जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
२०४. वीरक जातक
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२०४. वीरक जातक
“अपि वीरक पस्सेसि....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
बुद्ध का रग-ढंग बनाने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
देवदत्त की परिषद लेकर स्थविरो के लौट आने पर शास्ता ने पूछा—
सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ?
“भन्ते ! सुगत का रग-ढंग बनाया।”
“सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त
हुआ। पहले भी प्राप्त हुआ है।”
स्थविरो के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हिमालय प्रदेश में जल-कौए की योनि में पैदा हो एक तालाब के पास रहते
थे। उसका नाम था वीरक।
उस समय काशी देश में अकाल पड़ा। मनुष्य कौओ को भोजन देने या
यक्ष-भाग बलिकर्म करने में असमर्थ हो गए। अकाल-पीड़ित प्रदेश से अधिकांश
कौवे जगल चले गए। वाराणसी वासी सविट्ठक नाम का एक कौआ अपनी
कौवी को ले वीरक के निवासस्थान पर जा, उस तालाब के पास एक ओर रहने
लगा।
एक दिन उसने उस तालाब में शिकार खोजते हुए वीरक को तालाब में
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उतर, मछलियाँ खा, बाहर निकल शरीर को सुखाते देख सोचा-इस कौवे
के आश्रय से मुझे बहुत मछलियाँ मिल सकती हैं। इसकी सेवा करूँ।
यह कौवे के पास गया। कौवे ने पूछा-
"सौम्य क्यो ?"
"स्वामी ! तुम्हारी सेवा में रहना चाहता हूँ।"
उसके 'अच्छा' कह स्वीकार करने पर उस समय से सेवा करने लगा।
तब से वीरक भी अपने गुज़ारे लायक खा मछलियाँ निकाल कर सविट्ठक को
देता। वह भी अपने गुज़ारे लायक खा बाकी कौवी को देता।
आगे चलकर उसको अभिमान हो गया। वह सोचने लगा-यह जल-
कौवा भी काला है। मैं भी काला हूँ। मेरे और इसके आँख, चोंच तथा पैरो
में भी कोई भेद नही है। अब से इसकी पकड़ी हुई मछलियो से मुझे सरोकार
नही। मैं स्वयं पकडूंगा। बोला- 'सौम्य ! अब से मैं स्वयं तालाब में उतर
कर मछलियाँ पकडूँगा।' वीरक ने मना किया-तू पानी में उतर मछलियाँ
पकडने वाले कुल में पैदा नही हुआ। तू अभिमान करता है। वह वीरक की
बात न मान तालाब में उतरा। पानी में प्रवेश कर ऊपर आते समय काई को
छेद कर बाहर नही निकल सका। काई में ही फँस गया। केवल चोंच का अगला
भाग दिखाई दिया। वह साँस घुट कर पानी के अन्दर ही मर गया।
उसकी भार्या ने जब उसे आता न देखा तो वह उसका समाचार जानने
के लिए वीरक के पास गई। उसने 'स्वामी ! सविट्ठक दिखाई नही देता।
इस समय वह कहाँ है ?' पूछते हुए पहली गाथा कही-
अपि वीरक पस्सेसि सकुण मञ्जुभाणक,
मयूरगीवसङ्कास पतिं मह सविट्ठकं ॥
[ वीरक ! क्या मधुरभाषी, मोर पक्षी की सी गर्दन वाले मेरे पति सविट्ठक
को देखते हो ? ]
अपि वीरक पस्सेसि स्वामी ! वीरक भी दिखाई देता है ? मञ्जुभाणक,
सुन्दर भाषी, वह राग के कारण अपने पति को मधुरभाषी समझती है।
इसलिए ऐसा कहा। मयूरगीवसङ्कास, मोर की गर्दन के समान वर्ण वाला।
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यह सुन वीरक ने 'हाँ, मै जानता हूँ कि तेरा स्वामी कहाँ गया है' कह दूसरी
गाथा कही—
उदकथलचरस्स पक्खिनो निच्चं आमकमच्छभोजिनो,
तस्सानुकरं सविट्ठको सेवाले पळिगुण्ठितो मतो ॥
[ सविट्ठक जल और स्थल पर चलने वाले, नित्य कच्ची मछली खाने वाले,
पक्षी की नकल करने जाकर काई में फँस कर मर गया । ]
उदकथलचरस्स, जो जल और स्थल में चलने में समर्थ है। पक्खिनो,
अपने सम्बंध में कहता है। तस्सानुकरं उसकी नकल करता हुआ। पळि-
गुण्ठितो मतो, पानी में घुस काई को छेद कर बाहर न निकल सकने के कारण
काई में उलझ कर पानी के अन्दर ही मर गया। देख, उसकी चोच दिखाई
देती है।
इसे सुन कौवी रो पीट कर वाराणसी ही चली गई।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। तब सविट्ठक
देवदत्त था। वीरक मैं ही था।
२०५. गङ्गेय्य जातक
"सोभति मच्छो गङ्गेय्यो..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय दो तरुण भिक्षुओं के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वे दो श्रावस्ती वासी कुलपुत्र बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो अशुभ-भावना में
न लग रूप के प्रशंसक हो, रूप को ही प्यार करते हुए घूमते थे। एक दिन उन
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दोनो में रूप को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ । एक ने कहा—'मैं शोभा देता
हूँ। दूसरे ने कहा—तू नही शोभा देता, मे शोभा देता हूँ। कुछ ही दूर पर
एक वृद्ध स्थविर को बैठे देख उन्होने सोचा—यह जानेंगे। हम में से कौन
शोभनीय है, कौन नही ? उन्होने पास जाकर पूछा—हम में से कौन सुन्दर
है ? स्थविर ने उत्तर दिया—तुम दोनो से में ही सुन्दर हूँ।
तरुण भिक्षुओ ने कहा, यह बूढ़ा जो हम पूछते हैं वह न बता जो नही
पूछते हैं वही कहता हैं। वे उसकी निन्दा कर चले गए।
उनकी यह करतूत भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई। एक दिन धर्मसभा में बात-
चीत चली—आयुष्मानो, वृद्ध स्थविर ने उन रूप-प्रिय तरुण भिक्षुओ को लज्जित
कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत
कर रहे हो ? "यह बातचीत" कहने पर "भिक्षुओ, यह दो तरुण केवल अभी
रूप प्रशसक नही हैं, यह पहले भी रूप को ही प्यार करते हुए विचरते थे"
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गङ्गा के किनारे वृक्ष-देवता थे। उस समय गङ्गा-यमुना के सङ्गम पर गङ्गेय्य
और यामुनेय्य नाम की दो मछलियाँ थीं। वे आपस में विवाद करने लगीं—
मे शोभा देती हूँ, तू नही शोभती। इस प्रकार रूप के बारे में विवाद करते हुए
उन्होने थोडी दूर पर गङ्गा के किनारे पड़े एक कछुए को देखकर सोचा—,
यह जानेगा कि हम में कौन सुन्दर है ? कौन असुन्दर ? उसके पास जाकर
उन्होने पूछा—सोम्य ! गङ्गेय्य सुन्दर है ? अथवा यामुनेय्य ?।
कछुए ने कहा—गङ्गेय्य भी सुन्दर है, यामुनेय्य भी सुन्दर है, लेकिन
में तुम दोनो से अधिक सुंदर हूँ।
इस बात को प्रकट करते हुए उसने पहली गाथा कही—
सोभति मच्छो गङ्गेय्यो अथो सोभति यामुनो,
अनुपदप कुरिसो निग्रोधपरिमण्डलो;
ईसायतगीवो च सब्बेव अतिरोचति ॥
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[ गङ्गेय्य मछली शोभा देती है, यामुनेय्य भी शोभा देती है; लेकिन यह
चार पैरों वाला, बट-वृक्ष की तरह गोलाकार, गाड़ी की बल्ली की तरह लम्बी
गर्दन वाला (पुरुष) सब से अधिक सुन्दर है।]
चतुप्पदायं, यह चतुष्पाद पुरिसो अपने बारे में कहता है। निग्रोध परि-
मण्डलो, अच्छी तरह उलझा न्यग्रोध वृक्ष की तरह गोलाकार। ईसाकामतगीवो
रथ की धड़ की तरह लम्बी वल्ली वाला। सम्बेव अतिरोचति इस प्रकार
के आकार वाला कछुवा सबसे बढ़कर सुन्दर है, तुम दोनों से बढ़कर शोभा
देता है।
मछलियों ने उसकी बात सुन 'अरे पापी कछुए ! हमारी पूछी बात का
उत्तर न दे, दूसरी ही कहता है' यह दूसरी गाथा कही—
यं पुच्छितो न तं अक्खा अञ्ञं अक्खासि पुच्छितो,
अत्तप्पसंसको पोसो नायं अस्माक रुच्चति ॥
[ जो पूछा है वह नहीं कहता; पूछने पर दूसरी बात कहता है। यह
अपनी ही प्रशंसा करने वाला पुरुष हमें अच्छा नहीं लगता।]
अत्तप्पसंसको, अपनी प्रशंसा करने वाला, अपनी बड़ाई करने वाला पुरुष।
नायं अस्माक रुच्चति, यह पापी कछुवा हमें अच्छा नहीं लगता, रुचिकर नहीं
है। वे कछुए के ऊपर पानी फेंक अपने निवासस्थान को गईं।