गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
७०- रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य
१४० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
गयातीर्थमें पिण्डदानकी महिमा
ब्रह्माजीने कहा—पिण्डदान करनेवालेको चाहिये कि वह प्रेतशिलादि तीर्थोंमें स्नान करके 'अस्मत्कुले मृता ये च०' आदि मन्त्रोंसे अपने श्रेष्ठ पितरोंका आवाहनकर वरुणनदीके अमृतमय जलसे पिण्डदान प्रदान करे*।
हमारे कुलमें जो मरे हैं, जिनकी सद्गति नहीं हुई है। इस दर्भपृष्ठपर तिलोदकके द्वारा उन सभी पितरोंका आवाहन करता हूँ। पितृवंश एवं मातृवंशमें जिन लोगोंकी मृत्यु हुई है, उन लोगोंके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान दे रहा हूँ। मातामह अर्थात् नानाके कुलमें जो लोग मर गये हैं, जिनको कोई सद्गति प्राप्त नहीं हुई है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। हमारे कुलमें जो दाँत निकलनेके पूर्व ही मृत्युको प्राप्त हो गये और जो कोई गर्भकालमें विनष्ट हो गये हैं, उन लोगोंके उद्धारके लिये मैं यह पिण्डदान दे रहा हूँ। बन्धुकुलमें उत्पन्न जो कोई नाम-गोत्रसे रहित हैं, स्वगोत्र एवं परगोत्रमें जिनकी कोई गति नहीं रही है, उनके उद्धारके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। उद्धन्धन (फाँसीद्वारा) अथवा विषसे या शस्त्राघातसे जिनकी मृत्यु हुई है, जिन्होंने आत्महत्या की है, उन लोगोंके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।
जो लोग अग्निमें जलकर मर गये हैं, जिनकी मृत्यु सिंह और व्याघ्रादि हिंसक प्राणियोंके द्वारा हुई है अथवा विशाल दाँतोंवाले हाथियों या सींगधारी पशुओंके आघातसे जो मरे हैं, उन सभीके उद्धारके लिये मैं पिण्ड दे रहा हूँ। जिनकी मृत्यु अग्निमें जलकर अथवा बिना अग्निमें जले
१-अस्मत्कुले मृता ये च गतिर्येषां न विद्यते। आवाहयिष्ये तान् सर्वान् दर्भपृष्ठे तिलोदकैः॥
पितृवंशे मृता ये च मातृवंशे च ये मृताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
मातामहकुले ये च गतिर्येषां न विद्यते। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
अजातदन्ता ये केचिद्दे च गर्भे प्रपीडिताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
बन्धुवर्गाश्च ये केचिन्नामगोत्रविवर्जिताः। स्वगोत्रे परगोत्रे वा गतिर्येषां न विद्यते।
तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
उद्धन्धनमृता ये च विषशस्त्रहताश्च ये। आत्मोपघातिनो ये च तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
अग्निदाहे मृता ये च सिंहव्याघ्रहताश्च ये। दंष्ट्रिभिः शृङ्गिभिर्वापि तेषां पिण्डं ददाम्यहम्॥
अग्निदग्धाश्च ये केचिन्नाग्निदग्धास्तथापरे। विद्युच्चौरहता ये च तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
रौरवे चान्धतामिस्रे कालसूत्रे च ये गताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
असिपत्रवने घोरे कुम्भीपाके च ये गताः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
अन्येषां यातनास्थानां प्रेतलोकनिवासिनाम्। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
पशुयोनिं गता ये च पक्षिकीटसरीसृपाः। अथवा वृक्षयोनिस्यास्तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
असंख्ययातनासंस्था ये नीता यमशासनैः। तेषामुद्धरणार्थाय इमं पिण्डं ददाम्यहम्॥
जात्यन्तरसहस्रेषु भ्रमन्ति स्वेन कर्मणा। मानुष्यं दुर्लभं येषां तेभ्यः पिण्डं ददाम्यहम्॥
ये बान्धवाऽबान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये केचित् प्रेतरूपेण वर्तन्ते पितरो मम। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु पिण्डदानेन सर्वदा॥
ये मे पितृकुले जाताः कुले मातुस्तथैव च। गुरुश्वशुरबन्धूनां ये चान्ये बान्धवा मृताः॥
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः। क्रियालोपहता ये च जात्यन्धाः पङ्गवस्तथा॥
विरूपा आमगर्भाश्च ज्ञाताज्ञाताः कुले मम। तेषां पिण्डं मया दत्तमक्षय्यमुपतिष्ठताम्॥
साक्षिणः सन्तु मे देवा ब्रह्मेशानादयस्तथा। मया गयां समासाद्य पितॄणां निष्कृतिः कृता॥
आगतोऽहं गयां देव पितृकार्ये गदाधर। तन्मे साक्षी भवत्वद्य अनुणोऽहम्ऋणत्रयात्॥ (८५।२—२२)
काण्ड ] गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य १४१
हो गयी है, जो विद्युत्से या चोरोंके द्वारा मारे गये हैं, उनके लिये मैं पिण्ड दे रहा हूँ। जो रौरव, अन्धतामिस्र तथा कालसूत्र नामक नरकोंमें गये हैं, उन सबके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो असिपत्रवन और घोरकुम्भीपाक नामक नरकोंमें पड़े हुए हैं, उनके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। अन्य जो यातना भोग रहे हैं और प्रेतलोकमें निवास कर रहे हैं, उनके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।
जो पितृगण पशुयोनिमें चले गये हैं अथवा जो पक्षी, कीट-पतंग, सर्प, सरीसृप (छिपकली, गिरगिट, सर्पादि) हो गये हैं या जो वृक्षयोनिमें अवस्थित हैं, उनके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो यमराजके शासनादेशसे यमगणोंके द्वारा असंख्य यातनाओंके बीच पहुँचाये गये हैं, उन सभीके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो अपने कर्मानुसार हजारों योनियोंमें घूमते हुए कष्ट भोग रहे हैं, जिनको मानुषयोनि दुर्लभ है, उन सभीके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।
जो हमारे बान्धव हैं या बान्धव नहीं हैं अथवा जो अन्य जन्मोंमें मेरे बन्धु-बान्धव रहे हैं, वे मेरे द्वारा दिये गये इस पिण्डदानसे सदैव तृप्तिको प्राप्त करें। जो कोई भी पितृजन प्रेतरूपमें अवस्थित हैं, वे सभी इस पिण्डदानसे तृप्ति प्राप्त करें।
जो हमारे पितृकुल, मातृकुल, गुरु, श्वशुर, बान्धव अथवा अन्य सम्बन्धियोंके कुलमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त हुए हैं और जो अन्य बान्धव हैं, जो मेरे कुलमें पुत्र-पत्नीसे रहित होनेके कारण लुप्तपिण्ड हैं, क्रियालोपसे जिनकी दुर्गति हुई है, जो जन्मान्ध या पंगु हैं, जो विरूप हैं अथवा अल्पगर्भमें ही मृत्युको प्राप्त हुए हैं, जो ज्ञात अथवा अज्ञात हैं, उनके निमित्त मेरे द्वारा दिया गया यह पिण्डदान अक्षय होकर उन्हें प्राप्त हो।
ब्रह्मा और ईशान आदि देव ! आप सब मेरे इस कार्यमें साक्षी हों। मैंने गयातीर्थमें आ करके पितरोंके उद्धारके लिये यह पिण्डदानादिक कार्य सम्पन्न किया है।
हे देव ! भगवान् गदाधर विष्णु ! मैं पितृकार्यके लिये इस गयातीर्थमें उपस्थित हुआ हूँ। मेरे द्वारा सम्पन्न किये गये आजके इस पितृकार्यमें आप साक्षी हों। आज मैं (देव-गुरु एवं पितृ) तीनों ऋणोंसे विमुक्त हो गया हूँ। (अध्याय ८५)
गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य
ब्रह्माजीने कहा— इस गयाक्षेत्रमें जो विख्यात प्रेतशिला है, वह प्रभास, प्रेतकुण्ड एवं गयासुरशीर्ष नामक तीर्थोंमें तीन प्रकारसे अवस्थित है। सर्वदेवमयी इस शिलाको धर्मदेवताके द्वारा ऐश्वर्यके लिये धारण किया गया है। अपने मित्रादिक बन्धु-बान्धवोंमें जिन लोगोंको प्रेतयोनि प्राप्त हो गयी है, उनका उद्धार करनेके लिये यह प्रेतशिला शुभ है। अतएव मुनिजन, नृपगण तथा राजपत्नयादि इस प्रेतशिलापर आ करके अपने पितृजनोंके लिये श्राद्धादिकर ब्रह्मलोक प्राप्त करते हैं।
गयासुरके मुण्डके पृष्ठभागमें जो शिला स्थित है, उसका नाम 'मुण्डपृष्ठगिरि' है, इसी कारण यह पर्वत सर्वदेवमय है। इसके पाददेशमें ब्रह्मसरोवरादि अनेक तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें एक अरविन्दवन नामक तीर्थ है। उस वनसे सुशोभित होनेके कारण उसके पर्वतीय प्रान्त-भागको 'अरविन्दगिरि' कहते हैं। वहाँपर क्रौञ्च पक्षियोंके चरण-चिह्न विद्यमान रहते हैं। इसलिये वह पर्वतीय भाग 'क्रौञ्चपाद' के
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नामसे प्रसिद्ध है। श्राद्धादि करनेसे वह तीर्थ पितरोंको ब्रह्मलोक प्रदान करता है।
आदिकालसे ही यहाँपर आदिदेव भगवान् गदाधर विष्णु अव्यक्तरूपमें शिलारूपसे स्थित हैं। इसलिये यह शिला देवमयी कही गयी है। यह शिला गयासुरके सिरको आच्छादित करके वर्तमान समयमें भी अपने गुरुत्व भावके कारण चारों ओरसे अवस्थित है। कालान्तरमें महारुद्रादि देवोंके साथ आदि-अन्तसे रहित हरि आदि गदाधरके रूपमें व्यक्त होकर यहाँ स्थित हो गये हैं।
जिस प्रकार पूर्वकालमें धर्म-संरक्षण एवं अधर्म-विनाशके निमित्त दैत्यों और राक्षसोंका संहार करनेके लिये मत्स्यावतार हुआ। जैसे कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, दाशरथी राम, कृष्ण और बुद्ध हुए। तदनन्तर कल्कि अवतार भी हुआ। उसी प्रकार यहाँपर व्यक्ताव्यक्त भगवान् आदि गदाधर प्रकट हुए।
आदिकालमें इसी पवित्र तीर्थपर ब्रह्मादि देवोंने आदिदेव भगवान् गदाधर विष्णुकी पूजा की थी। इसलिये यहाँपर अर्घ्य, पाद्य, पुष्पादिक उपहारोंसे उन भगवान् गदाधरकी पूजा करनी चाहिये। जो मनुष्य इस तीर्थमें जाकर अन्य देवताओंके साथ इन आदिदेव भगवान् गदाधरको अर्घ्य-पात्र, पाद्य, गन्ध, पुष्प, धूप, सुन्दर नैवेद्य, विविध प्रकारके पुष्पोंसे बनी हुई मालाएँ, वस्त्र, मुकुट, घण्टा, चामर, दर्पण, अलंकार, पिण्ड, अन्न तथा अन्यान्य वस्तुओंको प्रदान करता है, वह जबतक इस पृथिवीपर जीवित रहता है, तबतक धन, धान्य, आयु, आरोग्य, सम्पदाओं, पुत्र-पौत्रादिक संतति, श्रेय, विद्या, अर्थ एवं अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करता है। भार्याको प्राप्तकर (अन्तमें) स्वर्गका निवासी बन जाता है। तदनन्तर वह पुनः पृथिवीपर जन्म लेकर राज्यसुख प्राप्त करता है। वह श्रेष्ठ कुलीन मनुष्य सत्त्वसम्पन्न होकर युद्धभूमिमें शत्रुओंको पराजित करनेमें समर्थ रहते हुए वध और बन्धनसे विमुक्त होकर मृत्युके पश्चात् मोक्ष प्राप्त करता है।
जो इस गयातीर्थमें अपने पितृजनोंके लिये श्राद्ध तथा पिण्डदानादिक क्रियाओंको सम्पन्न करनेवाले हैं, वे उन पितृगणोंके साथ स्वयं भी ब्रह्मलोकगामी होते हैं*।
जो व्यक्ति पुरुषोत्तमक्षेत्रमें जाकर भगवान् जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्रकी पूजा करते हैं, वे लोग ज्ञान, लक्ष्मी तथा पुत्रादिकोंको प्राप्तकर अन्त समयमें भगवान् पुरुषोत्तम विष्णुके सांनिध्यमें चले जाते हैं। जो मनुष्य वहाँ स्थित भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथ, सूर्यदेव और गणनायक विघ्नेश्वरके समक्ष पितरोंके लिये पिण्डदानादिक कार्य करते हैं, उन लोगोंको वह सम्पूर्ण कृत्य ब्रह्मलोक प्रदान करता है।
इस क्षेत्रमें विद्यमान कपर्दी भगवान् शिव और गणेशको नमस्कार करके मनुष्य समस्त विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। यहाँपर विराजमान भगवान् कार्तिकेयका पूजनकर ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। द्वादशादित्य सूर्यदेवकी सम्यक् अर्चनासे पुरुष सर्वरोग-विमुक्त हो जाता है। भगवान् वैश्वानर अग्निदेवकी विधिवत् पूजा करके पुरुष उत्तम कान्ति प्राप्त करता है। रेवन्त देवकी पूजा करके मनुष्य उत्तम जातिके अश्वोंको प्राप्त करता है। देवराज इन्द्रकी भलीभाँति पूजा करके महान् ऐश्वर्य एवं गौरीदेवीकी पूजा करके सौभाग्यकी प्राप्ति करनी चाहिये। मनुष्य सरस्वतीदेवीकी पूजा करके विद्या, लक्ष्मीकी पूजा करके सम्पत्ति तथा गरुड़की पूजा करके विघ्नोंके समूहोंसे विमुक्त हो जाता है।
क्षेत्रपालदेवकी पूजा करके व्यक्ति ग्रहोंके समूहसे निर्मुक्त हो जाता है। मुण्डपृष्ठकी पूजा करके अपनी सम्पूर्ण अभिलाषाओंकी पूर्ति करनी चाहिये।
* वधबन्धविनिर्मुक्तश्चान्ते मोक्षमवाप्नुयात्। श्राद्धपिण्डादिकर्तारः पितृभिर्ब्रह्मलोकगाः॥ (८६।१८)
काण्ड ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम १४३
अष्टनागदेवकी पूजा करके प्राणी सर्पदंशसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्माकी पूजा करके ब्रह्मलोकका पुण्य अर्जित करना चाहिये।
भगवान् बलभद्रकी सम्यक् पूजा करके शक्ति और आरोग्य तथा सुभद्रादेवीकी विधिवत् पूजा करके परम सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। भगवान् पुरुषोत्तम जगन्नाथकी पूजा करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति होती है। भगवान् नारायणकी पूजा करके वह मनुष्योंका अधिपति होता है।
नृसिंहदेवके चरणोंका स्पर्श एवं नमन करके मनुष्य संग्राममें विजयी होता है। वराहदेवकी पूजा करके वह पृथिवीका राज्य प्राप्त करता है तथा मालाधर एवं विद्याधरका स्पर्श करके विद्याधरोंके पदको प्राप्त कर लेता है।
भगवान् आदिगदाधरकी सम्यक् पूजा करके प्राणी समस्त अभिलाषाओंको पूर्ण कर लेता है। भगवान् सोमनाथकी पूजासे शिवलोकको प्राप्त करता है। रुद्रदेवको नमस्कार करके रुद्रलोकमें प्रतिष्ठापित होता है।
रामेश्वर-शिवको प्रणाम करके मनुष्यको रामके समान अतिशय प्रिय बनना चाहिये। भगवान् ब्रह्मोश्वरकी पूजा करके ब्रह्मलोक-प्राप्तिकी योग्यता प्राप्त करनी चाहिये। कालेश्वरकी भलीभाँति पूजा करके कालजयी बनना चाहिये। केदारनाथकी पूजा करके शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करनी चाहिये और भगवान् सिद्धेश्वरकी पूजा करके मनुष्यको ब्रह्मलोक प्राप्त करना चाहिये।
आद्यदेव रुद्र आदिके साथ भगवान् आदिगदाधर विष्णुका दर्शन करके अपने सौ कुलोंका उद्धार कर उन्हें ब्रह्मलोक प्राप्त कराये। आदिगदाधरकी पूजासे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, कामार्थी कामको तथा मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है। इनकी पूजासे राज्य चाहनेवाला पुरुष राज्य और शान्तिका इच्छुक शान्ति प्राप्त कर लेता है। सब प्रकारकी कामना करनेवाला सब कुछ प्राप्त कर लेता है। इन भगवान् आदिगदाधरकी अर्चनासे पुत्रकी कामना करनेवाली स्त्रीको पुत्र, सौभाग्य चाहनेवालीको सौभाग्य तथा वंशाभिवृद्धिकी इच्छुक स्त्रीको वंशाभिवृद्धिका पुण्य प्राप्त करना चाहिये। मनुष्य श्राद्ध, पिण्डदान, अन्नदान और जलदानके द्वारा भगवान् गदाधरदेवकी विधिवत् पूजा करके ब्रह्मलोक प्राप्त करता है। पृथिवीपर अवस्थित सभी तीर्थोंकी अपेक्षा जिस प्रकार गयापुरी श्रेष्ठ है, उसी प्रकार शिलाके रूपमें विराजमान गदाधर श्रेष्ठ हैं। उनकी मूर्तिका दर्शन करनेसे सम्पूर्ण शिलाका दर्शन हो जाता है; क्योंकि सब कुछ तो भगवान् गदाधर विष्णु ही हैं—
श्राद्धेन पिण्डदानेन अन्नदानेन वारिदः॥
ब्रह्मलोकमवाप्नोति सम्पूज्यादिगदाधरम्।
पृथिव्यां सर्वतीर्थेभ्यो यथा श्रेष्ठा गयापुरी॥
तथा शिलारूपश्च श्रेष्ठश्चैव गदाधरः।
तस्मिन् दृष्टे शिला दृष्टा यतः सर्वं गदाधरः॥
(८६। ३८-४०)
(अध्याय ८६)
चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम
श्रीहरिने कहा— हे रुद्र! अब मैं चौदह मनु और उनके पुत्रोंका वर्णन करूँगा। पूर्वकालमें सर्वप्रथम स्वायम्भुव मनु हुए। उनके अग्नीध्र आदि अनेक पुत्र थे। मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु तथा वसिष्ठ—ये इस मन्वन्तरके सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें जय, अमित, शुक्र एवं याम नामक (देवताओंके) बारह गण थे, जिनमें चार सोमपायी थे। इसीमें
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विश्वभुक् और वामदेव इन्द्रपदसे प्रसिद्ध हुए। वाष्कलि नामक दैत्य उनका शत्रु था, वह भगवान् विष्णुके द्वारा चक्रसे मारा गया।
तदनन्तर स्वारोचिष मनुका प्रादुर्भाव हुआ। उनके चैत्रक, विनत, कर्णान्त, विद्युत्, रवि, बृहद्गुण और नभ नामसे विख्यात महाबली मण्डलेश्वर एवं पराक्रमशाली पुत्र हुए थे। ऊर्ज, स्तम्ब, प्राण, ऋषभ, निश्चल, दत्तोति और अर्वरीवान्—ये सात ऋषि सप्तर्षिरूपमें प्रसिद्ध हुए। इस मन्वन्तरमें द्वादश तुषित और पारावतदेवगण हुए। विपश्चित् नामक इन्द्र थे। उनका शत्रु पुरुकुत्सर नामक दैत्य था। मधुसूदन भगवान् विष्णुने हाथीका रूप धारण करके उसे मारा था।
हे रुद्र! स्वारोचिष मनुके पश्चात् औत्तम मनु हुए। इस मनुके अज, परशु, विनीत, सुकेतु, सुमित्र, सुबल, शुचि, देव, देवावृध, महोत्साह और अजित नामक पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें रथौजा, ऊर्ध्वबाहु, शरण, अनघ, मुनि, सुतप और शंकु—ये सप्तर्षि हुए। वशवर्ति, स्वधाम, शिव, सत्य तथा प्रतर्दन नामके पाँच देवगण हुए। इन सभी देवगणोंके प्रत्येक गणमें बारह देवता थे। स्वशान्ति नामक इन्द्र हुए, जिनका शत्रु प्रलम्बासुर दैत्य था। भगवान् विष्णुने मत्स्यावतार धारण करके उस दैत्यका वध किया।
उस मनुके बाद तामस मनु हुए। उनके जानुजङ्घ, निर्भय, नवख्याति, नय, विप्रभृत्य, विविक्षिप, दृढेषुधि, प्रस्तलाक्ष, कृतबन्धु, कृत, ज्योतिर्धाम, पृथु, काव्य, चैत्र, चेताग्नि और हेमक नामक पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें सुरागा तथा सुधी आदि सात ऋषि कहे गये हैं। इसमें हरि आदि देवताओंके चार गण थे, प्रत्येकमें पचीस देवता हुए। उसी गणमें शिवि इन्द्र हुए। उनका शत्रु भीमरथ नामक असुर हुआ। भगवान् विष्णुने कूर्मावतार लेकर उसका वध किया।
तदनन्तर रैवत मनुका आविर्भाव हुआ। उनके महाप्राण, साधक, वनबन्धु (वलबन्धु), निरमित्र, प्रत्यङ्ग, परहा, शुचि, दृढ़व्रत और केतुशृंग नामक ऋषि कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें वेदश्री, वेदबाहु, ऊर्ध्वबाहु, हिरण्यरोम, पर्जन्य, सत्यनेत्र और स्वधाम—ये सात ऋषि हुए। इस मन्वन्तरमें अभूतरजस्, अश्वमेधस्, वैकुण्ठ तथा अमृत नामक चार देवगण हुए, जिनमें चौदह देव हुए। विभु नामक इन्द्र हुए। उनका शत्रु शान्त नामक दैत्य था। भगवान् विष्णुने हंसरूप धारण करके उसका विनाश किया।
इसके बाद चाक्षुष मनुका प्रादुर्भाव हुआ। इनके ऊरु, पूरु, महाबल, शतद्युम्न, तपस्वी, सत्यबाहु, कृति, अग्निष्णु, अतिरात्र, सुद्युम्न तथा नर नामक पुत्र हुए। हविष्मान्, उत्तम, स्वधामा, विरज, अभिमान, सहिष्णु तथा मधुश्री नामक—ये सात ऋषि हुए। आर्य, प्रभूत, भव्य, लेख और पृथुक नामवाले पाँच गणोंमें आठ-आठ देवता कहे गये हैं। इस मन्वन्तरके इन्द्र मनोजव थे, उनका शत्रु महान् भुजाओंवाला महाबली महाकाल कहा गया है। जगदाधार भगवान् विष्णुने अश्वरूप धारण करके उसका वध किया था।
तत्पश्चात् वैवस्वत मनु हुए। उनके इक्ष्वाकु, नाभाग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, पांसु, नभ, नेदिष्ठ, करूष, पृषध्र और सुद्युम्न नामक विष्णुपरायण पुत्र हुए। इस मन्वन्तरमें अत्रि, वसिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, गौतम, भरद्वाज तथा विश्वामित्र नामक सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गये हैं। इसमें उनचास मरुद्गण, द्वादश आदित्य, एकादश रुद्र, साध्यगण आठ वसु, अश्विनीकुमारद्वय, दस विश्वेदेव, दस आंगिरसदेव तथा नौ देवगण कहे गये हैं। इस मनुके समयमें तेजस्वी नामक इन्द्र हैं। उनका शत्रु हिरण्याक्ष माना गया है। भगवान् विष्णुने वराह