जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो
२० [ १.११.११०
ने उसे सेठ के पद पर नियुक्त किया। इस प्रकार वह बोधिसत्त्व (की कृपा)
से महासम्पत्तिशाली हो स्वकर्मानुसार परलोक गया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया। उस समय जो
दरिद्र था, वही इस समय दरिद्र। अरण्ड-वृक्ष का देवता तो मै ही था।
११०. सब्ब संहारक पञ्हो
“सब्ब संहारको नत्थि”—यह सब्बसहारकपञ्ह (जातक) सारी की
सारी उम्मग्ग जातक¹ में प्रगट होगी।
महाउम्मग जातक (५४६)
“हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म
पहला परिच्छेद
१२. हंसी वर्ग
१११. गद्रभ पञ्हो
“हंसी त्वं मञ्जसि” यह गद्रभपञ्ह (जातक) भी उम्मग जातक¹ म
ही आयेगी ।
११२. अमरादेवी पञ्ह
“येन सत्तुकिलङ्गा च” यह अमरादेवी पञ्ह (जातक) भी वही
(उम्मग जातक¹ में) आयेगी ।
११३. सिगाल जातक
“सद्दहासि सिगालस्स...”यह गाथा शास्ता ने वेळुवन में विहार करते
समय देवदत्त के बारे में कही ।
१ उम्मग जातक (५४६)
क. वर्तमान कथा
२२ [ १.१२.११३
क. वर्तमान कथा
उस समय धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु बातचीत कर रहे थे—'आयुष्मानो !
देवदत्त पाँच सौ भिक्षुओं को लेकर गयाशीर्ष चला गया। वहाँ जाकर उसने
उन भिक्षुओं को कहा कि श्रमण गौतम जो करता है वह धर्म नहीं है बल्कि
जो मैं करता हूँ वह धर्म है। इस प्रकार उन्हें अपने मत का बना, यथास्थान
झूठा आचरण कर संघ में फूट डाल एवं सीमा¹ में दो उपोसथ² (-गृह)
बना दिए।" यूँ वे देवदत्त के दोष कह रहे थे। भगवान् ने आकर पूछा—
"यहाँ बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?"
"यह बातचीत ।"
"भिक्षुओ ! देवदत्त केवल अभी झूठ बोलनेवाला नहीं। यह पूर्व-
जन्म में भी झूठ बोलनेवाला ही रहा है" वह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि-
सत्त्व श्मशान-वन में एक वृक्ष-देवता होकर उत्पन्न हुए। उस समय वारा-
णसी में नक्षत्र की घोषणा हुई। मनुष्यों ने यक्षों को बलि देने की इच्छा से
चौराहों और दूसरे रास्तों पर मत्स्य-मांस आदि बखेर कर खप्परों में शराब
रक्खी।
एक गीदड़ आधी रात के समय चुपके से नगर में दाखिल हुआ। मत्स्य-
मांस और शराब पीकर व पुन्नाग-वृक्ष के बीच जाकर सो रहा। सोते सोते
सूर्य निकल आया। आँख खोलने पर प्रकाश हुआ देख उसने सोचा—
"अब मैं नगर से निकल नहीं सकता।" इसलिए वह रास्ते के पास जाकर
छिपकर लेट रहा। दूसरे मनुष्यों को आते-जाते देख वह कुछ नहीं बोला,
लेकिन एक ब्राह्मण को मुँह धोने के लिये जाते देख उसने सोचा—"ब्राह्मण
¹ सीमित-प्रदेश।
² जहाँ भिक्षु एकत्र हो सांघिक-कृत्य करते हैं।
सिगाल ] २३
धन के लोभी होते हैं। मैं ऐसा उपाय करूँ कि यह ब्राह्मण मुझे अपनी चादर
में छिपा, गोद में ले जाकर नगर से बाहर कर दे।" उसने मनुष्य-भाषा में
कहा—"ब्राह्मण।"
ब्राह्मण ने लौटकर पूछा—"मुझे कौन बुला रहा है ?"
"ब्राह्मण ! मैं।"
"किस कारण ?"
"ब्राह्मण, मेरे पास दो सौ कार्षापण हैं। यदि मुझे गोद में ले चादर से
ढक जिससे कोई न देखे, इस प्रकार नगर से निकाल सके, तो मैं तुझे यह कार्षा-
पण दे दूंगा।"
धन के लोभ से ब्राह्मण 'अच्छा' कह स्वीकार कर, उस गीदड़ को वैसे ले
नगर से निकल थोड़ा आगे गया। गीदड़ ने पूछा—'ब्राह्मण यह कौन सी
जगह है ?"
"अमुक जगह।"
"और भी थोड़ा आगे तक ले चल।"
इस प्रकार बार बार कहकर उसे महाश्मशान तक ले जा, वहाँ पहुँचकर
कहा—"मुझे यहाँ उतार दे।" ब्राह्मण ने उसे उतार दिया।
"अच्छा तो ब्राह्मण चादर फैला।"
ब्राह्मण ने धन-लोभ से चादर फैला दी।
'तो इस वृक्ष की जड़ में खोद' कह गीदड़ ब्राह्मण को जमीन खोदने में लगा,
उसकी चादर पर चढ़ उसके चारों कोनों तथा बीच में—पाँच जगहों पर .
पाखाना कर, उसे लबेड़ श्मशान-वन में दाखिल हो गया।
बोधिसत्त्व ने वृक्ष की शाखा पर खड़े हो यह गाथा कही—
सद्दहासि सिगालस्स सुरापीतस्स ब्राह्मण,
सिप्पिकानं सतं नत्थि कुतो फसता दुवे॥
[ ब्राह्मण ! तू शराब पिए हुए गीदड़ का विश्वास करता है। उसके
पास सौ सीपियाँ भी नहीं, दो सौ कार्षापण तो कहाँ होंगे।]
सद्दहासि या सद्दहेसि। इसका मतलब है कि विश्वास करता है।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया।
२४ [ १.१२.११४
सिप्पिकानं सतं नत्थि—इसके पास सौ सीपियां भी नही हैं। कुतो कंससता
दुवे दो सौ कार्षापण तो कहाँ होगे।
बोधिसत्व यह गाथा कह 'हे ब्राह्मण ! जा अपनी चादर धोकर, स्नान
करके अपना काम कर' कह अन्तर्ध्यान हो गए।
ब्राह्मण वैसा कर 'हाय ठगा गया' सोचता हुआ चला गया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला, जातक का मेल बैठाया।
उस समय गीदड देवदत्त था। हाँ, वृक्ष-देवता में ही था।
११४. मितचिन्ती जातक
“बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय दो वृद्ध स्थविरो के बारे मे कही।
क. वर्तमान कथा
उन्होने एक जनपद के जगल मे वर्षा-काल बिताकर सोचा कि अब शास्ता
के दर्शन के लिए जायेगे, रास्ते के लिये आवश्यक सामग्री तैयार कर 'आज
जाते हैं, कल जाते हैं' करते करते एक मास बिता दिया। फिर दुबारा सामग्री
तैयार कर 'आज जाते है, कल जाते हैं' करते करते एक मास और बिता दिया।
इसी प्रकार अपने आलस्य और निवास-स्थान से मोह होने के कारण तीसरा
महीना भी बिता दिया। तीन महीने गुजारकर जेतवन पहुँच, अपने योग्य-
स्थान पर पाँच चीवर रख बुद्ध के दर्शनो को गए। भिक्षुओ ने पूछा—“आयु-
ष्मानो ! आप बुद्ध की सेवा में बहुत दिन के बाद उपस्थित हुए। इतनी
देर क्यो हुई ? उन्होने कारण बताया। उनका यह आलस्य तथा सुस्ती करने
मितचिन्ती ] २५
का स्वभाव भिक्षुओ पर प्रगट हो गया। भिक्षुओ ने धर्म सभा मे उन स्थविरो
के आलसी स्वभाव की चर्चा चलाई। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ,
इस समय बैठे क्या बात कर रहे थे ?" "यह बातचीत" कहने पर उन स्थविरो
को बुलवाकर पूछा—
"भिक्षुओ, क्या तुम सचमुच आलसी हो ?"
"भन्ते ! सचमुच ।"
"भिक्षुओ ! न केवल अभी आलसी हो, पूर्वजन्म में भी आलसी ही थे
और निवास-स्थान के प्रति मोह था" कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय
वाराणसी नदी में तीन मच्छ थे। उनके नाम थे बहुचिन्ती, अल्प चिन्ती
और मित-चिन्ती। वे जगल (की नदी) से वस्ती के पास आ गए। मितचिन्ती
ने बाकी दोनो को कहा—"यह वस्ती है। यहाँ सशकित रहने की तथा भय-
भीत रहने की जरूरत है। मछुवे लोग नाना प्रकार के मछली पकड़ने के जाल
आदि फेंककर मछलियां पकड़ते है। हम जगल को ही चले।"
बाकी दोनो जनो ने आलस्य के कारण और लोभ के कारण 'आज चले,
कल चलें' कहते हुए तीन महीने गुजार दिए। मछुओ ने नदी में जाल फेंका।
बहुचिन्ती और अल्प चिन्ती खाने की चीज को ग्रहण करते हुए आगे आगे
जाते थे। वे अपनी मूर्खता के कारण जाल की गन्ध का ख्याल न कर जाल
में ही जा फँसे। मितचिन्ती ने पीछे आते हुए जाल की गन्ध सूंघकर समझ
लिया कि वे दोनो जाल में जा फँसे। उसने सोचा—इन दोनो आलसी तथा
मूर्खों को जीवन-दान दूँ। यह सोच यह बाहर की तरफ से जाल मे घुस जाल
फाड कर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए जाल के आगे गिरा;
फिर पिछली तरफ से फाडकर निकलते हुए की तरह पानी को आलोडते हुए
पिछली तरफ गिरा। मछुओ ने यह समझकर कि मच्छ जाल फाडकर निकल
गए जाल के सिरो को खोल फेंक दिया। वे दोनो मच्छ जाल से छूटकर
पानी में जा पडे। इस प्रकार मितचिन्ती ने उनके प्राण बचाए।
शास्ता ने यह पूर्व-जन्म की कथा कह बुद्ध होने पर यह गाथा कही—
२६ [ १.१२.११५
बहुचिन्ती अप्पचिन्ती च उभो जाले अबज्झरे,
मितचिन्ती प्रमोचेसि उभो तत्थ समागता ॥
[बहुचिन्ती और अप्पचिन्ती दोनो जाल में फँस गए। मितचिन्ती
ने दोनो को छुड़ा दिया। ये दोनो उसके साथ आ गए ।]
बहुचिन्ती, बहुत चिन्तन करनेवाला होने से अथवा बहुत सङ्कल्प-विकल्प
वाला होने से बहुचिन्ती नाम हुआ। बाकी दोनो भी इसी प्रकार हैं। उभो
तत्थ समागता, मितचिन्ती के कारण प्राण बचाकर वे दोनो फिर पानी मे
मितचिन्ती के साथ आ गए।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्मदेशना ला (आर्य-) सत्यो को प्रकाशित कर
जातक का मेल बैठाया। (आर्य-) सत्यो की समाप्ति पर स्थविर भिक्षु
श्रोतापन्न हुए।
उस समय के बहुचिन्ती और अल्प-चिन्ती यह दोनो थे, मितचिन्ती तो मै
ही था।
११५. अनुसासिक जातक
“यायञ्चमनुसासति .” यह गाथा शास्ता ने जेतवन मे विहार करते
समय एक उपदेश देनेवाली भिक्षुणी के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह श्रावस्ती-निवासिनी एक कुल में उत्पन्न हुई थी। जिस समय से
प्रव्रजित होकर उपसम्पन्न हुई, उस समय से लेकर वह श्रमण-धर्म मे न लग
अनुसासिक ] २७
चीजो की लोभी होने से नगर के एक ऐसे हिस्से मे जहां दूसरी भिक्षुणियां नही
जाती थी, भिक्षा मांगने जाती । मनुष्य उसे बढ़िया भोजन देते । उसने रस
तृष्णा के कारण सोचा, यदि दूसरी भिक्षुणियां भी उसी ओर भिक्षा मांगने
जाएंगी, तो मेरी प्राप्ति मे फरक पडेगा। इस लिए मुझे ऐसा करना चाहिए,
जिसमे दूसरी भिक्षुणियां उधर भिक्षा मांगने न जाएं ।
वह भिक्षुणियो के निवास-स्थान पर गई और बोली—बहनो ! अमुक
जगह पर चण्ड-हाथी है, चण्ड-घोडा है, चण्ड-कुत्ता है। वह खतरनाक जगह
हैं। वहाँ पिण्ड-पात के लिए मत जाएं। उसकी बात सुन एक भिक्षुणी ने
भी उधर गर्दन निकालकर नही देखा।
उसके एक दिन उधर भिक्षा माँगने के समय, जब वह जल्दी से एक घर
मे घुसने जा रही थी एक मरखने मेढे ने उसे टक्कर मारकर उसकी जांघ की
हड्डी तोड दी । मनुष्यो ने दौडकर उस दो टुकडे हुए जांघ की हड्डी को एक में
बाँधा और उसे चारपाई पर लिटाकर भिक्षुणी आश्रम लाए। 'यह दूसरी भिक्षु-
णियो को उपदेश देती थी, स्वय उधर जाकर जांघ की हड्डी तुडाकर आई है'
कह भिक्षुणियो ने हंसी उडाई। यह बात शीघ्र ही भिक्षु-सघ तक पहुँच गई।
एक दिन धर्म-सभा में बैठे हुए भिक्षु उसकी निन्दा कर रहे थे—आयु-
ष्मानो ! दूसरो को उपदेश देनेवाली भिक्षुणी स्वय उधर जाकर मरखने मेंढे
से जांघ की हड्डी तुडा लाई है।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, बैठे क्या बात चीत कर रहे हो ?'
'यह बातचीत' कहने पर 'भिक्षुओ, केवल अब ही नही, पहले भी यह दूसरो को
तो उपदेश देती रही है, लेकिन स्वय तदनुसार आचरण न करने के कारण दुख
भोगती रही है' कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे वाराणसी मे राजा ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधि-
सत्व जगल मे पक्षी की योनि म जन्म ग्रहण कर बडे होने पर सैकडो पक्षियो को
ले हिमालय को गए। उनके वहीं रहते समय चण्ड-स्वभाव की एक चिडिया
राज-मार्ग में जाकर पडी रहती, वहाँ उसे गाडियो पर से गिरे हुए धान, मूँग
आदि के दाने मिलते। उन्हे पाकर वह सोचती कि अब ऐसा उपाय करूँ जिससे
दूसरे पक्षी इधर न आयें। वह पक्षियो को उपदेश देती—राज-मार्ग बड़ा
खतरनाक है। हाथी, घोड़े और मरकहे वैलोवाली गाडियां आती जाती है।
शीघ्रता से उड़ा भी नही जा सकता। वहाँ नहीं जाना चाहिए। पक्षियो
ने उसका नाम अनुशासिका रख दिया।
एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती हुई गाड़ी के शब्द
को सुन उसने पीछे मुंह कर देखा। 'अभी दूर है' सोच, चुगती ही रही।
हवा के जोर से गाड़ी शीघ्र ही आ पहुँची। वह उड़ न सकी। पहिये से
उसके दो टुकड़े हो गए।
बोधिसत्त्व ने पक्षियो के लौटने पर उनकी गिनती करते समय उसे न देख
कर कहा—अनुशासिका दिखाई नही देती, उसे खोजो। पक्षियो ने खोज करते
हुए, उसे राजपथ पर दो टुकड़े हो पड़े देखा। बोधिसत्त्व से आकर निवेदन
किया। 'वह दूसरो को जाने से रोकती थी लेकिन स्वयं वहाँ चुगने जाकर
दो टुकड़े हुई' कह यह गाथा कही—
यायञ्जमनुसासति सय लोलुप्पचारिणी,
साय विपक्खिका सेति हता चक्केन साळिका ॥
[ जो दूसरो को उपदेश देती थी लेकिन स्वयं थी लोभी, वह यह चिड़िया
पहिये के नीचे आकर पंख-रहित होकर मरी पड़ी है। ]
यायञ्जमनुसासतीति, इसमें 'य' केवल दो पदो की सन्धि के कारण है।
अर्थ है, जो दूसरो को उपदेश देती है। सय लोलुप्पचारिणी, अपने लोभी स्व-
भाव वाली। साय विपक्खिका सेति, वह पंखरहित होकर राजपथ पर पड़ी
है। हता चक्केन साळिका, गाड़ी के पहिये से मारी गई चिड़िया।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय उप-
देश देनेवाली चिड़िया यह उपदेश देनेवाली भिक्षुणी ही थी। ज्येष्ठ-पक्षी
तो मैं ही था।
११६. दुब्बच जातक
दुब्बच ]
२६
११६. दुब्बच जातक
“अतिक्करमकराचरिय” यह गाथा शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक बात न माननेवाले भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
यह कथा नवें निपात में गिज्झ जातक¹ में आयेगी। शास्ता ने उस भिक्षु
को बुला, ‘भिक्षु, तू केवल अभी बात न माननेवाला नहीं है, बल्कि पहले भी
तूने पण्डितों का कहना न करके शक्ति के आघात से जान गँवाई’ वह, पूर्व-
जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ने लङ्घन² के घर में जन्म लिया। बड़े होने पर वह बुद्धिमान तथा व्यवहार-
कुशल हुआ। वह एक नट से शक्ति लाँघने की कला सीखकर आचार्य के साथ
हुनर दिखाते हुए घूमता था। बोधिसत्त्व का उस्ताद चार ही शक्तियों के लाँघने
का हुनर जानता था, पाँच के लाँघने का नहीं।
एक दिन उसने एक गामड़े में तमाशा दिखाते समय शराब के नशे में मस्त
होकर, ‘पाँच शक्तियों को लाँघूँगा’ कह उन्हें क्रम से रखा। बोधिसत्त्व ने कहा—
आचार्य, आप पाँच शक्तियों को लाँघने का हुनर नहीं जानते; इसलिए एक
शक्ति को हटा दें। यदि पाँचों को लाँघेंगे तो पाँचवीं शक्ति से बिंधकर मरेंगे।
————————
¹ गिज्झ जातक—नवें निपात की पहली जातक।
² लङ्घनट=बाजीगर।
३० [ १.१२ ११६
आचार्य उस समय बिलकुल मदहोश था। इसलिए उसने कहा—तू
मेरी सामर्थ्य को नही जानता। इस प्रकार बोधिसत्व के उपदेश का अनादर
कर, चार शक्तियो को लांघ पांचवी को लांघते समय डण्ठल से महुए के फूल
के गिरने की तरह, चीखता हुआ गिरा; उसे देख बोधिसत्व ने कहा—यह
पण्डितो का कहना न कर इस आपत्ति में पडा। इसके बाद यह गाथा कही—
अतिकरमकराचरिय ! मय्हम्पेतं न रुच्चति,
चतुत्थे लंघयित्वान पञ्चमियास्मि¹ आवुतो ॥
[ आचार्य, आज तुमने अति कर दी। मुझ तक को यह अच्छा नही लगा।
चारो लांघकर पांचवी में गिर पडे । ]
————
अतिकरमकराचरिय, आचार्य, आज तुमने अति कर दी। अर्थात् अपनी
शक्ति से बाहर काम किया। मय्हम्पेतं न रुच्चति, मुझ आपके शिष्य तक को
यह अच्छा नही लगा। इसीलिए मैने पहले कह दिया था। चतुत्थे लंघयि-
त्वान, चौथे शक्ति-फलक पर बिना गिरे लांघकर, पञ्चमियास्मि आवुतो,
पण्डितो की बात न मानकर पांचवी शक्ति पर गिर पडे ।
————
इतना कह आचार्य को शक्ति पर से उठा, जो करना उचित था, किया।
शास्ता ने इस पूर्व-जन्म की कथा को ला जातक का मेल बैठाया—उस
समय का आचार्य, यह बात न माननेवाला भिक्षु था, शिष्य तो मैं ही था।
————
¹ 'पञ्चमायसिं' भी पाठ है।
११७. तित्तिर जातक (२)
तित्तिर ] ३१
११७. तित्तिर जातक (२)
"अच्चुग्गता अतिबलता "यह (गाथा) शास्ता ने जेतवन मे विहार
करते समय कोकालिक¹ के बारे मे कही थी।
क. वर्तमान कथा
उसकी वर्तमान कथा तेरहवे निपात की तक्कारिय जातक² म प्रगट होगी।
शास्ता ने कहा—भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण
नष्ट हुआ है, पहले भी नष्ट हुआ है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व ने
उदीच्य ब्राह्मण कुल म जन्म ग्रहण कर बड़े होने पर तक्षशिला जा सब विद्याएँ
सीखीं। फिर काम-भोग के जीवन को छोड़ ऋषि प्रव्रज्या के अनुसार प्रव्रजित
हो पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो को प्राप्त किया । हिमवन्त प्रदेश के
सभी ऋषियो ने उन्ह अपना उपदेशक आचार्य बनाया और उनके आस-पास
रहने लगे। वे भी पाँच सौ ऋषियो के उपदेशक-आचार्य बन ध्यान मग्न हो
हिमवन्त मे रहते थे ।
उस समय पाण्डु रोग से पीडित एक तपस्वी कुल्हाडी लेकर लकडियाँ
फाड रहा था। उसके पास बैठे एक वाचाल तपस्वी ने 'यहाँ पर मारें, यहाँ
पर मारें' बार बार कहकर उस तपस्वी को क्रोधित कर दिया। उसने क्रोध
¹ कोकालिक देवदत्त के पक्ष का एक सघ-भेदक था।
² तक्कारिय जातक (४८१)
३२ [ १.१२.११७
में आकर कहा, 'तू मुझे अब लकडी चीरना सिखाना चाहता है', और अपनी
तेज कुल्हाड़ी उठा उसे एक ही प्रहार से मार डाला।
बोधिसत्व ने उसका शरीर-कृत्य किया।
उसी समय आश्रम से कुछ ही दूर वल्मीक पर एक तित्तिर रहता था। यह
सुबह शाम वल्मी के ऊपर खड़ा हो बडे जोर से आवाज लगाता। उसे सुन
एक शिकारी ने सोचा कि तित्तिर होगा और शब्द के पीछे पीछे जा, उसे मार
घर ले गया।
बोधिसत्व ने उसकी आवाज न सुनाई देती देख तपस्वियों से पूछा-
उस जगह एक तित्तिर रहता था। उसकी आवाज नहीं सुनाई देती ? उन्होंने
बोधिसत्त्व को सब हाल कहा। बोधिसत्त्व ने ऊपर की दोनों बातों को मिला
ऋषियों के सामने यह गाथा कही—
अच्चुग्गता अतिबलता अतिवेलं पभासिता,
वाचा हनति दुम्मेधं तित्तिरं वातिवस्सितं ॥
[ अति-ऊँची, अति जोर से अत्यधिक देर तक बोली गई वाणी मूर्ख आदमी
को वैसे ही मार डालती है जैसे जोर से चिल्लाने से तित्तिर मारा गया।]
अच्चुग्गता, अति उद्गता। अतिबलता, बार बार बोलने से बहुत
बलशाली हो गई। अतिवेलं पभासिता उचित से बहुत ज्यादा देर तक
भाषित। तित्तिरं वातिवस्सितं, जैसे बहुत बोलने से तित्तिर मारा गया, वैसे
ही इस प्रकार की वाणी मूर्ख आदमी को मार गिराती है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ऋषियों को उपदेश दे चारो ब्रह्म-विहारों की
भावना कर ब्रह्म-लोक गामी हुए।
शास्ता ने 'भिक्षुओ, न केवल अभी कोकालिक अपनी वाणी के कारण
विनष्ट हुआ, किन्तु पहले भी नष्ट हुआ' कहा, और यह धर्मदेशना ला जातक का
मेल बैठाया।
उस समय दुर्वचन बोलनेवाला तपस्वी कोकालिक हुआ। ऋषिगण
बुद्ध-परिषद। और ऋषिगण का शास्ता तो मैं था ही।
११८. वट्टक जातक (२)
वट्टक ] ३३
११८. वट्टक जातक (२)
“नाचिन्तयन्तो पुरिसो....” यह गाथा शास्ता ने जेतवन में विहार
करते समय उत्तर नाम के श्रेष्ठि के पुत्र के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में उत्तर श्रेष्ठि महाधनवान था। उसकी भार्या की कोख में
एक बालक पैदा हुआ। वह पुण्यवान् था, ब्रह्मलोक से च्युत होकर यहाँ जन्म
ग्रहण किया था। बडा होने पर वह ब्रह्मा की तरह सुन्दर वर्ण का हुआ।
एक दिन श्रावस्ती में कार्तिक महोत्सव की घोषणा होने पर सभी लोग
उत्सव मनाने मे मस्त थे। उस तरुण के मित्रो—सभी दूसरे श्रेष्ठि-पुत्रो की
पत्नियां थी। उत्तर श्रेष्ठि पुत्र बहुत समय तक ब्रह्मलोक में रहा था, इसलिए
उसकी कामभोग में आसक्ति न थी।
उसके मित्रो ने सोचा कि उत्तर श्रेष्ठि पुत्र के लिए भी एक स्त्री लाकर
उत्सव मनाएगे। वे उसके पास जाकर बोले “सौम्य ! इस नगर में कार्तिक
रात्रि का उत्सव घोषित हुआ है। तुम्हारे लिए भी एक स्त्री लाकर उत्सव
मनाएं ?”
'मुझे स्त्री की आवश्यकता नही हैं' कहने पर भी बार बार आग्रह करके
स्वीकार करवा लिया। तब एक वेश्या को सब अलकारो से सजा, उसके घर
ले जाकर उसे श्रेष्ठिपुत्र का सोने का कमरा दिखाकर कहा कि तू श्रेष्ठिपुत्र
के पास जा। उसे कमरा दिखा वे स्वय चले गए।
उसके शयनागार मे प्रविष्ट होने पर भी श्रेष्ठिपुत्र ने न उसकी ओर देखा,
न बातचीत की। उसने सोचा यह मेरे जैसी सुन्दर उत्तम विलास-युक्त स्त्री
की ओर न देखता है, न बातचीत करता है। इसे अब स्त्री-लीला से देखने
पर मजबूर करूँगी। तब वह स्त्री-लीला दिखाते हुए प्रसन्न-मुख की भाँति
३
५४ [ १।२।१८
आगे के दांत निकालकर मुस्कराई। श्रेष्ठिपुत्र ने देखा, तो दांतो की हड्डियां
उसके लिए ध्यान का विषय हो गईं। उसमें अस्थि-सञ्ज्ञा पैदा हुई। उसे
वह सारा शरीर हड्डियों के पञ्जर की तरह मालूम देने लगा। उसकी मजदूरी
दे, उसने कहा 'जाओ'।
उसने घर से निकलने पर बीच-बाजार में खड़ा देख एक ऐश्वर्यशाली आदमी
उसे खर्चा दे अपने घर ले गया। सप्ताह बीतने पर उत्सव समाप्त हुआ।
वेश्या की माता ने जब देखा कि लडकी नहीं आई तो वह श्रेष्ठिपुत्रों के पास गई
और पूछा कि वह कहाँ है? उन्होने उत्तर श्रेष्ठिपुत्र के यहाँ जाकर पूछा कि
वह कहाँ है। उसने कहा "उसी समय खर्चा देकर विदा कर दिया।" उसकी
माँ रोने लगी। 'मैं अपनी लडकी को नहीं देखती। मेरी लडकी लाओ'
कहते हुए वह उत्तर-श्रेष्ठि-पुत्र को ले राजा के पास गई।
राजा ने मुकद्दमे का फैसला करते हुए पूछा-
"इन श्रेष्ठिपुत्रों ने तुम्हे वेश्या लाकर दी ?"
"देव ! हाँ।"
"अब वह कहाँ है ?"
"नहीं जानता हूँ। उसी समय उसे विदा कर दिया था।"
"अब उसे लिया आ सकता है ?"
"देव ! नहीं सकता हूँ।"
"यदि नहीं ला सकता है, तो इसे राज-दण्ड दो।"
उसके हाथ पीछे की तरफ बाँध राज-दण्ड देने के लिए उसे पकडकर ले
गए। वेश्या को न ला सकने के कारण राजा श्रेष्ठिपुत्र को राज-दण्ड दे रहा है,
सुन सारे नगर मे हल्ला मच गया। लोग छाती पर हाथ रखकर 'स्वामी !
यह क्या आपके योग्य है ?' कहते हुए रोने लगे। सेठ भी रोता पीटता
पुत्र के पीछे पीछे जा रहा था। श्रेष्ठिपुत्र सोचने लगा, 'यह जो मुझे इस प्रकार
का दुख हुआ, यह घर में रहन के ही कारण हुआ, यदि मैं इससे मुक्त हुआ
तो गोतम सम्यक सम्बुद्ध के पास प्रब्रजित होऊँगा।'
वेश्या ने हल्ला सुना तो पूछा यह क्या हल्ला है? समाचार मालूम
होने पर वह जल्दी से उतर "स्वामी ! हटो हटो" मुझे राज पुरुषो को देखने दें
कहती हुई राज-पुरुषो के पास पहुँची। राज-पुरुषो ने उसे देख माता को सौंपा
वट्टक ] ३५
और श्रेष्ठिपुत्र को मुक्त कर चले गए।
श्रेष्ठिपुत्र मित्रो रोहिणी नदी पर गया। यहाँ सिर से स्नान कर, घर जा,
प्रातराश कर, माता पिता को प्रव्रज्या की बात जना, चीवर-वस्त्र ले बड़ी
भारी मण्डली के साथ बुद्ध के पास जा प्रणाम कर प्रव्रज्या की याचना की।
प्राज्या तथा उपसम्पदा प्राप्त कर वह योगाभ्यास में लग विपश्यना की वृद्धि
कर थोड़ी ही देर में अर्हत्व मे प्रतिष्ठित हुआ।
एक दिन धर्म-सभा मे इकट्ठे हुए भिक्षु श्रेष्ठिपुत्र की प्रशंसा कर रहे थे—
“आयुष्मानो ! श्रेष्ठिपुत्र अपने पर आई आपत्ति देख बुद्ध-शासन की
महिमा जान 'इस दुःख से मुक्त होने पर प्रव्रजित होऊँगा' सोच, उस सुचिन्तन
के फलस्वरूप मुक्त हो, प्रव्रजित हो अर्हत्व में प्रतिष्ठित हुआ। शास्ता ने
आकर पूछा—'भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?'
"अमुक बातचीत ।"
"भिक्षुओ ! केवल श्रेष्ठिपुत्र ही अपने पर आपत्ति पड़ने पर इस उपाय
से इस दुःख से मुक्त होऊँगा" सोच मृत्यु भय से मुक्त नहीं हुआ, पूर्व समय में
बुद्धिमान लोग भी अपने पर आपत्ति पड़ने पर 'इस उपाय से इस दुःख से मुक्त
होग' सोच मृत्यु-भय के दुःख से मुक्त हुए। (यह कह) पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय जन्म मरण
के चक्कर में पड़े हुए बोधिसत्त्व एक बार बटेरे के जन्म में पैदा हुए।
उस समय बटेरो का एक शिकारी जगल से बहुत से बटेर पकड़ ले जाकर,
घर में रख उन्हें दाना खिला, खरीदारो से मूल्य ले उनके हाथ बेच अपनी
जीविका चलाता था। वह एक दिन बहुत से बटेरो के साथ बोधिसत्त्व को भी
पकड़ लाया। बोधिसत्व ने सोचा—यदि में इसका दिया हुआ चोगा खाऊँगा
पीऊँगा तो यह मुझे आये हुए मनुष्यो के हाथ बेच देगा। यदि नही खाऊँगा
तो मै कुम्हला जाऊँगा। मुझे कुम्हलाया हुआ देख कर मनुष्य नही खरीदेगे;
इस प्रकार मेरा कल्याण होगा। में यही उपाय करूँगा।
उसने वैसा ही किया, जिससे वह सूखकर केवल हड्डी और चमड़ी मात्र
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रह गया। मनुष्य उसे देखकर नहीं खरीदते थे। बोधिसत्त्व को छोड़ शेष
बटेरों के समाप्त हो जाने पर, चिड़ीमार पिंजरे को ला दरवाजे पर रख (उसमें
से) बोधिसत्त्व को हाथ पर ले देखने लगा कि इस बटेर को क्या हुआ ? उसे
असावधान देख बोधिसत्त्व ने पर फैलाए और उड़कर जंगल जा पहुँचा।
बटेरों ने बोधिसत्त्व को देखकर पूछा—"पता नहीं रहा कि कहाँ गए थे ?"
"मुझे चिड़ीमार ने पकड़ लिया था।" "कैसे मुक्त हुए ?" पूछने पर
बोधिसत्त्व ने कहा मैंने उसका दिया हुआ दाना-पानी नहीं ग्रहण किया, और
मुक्त होने का तरीका सोचकर छूट गया। (इतना कह) यह गाथा कही—
नाचिन्तयन्तो पुरिसो विसेसमधिगच्छति,
चिन्तितस्स फलं पस्स मुत्तोस्मि वधबन्धना ॥
[जो आदमी विचार नहीं करता, वह विशेष (=मोक्ष) को प्राप्त नहीं
होता। विचार करने के फल को देखो मैं मरण-बन्धन से मुक्त हो गया ।]
सारांश यह है। पुरिसो, दुःख में पड़कर मैं इस उपाय से मुक्त होऊँगा,
इस प्रकार न विचार करनेवाला अपने दुःख से मुक्ति स्वरूप विसेस नाधि
गच्छति । अब मैंने जो विचार से काम लिया, उसके फल को देखो। उसी
उपाय से मैं मुत्तोस्मि वधबन्धना, मैं मरण से तथा बन्धन से मुक्त हुआ।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने अपनी कृति का वखान किया।
शास्ता ने इस धर्मदेशना को ला जातक का मेल बैठाया। उस समय मरने
से मुक्त हुआ बटेर मैं ही था।
११९. अकालरावी जातक
अकालरावी ] ३७
११९. अकालरावी जातक
“अमातापितरि संवड्ढो” . यह धर्मदेशना शास्ता ने जेतवन मे रहते समय
एक असमय शोर करनेवाले भिक्षु के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
उस श्रावस्ती-निवासी तरुण ने (बुद्ध-) शासन में प्रव्रजित हो न कर्तव्य
सीखे न शिक्षा ग्रहण की। वह नहीं जानता था कि इस समय मुझे (झाडू
लगाना आदि) काम करने चाहिए, इस समय मुझे सेवा के काम करने चाहिएः
इस समय पाठ करना चाहिए। पहले याम में भी, बीच के याम, मे भी और
पिछले याम में भी जब जब आंख खुलती, यह शोर करता था। भिक्षुओं
को नींद न आती। धर्मसभा मे एकत्र हुए भिक्षु उसकी निन्दा करते—
“आयुष्मानो ! यह भिक्षु इस प्रकार के रतन¹ शासन मे प्रव्रजित हो कर भी, न
कर्तव्य जानता है, न शिक्षा जानता है, न समय जानता है और न असमय
जानता है।”
शास्ता ने आकर पूछा “भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ?” “अमुक बातचीत” कहने पर कहा— “भिक्षुओ ! यह केवल अभी
असमय शोर मचाने वाला नहीं है, पहले भी असमय हल्ला करनेवाला ही
रहा है। समय असमय न जानने के कारण ही इसकी गर्दन मरोडी जाकर
यह मृत्यु को प्राप्त हुआ।”
इतना कह पूर्व जन्म की बात कही—
¹ बुद्ध, धर्म तथा संघ तीन रतन हैं।
ख. अतीत कथा
३८ [ १.१२.११६
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उदीच्य ब्राह्मण-कुल में जन्म ग्रहण कर सयाने होने पर, सब शिल्पो में पारङ्गत
हो, चारो दिशाओ में प्रसिद्ध आचार्य बन पांच सौ शिष्यो को शिल्प बेंचवाते
(सिखाते) थे। उन शिष्यो के पास समय पर बोलनेवाला एक मुर्गा था।
वे उसके बांग देने पर उठकर शिल्प सीखते थे। वह मर गया। तब वह
कोई दूसरा मुर्गा ढूंढ़ते फिरते थे। एक शिष्य ने श्मशान वन में लकड़ी इकट्ठी
करते समय एक मुर्गे को देख, उसे लाकर पिंजरे में बन्द कर, पाला। वह श्मशान
में बडा हुआ होने से यह न जानता था कि किस समय बोलना चाहिए। कभी
आधी रात को बोलता कभी अरुण उदय होने पर। शिष्य उसके बहुत रात
रहते बोलने पर उसी समय शिल्प सीखना आरम्भ करने के कारण अरुणोदय
तक न सीख सकते थे। नींद के मारे सीखा हुआ भी भूल जाते। बहुत प्रभात
होने पर बोलने के समय पाठ करने का अवकाश ही न रहता।
शिष्यो ने सोचा, यह या तो बहुत रात रहने पर बोलता है, या बहुत दिन
चढ़ने पर। इस (की मदद) से हमारा शिल्प (सीखना) समाप्त न होगा।
यह सोच उसकी गर्दन मरोड उसे मार डाला। फिर आचार्य के पास जाकर
कहा कि हमने असमय शोर मचानेवाले मुर्गे को मार डाला।
आचार्य ने कहा कि वह प्रशिक्षित ही वृद्धि को प्राप्त हुआ था। इसी से
मरा। इतना कह यह गाथा कही—
अमातापितरि संवड्ढो अनाचरियकुले वस,
नायं काल अकाल वा अभिजानाति कुक्कुटो ॥
[ न माता-पिता से शिक्षा ग्रहण करते हुए बडा, न आचार्य्य-कुल मे ही
रहा। यह मुर्गा न समय जानता था, न असमय।]
अमातापितरि संवड्ढो, माता पिता के पास उनका उपदेश न ग्रहण करता
हुआ बढा। अनाचरिय कुले यस, आचार्य कुल मे भी न रह कर आचार-शिक्षा
न ग्रहण करने के कारण असंयमी। पायं अकाल वा इस समय बोलना चाहिए,
यह कथा सुना बोधिसत्त्व यावत आयु जीवित रहकर कर्मानुसार परलोक
बन्धन ] ३६
इस समय नही बोलना चाहिए, इस प्रकार यह मुर्गा समय असमय नहीं जानने
के कारण ही मृत्यु को प्राप्त हुआ ।
यह कथा सुना बोधिसत्त्व यावत आयु जीवित रहकर कर्मानुसार परलोक
सिधारे। शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया ।
उस समय असमय शोर मचानेवाला मुर्गा यह भिक्षु ही था। शिष्य
बुद्ध-परिषद हुए। आचार्य्य तो मै था ही ।
१२०. बन्धनमोक्ख जातक
"अबद्धा तत्थ बज्झन्ति" यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में रहते
समय चिञ्चमाणविका के बारे में कहा। उसकी कथा बारहवें निपात में
महापदुम जातक¹ में आएगी। उस समय शास्ता ने 'भिक्षुओ ! चिञ्च माण-
विकाने न केवल अभी मुझ पर झूठा इल्जाम लगाया है, पहले भी लगाया
है' कह पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
पुरोहित के घर में जन्म ग्रहण कर सयाना होने पर पिता के मरने के बाद
उसी राजा का पुरोहित हो गया।
¹ महापदुम जातक (४७२) ।