गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१९- श्रीगोपालजीकी पूजा, त्रैलोक्यमोहन-मन्त्र तथा श्रीधर-पूजन-विधि
काण्ड ] सर्पोंके विष हरनेके उपाय तथा दुष्ट उपद्रवोंको दूर करनेके मन्त्र ४३
अर्थात् यमराजकी गतिके समान गतिमान् रहता है।
रात्रि और दिनका मान लगभग तीस-तीस घटिका होता है। इस मानके अनुसार निर्मित कालचक्रमें चन्द्रमा प्रतिपदा तिथिको पादाङ्गुष्ठ, द्वितीयाको पैरसे ऊपर, तृतीयाको गुल्फ, चतुर्थीको जानु, पञ्चमीको लिङ्ग, षष्ठीको नाभि, सप्तमीको हृदय, अष्टमीको स्तन, नवमीको कण्ठ, दशमीको नासिका, एकादशीको नेत्र, द्वादशीको कान, त्रयोदशीको भौंह, चतुर्दशीको शंख अर्थात् कनपटी तथा पूर्णिमा एवं अमावस्याको मस्तकपर निवास करता है। पुरुषके दक्षिणाङ्गमें तथा स्त्रीके वामभागमें चन्द्रकी स्थिति होती है। चन्द्रकी स्थिति जिस अङ्गमें होती है, उस अङ्गमें सर्पके डसनेपर प्राणी जीवित बच सकता है। यद्यपि सर्पदंशसे शरीरमें उत्पन्न हुई मूर्च्छा शीघ्र समाप्त होनेवाली नहीं है, फिर भी शरीर-मर्दनसे वह दूर हो सकती है।
स्फटिकके समान निर्मल 'ॐ हंसः' नामक बीजमन्त्र, साधकका परम मन्त्र है। विषरूपी पापको नष्ट करनेमें समर्थ इस बीज-मन्त्रका प्रयोग सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीपर करना चाहिये। इसके चार प्रकार हैं। प्रथम मात्रा बीज बिन्दुसे युक्त है। दूसरा पाँच स्वरोंसे संयुक्त है। तीसरा छः स्वरोंवाला और चौथा विसर्गयुक्त है। प्राचीन समयमें पक्षिराज गरुडने तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये 'ॐ कुरु कुले स्वाहा' इस महामन्त्रको आत्मसात् किया था। अतः सर्प एवं सर्पिणियोंके विषको शान्त करनेके लिये इच्छुक व्यक्तिको मुखमें 'ॐ', कण्ठमें 'कुरु', दोनों गुल्फोंमें 'कुले' तथा दोनों पैरोंमें 'स्वाहा' मन्त्रका न्यास करना चाहिये। जिस घरमें उपर्युक्त मन्त्र भली प्रकारसे लिखा रहता है, सर्प उस घरको छोड़कर चले जाते हैं। जो मनुष्य एक हजार बार इस मन्त्रके जपसे अभिमन्त्रित सूत्रको कानपर धारण करता है, उसको सर्प-भय नहीं रहता। जिस घरमें इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित शर्कराखण्ड फेंक दिये जाते हैं, उस घरको भी सर्प छोड़ देते हैं। देवताओं और असुरोंने इस मन्त्रका सात लाख जप करके सिद्धि प्राप्त की थी।
इसी प्रकार एक अष्टदल पद्मका रेखाङ्कनकर उसके प्रत्येक दलपर इस—'ॐ सुवर्णरेखे कुक्कुटविग्रहरूपिणि स्वाहा'—मन्त्रके दो-दो वर्ण लिखे तथा 'ॐ पक्षि स्वाहा'—इस मन्त्रसे अभिमन्त्रित जलके द्वारा स्नान करानेसे विषविह्वल प्राणीका विष दूर हो जाता है।
'ॐ पक्षि स्वाहा' इस मन्त्रके द्वारा अङ्गुष्ठ-भागसे लेकर कनिष्ठापर्यन्त करन्यास तथा मुख-हृदय-लिङ्ग और पैरोंमें अङ्गन्यास करे तो विषधर नाग ऐसे मनुष्यकी छायाको स्वप्नमें भी लाँघ नहीं सकता। जो मनुष्य इस मन्त्रका एक लाख जप करके सिद्धि प्राप्त कर लेता है, वह अपनी दृष्टिमात्रसे व्यथित व्यक्तिके शरीरमें व्याप्त विषको नष्ट कर देता है।
'ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं भि (भी)रुण्डायै स्वाहा'—इस मन्त्रका जप सर्पदंशित व्यक्तिके कानमें करनेपर विषका प्रभाव क्षीण हो जाता है।
यदि दोनों पैरके अग्रभागमें 'अ आ', गुल्फमें 'इ ई' जानुमें 'उ ऊ', कटिमें 'ए ऐ', नाभिमें 'ओ', हृदयमें 'औ', मुखमें 'अं' तथा मस्तकमें 'अः' वर्णका स्थापनकर 'ॐ हंसः' बीजमन्त्रके सहित न्यास करके साधक इस बीजमन्त्रका ध्यान-पूजन और जप करे तो वह सर्प-विषको दूर कर सकता है।
'मैं (स्वयं) गरुड हूँ' यह ध्यान (भावना) करके साधकको विष-शमनका कार्य करना चाहिये। 'हं' बीजमन्त्रका शरीरमें विन्यास विषादिका हरण करनेवाला कहा गया है। वाम हाथमें 'हंसः' मन्त्रका न्यास करके जो साधक इस मन्त्रका
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ध्यान-पूजन और जप करता है, वह सर्प-विषको दूर करनेमें समर्थ होता है; क्योंकि यह मन्त्र विषधर नागोंके नासिकाभाग और मुँहकी श्वास-नलिकाको भी रोकनेमें पूर्ण समर्थ है। यह मन्त्र शरीरकी त्वचा-मांस आदिमें व्यास सर्प-विषको भी विनष्ट कर देता है।
सर्पदंशसे मूर्च्छित प्राणीके शरीरमें 'ॐ हंसः' मन्त्रका न्यास करके भगवान् नीलकण्ठ आदि देवोंका भी ध्यान करना चाहिये। ऐसा करनेसे यह मन्त्र अपनी वायु शक्तिके द्वारा उस सम्पूर्ण विषका हरण कर लेता है।
प्रत्यङ्गिराकी जड़को चावलके जलके साथ पीसकर पीनेसे विषका प्रभाव दूर हो जाता है। पुनर्नवा, प्रियंगु, वक्त्रज (ब्राह्मी), श्वेत, बृहती, कूष्माण्ड, अपराजिताकी जड़, गेरू तथा कमलगट्टेके फलको जलमें पीसकर घृतके साथ लेप तैयार करना चाहिये, इस प्रकार बना हुआ लेप भी शरीरमें लगानेसे विषको शान्त कर देता है। सर्पके काटनेपर जो मनुष्य उष्ण (गरम) घृतका पान कर लेता है, उसके शरीरमें विषका अधिक प्रभाव नहीं बढ़ता। सर्पदंश होनेपर शिरीष नामक वृक्षके पञ्चाङ्ग (पत्र, पुष्प, फल, मूल एवं छाल)-के सहित गाजरके बीजोंको पीसकर सर्वाङ्गमें लेप करनेसे अथवा पीनेसे भी विषका प्रभाव समाप्त हो जाता है।
'ॐ ह्रीं' बीजमन्त्र, गोनस (गोहअन) आदि विषैले सर्पोंके विषको दूर करनेमें समर्थ है। इस मन्त्रके साथ 'अः'-का प्रयोगकर अर्थात् 'ॐ ह्रीं अः' का उच्चारण करते हुए हृदय, ललाट आदिमें विन्यास करके उसका ध्यान करनेमात्रसे ही सर्पादिका वशीकरण हो जाता है। इसका पंद्रह हजार जप करके साधक गरुडके समान सर्वगामी, कवि—विद्वान्, वेदविद् हो जाता है तथा दीर्घ आयुको प्राप्त करता है।
**सूतजीने पुनः कहा—**ऋषियो! अब मैं आप सभीको शिवके द्वारा कथित अत्यन्त गोपनीय मन्त्रोंको बताऊँगा; जिनसे अभिमन्त्रित पाश, धनुष, चक्र, मुद्गर, शूल और पट्टिश नामक आयुधोंको धारण करके राजा शत्रुओंपर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
मन्त्रोद्धारके लिये कमल-पत्रपर अष्टवर्ग बनाकर पूर्व (दिशा)-से शुरू करके क्रमशः ईशान-कोणतक बीजमन्त्र (ॐ ह्रीं ह्रीं)-को लिखना चाहिये। **'ॐ'**कार ब्रह्मबीज है, **'ह्रीं'**कार विष्णुबीज है और 'ह्रीं' कार शिवबीज है। त्रिशूलके तीनों शीर्षपर 'ह्रीं' लिखकर क्रमानुसार न्यास करे। मन्त्र 'ॐ ह्रीं ह्रीं' है।
साधक हाथमें शूल ग्रहण करे। तत्पश्चात् उसको आकाशमें घुमाये, जिसे देखते ही दुष्ट ग्रह और सर्प नष्ट हो जाते हैं। साधक धूम्रवर्णके धनुषको हाथमें लेकर आकाशकी ओर भुजा उठाकर इस मन्त्रका चिन्तन करे। ऐसा करनेसे दुष्ट विषैले सर्प, कुत्सित ग्रह, विनाशकारी मेघ और राक्षस नष्ट होते हैं। यह मन्त्र तो त्रिलोककी रक्षा करनेमें समर्थ है, मृत्युलोकके विषयमें कहना ही क्या है?
'ॐ जूं सूं हूं फट्' यह दूसरा मन्त्र है। साधक खैरकी आठ लकड़ियोंको इसी मन्त्रसे अभिमन्त्रित कर उन्हें आठ दिशाओंमें गाड़ दे तो उस कीलाङ्कित क्षेत्रमें वज्रपात (विद्युत्-निपात) तथा इसकी गर्जनाका उपद्रव नहीं होता। गरुडद्वारा कहे गये इस मन्त्रसे आठ कीलोंको इक्कीस बार अभिमन्त्रितकर रात्रिके समय अपने अभीष्ट क्षेत्रकी चारों दिशाओं और विदिशाओंमें गाड़ देना चाहिये। इससे भी वहाँ विद्युत्-निपात, वज्रपतन तथा चूहा, टिड्डी आदिसे होनेवाले उपद्रवोंका भय नहीं रहता।
काण्ड ] पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि ४५
'ॐ हां सदाशिवाय नमः' ऐसा कहकर साधक तर्जनी अंगुलिके द्वारा अनार-पुष्पके सदृश कान्तिमान् एक पिण्डका निर्माण करे। उस पिण्डके प्रदर्शनमात्रसे ही दुष्ट जन, मेघ, विद्युत्, विष, राक्षस, भूत और डाकिनी आदि दसों दिशाओंको छोड़कर भाग जाते हैं।
'ॐ ह्रीं गणेशाय नमः।' 'ॐ ह्रीं स्तम्भनादिचक्राय नमः।' 'ॐ ऐं ब्राह्म्यै त्रैलोक्यडामराय नमः।'- इस मन्त्र-संग्रहको भैरव-पिण्ड कहा जाता है। यह भैरव-पिण्ड विष तथा पापग्रहोंके कुप्रभावको समाप्त करनेमें समर्थ है। यह साधकके कार्यक्षेत्रकी रक्षा और भूत-राक्षसादिकी उपद्रवी शक्तियोंको नष्ट करता है।
'ॐ नमः' यह कहकर साधक अपने हाथमें इन्द्रवज्रका ध्यान करे। इस वज्रमुद्रासे विष, शत्रु और भूतगण विनष्ट हो जाते हैं। 'ॐ क्षुं (क्ष) नमः' इस मन्त्रसे बायें हाथमें पाशका स्मरण करे, जिससे विष तथा भूतादिका विनाश होता है। इसी प्रकार 'ॐ हां (हो) नमः' इस मन्त्रके उच्चारणसे उपद्रवकारी मेघ और पापग्रहोंके प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। कृतान्त-यमराजका ध्यान करके साधक छेदक अस्त्र (भाले)-से शत्रु-समूहका विनाश करे। 'ॐ क्ष्ण (क्ष्म) नमः' इस मन्त्रोच्चारके साथ कालभैरवका ध्यान करके मनुष्य पापग्रह, भूत, विषके प्रभावका शमन कर सकता है।
'ॐ लसद्दंष्ट्रिजिव्हाक्ष स्वाहा' इस मन्त्रका ध्यान करके मनुष्य खेती-वाड़ीमें विघ्न डालनेवाले ग्रह, भूत, विष और पक्षियोंका निवारण कर सकता है। 'ॐ क्ष्व (क्ष्णं) नमः' इस मन्त्रको रक्त-वर्णकी स्याहीसे नगाड़ेपर लिखकर उसे बजाना चाहिये। उसके शब्दोंको सुनकर पापग्रह आदि सभी उपद्रवकारी तत्त्व भयभीत हो उठते हैं।
(अध्याय १९-२०)
पञ्चवक्त्र-पूजन तथा शिवार्चन-विधि
सूतजीने कहा-हे ऋषियो! अब मैं पञ्चमुख शिवकी पूजाका वर्णन करूँगा, जो साधकको भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है। साधकको सबसे पहले निम्न मन्त्रसे उन देवका आवाहन करना चाहिये-
'ॐ भूर्विष्णवे आदिभूताय सर्वाधाराय मूर्तये स्वाहा।'
पुनः 'ॐ हां सद्योजाताय नमः।' कहकर साधक सद्योजातका आवाहन करे। इन सद्योजातकी आठ कलाएँ कही गयी हैं। उनका नाम सिद्धि, ऋद्धि, धृति, लक्ष्मी, मेधा, कान्ति, स्वधा और स्थिति है। सद्योजातकी पूजा करनेके पश्चात् 'ॐ सिद्धयै नमः' इत्यादि मन्त्रोंसे उन सभी आठ कलाओंकी पूजा करनेका विधान है। तदनन्तर 'ॐ ह्रीं वामदेवाय नमः' इस मन्त्रसे साधक वामदेवकी पूजा करे। वामदेवकी तेरह कलाएँ हैं, जिन्हें रजा, रक्षा, रति, पाल्या, कान्ति, तृष्णा, मति, क्रिया, कामा, बुद्धि, रात्रि, त्रासनी तथा मोहिनी कला कहा गया है। इन कलाओंके अतिरिक्त मनोन्मनी, अघोरा, मोहा, क्षुधा, निद्रा, मृत्यु, माया तथा भयंकरा नामकी आठ कलाएँ (अघोरकी) हैं।
उक्त समस्त कलाओंका पूजन करनेके बाद साधकको 'ॐ हैं तत्पुरुषाय नमः' इस मन्त्रसे तत्पुरुषदेवकी पूजा करनी चाहिये। उनकी निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शान्ति और सम्पूर्णा-ये पाँच कलाएँ हैं। साधक कलाओंकी पूजा करके 'ॐ ह्रौं ईशानाय नमः' इस मन्त्रसे ईशानदेवकी पूजा करे। तत्पश्चात् ईशानदेवकी निश्चला, निरञ्जना, शशिनी, अंगना, मरीचि और ज्वालिनी नामकी जो छः कलाएँ हैं, उनकी पूजा करके पूजन पूर्ण करे।
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सूतजीने पुनः कहा— हे ऋषियो! अब मैं शिवकी अर्चनाका वर्णन करूँगा, जो भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करनेवाली है। बारह अंगुलके मापमें बिन्दुद्वारा (किसी पात्रमें) भगवान् शिवकी मूर्ति बनानी चाहिये। उसमें शान्त, सर्वगत और निराकारका चिन्तन करना चाहिये। बिन्दुद्वारा बनायी गयी मूर्तिमें ऊपरकी ओर पाँच बिन्दु लगाने चाहिये, जो शिवका मुख है। वह छोटे आकारमें होना चाहिये और नीचेकी ओर मूर्तिके अनुसार बिन्दु लगाकर बड़े-बड़े अङ्ग बनाने चाहिये। मूर्तिके अधोभागमें छठा बिन्दु विसर्गके साथ होना चाहिये, जो अस्त्र है। इसके साथ 'हौं' लिख देना चाहिये—यह महामन्त्र है और सम्पूर्ण अर्थोंको देनेवाला है। साधक मूर्तिके ऊर्ध्वभागसे लेकर मूर्तिके चरणपर्यन्त अपने दोनों हाथोंसे स्पर्श करे और महामुद्रा दिखाये; इसके बाद सम्पूर्ण अङ्गोंमें न्यास-करन्यास आदि करे।
तदनन्तर वह अस्त्रमन्त्र 'ॐ फट्' का उच्चारण करता हुआ दाहिनी हथेलीसे स्पर्श करके शोधन करे। उसके बाद कनिष्ठा अँगुलीसे लेकर महामन्त्रसे ही तर्जनी अँगुलीतक न्यास करना चाहिये।
अब मैं हृदय-कमलकी कर्णिकामें* पूजनकी विधि बतलाऊँगा। उसमें धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यादिकी अर्चना करे। सर्वप्रथम आवाहन, स्थापन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान अर्पित करे तथा अन्य विविध मानस उपचारोंको करके तदाकार हो जाय। उसके बाद अग्निमें आहुति देनेकी विधि कह रहा हूँ। साधकको पूजा-स्थलपर अग्नि प्रज्वलित करनेके लिये 'ॐ फट्' अस्त्रमन्त्रसे एक कुण्डका निर्माण करना चाहिये। तत्पश्चात् 'ॐ हूं' इस कवचमन्त्रसे उस कुण्डका अभ्युक्षण करके मानिसकरूपसे उसमें शक्तिका विन्यास करे। उसके बाद साधकको हृदय अथवा शक्तिकुण्डमें क्रमशः ज्ञानरूपी तेज तथा अग्निका विन्यास करना चाहिये। तत्पश्चात् अग्निके निष्कृति-संस्कारको छोड़कर गर्भाधानादि समस्त संस्कार करनेका विधान है। निष्कृति या मोक्ष-संस्कार आहुतिके पश्चात् किया जाता है। [इसलिये आहुतिके पूर्व उस संस्कारका निषेध है।] समस्त संस्कारोंके बाद साधकको उस प्रज्वलित अग्निमें समस्त आङ्गिकदेवोंके साथ मानसिकरूपसे शिवको आहुति देनी चाहिये।
तदनन्तर कमलाङ्कित गर्भवाले उस मण्डलमें नीलकण्ठ शिवका पूजन करना चाहिये। इस मण्डलके अग्निकोणमें अर्धचन्द्राकार कल्याणकारी एक अग्निकुण्ड बनाना चाहिये।
तदनन्तर अग्निदेवताके अस्त्रोंसे युक्त हृदयादिमें न्यास करनेका विधान है। उसके बाद मण्डलके अन्तर्गत बने हुए कमलकी कर्णिकापर सदाशिवकी तथा दिशाओंमें अस्त्रकी पूजा करे।
अब श्रेष्ठ पञ्चतत्त्वोंमें स्थित पृथ्वी, जल आदि तत्त्वोंकी दीक्षा बतलायी जाती है। इन दोनों शान्तियोंके लिये पृथक्-पृथक् रूपसे सौ-सौ आहुतियाँ पाँच बार देनी चाहिये। तत्पश्चात् साधक पूर्णाहुति देकर प्रसन्नतापूर्वक त्रिशूली भगवान् शिवका ध्यान करे।
उसके बाद प्रायश्चित्त-शुद्धिके लिये आठ बार आहुति देनी चाहिये। यह आहुति अस्त्र-बीज 'हुं फट्' मन्त्रसे प्रदान करनेका विधान है। इस प्रकार संस्कारसे शुद्ध हुआ वह साधक निःसंदेह शिव-स्वरूप हो जाता है।
शिवकी विशेष पूजामें साधकको चाहिये कि वह प्रथम—'ॐ हां आत्मतत्त्वाय स्वाहा', 'ॐ हीं विद्यातत्त्वाय स्वाहा' तथा 'ॐ हूं शिवतत्त्वाय स्वाहा'—ऐसा उच्चारण करके आचमन करे।
* यहाँ बाह्यपूजन तथा मानसपूजन दोनोंका एक साथ वर्णन है।