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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

५२-पद्मरागके विविध लक्षण एवं उसकी परीक्षा-विधि

११२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

मधुर शब्दोंका प्रयोग करके वह दूसरोंको सुख प्रदान करती है, वही स्त्री श्रेष्ठ होती है। स्त्रियोंकी नासिका और नासिका-छिद्र समान होना मनोहर और मङ्गलदायी होता है।

स्त्रियोंके नीलकमलके समान नेत्र अच्छे होते हैं। बालचन्द्रके सदृश भौंहोंका होना शुभ है, किंतु उनका मोटा होना अच्छा नहीं है। उनका मस्तक अर्द्धचन्द्रके समान सुन्दर, समतल तथा रोमविहीन होना शुभ है।

सुन्दर, समान, मांसल एवं कोमल कान श्रेष्ठ होते हैं। स्त्रियोंके चिकने, नीलवर्णवाले, मृदु और घुँघराले केश प्रशस्त माने गये हैं। उनका सम आकारवाला सिर शुभ होता है। चरणतल अथवा करतलमें अश्व, हस्ति, श्री, वृक्ष, यूप, बाण, यव, तोमर, ध्वज, चामर, माला, पर्वत, कुण्डल, वेदी, शङ्ख, छत्र, पद्म, स्वस्तिक, रथ तथा अङ्कुश आदि चिह्नवाली स्त्रियाँ राजवल्लभा होती हैं।

स्त्रियोंके मांसल मणिबन्धवाले तथा कमलदलके समान हाथोंको शुभ माना जाता है। स्त्रियोंके करतलोंका न तो अधिक निम्न और न अधिक उन्नत होना अच्छा होता है। शुभ रेखाओंसे व्याप्त करतलवाली स्त्रियाँ आजीवन सधवा रहकर विभिन्न प्रकारके सुखोंका उपभोग करती हैं। हाथमें जो रेखा मणिबन्धसे निकलकर मध्यमा अँगुलीतक जाती है, वह ऊर्ध्वरेखा कही जाती है। ऐसी रेखा यदि स्त्री या पुरुषके करतल अथवा चरणतलमें अवस्थित रहती है तो वे स्त्री या पुरुष राज्य अथवा अन्य प्रकारके सुखोंका उपभोग करते हैं।

कनिष्ठिका अँगुलीके मूलसे निकलकर तर्जनी और मध्यमा अँगुलियोंके मध्यभागतक रेखाके पहुँचनेपर स्त्री या पुरुषकी आयु सौ वर्षकी होती है। यदि इन अँगुलियोंके बीचतक आनेवाली रेखाका परिमाण उसकी अपेक्षा कम हो तो उसी अनुपातमें मनुष्यकी आयु भी कम होती है।

अङ्गुष्ठमूलक रेखाओंके रहनेपर स्त्री या पुरुष बहुत-से पुत्रों या कन्याओंवाले होते हैं। स्थान-स्थानपर आयुरेखाके छिन्न-भिन्न होनेसे मनुष्यकी आयु अल्प हो जाती है। यदि वह रेखा दीर्घ एवं अविच्छिन्न हो तो उस पुरुष अथवा स्त्रीको दीर्घायु माना जाता है। स्त्रियोंके विषयमें कहे गये ये सभी लक्षण शुभ हैं। इनके विपरीत लक्षणोंके होनेपर उन्हें अशुभ मानना चाहिये। (अध्याय ६५)


चक्राङ्कित शालग्रामशिलाओंके विविध नाम, तीर्थमाहात्म्य तथा साठ संवत्सरोंके नाम

**श्रीहरिने कहा—**हे शिव! चक्राङ्कित शालग्राम-शिलाकी पूजा सब प्रकारके कल्याण-मङ्गल प्रदान करती है।

प्रथम शालग्राम-शिलाका नाम सुदर्शन है। (इसमें एक चक्रका चिह्न अङ्कित होता है।) दूसरी शिलाका नाम लक्ष्मीनारायण है। (इसमें दो चक्रोंके चिह्न होते हैं।) तीन चक्रोंवाली शिलाको अच्युत तथा चार चक्रोंवाली शिलाको चतुर्भुज कहा जाता है। इस प्रकार चक्रसमन्वित अन्य शालग्राम-शिलाओंको क्रमशः—वासुदेव, प्रद्युम्न, संकर्षण तथा पुरुषोत्तमके नामसे अभिहित किया गया है। नौ चक्रोंवाली शिलाको नवव्यूह और दस चक्रोंवाली शिलाको दशात्मक कहते हैं। एकादश चक्रोंसे युक्त शिलाको अनिरुद्ध एवं द्वादश चक्रोंसे समन्वित शिलाका नाम द्वादशात्मक है। उसके ऊपर चक्रोंकी चाहे जितनी संख्या हो, उनसे लक्षित शिलामूर्तिका

काण्ड ] स्वरोदय-विज्ञान ११३


नाम भगवान् अनन्त कहा गया है। जो शिलामूर्ति सबसे सुन्दर हो, उसका पूजन करना चाहिये, ऐसी सुदर्शन मूर्तियाँ पूजित होनेपर सभी कामनाओंको पूर्ण करती हैं।

जहाँ शालग्राम और द्वारका-शिला रहती हैं और इन दोनों शिलाओंका जहाँ संगम है, वहाँ मुक्ति रहती है, इसमें संशय नहीं है—

शालग्रामशिला यत्र देवो द्वारवतीभवः।
उभयोः संगमो यत्र तत्र मुक्तिर्न संशयः॥

<div align="right">(६६। ५)</div>

हे शंकर! शालग्राम, द्वारका, नैमिष, पुष्कर, गया, वाराणसी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, सूकरक्षेत्र, गङ्गा, नर्मदा, चन्द्रभागा, सरस्वती, पुरुषोत्तमक्षेत्र तथा महाकालका अधिष्ठान उज्जयिनी—ये सभी तीर्थ सब प्रकारके पापोंका विनाश करनेवाले एवं भुक्ति-मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं।*

प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, विषु, चित्रभानु, स्वभानु, तारण, पार्थिव, व्यय, सर्वजित्, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नन्दन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्ब, विलम्ब, विकार, शर्वरी, प्लव, शुभकृत्, शोभन, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्लवंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत्, परिधावी, प्रमादी, आनन्द, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभि, रुधिरोद्गारी, रक्ताक्ष, क्रोधन एवं अक्षय—ये साठ संवत्सर अपने नामके अनुसार शुभ और अशुभ फल प्रदान करनेवाले हैं। (अध्याय ६६)


स्वरोदय-विज्ञान

स्वरके उदयसे कार्योंके शुभ और अशुभका ज्ञान होता है। शरीरमें बहुत प्रकारकी नाड़ियोंका विस्तार है। नाभि-प्रदेशके नीचे जो कन्दस्थान अर्थात् मूलाधार है, वहींसे उन नाड़ियोंका अङ्कुरण होकर सम्पूर्ण शरीरमें विस्तार होता है। बहत्तर हजार नाडियाँ नाभिके मध्यमें चक्राकार अवस्थित रहती हैं। उन नाड़ियोंमें वामा, दक्षिणा और मध्यमा नामक तीन श्रेष्ठ नाडियाँ हैं। (उन्हींको क्रमशः—इडा, पिंगला और सुषुम्णा कहा जाता है।) इनमें वामा सोमात्मिका, दक्षिणा सूर्यके समान तथा मध्यमा नाडी अग्निके समान फलदायिनी एवं कालरूपिणी है।

वामा नाडी अमृतरूपा है, वह जगत्को आप्यायित करती रहती है। दक्षिणा नाडी अपने रौद्रगुणसे सदैव जगत्का शोषण करती रहती है। जब शरीरमें इन दोनोंका एक साथ प्रवाह होता है, उस समय समस्त कार्योंका विनाश करनेवाली मृत्यु आ पहुँचती है।

यात्रादिके लिये प्रस्थानकालमें वामा तथा प्रवेशके अवसरपर दक्षिणा नाडीप्रवाहको शुभ माना गया है। इडा अर्थात् वामाके श्वास-प्रवाह-कालमें ऐसा सौम्य शुभकारी कार्य करना चाहिये, जो चन्द्रके समान जगत्के लिये भी शुभकारी हो तथा पिंगला अर्थात् दक्षिणा नाडीमें प्राणवायुके प्रवाहित होनेके समय सूर्यके समान तेजस्वी क्रूर कार्य करना चाहिये। यात्रामें, सभी कार्योंमें तथा विषको दूर करनेमें इडा नाडीका चलना अच्छा होता है। भोजन, मैथुन, युद्धारम्भमें, पिंगला नाडी सिद्धिदायक


* शालग्रामो द्वारका च नैमिषं पुष्करं गया। वाराणसी प्रयागश्च कुरुक्षेत्रं च सूकरम्॥
गङ्गा च नर्मदा चैव चन्द्रभागा सरस्वती। पुरुषोत्तमो महाकालस्तीर्थान्येतानि शङ्कर॥
सर्वपापहराण्येव भुक्तिमुक्तिप्रदानि वै।

<div align="right">॥ (६६। ६–८)</div>