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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

८७- अशौच तथा आपद्वृत्ति-निरूपण

काण्ड ] विनायकशान्ति-स्नान [ १७५


आदि पाँच स्थानोंकी मिट्टी, गोरोचन, गन्ध और गुग्गुल—ये वस्तुएँ भी उन कलशोंके जलमें छोड़े।

प्रथम कलशको लेकर आचार्य निम्नलिखित मन्त्रसे उसे स्नान कराये—

सहस्राक्षं शतधारमृषिभिः पावनं स्मृतम्॥
तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते।
(१००। ६-७)

जो सहस्रों नेत्र (अनेक प्रकारकी शक्तियों)-से युक्त हैं, जिनकी सैकड़ों धाराएँ (प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियोंने पवित्र करनेवाला बताया है, उस पवित्र जलसे मैं (विनायकग्रस्त) तुम्हारा (उपद्रवकी शान्तिके लिये) अभिषेक करता हूँ। यह पावन जल तुम्हें पवित्र करे।

द्वितीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे—

भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः॥
भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः।
(१००। ७-८)

राजा वरुण तथा भगवान् सूर्य एवं देवगुरु बृहस्पति आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करें; इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वायुदेव तथा सप्तर्षिगण भी आपके सौभाग्यकी अभिवृद्धि करते रहें।

तृतीय कलशके जलसे निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए अभिषेक करे—

यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्द्धनि॥
ललाटे कर्णयोरक्षणोरापस्तद्घ्नन्तु ते सदा।
(१००। ८-९)

तुम्हारे केशोंमें, सीमन्तमें, मस्तकपर, ललाटमें, कानोंमें और नेत्रोंमें भी जो दुर्भाग्य है, उसे जलदेवता सदाके लिये शान्त करें।

तदनन्तर पहले कहे गये तीनों मन्त्रोंसे चतुर्थ कलशके जलसे स्नान कराये। इसके बाद बाँयें हाथमें कुशा लेकर स्नान किये हुए प्राणीके सिरको कुशसे स्पर्श करते हुए ब्राह्मणको संयमित होकर गूलरकी लकड़ीसे निर्मित स्रुवाके द्वारा सार्षपतैल (सरसोंका तेल)-से अग्निमें आहुति प्रदान करनी चाहिये। आहुति देनेके लिये ये मन्त्र विहित हैं— 'मिताय स्वाहा', 'सम्मिताय स्वाहा', 'शालाय स्वाहा', 'कटङ्कटाय स्वाहा', 'कूष्माण्डाय स्वाहा', 'राजपुत्राय स्वाहा' ('स्वाहा' के पूर्व प्रयुक्त सभी नाम विनायकके हैं। या० मि० ग० प्र० अ० श्लोक २८५)।

इसके अनन्तर लौकिक अग्निमें स्थालीपाक-विधिसे चरु पकाकर उससे सभी निर्दिष्ट विनायक नामवाले 'स्वाहा' युक्त छः मन्त्रोंसे उसी लौकिक अग्निमें ही हवनकर अवशिष्ट हविशेषके द्वारा इन्द्र, अग्नि, यम आदिको बलि देनी चाहिये। तत्पश्चात् किसी चतुष्पथ (चौराहे)-पर कुशोंका आसन बिछाकर उसमें पुष्प, गन्ध, उण्डेरककी माला, कच्चे-पक्के चावल, घृतमिश्रित पुलाव, मूली, पूड़ी, पुआ, दही, पायस, घृत, गुड़पिष्ट, लड्डू तथा इक्षु—इन सभी सामग्रियोंको एकत्र करके रख दे। तदनन्तर विनायकजननी भगवती अम्बिकाका उपस्थान करे और हाथ जोड़कर अर्घ्य प्रदान करे।

पुत्रजन्मकी कामना करनेवाली स्त्रीको दूर्वा और सरसोंके पुष्पोंसे भगवती दुर्गाकी अर्चना करके स्वस्ति-वाचनके साथ इस प्रकार उनकी प्रार्थना करनी चाहिये—

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे।
पुत्रान्देहि श्रियं देहि सर्वान्कामांश्च देहि मे॥
(१००।१६)

हे भगवति! आप मुझे रूप, यश और ऐश्वर्य प्रदान करें। हे देवि! आप मेरे लिये पुत्र दें, लक्ष्मी दें और मेरी सभी कामनाओंको परिपूर्ण करें।

तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको भोजन प्रदानकर संतुष्ट करे। अपने गुरुको दो वस्त्र प्रदानकर अन्य ग्रहोंकी पूजा करके सूर्यार्चनमें निरत रहे। इस प्रकार विनायक और ग्रहोंका पूजन करके मनुष्य अपने सभी कार्योंमें सफलता प्राप्त करता है।

(अध्याय १००)

१७६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

ग्रहशान्ति-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे मुनियो! लक्ष्मी एवं सुख-शान्तिके इच्छुक तथा ग्रहोंकी दृष्टिसे दुःखित जनोंको ग्रहशान्तिके लिये तत्सम्बन्धित यज्ञ करना चाहिये। विद्वानोंके द्वारा सूर्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—ये नौ ग्रह बताये गये हैं। इनकी अर्चाके लिये इनकी मूर्ति क्रमशः इन द्रव्योंसे बनानी चाहिये—ताम्र, स्फटिक, रक्तचन्दन, स्वर्ण, सुवर्ण, रजत, अयस् (लोहा), सीसा तथा कांस्य। अर्थात् सूर्यग्रहके लिये ताम्र धातु, चन्द्रके लिये स्फटिक, मंगलके लिये रक्तचन्दन, बुध एवं बृहस्पतिके लिये स्वर्ण, शुक्रके लिये रजत, शनिके लिये लोहा, राहुके लिये सीसा तथा केतुके लिये कांस्य धातु प्रशस्त है।

सूर्यका वर्ण लाल, चन्द्रमाका सफेद, मंगलका लाल, बुध तथा बृहस्पतिका पीला, शुक्रका श्वेत, शनि, राहु और केतुका काला वर्ण होता है। इसी वर्णके इनके द्रव्य भी होते हैं। एक पाटेपर वस्त्र बिछाकर ग्रहवर्णोंके अनुसार निर्दिष्ट द्रव्योंके द्वारा विधिपूर्वक उनकी स्थापना तथा पूजा-होम करे। उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा पुष्प समर्पित करे। उनके लिये गन्ध, बलि, धूप, गुग्गुल भी देना चाहिये। तत्पश्चात् मन्त्रोंके द्वारा प्रत्येक ग्रह-देवताके निमित्त चरु पदार्थ अर्पित करना चाहिये।

उसके बाद यथाक्रम ‘ॐ आकृष्णेन रजसा०’ इस मन्त्रके द्वारा सूर्य, ‘ॐ इमं देवा०’ मन्त्रसे चन्द्र, ‘ॐ अग्निमूर्धादिवः ककुत्०’ मन्त्रके द्वारा मंगल, ‘ॐ उद्बुध्यस्व०’ मन्त्रसे बुध, ‘ॐ बृहस्पते०’ इस मन्त्रके द्वारा बृहस्पति, ‘ॐ अन्नात्परिस्रुतम०’ मन्त्रसे शुक्र, ‘ॐ शं नो देवी०’ मन्त्रके द्वारा शनि, ‘ॐ कयानश्चि०’ मन्त्रसे राहु तथा ‘ॐ केतुं कृण्वन्०’ मन्त्रके द्वारा केतु ग्रहके लिये आहुति देनी चाहिये।

इन ग्रहोंके लिये इसी क्रमसे मन्दार, पलाश, खैर, अपामार्ग (चिचड़ा), पिप्पल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशकी समिधाएँ विहित हैं। इन समिधाओंको घृत, दधि तथा मधुसे मिश्रितकर हवन करना चाहिये। तदनन्तर क्रमानुसार उपर्युक्त मन्त्रोंके द्वारा पदार्थोंकी आहुति प्रदान करे। यथा—सूर्यके लिये गुड़, चन्द्रके लिये भात, मंगलके लिये पायस, बुधके लिये साठी चावलकी खीर, बृहस्पतिके लिये दही-भात, शुक्रके लिये घृत, शनिके लिये अपूप (पुआ), राहुके लिये फलका गूदा और केतुके लिये अनेक वर्णके पकाये हुए धान्यकी आहुति देनी चाहिये।

द्विजको चाहिये कि इसी क्रमसे प्रत्येक ग्रहके लिये अन्न भी दानरूपमें दे। तदनन्तर प्रत्येक ग्रहके निमित्त यथाक्रम—धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, कृष्णा गौ, अयस् (शस्त्र आदि) तथा छागकी दक्षिणा देनी चाहिये। इस प्रकार ग्रहोंकी सदैव पूजा करनेसे मनुष्यको राज्यादि फल प्राप्त होते हैं।
(अध्याय १०१)


वानप्रस्थ-धर्म-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने कहा— हे महर्षियो! अब मैं वानप्रस्थाश्रमके धर्मका वर्णन कर रहा हूँ, आप सभी इसका श्रवण करें।

वानप्रस्थ-आश्रममें प्रविष्ट पुरुषको अपनी पत्नीके संरक्षणका भार पुत्रोंके ऊपर छोड़कर अथवा पत्नीके सहित वनमें जाना चाहिये।

वानप्रस्थ-धर्मका पालन करनेवाला ब्रह्मचर्य-व्रतका निर्वाह करते हुए अपनी श्रौत-अग्नि एवं

काण्ड ] * संन्यास-धर्म-निरूपण * १७७


गृह-अग्निके साथ वनमें जाय। शान्त एवं क्षमावान् रहकर वह अहर्निश देवोपासनामें निमग्न रहे। वह बिना जोती हुई भूमिसे उत्पन्न अन्नके द्वारा अग्निदेव, पितरों, देवताओं, अतिथियों तथा भृत्योंको तृप्त (संतुष्ट) करे। आत्मज्ञानमें तत्पर रहनेवाला वह वानप्रस्थी दाढ़ी, जटा तथा लोमराशिको धारण करे, इन्द्रियोंका दमन करे, त्रिकाल स्नान करे एवं अपनेको प्रतिग्रह अर्थात् दान-ग्रहणसे दूर रखे।

ऐसे व्यक्तिको स्वाध्यायवान्, भगवद्ध्यानपरायण तथा सभी लोगोंके हितसाधनमें लगे रहना चाहिये। उसको जीवनयापनके लिये सीमित अर्थ-संग्रह करना चाहिये।

उसके पास जो कुछ शेष सामग्री हो, उसका आश्विन-मासमें परित्यागकर वह व्रतादिके द्वारा ही समय व्यतीत करे। यदि शक्ति हो तो एक मास या एक पक्षका व्रतकर मास या पक्षके अन्तमें ही भोजन करे। ऐसे व्रती अपने दाँतोंको ही उलूखल मानकर उन्हींसे अन्नको तुषसे विहीनकर अपनी प्राण-रक्षाके लिये उपयोगमें लाते हैं।

वानप्रस्थीको चान्द्रायणव्रत करना चाहिये, भूमिपर सोना चाहिये और वह अपने सभी धार्मिक कृत्योंका सम्पादन यथासम्भव फलसे करे (अन्नसे नहीं)। वह ग्रीष्म-ऋतुमें पञ्चाग्निके^१ मध्य स्थित रहे, वर्षा-ऋतुमें स्थण्डिल (खुले चबूतरे)-पर शयन करे तथा हेमन्त-ऋतुमें आर्द्रवस्त्रोंको धारण करके योगाभ्यासके द्वारा अपने दिन व्यतीत करे।

जो काँटोंसे उसे पीड़ा पहुँचाये उसके प्रति भी क्रोध न करे और जो अङ्गोंमें चन्दनका अनुलेपन करे उसपर भी प्रसन्न न हो, उन दोनोंके प्रति वह समान भाव रखे। वानप्रस्थियोंमें दुःख और सुख भोगनेकी एक समान ही क्षमता होनी आवश्यक है। (अध्याय १०२)


संन्यास-धर्म-निरूपण

याज्ञवल्क्यजीने पुनः कहा—हे सज्जनवृन्द! अब मैं भिक्षु-धर्म (संन्यास-धर्म)-का वर्णन करूँगा। आप सब उसका ज्ञान प्राप्त करें।

गृहस्थाश्रम एवं वानप्रस्थाश्रममें विहित सभी श्रौत इष्टियोंको सम्पन्नकर सर्व वेद-सम्बन्धी दक्षिणा जिस इष्टिमें विहित है, उस प्राजापत्य इष्टिको भी सम्पन्न करके अन्तमें वेद-विहित विधानसे समस्त श्रौताग्नियोंको अपनेमें आरोपित करके संन्यास ग्रहण किया जा सकता है। संन्यासीको चाहिये कि वह सभी प्राणियोंका हितैषी हो, शान्त हो, त्रिदण्डी हो, (संन्यासीके लिये बाँसके बने तीन दण्ड धारण करनेका विधान है।) वह कमण्डलु धारण करे। सभी प्रकारके सुख-साधनयुक्त भवनोंका परित्यागकर भिक्षार्थी होकर ग्रामका आश्रय ग्रहण करे। प्रमादरहित होकर भिक्षाटन करे और सायंकाल ग्राममें न दिखलायी पड़े। जो ग्राम भिक्षुकोंसे^२ रहित हो, वहाँपर वह लोभशून्य होकर प्राणधारणमात्रके लिये भिक्षा माँगे।

यम-नियमका पालन करते हुए योग-सिद्ध होकर संन्यासीको एकदण्डी^३ अथवा परमहंस^४ बनना चाहिये। इस प्रकार रहता हुआ संन्यासी शरीरका परित्यागकर इसी लोकमें अमरत्व प्राप्त कर लेता है। दान देनेवाला, अतिथिका आदर करनेवाला, ब्रह्मज्ञ, यथाविधि श्राद्ध करनेवाला गृहस्थ भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है। (अध्याय १०३)


१-चार दिशाओंमें चार अग्नि और ऊपर सूर्य।
२-व्यवसायकी दृष्टिसे अनेक प्रकारके पाखण्डके साथ भिक्षा माँगनेवाले यहाँ 'भिक्षुक' शब्दसे अभिप्रेत हैं।
३-बाँसके बने हुए तीन दण्डोंके विकल्पमें बाँसके एक दण्डके धारणका भी विधान है। अतः संन्यासी बाँसके एक दण्डको भी धारण कर सकता है। ऐसे संन्यासीको 'एकदण्डी' कहते हैं।
४-परमहंस उस अवधूतको कहते हैं, जो अपने शरीरकी ममतासे सर्वथा विनिर्मुक्त हो। ये यथेच्छ सवस्त्र-निर्वस्त्र आदि किसी भी रूपमें रह सकते हैं। इसके लिये कोई बन्धन नहीं होता।