टकराकर मरे होगे । 'बिना विचारे जल्दबाजी
करने वालो का काम ऐसा ही होता है' कह पहली गाथा कही—
असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं,
सानि कम्मानि तप्पेन्ति उन्हं बज्झोहितं मुखे ॥
[जो आदमी बिना विचारे जल्दबाजी में काम करता है, उसके वह काम ही
उसे तपाते हैं; जैसे मुंह मे डाला हुया गर्म भोजन ।]
असमेक्खितकम्मन्तं तुरिताभिनिपातिनं, जो आदमी जिस काम को करना
चाहता है, यदि वह उसके दोषो का ख्याल न कर, उन पर विचार न कर जल्दबाज
होकर जल्दी मे ही उस काम को करने को तैयार होता है, कूद पडता है, लग
जाता है, उस बिना विचारे जल्दबाजी में काम करने वाले को वे इस प्रकार किए
गए सानि कम्मानि तप्पेन्ति, सोच में डाल देते हैं कष्ट देते हैं । कैसे ? उन्हं
बज्झोहितं मुखे जिस तरह खाते समय यदि इसका विचार न कर कि यह ठण्डा
है, यह गर्म है गर्म भोजन मुख में डाल दिया जाए तो मुंह भी जलता है, गला
भी जलता है और पेट भी जलता है; चिन्ता होती है तथा कष्ट होता है । इसी
प्रकार उस तरह के आदमी को वह कर्म तपाते है ।
उस सिंह ने यह गाथा कह सोचा—मेरे भाई उपाय-कुशल नहीं रहे ।
सियार को मारने जाकर वह बडे जोर से कूद कर स्वय मर गए । मैं ऐसा न कर
गुफा में पडे हुए ही सियार के हृदय को फाड डालूंगा ।
उसने सियार के चढने-उतरने के रास्ते का ख्याल कर उसके सामने खडे
हो तीन बार सिंह नाद किया । पृथ्वी सहित आकाश गूंज उठा । सियार का
हृदय स्फटिक गुफा में लेटे ही लेटे डर के मारे फट गया । वह वही मर गया ।
शास्ता ने कहा—इस प्रकार वह सियार सिंहनाद सुनकर मर गया ।
शास्ता ने बुद्धत्व प्राप्त किए रहने पर यह गाथा कही—
सीहोच सीहनादेन बद्धरं अभिनादयि
सुत्वा सीहस्स निग्घोस सिगालो दद्दरे वस
भीतो सन्तासमापादि हृदयं चस्स अप्फलि ॥