गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२३७- प्रेतयोनि दिलानेवाले निन्दित कर्म, पञ्चप्रेतोपाख्यान तथा प्रेतत्वप्राप्ति न करानेवाले श्रेष्ठ कर्म
प्रेतकल्प ] समस्त शुभाशुभ कर्मोंके साक्षी ब्रह्माके पुत्र श्रवणदेवोंका स्वरूप ५२१
समस्त शुभाशुभ कर्मोंके साक्षी ब्रह्माके पुत्र श्रवणदेवोंका स्वरूप
श्रीगरुड़ने कहा— हे देव! यह एक संदेह मेरे हृदयको बाधित कर रहा है कि श्रवण किसके पुत्र हैं, यमलोकमें वे किस प्रकारसे रहते हैं? हे प्रभो! किस शक्तिके प्रभावसे वे मानव-कर्मको जान लेते हैं? वे कैसे किसी बातको सुन लेते हैं? उनको यह ज्ञान किससे प्राप्त हुआ है? हे देवेश्वर! उन्हें भोजन कहाँसे प्राप्त होता है? आप प्रसन्न होकर मेरे इस समस्त संदेहको नष्ट करें। पक्षिराज गरुड़के इस कथनको सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—
श्रीकृष्णने कहा— हे तार्क्ष्य! सभी प्राणियोंको सुख देनेवाले मेरे इस वचनको तुम सुनो। श्रवणसे सम्बन्धित उन समस्त बातोंको तुम्हें मैं बताऊँगा। प्राचीनकालमें जब समस्त स्थावर-जंगमात्मक सृष्टि एकाकार हो गयी थी और मैं समस्त सृष्टिको आत्मलीन करके क्षीरसागरमें सो रहा था। उस समय मेरे नाभिकमलपर स्थित ब्रह्माने बहुत वर्षोंतक तपस्या की। उन्होंने एकाकार उस सृष्टिको चार प्रकारके प्राणियोंमें विभक्त किया। तदनन्तर ब्रह्मासे ही बनी सृष्टिके पालनका भार विष्णुने स्वीकार किया। तत्पश्चात् ब्रह्माके द्वारा संहारमूर्ति रुद्रका निर्माण हुआ। उसके बाद समस्त चराचर जगत्में प्रवाहित होनेवाले वायु, अत्यन्त तेजस्वी सूर्य तथा चित्रगुप्तके साथ धर्मराजकी सृष्टि हुई।
इन सभीकी रचना करके ब्रह्मा पुनः तपस्यामें निमग्न हो गये। विष्णुके नाभिपङ्कजमें तपस्या करते हुए उनको बहुत वर्ष बीत गये। वहींपर लोकसृष्टिमें लगे हुए ब्रह्माने कहा कि जिन लोगोंकी उत्पत्ति पहले हुई है, उन सभीको अपनी योग्यताके अनुसार कर्ममें लग जाना चाहिये। अतः रुद्र, विष्णु तथा धर्म पृथ्वीके शासन-कार्यमें लग गये, किंतु उन लोगोंने कहा कि हम सभी लोगोंको लोक-व्यवहारका कुछ भी ज्ञान नहीं है। इस सम्बन्धमें आप ही कुछ बतायें। इस विषयमें चिन्तित होकर सभी देवताओंने उस समय परस्पर विचार-विमर्श किया। तत्पश्चात् देवताओंने हाथमें पत्र-पुष्प लेकर ब्रह्म-मन्त्रका ध्यान किया। उसके बाद देवताओंकी प्रेरणासे ब्रह्माने अत्यन्त तेजस्वी एवं बड़े-बड़े नेत्रोंवाले बारह पुत्रोंको जन्म दिया। इस संसारमें जो कोई जैसा भी शुभ या अशुभ बोलता है, उसे वे अत्यन्त शीघ्र ब्रह्माके कानोंतक पहुँचाते हैं। हे पक्षिन्! दूरसे ही सुनने एवं दूरसे ही देख लेनेका विशेष ज्ञान उन्हें प्राप्त है। चूँकि वे सब कुछ सुन लेते हैं, उसीके कारण उन्हें 'श्रवण' कहा गया है। वे आकाशमें रहकर प्राणियोंकी जो भी चेष्टा होती है, उसको जानकर धर्मराजके सामने मृत्युकालके अवसरपर कहते हैं। उनके द्वारा प्राणियोंके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारोंकी विवेचना उस समय धर्मराजसे की जाती है। हे वैनतेय! संसारमें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—ये चार मार्ग हैं। जो उत्तम प्रकृतिवाले प्राणी हैं, वे धर्ममार्गसे चलते हैं। जो अर्थ अर्थात् धन-धान्यका दान करनेवाले प्राणी हैं, वे विमानसे परलोक जाते हैं। जो प्राणी अभिलषित याचककी इच्छाको संतुष्ट करनेवाले हैं। वे अश्वोंपर सवार होकर प्रस्थान करते हैं। जो प्राणी मोक्षकी आकाङ्क्षा रखते हैं, वे हंसयुक्त विमानसे परलोकको जाते हैं। इनके अतिरिक्त प्राणी जो धर्मादि पुरुषार्थचतुष्टयसे हीन है, वह पैदल ही कांटों तथा पत्थरोंके बीचसे कष्ट झेलता हुआ 'असिपत्रवन'में जाता है।
हे पक्षिराज! इस मनुष्यलोकमें जो कोई भी पक्वान्न, वर्धनी और जलपात्रके द्वारा मेरे सहित
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इन श्रवणदेवोंकी पूजा करता है, उसको मैं वह प्रदान करता हूँ, जिसकी प्राप्ति देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। भक्तिपूर्वक शुभ एवं पवित्र ग्यारह ब्राह्मण तथा बारहवें सपत्नीक ब्राह्मणको भोजन कराकर मेरी प्रसन्नताके लिये पूजा करनी चाहिये। ऐसा मनुष्य सभी देवताओंसे पूजित होकर सुख प्राप्त करता है। उनकी पूजासे मैं और चित्रगुप्तके सहित धर्मराज प्रसन्न होते हैं। उन्हींकी संतुष्टिसे धर्मपरायण लोग मेरे विष्णुलोकको प्राप्त करते हैं।
हे खगेश्वर ! जो प्राणी इन श्रवणदेवोंके माहात्म्य, उत्पत्ति और शुभ चेष्टाओंको सुनता है, वह पापसे संलिप्त नहीं होता है। वह इस लोकमें सुख भोगकर स्वर्गमें महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त करता है।
(अध्याय १७)
विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना, पददानका माहात्म्य, जीवको अवान्तर-देहकी प्राप्तिका क्रम
श्रीकृष्णने कहा— हे पक्षिन् ! इन श्रवणदेवोंके वचनोंको सुनकर चित्रगुप्त पुनः क्षणभर स्वयं ध्यान करके मनुष्य जो कुछ भी दिन-रात पाप-पुण्य करते हैं, उन्हें धर्मराजसे निवेदन करते हैं।
हे तार्क्ष्य ! मनुष्य वाणी, शरीर और मनसे जो भी शुभाशुभ कर्म करता है, उन सबका वह भोग करता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें प्रेतमार्गका निर्णय सुना दिया। मृत्युके पश्चात् प्रेत कहाँ रुकते हैं, उन सभी स्थानोंका भी वर्णन तुमसे कर दिया। जो मनुष्य यह सब समझकर अन्नदान तथा दीपदान करता है, वह उस महामार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है।
जो दीपदान करते हैं, वे कुत्तोंसे परिव्याप्त लक्ष्यहीन मार्गमें पूर्ण प्रकाशके साथ गमन करते हैं। कार्तिकमासमें कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको रात्रिमें किया गया दीपदान प्राणियोंके लिये सुखकारी होता है।
अब मैं संक्षेपमें तुम्हें प्राणियोंके यममार्गके निस्तारका उपाय बताऊँगा।
हे गरुड ! वृषोत्सर्गके पुण्यसे मनुष्य पितृलोकको जाता है, एकादशाहमें पिण्डदानसे देहशुद्धि होती है। जलसे परिपूर्ण घड़ेका दान करनेसे यमदूत संतुष्ट होते हैं। उस दिन शय्यादान करनेसे मनुष्य विमानपर चढ़कर स्वर्गलोकको जाता है। विशेषतः द्वादशाहके दिन सभी प्रकारका दान देना चाहिये और तेरह पददानके लिये विहित श्रेष्ठ वस्तुओंको द्वादशाहके दिन अथवा जो जीवित रहते हुए अपने कल्याणके निमित्त दान देता है, वह उसीके सहारे महामार्गमें सुखपूर्वक गमन करता है।
हे खगराज ! उस यममार्गमें सर्वत्र एक-जैसा ही व्यवहार होता है। उत्तम, मध्यम और अधमरूपमें किसी भी प्रकारका वर्गीकरण वहाँ वर्जित है।
प्रेतकल्प ] विविध दानादि कर्मोंका फल प्रेतको प्राप्त होना ५२३
जिसका भाग्य जैसा होता है, उसको उस मार्गमें वैसा ही भोग प्राप्त होता है। प्राणी स्वयं अपने लिये स्वस्थचित्तसे श्रद्धापूर्वक जो कुछ दान देता है, उसको वहाँपर प्राप्त करता है। मरनेपर जो बन्धु-बान्धवोंके द्वारा उसके लिये दिया जाता है, उसका आश्रय ले करके वह सुखी होता है।
गरुडने कहा—हे देवेश! तेरह पददान किसलिये करना चाहिये? यह दान किसे देना चाहिये? यह सब यथोचित रूपसे मुझे बतायें।
श्रीभगवान्ने कहा—हे पक्षिराज! छत्र, पादुका, वस्त्र, मुद्रिका, कमण्डलु, आसन और भोजनपात्र—ये सात प्रकारके पद माने गये हैं। पूर्ववर्णित महापथमें जो महाभयंकर 'रौद्र' नामक आतप (धूप) है, उसके द्वारा मनुष्य जलता है। छत्रका दान देनेसे प्रेतको तृप्ति देनेवाली शीतल छाया प्राप्त होती है। पादुका दान देनेसे मृतप्राणी अश्वारूढ़ होकर घोर असिपत्रवनको निश्चित ही पार कर जाते हैं। मृतप्राणीके उद्देश्यसे ब्राह्मणको आसन और भोजन देकर स्वागत करनेपर प्रेत महापथमें धीरे-धीरे चलता हुआ उस दान दिये गये अन्नको सुखपूर्वक ग्रहण करता है। कमण्डलुका दान देनेसे प्राणी उस यमलोकके महापथमें फैले हुए बहुत धूपवाले, वायुरहित और जलहीन मार्गमें निश्चित ही यथेच्छ जल एवं वायु प्राप्तकर सुखपूर्वक गमन करता है। मृतकके उद्देश्यसे जो व्यक्ति जलपूर्ण कमण्डलुका दान करता है, उसको निश्चित ही हजार पौंसलोंके दानका फल प्राप्त होता है।
उदारतापूर्वक वस्त्रका दान देनेसे प्रेतात्माको महाक्रोधी काले और पीले वर्णवाले अत्यन्त भयंकर यमदूत कष्ट नहीं देते हैं। मुद्रिका दान देनेसे उस महापथमें अस्त्र-शस्त्रसे युक्त दौड़ते हुए यमदूत दिखायी नहीं देते हैं। पात्र, आसन, कच्चा अन्न, भोजन, घृत तथा यज्ञोपवीतके दानसे पददानकी पूर्णता होती है। यममार्गमें जाता हुआ भूख-प्याससे व्याकुल एवं थका हुआ प्रेत भैंसके दूधका दान करनेसे निश्चित ही सुखका अनुभव करता है।
गरुडने कहा—हे विभो! मृत व्यक्तिके उद्देश्यसे जो कुछ भी दान अपने घरमें किया जाता है, वह प्रेततक किसके द्वारा पहुँचाया जाता है?
श्रीभगवान्ने कहा—हे पक्षिन्! सर्वप्रथम वरुण दानको ग्रहण करते हैं, उसके बाद वे उस दानको मेरे हाथमें दे देते हैं। मैं सूर्यदेवके हाथोंमें सौंप देता हूँ और सूर्यदेवसे वह प्रेत उस दानको लेकर सुखका अनुभव करता है*।
बुरे कर्मके प्रभावसे वंशका विनाश हो जाता है और उस कुलके सभी प्राणियोंको नरकमें तबतक रहना पड़ता है, जबतक पापका क्षय नहीं हो जाता है।
इन नरकोंकी संख्या बहुत है। पर इनमेंसे इक्कीस नरक मुख्यरूपसे उल्लेख्य हैं—तामिस्र, लौहशंकु, महारौरव, शाल्मली, रौरव, कुड़वल, कालसूत्र, पूतिमृत्तिका, संघात, लोहतोद, सविष, सम्प्रतापन, महानरक, कालोल, सजीवन, महापथ, अवीचि, अन्धतामिस्र, कुम्भीपाक, असिपत्रवन और पतन नामवाले हैं। घोर यातना भोगते हुए जिनके बहुत-से वर्ष बीत जाते हैं और यदि संतति नहीं है तो वे यमके दूत बन जाते हैं। यमके द्वारा भेजे गये वे दूत मरे हुए मनुष्यके लिये प्रतिदिन बन्धु-बान्धवोंसे दानस्वरूप प्राप्त अन्न और जलका सेवन करते हैं। मार्गके मध्यमें जब वे भूख-प्याससे व्याकुल हो जाते हैं तो मरे हुए प्राणीका हिस्सा ही लूटकर खा-पी जाते हैं। मासके अन्तमें जो भोजन और पिण्डदान देते हैं, जब उसकी प्राप्ति उन्हें हो जाती है तो वे सभी उसको खाकर संतुष्ट हो जाते
* गृह्णाति वरुणो दानं मम हस्ते प्रयच्छति। अहं च भास्करे देवे भास्करात् सोऽश्नुते सुखम्॥ (१८। २७)
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हैं। इसीसे उन्हें प्रतिदिन वर्षभर तृप्ति मिलती है।
इस प्रकार किये गये पुण्यके प्रभावसे प्रेत 'सौरिपुर'की यात्रा करता है। तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर वह प्रेत, यमराजके भवनके संनिकट स्थित 'बहुभीतिकर' नामक नगरमें पहुँचकर दशगात्रके पिण्डसे निर्मित हस्तमात्र परिमाणके शरीरको छोड़ देता है। जिस प्रकार रामको देखकर परशुरामका तेज उनके शरीरसे निकलकर राममें प्रविष्ट हो गया था, उसी प्रकार कर्मज शरीरका आश्रय लेकर वह पूर्व शरीरका परित्याग कर देता है, अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला वायुरूप वह शरीर शमीपत्रपर चढ़कर आश्रय लेता है। 'जिस प्रकार मनुष्य चलते हुए एक पैर भूमिपर रखकर दूसरे पैरको आगे बढ़ानेके लिये उठाता है, जैसे तृणजलौका (तृण जोंक) एक पाँवपर स्थिर होकर दूसरे पाँवको आगे बढ़ाती है, वैसे ही जीव भी कर्मानुसार एक देहसे दूसरे देहको धारण करता है। जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रका परित्याग कर नवीन वस्त्र धारण कर लेता है, उसी प्रकार जीव अपने पुराने शरीरका त्याग करके नये शरीरको धारण करता है'—
ब्रजंस्तिष्ठन् पदैकेन यथैवैकेन गच्छति।
<p align="right">(१८।४१-४२)<br>(अध्याय १८)</p>
यथा तृणजलौकेव देही कर्मानुगोऽवशः॥
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
जीवका यमपुरीमें प्रवेश, वहाँ शुभाशुभ कर्मोंका फलभोग, कर्मानुसार अन्य देहकी प्राप्ति, मनुष्य-जन्म पाकर धर्माचरण ही मुख्य कर्तव्य
**श्रीभगवान्ने कहा—**वायुरूप होकर भूखसे पीड़ित, कर्मजन्य शरीरका आश्रय लेकर जीव यमके साथ चित्रगुप्तपुरकी ओर जाता है। चित्रगुप्तपुर बीस योजन विस्तृत है। वहाँ रहनेवाले कायस्थ* सभी प्राणियोंके पाप-पुण्यका भली प्रकारसे सर्वेक्षण करते हैं। महादान करनेपर वहाँ गया हुआ व्यक्ति सुखका भोग करता है। चौबीस योजन विस्तृत वैवस्वतपुर है। लौह, लवण, कपास और तिलसे पूर्ण पात्रका दान करनेपर इस दानके फलस्वरूप यमपुरमें निवास करनेवाले दाताके पितर लोग तृप्त होते हैं। वहाँपर धर्मध्वज नामका प्रतीहार सदैव द्वारपर अवस्थित रहता है। सप्तधान्यका दान देनेसे धर्मध्वज प्रसन्न हो जाता है। वहाँ जाकर प्रतीहार प्रेतके शुभाशुभका वर्णन करता है। धर्मराजका
* कायस्थ नामकी एक देवयोनि विशेष है।