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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२४९- तीर्थमरण एवं अनशनव्रतका माहात्म्य, आतुरावस्थाके दानका फल, धनकी एकमात्र गति दान तथा दानकी महिमा

प्रेतकल्प ] इष्टापूर्तकर्मकी महिमा तथा और्ध्वदैहिक कृत्य ५६३


शय्यादानसे प्रेतको मुक्ति मिलती है। यदि प्रेतका कोई सगोत्री न हो तो उसके अन्त्येष्टि कार्यको किसी औरको करना चाहिये अथवा उसकी भार्या करे या किसी ऐसे पुरुषको करना चाहिये, जो मृत व्यक्तिसे तुष्ट अर्थात् उसके सद्व्यवहारसे उपकृत हो। पहले दिन विधिपूर्वक श्राद्धयोग्य जिस अन्नादिसे पिण्डदान दिया जाता है, उसी अन्नादिसे सभी श्राद्ध करने चाहिये।* दशाह-श्राद्धका कर्म मन्त्रोंका प्रयोग बिना किये ही नाम-गोत्रोच्चारसे हो जाता है। जिन वस्त्रोंको धारण करके संस्कर्ता श्राद्धकर्म करता है, अशौचका दिन बीतनेके बाद उन्हें त्याग करके ही घरमें प्रविष्ट होना चाहिये। पहले दिन जो और्ध्वदैहिक कर्म आरम्भ करे, उसीको दस दिनतक समस्त श्राद्धकृत्य सम्पन्न करना चाहिये। वह क्रिया करनेवाला चाहे सगोत्री हो या दूसरे गोत्रसे सम्बन्धित हो, स्त्री हो अथवा पुरुष हो।

जिस प्रकार गर्भमें स्थित प्राणीके शरीरका पूर्ण विकास दस मासमें होता है, उसी प्रकार दस दिनतक दिये गये पिण्डदानसे जीवके उस शरीरकी संरचना होती है जिस शरीरसे उसे यमलोक आदिकी यात्रा करनी है। जबतक घरमें इसका अशौच होता है, तबतक पिण्डोदक-क्रिया करनी चाहिये। यह विधि ब्राह्मणादि चारों वर्णोंके लिये मानी गयी है। पुत्रके अभावमें जिनके लिये अशौच तीन रातोंका ही माना जाता है, वे पहले दिन तीन, दूसरे दिन चार और तीसरे दिन तीन पिण्डदान करें। प्रेतके लिये पृथक्-पृथक् मिट्टीके पात्रमें दूध तथा जल और चौथे दिन उसे एकोद्दिष्ट-श्राद्ध करना चाहिये।

हे अण्डज! पहले दिन जो पिण्डदान दिया जाता है, उससे जीवकी मूर्द्धाका निर्माण होता है। दूसरे दिनके पिण्डदानसे आँख, कान और नाककी रचना होती है। तीसरे दिनके पिण्डदानद्वारा दोनों गण्डस्थल, मुख तथा ग्रीवाभाग बनकर तैयार होता है। उसी प्रकार चौथे दिन उसके हृदय, कुक्षिप्रदेश एवं उदरभाग, पाँचवें दिन कटिप्रदेश, पीठ और गुदाका आविर्भाव होता है। तत्पश्चात् छठे दिन उसके दोनों ऊरु, सातवें दिन गुल्फ, आठवें दिन जंघा, नौवें दिन पैर तथा दसवें दिन पिण्डदान देनेसे प्रबल क्षुधाकी उत्पत्ति होती है। एकादशाहमें जो पिण्डदान होता है, उसको पायस आदि मधुर अन्नसहित प्रदान करें। निमन्त्रित ब्राह्मणके दोनों पैर धोकर तथा उन्हें अर्घ्य, धूप, दीपादिसे पूजकर और सिद्धान्न, कृशर, अपूप एवं दूध आदिसे परिपूर्ण भोजन कराकर संतुष्ट किया जाय। द्वादश मासिक श्राद्ध तथा ऊनमासिक, त्रैपाक्षिक, ऊनषाण्मासिक तथा ऊनाब्दिक—ये षोडश श्राद्ध कहे जाते हैं। (ग्यारहवें दिन इन श्राद्धोंको करनेकी विधि है।) प्राणीकी जो मृत्यु-तिथि हो, उसी तिथिपर प्रतिमास श्राद्ध करना चाहिये। प्रथम मासिक श्राद्ध मृताहके दिन न करके एकादशाहके दिन करना चाहिये। जिस तिथिको मनुष्य मरता है, वही तिथि (अन्य) मासिक श्राद्धके लिये प्रशस्त होती है। ऊनमासिक, ऊनषाण्मासिक और ऊनाब्दिक तथा त्रैपाक्षिक—इन श्राद्धोंके लिये मृत्यु-तिथिका विचार नहीं करना चाहिये। उदाहरणार्थ—पूर्णिमा तिथिमें जो व्यक्ति मरता है, उसके लिये अगली चतुर्थी तिथिको ऊनमासिक श्राद्ध करना चाहिये। जिसकी मृत्यु चतुर्थी तिथिको होती है, उसके लिये ऊनमासिक श्राद्ध नवमीको होना चाहिये और जो मनुष्य नवमी तिथिको मरता है, उसके लिये चतुर्दशी ऊनमासिक श्राद्धकी तिथि है। अतः अन्त्येष्टि-कर्मकुशल विद्वान्‌को यह जान लेना चाहिये कि ये सभी तिथियाँ यथाविहित मृत्यु-तिथिके अनुसार रिक्ता ही होंगी।


* प्रथमेऽहनि यः पिण्डो दीयते विधिपूर्वकम्। अन्नाद्येन च तेनैव सर्वश्राद्धानि कारयेत्॥ (३४। ४१)

५६४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

एकादशाहको जो श्राद्ध किया जाता है, उसका नाम नवक है। इस दिन चौराहेपर प्रेतके निमित्त भोजन रख करके श्राद्धकर्ता पुनः स्नान करे। एकादशाहसे वर्षपर्यन्त श्रेष्ठ ब्राह्मणको प्रतिदिन सान्नोदक घटका दान करना चाहिये। मानव-शरीरमें जो अस्थियोंका एक समूह विद्यमान है, जिसमें उनकी कुल संख्या तीन सौ साठ है। जलपूर्ण घटका दान देनेसे उन अस्थियोंको पुष्टि मिलती है। इसलिये जो घट-दान दिया जाता है, उससे प्रेतको प्रसन्नता प्राप्त होती है। जंगल या किसी विषम परिस्थितिमें जीवकी मृत्यु जिस दिन होती है, उस दिनसे घरमें सूतक होता है और उसीके अनुसार दशाहादि क्रियाएँ करनी चाहिये, दाह-संस्कार जब कभी भी हो।

तिलपात्र, अन्नादिक भोज्यपदार्थ, गन्ध, धूपादि एवं पूजन-सामग्रीका जो दान है, उसको एकादशाहमें देना चाहिये। उससे ब्राह्मणकी शुद्धि होती है। मृत्यु और जन्ममें घरमें होनेवाले सूतकसे क्रमशः— क्षत्रिय बारहवें दिन, वैश्य पंद्रहवें दिन तथा शूद्र एक मासमें शुद्ध होता है। मृत्युके तीन मास होनेपर त्रिरात्र, छः मास होनेपर पक्षिणी, संवत्सर पूर्ण होनेसे पूर्व अहोरात्र तथा संवत्सर पूर्ण होनेपर जलदानकी क्रिया करनेसे शुद्धि होती है। इसीके अनुसार सभी वर्णोंकी शुद्धि होती है। कलियुगमें सूतककी समाप्ति दशाहमें ही है। एकादशाहसे* लेकर सांवत्सरिक आदि सभी श्राद्धोंके अवसरपर विश्वेदेवोंकी पूजा करके अन्य पिण्डदान करना चाहिये। जैसे सूर्यकी किरणें अपने तेजसे सभी तारागणोंको ढक देती हैं, उसी प्रकार प्रेतत्वपर इन क्रियाओंका आच्छादन होनेसे भविष्यमें पुनः प्रेतत्व नहीं मिलता है। अतः सपिण्डनके अनन्तर कहीं 'प्रेत' शब्द प्रयोग नहीं होता।

श्रेष्ठ ब्राह्मण सर्वदा शय्यादानकी प्रशंसा करते हैं। यह जीवन अनित्य है, उसे मृत्युके बाद कौन प्रदान करेगा? जबतक यह जीवन है, तबतक अपने बन्धु-बान्धव हैं और अपने पिता हैं। मृत्यु हो जानेपर यह मर गया है, ऐसा जान करके क्षणभरमें ही वे अपने हृदयसे स्नेहको दूर कर देते हैं। इसलिये आत्मा ही अपना बन्धु है, ऐसा बारम्बार विचार करके जीते हुए ही अपने हितके कार्य कर लेना चाहिये। इस संसारमें मरे हुए प्राणीका कौन पुत्र है, जो बिस्तरके सहित शय्याका दान ब्राह्मणको दे सकता है? ऐसा सब कुछ जानते हुए मनुष्यको अपने जीवनकालमें ही अपने हाथोंसे शय्यादानादि सभी दान कर देना चाहिये। अतः अच्छी एवं मजबूत लकड़ीकी सुन्दर शय्या बनवा करके उसे हाथीके दाँत तथा सोनेकी पट्टियोंसे अलंकृत करके उस शय्याके ऊपर लक्ष्मीके सहित विष्णुकी स्वर्णमयी प्रतिमाको स्थापित करे। उसके बाद उसी शय्याके संनिकट घीसे परिपूर्ण कलश रखे। हे गरुड ! वह कलश अपने सुखके लिये ही होता है। विद्वानोंने तो उसको निद्राकलश कहा है। ताम्बूल, केशर, कुंकुम, कपूर, अगुरु, चन्दन, दीपक, पादुका, छत्र, चामर, आसन, पात्र तथा यथाशक्ति ससधान्य उसी शय्याके बगलमें स्थापित करे। इन वस्तुओंके अतिरिक्त शयन करनेवालेके लिये जो अन्य उपयोगी वस्तु हो, उसको भी वहाँ रखे। सोने-चाँदी या अन्य धातुसे बनी झारी, करक (करवा), दर्पण और पञ्चरंगी चाँदनीसे उस शय्याको संयुक्त करके उसे ब्राह्मणको दान दे दे।

कल्याणके लिये यजमान स्वर्गमें सुख प्रदान करनेवाली शय्याकी विधिवत् रचना करके सपत्नीक द्विज-दम्पतिकी पूजा करके उसका दान करे। कर्णफूल, कण्ठहार, अंगूठी, भुजबंद तथा चित्रकादि


* एकादशाह-श्राद्धके अनन्तर वर्षपर्यन्त किया जानेवाला एकोद्दिष्ट-श्राद्ध तथा प्रति सांवत्सरिक एकोद्दिष्ट-श्राद्ध विश्वेदेवपूजनपूर्वक करनेकी परम्परा नहीं है।