जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
क. वर्तमान कथा
स्कन्धवत्त ] ३१३
क. वर्तमान कथा
जिस समय वह अग्नि-गृह¹ के द्वार पर लकड़ियां चीर रहा था, पुराने वृक्ष
में से एक सांप ने निकल कर उसे पाँव की अँगुलियों में डसा। वह वहीं मर
गया। उसके मरने की खबर सारे विहार में फैल गई।
धर्मसभा में भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु
अग्नि-गृह के दरवाजे पर लकड़ियाँ फाड़ता हुआ सर्प से डसा जाकर वहीं मर
गया।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ?
"अमुक बातचीत।"
"भिक्षुओ, यदि वह भिक्षु चारो सर्पराज-कुलो के प्रति मैत्री भावना करता,
उसे सर्प न डसता। पुराने तपस्वी भी, जिस समय बुद्ध उत्पन्न नहीं हुए थे उस
समय चारो सर्पराज-कुलो के प्रति मैत्री भावना कर, उन सर्पराज-कुलो से जो
भय था उससे मुक्त हुए।"
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
काशी राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर गृहस्थी छोड़ ऋषियो
के प्रब्रज्या क्रम से प्रब्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर, हिमवन्त
प्रदेश में एक जगह जहाँ गङ्गा का मोड़ था आश्रम बना कर, ध्यान क्रीड़ा में
रत हो ऋषिगणो के साथ रहने लग।
उस समय नाना प्रकार के सर्प ऋषियों को बाधक होते थे। अधिकांश
ऋषि मर जाते। तपस्वियों ने बोधिसत्त्व से यह बात कही। बोधिसत्त्व ने
सभी तपस्वियों को इकट्ठा कर कहा—"यदि तुम चारो सर्पराज-कुलो के
¹ जन्ताघर, जिसमें आग जलाकर स्वेद-स्नान लेते थे।
३१४ [ २.६.२०३
प्रति मैत्री भावना करो, तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे। अब से चारो सर्पराज-कुलों
के बारे में इस प्रकार मैत्री भावना करो।"
इतना कह यह गाथा कही—
विरूपक्खेहि मे मेत्तं मेत्तं एरापथेहि मे,
छब्यापुत्तेहि मे मेत्तं मेत्तं कण्हागोतमकेहि च ॥
[ विरूपक्खो के प्रति मे मैत्री-भाव रखता हूँ; एरापथों के प्रति भी मेरी
मैत्री है। छब्यापुत्रो के प्रति मेरी मैत्री है और मैत्री है कण्हागोतमो के
प्रति ] .
विरूपक्खेहि मे मेत्तं, विरूपक्ख नागराज-कुल के प्रति मेरा मैत्री-भाव
है। एरापथ आदि में भी इसी प्रकार। यह एरापथ नागराज-कुल, छब्यापुत्त
नागराजकुल और कण्हागोतम नगराज-कुल भी नागराज-कुल ही हैं।
इस प्रकार चार नागराज-कुल दिखाकर कहा कि यदि तुम इनके प्रति
मैत्री-भावना कर सको तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे, कष्ट नहीं देंगे।, इतना कह
दूसरी गाथा कही—
अपादकेहि मे मेत्तं मेत्तं दिपादकेहि मे,
चतुप्पदेहि मे मेत्तं मेत्तं बहुप्पदेहि मे ॥
[ जिनके पैर नहीं हैं उनसे मेरी मैत्री है, जिनके दो पैर हैं उनसे मेरी मैत्री
है, जिनके चार पैर हैं उनसे मेरी मैत्री है और जिनके अनेक पैर है उनसे मेरी
मैत्री है।]
पहले पद से विशेष रूप से सभी पैर-रहित सर्पों तथा मछलियो के प्रति
मैत्री-भावना कही गई। दूसरे पद से मनुष्यो तथा पक्षियो के प्रति। तीसरे
से हाथी घोड़े आदि सभी चतुष्पदों के प्रति। चौथे पद से बिच्छु, गूजर, कीडे
मकोड़े, मकडी आदि के प्रति।
४ खन्धवत्त ] ३१५
इस प्रकार मैत्री-भावना का क्रम बता अब प्रार्थना-क्रम कहते हुए यह
गाथा कही—
मा मं अपादको हिंसि मा मं हिंसि दिपादको,
मा मं चतुप्पदो हिंसि मा म हिंसि बहुप्पदो ॥
[ जो पैर-रहित है वे मेरी हिंसा न करे, जो द्विपद हैं वे मेरी हिंसा न करें,
जो चतुष्पद हैं वे मेरी हिंसा न करें और जो अनेक पैर वाले हैं वे भी मेरी हिंसा
न करें । ]
मा मं इस प्रकार 'उन पैर-रहित आदि में कोई एक भी मेरी हिंसा न करे
मुझे कष्ट न दे' प्रार्थना करते हुए मैत्री-भावना करो—यही अर्थ है।
अब सामान्य रूप से भावना-क्रम प्रकट करते हुए यह गाथा कही—
सब्बे सत्ता सब्बे पाणा सब्बे भूता च केवला,
सब्बे भद्रानि पस्सन्तु मा कञ्चि पापमागमा ॥
[ सभी सत्त्व, सभी प्राणी, सारे के सारे जीव; सभी का कल्याण हो।
किसी को दुख न हो।]
तृष्णा-दृष्टि के कारण ससार में, पाँच स्कन्धो में आसक्त, विशेष आसक्त
होने से सत्ता (सक्ता) । स्वास प्रश्वास कहलाने वाले प्राण के कारण प्राणी ।
भूत(=जीवित) भावित (जीने वालो) का जन्म होने से भूता। इस प्रकार
जानना चाहिए कि वचन-मात्र की ही विशेषता है। सामान्य तौर पर इन सभी
पदो का अर्थ सभी प्राणी ही है। केवला सकल, यह सर्व शब्द का ही पर्याय-
वाची है। भद्रानि पस्सन्तु, यह सभी प्राणी कल्याण को ही प्राप्त हो ।
मा कञ्चि पापमागमा, इनमें से किसी एक भी प्राणी को दुख न हो। सभी
वैर-रहित ओघ-रहित, सुखी तथा दुख-रहित हो ।
इस प्रकार सामान्य रूप से सभी प्राणियो के प्रति मैत्री-भावना की बात
कह तीनो रत्नो के गुणो की याद दिलाने के लिए कहा—
, ३१६ [ २.६.२०३
अप्पमाणो बुद्धो अप्पमाणो धम्मो अप्पमाणो सङ्घो।
सीमित (प्रमाण-सहित) विकारो का अभाव होने से और गुण असीम
(अप्रमाण) होने से बुद्ध रत्न असीम (अप्रमाण) है, धर्म, नौ प्रकार¹ का
लोकोत्तर धर्म; उसकी भी सीमा नहीं की जा सकती इसलिए असीम (अप्रमाण)।
उस असीम (अप्रमाण) धर्म से युक्त होने के कारण सङ्घ भी असीम (अप्रमाण)।
इस प्रकार बोधिसत्त्व उन तीनो रत्नो के गुणो को स्मरण करने के लिए
कह तथा उन तीन रत्नो के गुणो का असीम होना दिखा सीमित प्राणियो के
बारे में बोले—
पमाणवन्तानि सिरिसपानि अहिविच्छिका,
सतपदी उण्णनाभि सरबूमूसिका ।
[ रेंगने वाले, सर्प, विच्छू, गूजर, मकड़ी तथा छिपकली—यह सब सीमा
वाले हैं।]
सिरिसपा, सब दीर्घाकार प्राणियो का यह नाम है। वे सरक कर चलते
हैं, वा सिर से चलते हैं, इसीलिए सिरिसपा। अहि आदि उनके स्वरूप का
वर्णन किया गया है। तत्थ उण्णनाभि मकड़ी, उसकी नाभि से ऊन सदृश
सूत निकलता है, इसलिए उण्णनाभि कहलाती है। सरबू, छिपकली।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने 'क्योकि इनके अन्दर जो रागादि है वह सीमा
वाले धर्म हैं, इसलिए ये सिरिसप आदि सीमा वाले हैं दिखा तीनो असीम
रत्नो के प्रताप से यह सीमा वाले रात दिन रक्षा करे' कह तीनो रत्नो
के गुणो का अनुस्मरण करने को कहा। उसके आगे जो कर्तव्य है वह बताने
के लिए यह गाथा कही—
¹ चार मार्ग, चार फल तथा निर्वाण।
खन्धवत्त ] ३१७.
कता मे रक्खा कता मे परित्ता,
पटिक्कमन्तु भूतानि सोहं नमो भगवतो;
नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं ॥
[ मैने अपनी हिफाजत कर ली; मैने अपना परित्राण कर लिया। (हानि-
कर) जीव दूर हों। मै भगवान् (बुद्ध) को और सात सम्यक् सम्बुद्धो१ को
प्रणाम करता हूँ । ]
कता मे रक्खा, रत्नत्रय का गुणानुस्मरण कर मैने अपनी रक्षा, हिफा-
जत कर ली। कता मे परित्ता मैने अपना परित्राण भी कर लिया। पटिक्कमन्तु
भूतानि, मेरा अहित चिन्तन करने वाले प्राणी चले जाएँ, दूर हों। सोहं नमो
भगवतो, सो मै इस प्रकार अपनी रक्षा कर पूर्व के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए
बुद्ध भगवान् को नमस्कार करता हूँ। नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं, विशेष
रूप से अतीत के क्रम से परिनिर्वाण को प्राप्त हुए सात बुद्धो को नमस्कार
करता हूँ ।
इस प्रकार नमस्कार करते हुए भी सात बुद्धो का अनुस्मरण करो, (करके)
बोधिसत्त्व ने ऋषिगण को यह परित्राण-धर्मदेशना रच कर दी।
आरम्भ में दो गाथाओ द्वारा चारो सर्पराज कुलो में मैत्री-भावना प्रकट
की होने से, विशेष रूप से तथा सामान्य रूप से दोनो मैत्री-भावनाएँ प्रकट की
होने से, यह परित्राण धर्मदेशना यहाँ दी गई है। और कारण खोजना चाहिए।
उस समय से ऋषियो का समूह बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल मैत्री-
भावना करने लगा। बुद्ध के गुणो का स्मरण करने लगा। इस प्रकार उनके
बुद्ध-गुणो का स्मरण करने ही पर सब सांप चले गए। बोधिसत्त्व भी ब्रह्म-
विहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल वैठाया। उस समय
ऋषि-गण बुद्ध परिषद थी। गण का शास्ता तो मै ही था।
१ देखो महापदान सूत्र (दीर्घनिकाय) ।