जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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और श्रेष्ठिपुत्र को मुक्त कर चले गए।
श्रेष्ठिपुत्र मित्रो रोहिणी नदी पर गया। यहाँ सिर से स्नान कर, घर जा,
प्रातराश कर, माता पिता को प्रव्रज्या की बात जना, चीवर-वस्त्र ले बड़ी
भारी मण्डली के साथ बुद्ध के पास जा प्रणाम कर प्रव्रज्या की याचना की।
प्राज्या तथा उपसम्पदा प्राप्त कर वह योगाभ्यास में लग विपश्यना की वृद्धि
कर थोड़ी ही देर में अर्हत्व मे प्रतिष्ठित हुआ।
एक दिन धर्म-सभा मे इकट्ठे हुए भिक्षु श्रेष्ठिपुत्र की प्रशंसा कर रहे थे—
“आयुष्मानो ! श्रेष्ठिपुत्र अपने पर आई आपत्ति देख बुद्ध-शासन की
महिमा जान 'इस दुःख से मुक्त होने पर प्रव्रजित होऊँगा' सोच, उस सुचिन्तन
के फलस्वरूप मुक्त हो, प्रव्रजित हो अर्हत्व में प्रतिष्ठित हुआ। शास्ता ने
आकर पूछा—'भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर रहे हो ?'
"अमुक बातचीत ।"
"भिक्षुओ ! केवल श्रेष्ठिपुत्र ही अपने पर आपत्ति पड़ने पर इस उपाय
से इस दुःख से मुक्त होऊँगा" सोच मृत्यु भय से मुक्त नहीं हुआ, पूर्व समय में
बुद्धिमान लोग भी अपने पर आपत्ति पड़ने पर 'इस उपाय से इस दुःख से मुक्त
होग' सोच मृत्यु-भय के दुःख से मुक्त हुए। (यह कह) पूर्व-जन्म की
कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय जन्म मरण
के चक्कर में पड़े हुए बोधिसत्त्व एक बार बटेरे के जन्म में पैदा हुए।
उस समय बटेरो का एक शिकारी जगल से बहुत से बटेर पकड़ ले जाकर,
घर में रख उन्हें दाना खिला, खरीदारो से मूल्य ले उनके हाथ बेच अपनी
जीविका चलाता था। वह एक दिन बहुत से बटेरो के साथ बोधिसत्त्व को भी
पकड़ लाया। बोधिसत्व ने सोचा—यदि में इसका दिया हुआ चोगा खाऊँगा
पीऊँगा तो यह मुझे आये हुए मनुष्यो के हाथ बेच देगा। यदि नही खाऊँगा
तो मै कुम्हला जाऊँगा। मुझे कुम्हलाया हुआ देख कर मनुष्य नही खरीदेगे;
इस प्रकार मेरा कल्याण होगा। में यही उपाय करूँगा।
उसने वैसा ही किया, जिससे वह सूखकर केवल हड्डी और चमड़ी मात्र