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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

२०१- भगवद्भक्तिनिरूपण तथा भक्तोंकी महिमा

काण्ड ] भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण ४०७


जो मनुष्य अवरोध उत्पन्न करनेके लिये पशुके दो पैरोंमें बन्धन लगानेका पाप करता है और उस पशुकी मृत्यु जलाशयके समीप, वनमें अथवा घरमें जलनेसे या कण्ठमें रस्सी बाँधने, घण्टी, घुँघरू आदि आभूषणोंके पहनानेसे हो जाती है तो उस मनुष्यको कृच्छ्रपादव्रत करना चाहिये।

गायके शरीरकी हड्डी तोड़नेपर, सींग तोड़नेपर, चमड़ा भेदन करनेपर तथा पूँछ काटनेपर लगे हुए पापका प्रायश्चित्त आधे मासतक 'यावक पान' करनेसे होता है। हाथी, घोड़े और शस्त्र आदिसे गौकी ऐसी क्षति होनेपर कृच्छ्रव्रत करना चाहिये। यदि अनजानमें ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मल, मूत्र, मदिरासे संस्पृष्ट पदार्थका भोजन कर लें तो उन्हें पुनः 'द्विजातीय संस्कार' करना चाहिये। पुनः द्विजातीय संस्कारके समय केशमुण्डन, मेखलाधारण, दण्डग्रहण और भिक्षाचरणादिकी आवश्यकता नहीं है।

अन्त्यजके पात्रमें रखा हुआ कच्चा मांस, घृत, मधु तथा यथासमय उत्पन्न स्निग्ध पदार्थ तैल आदि उसके पात्रसे निकाले जानेके बाद शुद्ध हो जाते हैं।

क्रमशः प्रथम दिन एकभक्तव्रत<sup>१</sup>, दूसरे दिन नक्तव्रत<sup>२</sup>, तीसरे दिन अयाचितव्रत<sup>३</sup> करते हुए जो उपवास किया जाता है, वह पादकृच्छ्रव्रत है। कृच्छ्रार्धका द्विगुण प्राजापत्यव्रत कहा जाता है। यह सभी पापोंका विनाशक है। सात उपवास करनेसे कृच्छ्रव्रत पूर्ण होता है। इसीको महासान्तपनव्रतके नामसे स्वीकार किया गया है। तीन दिन गरम जलमात्र, उसके बाद तीन दिन गरम दूधमात्र और उसके बाद तीन दिन गरम घृतमात्र पान करते हुए जो व्रत किया जाता है, वह तप्तकृच्छ्रव्रत है। यह समस्त पापोंको विनष्ट करनेवाला है। बारह दिनोंतक जलमात्र ग्रहण कर उपवास करनेसे एक पराकव्रत सम्पन्न होता है। यह व्रत सभी पापोंका विनाशक है। जिस व्रतमें शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको एक ग्रासमात्र भोजन करके क्रमशः पूर्णिमापर्यन्त प्रत्येक तिथिको एक-एक ग्रास भोजनकी वृद्धि की जाती है और उसके बाद कृष्णपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे प्रतिदिन अमावास्या तिथितक एक-एक ग्रास भोजनकी मात्रा कम की जाती है, उसे चान्द्रायणव्रत कहते हैं।

सोनेके समान वर्णवाली गायका दूध, श्वेतवर्णवाली गायका गोबर, ताम्रवर्णवाली गायका मूत्र, नीलवर्णवाली गायका घृत तथा कृष्णवर्णवाली गायका दही प्रशस्त है। इन चारोंके साथ कुशोदक मिलाकर जो पदार्थ तैयार किया जाता है, उसको पञ्चगव्य कहते हैं। इस मिश्रणमें गोमूत्रकी मात्रा आठ माशा, गोबरकी मात्रा चार माशा, दूधकी मात्रा बारह माशा, दहीकी मात्रा दस माशा और घृतकी मात्रा पाँच माशा कही गयी है। इस विधिसे तैयार किया गया पञ्चगव्य सभी मलोंका विनाशक होता है।

(अध्याय २२२)


भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण, पुराणों तथा उपपुराणों और अठारह विद्याओंका परिगणन, चारों युगोंके धर्मोंका कथन एवं कलियुगमें नामसंकीर्तनका माहात्म्य

**श्रीब्रह्माजीने कहा—**हे व्यास! मुनियोंद्वारा भक्तिपूर्वक आचरण किये गये उन धर्मोंको मैंने कहा, जिनसे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं। सूर्यादि देवोंकी पूजा, पितृतर्पण, होम तथा संध्यावन्दनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इस पुरुषार्थचतुष्टयकी सिद्धि प्रदान करनेवाले भगवान् विष्णु स्वयं भक्तोंको


<sup>१</sup> १-एक समय मात्र हविष्यान्न-ग्रहण। <sup>२</sup> २-रात्रिमें उपवास। <sup>३</sup> ३-बिना याचनाके जो प्राप्त हो उसीका ग्रहण।

४०८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

प्राप्त हो जाते हैं। भगवान् विष्णु धर्मस्वरूप ही हैं। पूजा, तर्पण, हवन, संध्या, ध्यान, धारणा आदि जो भी सत्कर्म हैं, वे सब हरि ही हैं।

सूतजीने कहा—हे शौनक ! मैं चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन करता हूँ, आप सुनें।

चार हजार युगोंका एक कल्प होता है, इसको ब्रह्माका एक दिन माना गया है। कृतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलि—ये चार युग होते हैं। कृतयुगमें सत्य, दान, तप तथा दया—इन चार पादोंसे धर्म अवस्थित रहता है। धर्मका संरक्षण करनेवाले हरि ही हैं। इस रहस्यको जानकर जो लोग संतुष्ट रहते हैं, वे ही ज्ञानी हैं। सत्ययुग (कृतयुग)-में मनुष्य चार हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। सत्ययुगके अन्तमें धर्मपालनकी दृष्टिसे क्षत्रिय उत्कर्षकी स्थितिमें रहते हैं। शूद्रोंकी अपेक्षा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य धर्मपालनमें उच्च आदर्श प्रस्तुत करते हैं। सर्वाधिक बलशाली एवं शूर भगवान् विष्णु ही राक्षसोंका विनाश करते हैं।

त्रेतायुगमें धर्म सत्य, दान और दया—इन तीन पादोंपर ही अवस्थित रह जाता है। इस कालके मनुष्य यज्ञपरायण होते हैं। सम्पूर्ण संसार क्षत्रियोंसे सुरक्षित रहता है। रक्तवर्णके भगवान् हरि मनुष्योंद्वारा इस युगमें पूजित होते हैं। मनुष्योंकी आयु एक हजार वर्षकी होती है। इस युगमें विष्णु भीमरथ कहलाते हैं और क्षत्रियोंके द्वारा राक्षसोंका संहार होता है।

द्वापरमें धर्मकी मूर्ति दो पादोंपर अवस्थित रहती है। इस युगमें अच्युत भगवान् विष्णु पीतवर्ण धारण करते हैं। लोगोंकी आयु चार सौ वर्षकी होती है। ब्राह्मण और क्षत्रिय-वर्णसे उत्पन्न प्रजासे पृथिवी व्याप्त रहती है। इस युगके लोगोंकी अल्प बुद्धिको देखकर वेदव्यासका रूप धारण कर भगवान् विष्णुने एक ही रूपमें विद्यमान वेदको चार भागोंमें विभक्त किया और अपने समस्त शिष्योंको उन चारों वेदोंका अध्ययन कराया। भगवान् वेदव्यासने ऋग्वेदकी शिक्षा 'पैल' नामक शिष्यको, सामवेदकी शिक्षा 'जैमिनि' नामक शिष्यको, अथर्ववेदकी शिक्षा 'सुमन्तु' नामक शिष्यको और यजुर्वेदकी शिक्षा 'महामुनि वैशम्पायन' नामक शिष्यको प्रदान की तथा वेदाङ्गों और पुराणोंका अध्ययन सूतजीको कराया। इन पुराणोंके एकमात्र वेद्य हरि ही हैं। ये अठारह पुराणोंके रूपमें विभक्त हैं।

सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं। ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शिव, भागवत, भविष्यत्, नारदीय, स्कन्द, लिङ्ग, वराह, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, कूर्म, मत्स्य, गरुड, वायु तथा ब्रह्माण्ड नामक अठारह पुराण प्रसिद्ध हैं। मुनियोंने अनेक उपपुराणोंकी भी बात बतायी है। उनमें सबसे पहला उपपुराण सनत्कुमारके द्वारा कथित है। भगवान् नरसिंहके द्वारा उपदिष्ट एक दूसरा उपपुराण है, जो नरसिंहपुराणके नामसे प्रसिद्ध है। तीसरा उपपुराण स्कन्द है, इसको भगवान् शिवके पुत्र कुमार कार्तिकेयजीने कहा है। चौथा उपपुराण शिवधर्म (शिवधर्मोत्तर) नामक है, जिसे भगवान् नन्दीश्वरने कहा है। महर्षि दुर्वासाद्वारा प्रोक्त आश्चर्य (अद्भुत) पुराण तथा देवर्षि नारदजीद्वारा कथित नारद उपपुराण है। इसी प्रकार कपिल, वामन तथा उशनस् उपपुराण महर्षि कपिल, वामन तथा उशनस्द्वारा उपदिष्ट हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब, पराशर, मारीच तथा भार्गव नामक उपपुराण भी हैं। पुराण, धर्मशास्त्र, चारों वेद, शिक्षा, कल्पादि, छः वेदाङ्ग, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, गन्धर्वशास्त्र तथा धनुर्वेदशास्त्र—ये अठारह विद्याएँ हैं—

पुराणं धर्मशास्त्रं च वेदास्त्वंगानि यन्मुने।
न्यायः शौनक मीमांसा आयुर्वेदार्थशास्त्रकम्॥
(२२३।२१)

काण्ड ] भगवान् विष्णुकी महिमा, चतुष्पाद-धर्मनिरूपण ४०९


द्वापरयुगके अन्तमें भगवान् श्रीहरि पृथ्वीके भारका हरण करते हैं।

कलियुगमें धर्म एक पादपर अवस्थित रह जाता है। भगवान् अच्युत कृष्णवर्णके होते हैं। उस कालमें लोग दुराचारी और निर्दय होने लगते हैं। मनुष्योंमें सत्त्व, रज तथा तम—ये तीनों गुण दिखायी देते हैं। कालकी प्रेरणासे ये सभी गुण मनमें उत्पन्न होते हैं और परिवर्तित होते रहते हैं।

हे शौनक! जब प्रवृद्ध सत्त्वगुणसे मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ व्याप्त हो जाती हैं और लोगोंकी अनुरक्ति ज्ञानार्जन तथा तपश्चरणमें बढ़ जाती है तब सत्ययुग जानना चाहिये। जब मनुष्योंकी आसक्ति काम्यकर्म और यशमें होती है, उस समय रजोगुणकी प्रवृत्तिसे त्रेतायुग जानना चाहिये और तमोगुणकी प्रबलताके साथ रजोगुणकी वृद्धिके कारण जब लोगोंमें लोभ, असंतोष, मान, दम्भ और मत्सरके भाव प्रबल होते हैं और काम्य कर्मोंमें आसक्ति बढ़ जाती है तब द्वापरयुग समझना चाहिये। जब सदा असत्य बोलने, आलस्य, नींद और हिंसा आदि साधनोंमें ही प्रवृत्ति हो जाती है, शोक, मोह, भय और दीनताका भाव जब बढ़ जाता है, तब तमोगुणको सर्वाधिक प्रबल मानना चाहिये। यही काल कलियुग है*।

इसी प्रकार जब लोग कामी हो जाते हैं, सदैव कटुवाणी बोलते हैं, जनपद चोर, डाकुओंसे भर जाते हैं, वेद पाखण्डियोंसे दूषित हो जाते हैं, राजा प्रजाओंका सर्वस्व हरण करते हैं, लोग मैथुन और पेट पालनके कर्मसे स्वतः पराजित होने लगते हैं, ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्यव्रतका परित्याग करके अशुचि हो जाते हैं, कुटुम्बी अर्थात् गृहस्थ भिक्षाटन करने लगते हैं, तपस्वी गाँवोंमें रहना प्रारम्भ कर देते हैं, संन्यासी अर्थलोभमें फँस जाते हैं, लोग लघु शरीर होनेपर भी अत्यधिक भोजन करते हैं और जो चोर हैं, उन्हें साधुके रूपमें लोग स्वीकार करने लगते हैं, तब कलियुग ही मानना चाहिये।

इस कलिकालमें भृत्यगण अपने स्वामीका तिरस्कार करते हैं, तपस्वी अपने व्रतोंका परित्याग कर देते हैं, शूद्र प्रतिग्रह लेने लगते हैं, वैश्य ब्राह्मणोंकी सेवाकी उपेक्षा कर स्वयं व्रत-परायण हो जाते हैं, धार्मिक भाव कम होनेसे सभी लोग बेचैन रहते हैं, संतानें धार्मिक शिक्षाका अभाव होनेसे पिशाचके समान बन जाती हैं, अन्यायसे अर्जित भोजनके द्वारा अग्निदेवको आहुति, देवताओंको नैवेद्य तथा द्वारपर आये हुए अतिथि देवकी पूजा होती है, तब कलियुग समझना चाहिये।

हे शौनक! कलियुगके आ जानेपर लोग अपने पितरोंको जलतक नहीं देंगे। सभी प्राणी स्त्रीके वशमें हो जायँगे। सबके कर्म शूद्रवत् होंगे। इस कलिकालमें स्त्रियाँ अत्यधिक संतानोत्पत्ति करनेवाली और दुर्बल भाग्यवाली होंगी तथा बड़ोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन उनका स्वभाव होगा। ऐसा स्वभाव हो जानेपर यदि उनकी निन्दा की जायगी तो वे उसके प्रति गम्भीर न होकर उपेक्षाभाव अपनायेंगी। वे इस उपेक्षाभावको अपना सिर खुजलाकर व्यक्त करेंगी।

कलियुगके मनुष्य भगवान् विष्णुकी पूजा नहीं करेंगे। उन सभीका विश्वास पाखण्डमें बढ़ जायगा। हे ब्राह्मणो! यह कलिकाल दोषोंसे भरा हुआ है, किंतु इस दोषपूर्ण युगमें एक महान् गुण भी है। वह


* प्रभूतञ्च यदा सत्त्वं मनो बुद्धीन्द्रियाणि च। तदा कृतयुगं विद्याज्ज्ञाने तपसि यद्रतिः॥
यदा कर्मसु काम्येषु शक्तिर्यशसि देहिनाम्। तदा त्रेता रजोभूतिरिति जानीहि शौनक ॥
यदा लोभस्त्वसन्तोषो मानो दम्भश्च मत्सरः। कर्मणां चापि काम्यानां द्वापरं तद्रजस्तमः ॥
यदा सदानृतं तन्द्रा निद्रा हिंसादिसाधनम्। शोकमोहौ भयं दैन्यं स कलिस्तमसि स्मृतः ॥

४१० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

गुण है भगवान् श्रीकृष्णका संकीर्तन। उनका संकीर्तन करनेसे ही मनुष्य संसारके महाबन्धन अर्थात् आवागमनके जालसे मुक्त हो जाता है। हे शौनक! कृतयुगमें प्राणीको जो फल भगवान् विष्णुका ध्यान करनेसे प्राप्त होता है, त्रेतायुगमें जो फल उनका जप करनेसे प्राप्त होता है और द्वापरयुगमें जो फल उन विष्णुदेवकी सेवा करनेसे प्राप्त होता है, वही फल कलिकालमें भगवान्‌के गुण, लीला और नाम-संकीर्तनसे ही प्राप्त हो जाता है। इसलिये नित्य ही भगवान् श्रीहरिका ध्यान, पूजन और संकीर्तन करना चाहिये—

कलेर्दोषनिधेर्विप्रा अस्ति ह्येको महागुणः ॥
कीर्तनादेव कृष्णस्य महाबन्धं परित्यजेत्।
कृते यद्ध्यायतो विष्णुं त्रेतायां जपत: फलम्॥
द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्।
तस्माद्ध्येयो हरिर्नित्यं गेयः पूज्यश्च शौनक ॥
(२२३ । ३५-३७)
(अध्याय २२३)

नैमित्तिक तथा प्राकृतिक प्रलय और भगवान् विष्णुसे पुनः सृष्टिका प्रादुर्भाव

सूतजीने कहा—चार हजार युगोंके बीतनेपर ब्रह्माका नैमित्तिक प्रलयकाल आता है। कल्पके अन्तमें सौ वर्षतक अनावृष्टि होती है। आकाशमण्डलमें प्रचण्ड रूपसे संतप्त करनेवाले भयंकर सात सूर्य उदित हो जाते हैं। वे अपनी प्रखर रश्मियोंसे सम्पूर्ण जलराशिका पानकर तीनों लोकोंको सुखा देते हैं।

भगवान् विष्णु रुद्रस्वरूप धारण करके भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक तथा पाताललोककी समस्त चराचर सृष्टिको जला देते हैं। भगवान् विष्णु तीनों लोकोंको जलानेके बाद संवर्तक नामके मेघोंकी सृष्टि करते हैं। नाना प्रकारके महामेघ सौ वर्षोंतक बरसते हैं। विष्णुरूपमें स्थित वायु अत्यन्त तेजगतिसे सौ वर्षोंतक चलती है। उस जलवृष्टिसे समुद्रके समान उत्ताल तरंगोंवाले संसारके इस प्रलयकालमें स्थावर-जंगमके नष्ट होनेपर ब्रह्मस्वरूप भगवान् विष्णु अनन्तशय्यापर शयन करते हैं। एक हजार वर्षतक सोनेके पश्चात् जब वे जागते हैं तो पुनः उन्हींके द्वारा इस जगत्‌की सृष्टि होती है।

हे शौनक! इसके बाद मैं प्राकृतिक प्रलयका वर्णन करता हूँ, उसको आप सुनें। ब्रह्माके एक सौ वर्ष बीत जानेपर भगवान् हरि अपने योगबलसे समस्त सृष्टिको अपनेमें लीन करके ब्रह्माको धारण कर लेते हैं। इस कालमें जो प्राणी ब्रह्मलोकमें स्थित रहते हैं, वे भी भगवान् विष्णुमें लीन हो जाते हैं।

हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! उस कालमें अनावृष्टि करनेवाले सूर्योंसे सम्पन्न मेघ थे। मेघोंके लगातार सौ वर्षतक बरसते रहनेसे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जलसे भर उठता है। अंदर प्रविष्ट हुई उस जलराशिसे ब्रह्माण्ड फट जाता है। ब्रह्माकी आयु पूर्ण होते ही सब कुछ जलमें ही लय हो जाता है। संसारमें कुछ भी शेष नहीं रहता। संसारको आधार प्रदान करनेवाली यह पृथ्वी भी उस जलराशिमें डूब जाती है। उस समय जल तेजमें, तेज वायुमें, वायु आकाशमें और आकाश भूतादि महत्तत्त्वमें प्रविष्ट हो जाता है और वह महत्तत्त्व प्रकृतिमें तथा प्रकृति अव्यक्त परमपुरुषमें लीन हो जाती है। वे हरि (अव्यक्त पुरुष) सौ वर्षतक सोते हैं। तदनन्तर (ब्रह्माका) दिन आनेपर अव्यक्तादि क्रमसे पुनः व्यक्तिभूत चराचर जगत्‌की सृष्टि करते हैं। (अध्याय २२४)