गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२१३- ब्रह्मगीतासार
काण्ड ] अच्युतस्तोत्र ४३३
इच्छा रखनेवाला उससे मुक्त हो जाता है। इस स्तोत्रके पाठसे रोगी रोगसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है, निर्धन व्यक्ति धनवान् बन जाता है और विद्यार्थी विद्या, भाग्य तथा कीर्ति प्राप्त करता है। जातिस्मरत्व (पूर्वजन्मके वृत्तान्तकी स्मृति) तथा और जो कुछ चित्तमें इच्छा रखता है, भक्त उसे प्राप्त कर लेता है।
वह प्राणी धन्य है, सब कुछ जाननेवाला है, बुद्धिमान् है, साधु है, सभी सत्कर्मोंका कर्ता है, सत्यवादी है, पवित्र है और दाता है, जो भगवान् पुरुषोत्तमकी स्तुति करता है। इस संसारमें वे प्राणी सम्भाषण करने योग्य नहीं हैं और समस्त धर्मोंसे बहिष्कृत हैं, जिनका कोई भी सत्कार्य भगवान् हरिके उद्देश्यसे सम्पन्न नहीं होता। वह व्यक्ति दुरात्मा है, उसका मन और वचन शुद्ध नहीं है, जिसकी सब कुछ प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णुमें अचल भक्ति नहीं है।
मनुष्य सब सुख प्रदान करनेवाले भगवान् हरिकी विधिवत् पूजा कर जो कुछ भी कामना करता है उसे प्राप्त कर लेता है। श्रद्धापूर्वक आराधना करनेपर पुरुषोत्तमभगवान् सब कुछ प्रदान करते हैं। समस्त मुनि जिन देवका चिन्तन करते हैं, वे ही शुद्ध ब्रह्म परब्रह्म हैं। जो सभीके हृदयमें विराजमान रहते हैं, जो सब कुछ जानते हैं और जो सभी कृत्योंके साक्षी हैं, जो भय-मरण-विहीन हैं, नित्य-आनन्दस्वरूप हैं, ऐसे अज, अमृत, ईश वासुदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। मैं समस्त संसारके स्वामी, सुप्रसन्न, शाश्वत, अति विमल, विशुद्ध, निर्गुण, आत्मस्वरूप और समस्त सुखोंके मूल भगवान् नारायणकी भावपुष्पसे पूजा करता हूँ। मेरे हृदयकमलमें सर्वसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् विष्णु सदा विराजमान रहें—
सकलमुनिभिराद्यश्चिन्त्यते यो हि शुद्धो
निखिलहृदि निविष्टो वेत्ति यः सर्वसाक्षी।
तमजममृतमीशं वासुदेवं नतोऽस्मि
भयमरणविहीनं नित्यमानन्दरूपम्॥
निखिलभुवननाथं शाश्वतं सुप्रसन्नं
त्वतिविमलविशुद्धं निर्गुणं भावपुष्पैः।
सुखमुदितसमस्तं पूजयाम्यात्मभावं
विशतु हृदयपद्मे सर्वसाक्षी चिदात्मा॥
(२३४।६०-६१)
इस प्रकार मैंने आदि-अन्तसे रहित, परात्पर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णुके महा प्रभावका वर्णन किया। इसलिये मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको चाहिये कि वह भलीभाँति परमेश्वरका चिन्तन करे। इस संसारमें कौन ऐसा योगी है जो उन बोधगम्य पुराणपुरुष, सूर्यके समान तेजस्वी, विमल, विशुद्धात्मा, श्रेष्ठ, अद्वितीय विष्णुका चिन्तन करके उनमें तदाकार नहीं हो जाता ? जो मनुष्य इस स्तुतिका सदैव पाठ करता है, वह श्रीविष्णुके समान ही प्रशान्तचित्त तथा पापसे रहित हो जाता है। जो व्यक्ति अर्थ, धर्म, काम और मोक्षरूप पुरुषार्थकी कामना करता है अथवा सम्पूर्ण सौख्य चाहता है, वह सब कुछ छोड़कर सर्वश्रेष्ठ पुराणपुरुष, वरण करने योग्य विष्णुकी शरणमें जाता है, इसीलिये उसका प्रभाव सर्वत्र फैल जाता है और वह विष्णुलोकको चला जाता है।
जो प्राणी विभु, सबके स्वामी, विश्वको धारण करनेवाले, विशुद्धात्मा, समस्त संसारके विनाशके हेतु, विमल, भगवान् वासुदेवकी शरणमें अनासक्त-भावसे जाता है, वह मोक्षपदको प्राप्त करता है—
विभुं प्रभुं विश्वधरं विशुद्ध-
मशेषसंसारविनाशहेतुम् ।
यो वासुदेवं विमलं प्रपन्नः
स मोक्षमाप्नोति विमुक्तसङ्गः॥
(२३४।६६)
(अध्याय २३४)
४३४ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-
ब्रह्मज्ञाननिरूपण तथा षडङ्गयोग
सूतजीने कहा— [हे शौनक!] अब मैं वेदान्त और सांख्यसिद्धान्तके अनुसार ब्रह्मज्ञानका वर्णन करता हूँ।
'मैं ही ज्योतिर्मय परब्रह्मस्वरूप विष्णु हूँ'—ऐसा चिन्तन करते हुए 'सूर्य, हृदयाकाश और वह्निमें एक ही ज्योति तीन रूपमें स्थित है', ऐसा निश्चय करना चाहिये। जैसे गायोंके शरीरमें घृत रहनेपर भी घृत गायको बल प्रदान नहीं करता, परंतु उसी घृतको निकालकर विधिके अनुसार गायोंके निमित्त प्रयोग करनेपर वह घृत महाबलप्रद हो जाता है, वैसे ही विष्णु सभी जीवोंके शरीरमें विद्यमान रहनेपर भी बिना आराधनाके कल्याणकारी नहीं हो सकते। जो योगरूप वृक्षपर चढ़नेके इच्छुक हैं, उनके लिये कर्मज्ञान आवश्यक है, किंतु जो योगरूपी वृक्षपर आरूढ़ हो चुके हैं, उनके लिये त्याग (वैराग्य) एवं ज्ञान ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। जो शब्दादि विषयोंको जाननेकी इच्छा करता है, उसमें राग-द्वेषादि प्रादुर्भूत हो जाते हैं, इसी कारण मनुष्य लोभ-मोह तथा क्रोधके वशीभूत होकर पापाचार करता है।
जिसके हाथ, उपस्थ<sup>१</sup>, उदर और वाक्य—ये चार सुसंयत रहते हैं, वही बुद्धिमानोंके द्वारा विप्र कहा जाता है। जो दूसरेके द्रव्यको ग्रहण नहीं करते, हिंसा नहीं करते, जुएमें अनुरक्त नहीं रहते, वास्तवमें उन्हींके दोनों हाथ सुसंयत रहते हैं। जो दूसरेकी स्त्रीके प्रति कामका भाव नहीं रखता, उसीकी उपस्थेन्द्रिय सुसंयत है। जो लोभरहित होकर परिमित भोजन करते हैं, उन्हींके उदरको संयत कहा जाता है। जो हित-परिमित और सत्य वाक्य बोलता है, उसीकी वाणी संयत कही जाती है। जिसके हाथ आदि संयत रहते हैं, उसके लिये तपस्या या यज्ञादिका कोई प्रयोजन नहीं है अर्थात् तपस्या, यज्ञ आदि तभी सफल होते हैं, जब हाथ, उपस्थ, उदर एवं वाक्य संयत हों।
मन, बुद्धि और इन्द्रियोंका आत्यन्तिक ऐक्य अर्थात् सदा ध्येयतत्त्वमें लगा रहना ध्यान कहलाता है। वह ध्यान दो प्रकारका होता है—सबीज<sup>२</sup> तथा निर्बीज<sup>३</sup>।
चिन्तनकी मूल आधार-शक्ति 'बुद्धि' भौंहोंके मध्यमें रहती है। इसे यदि जीव विषयोंमें लगाये रहता है तो यही जाग्रत्-अवस्था होती है। जब जीवकी इन्द्रियाँ शान्त हों, केवल मन चञ्चल हो और इसी कारण बाहरी एवं भीतरी विषयोंको केवल स्वप्नमें जीव देखता रहे तो यही स्वप्नावस्था है। जब मन हृदयमें स्थित हो तथा तमोगुणसे मोहित होनेके कारण कुछ भी स्मरण न कर सके, तब सुषुप्ति-अवस्था समझनी चाहिये।
जो जितेन्द्रिय होता है उसको जाग्रत्-अवस्था में तन्द्रा, मोह और भ्रम नहीं उत्पन्न होते। वह शब्दादि विषयोंमें आसक्त नहीं होता।
ज्ञानी इन्द्रियों और मनको विषयोंसे खींचकर बुद्धिके द्वारा अहंकारको एवं प्रकृतिके द्वारा बुद्धिको संयत कर और चित्-शक्तिके द्वारा प्रकृतिको भी संयत कर केवल आत्मरूपमें अवस्थित रहता है। इस स्थितिमें ज्ञानी मनसे स्वप्रकाश आत्मा (परमात्मा)-को देख सकता है। आत्मा स्वप्रकाश है, ज्ञेय है, ज्ञाता है और ज्ञानाधिकरण है। चिद्रूप अमृत शुद्ध निष्क्रिय सर्वव्यापी शिवप्रद आत्माको जानकर मनुष्य तुरीय<sup>४</sup>-अवस्था में आ जाता है, इसमें संशय नहीं है।
<sup>१</sup> मूत्रेन्द्रिय।
<sup>२</sup> अविद्या आदि क्लेश ही बीज हैं। इनका अनुभव होते रहनेपर सबीज ध्यान कहा जाता है।
<sup>३</sup> क्लेशरूप बीजका अनुभव न हो तो निर्बीज ध्यान कहा जाता है।
<sup>४</sup> परम शान्त, शिवस्वरूप अद्वैतावस्था।