गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१८०- व्याकरणसार
काण्ड ] उत्तम तथा अधम अश्वोंके लक्षण, अश्वोंके आगन्तुज और त्रिदोषज रोगोंकी चिकित्सा ३५९
बनाकर यदि घोड़ेको पिलाया जाय तो उसका रक्तस्राव बंद हो जाता है। घोड़ेमें कुष्ठविकार होनेपर तो उसके उपशमनके लिये इसी काढ़ेको तीन दिन देना चाहिये। व्रणयुक्त कुष्ठरोग होनेपर सरसोंका तैल बहुत ही लाभप्रद है। लहसुन आदिका काढ़ा देनेसे उसके खाने-पीनेके दोष दूर हो जाते हैं। बिजौरा नींबूका रस जटामांसीके रसमें मिलाकर नस्य देनेसे तत्काल घोड़ेके वातजनित दोषोंका विनाश होता है।
घोड़ेको प्रथम दिन एक पल औषधीय नस्य देना चाहिये। उसके बाद एक-एक पल प्रतिदिन अधिक बढ़ाते हुए अठारह दिनतक उसका उपयोग करना चाहिये। यह मात्रा उत्तम प्रकारके घोड़ेकी है। मध्यम प्रकारके घोड़ोंकी औषधिकी मात्रा चौदह पल तथा अधम जातिके घोड़ोंकी आठ पल होती है। शरत् और ग्रीष्म-ऋतुमें घोड़ोंको ऐसे विकारोंसे मुक्त करनेके लिये किसी भी प्रकारकी औषधिका नस्य-प्रयोग करना उचित नहीं है। घोड़ेके वातजन्य रोगमें शर्करा, घृत तथा दुग्धसे युक्त तैल, श्लैष्मिक रोगमें त्रिकटुसे युक्त कडुवा तैल और पित्तविकारमें त्रिफलाचूर्ण-समन्वित जलसे नस्य देना चाहिये। साठी चावल और दुग्ध खाने-पीनेवाला घोड़ा अत्यन्त बलशाली होता है। पके हुए जामुनके समान तथा सोनेके सदृश चमकते हुए वर्णवाला अश्व श्रेष्ठ होता है।
भारवाही घोड़ेको आधे-आधे प्रहरपर गुग्गुलका सेवन कराना चाहिये। जो घोड़ा बहुत ही जल्दी थक जानेके कारण रुक जाता हो, उसको खीर या दूध पिलाना चाहिये। वातजनित विकार होनेपर घोड़ेको भोजनमें साठी चावलका भात और दूध देना चाहिये। पित्तविकार होनेपर उसको एक कर्ष अर्थात् दो तोला जटामांसीका रस, मधु, मूँगाका रस और घृतका मिश्रण देनेसे लाभ होता है। कफ-विकार होनेपर मूँग और कुलथी या कडुवा तथा तिक्त भोज्य-पदार्थ देना चाहिये। बधिरता या ग्रासजन्य रोगसे ग्रस्त होनेपर अथवा त्रिदोषजन्य विकारोंके उत्पन्न हो जानेसे दुखित घोड़ेको गुग्गुलकी औषधि देनी चाहिये। सभी प्रकारके रोगोंमें घोड़ेको पहले दिन अन्य प्रकारकी घासोंके साथ एक पल दूर्वा घास देना ही अपेक्षित है। उसके बाद इस मात्राको धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिये। एक दिनमें एक कर्ष अर्थात् दो तोला और अधिकतम पाँच पल दिया जा सकता है। सामान्य स्थितिमें घोड़ेके लिये खाने-पीनेके निमित्त अस्सी पल दूर्वाकी मात्रा श्रेष्ठतम मानी गयी है। उसकी मध्यम मात्रा साठ पल और अधम चालीस पल है।
घोड़ेको व्रण-कुष्ठ तथा खञ्ज-विकार (लँगड़ानेका विकार) होनेपर त्रिफलाके क्वाथमें भोजन मिलाकर देना चाहिये। मन्दाग्नि और शोथ-रोग होनेपर उसको गोमूत्रके साथ भोजन देना चाहिये। वात-पित्तजन्य व्रणविकार अथवा अन्य व्याधि होनेपर गोदुग्ध और घृत मिलाकर घोड़ेको भोजन देना लाभकारी है। दुर्बल घोड़ेको मासी नामक औषधिके साथ भोजन देना पुष्टिकारक होता है। शरत् और ग्रीष्म-ऋतुमें घोड़ेको पाँच पल गुडूचीका रस घीमें मिलाकर अथवा दूधमें मिलाकर प्रातःकाल पिलाना चाहिये। यह घोड़ेके रोगोंका विनाश करनेवाली, उनको शक्तिसम्पन्न बनानेवाली और उनके तेजको बढ़ानेवाली है। गुडूची-कल्पके साथ शतावरी और अश्वगन्धा नामक औषधियोंके रसकी मात्रा क्रमशः उत्तम, मध्यम और अधमरूपमें चार पल, तीन पल तथा एक पल निश्चित की गयी है।
यदि घोड़ोंमें अकस्मात् एक ही प्रकारका रोग उत्पन्न हो जाय और उपचार होनेपर भी घोड़ेकी मृत्यु हो जाय तो उसे उपसर्ग (कोई दैवीप्रकोप या महामारी) समझना चाहिये। उसकी शान्तिके लिये
| ३६० | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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हवन, पूजन, ब्राह्मण-भोजन आदि कराना चाहिये। हरीतकी-कल्पके सेवनसे भी उपसर्गकी शान्ति होती है। गोमूत्र, सरसोंके तैल और सेंधानमकसे युक्त हरीतकीकी मात्रा प्रारम्भमें पाँच मानी गयी है। तत्पश्चात् प्रतिदिन उसकी पाँच-पाँच मात्रा बढ़ाते हुए सौतक की जा सकती है। घोड़ेके लिये एक सौ हरीतकीकी मात्रा उत्तम है। अस्सी तथा साठ मात्राओंका भी परिमाण है जो मध्यम और अधम मात्राएँ मानी गयी हैं।
धन्वन्तरिजीने पुनः कहा—हे सुश्रुत! अब मैं (अश्वायुर्वेदकी भाँति) गजायुर्वेदका वर्णन करने जा रहा हूँ, आप उसे सुनें। अश्वचिकित्सामें बताये गये औषधिक कल्प हाथियोंके लिये भी हितकारी हैं। हाथीके निमित्त उक्त मात्रा चौगुनी होती है। पूर्ववर्णित औषधियोंके द्वारा भी हाथियोंमें पाये जानेवाले रोगोंको दूर किया जा सकता है। हाथियोंकी उपसर्गजनित व्याधियों (दैवीप्रकोप या महामारी आदि)-के उपशमनके लिये गजशान्तिकर्म करना चाहिये। देवताओं और ब्राह्मणोंकी रत्न आदिके द्वारा पूजा करके उन्हें कपिला गौका दान दे। रक्षा-मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित वचा (वच) और सरसोंको मालामें पिरोकर हाथीके दोनों दाँतोंमें बाँधना चाहिये। सूर्य आदि नवग्रहोंके तथा शिव, दुर्गा, लक्ष्मी और विष्णुके पूजन आदिसे हाथीकी रक्षा होती है। देवादिकी पूजा करनेके पश्चात् प्राणियोंके लिये अन्नादिकी बलि देकर हाथीको चार घड़ोंके जलसे स्नान कराना चाहिये। तदनन्तर मन्त्रोंद्वारा अभिमन्त्रित भोजन हाथीको देना चाहिये। हाथीके पूरे शरीरपर भस्म लगाना चाहिये। त्रिफला, पञ्चकोल (पीपर, पीपरामूल, चव्य, चित्रकमूल, सोंठ), दशमूल, विडङ्ग, शतावरी, गुडूची, नीम, अड़ूसा और पलाशके चूर्ण अथवा क्वाथ हाथीके रोगोंको विनष्ट करनेमें समर्थ हैं। (अध्याय २०१)
स्त्रियोंके विविध रोगोंकी चिकित्सा, बालकोंकी रक्षाके उपाय तथा बलवर्धक औषधियाँ
श्रीहरिने कहा—हे शिव! पुनर्नवा अथवा अपामार्ग नामक औषधिकी जड़का गुण अद्वितीय है। इसका यथाविधि प्रयोग करनेसे प्रसव-वेदनाका कष्ट दूर हो जाता है। भुइँकुम्हड़ाकी जड़ अथवा साठी चावलको पीसकर एक सप्ताहपर्यन्त दूधके साथ सेवन करनेसे स्त्रियोंके दूधकी वृद्धि होती है। हे रुद्र! इन्द्रवारुणी (इन्द्रायण)-की जड़का लेप करनेसे स्त्रियोंके स्तनोंकी पीड़ा विनष्ट हो जाती है। नीली, परवलकी जड़ तथा तिलको जलमें पीसकर घीके साथ तैयार किया गया लेप ज्वालागर्भ नामक रोगका नाश करता है। पाढ़ाकी जड़को चावलके जलके साथ पीनेसे पाप-रोग विनष्ट हो जाता है। ऐसे रोगका विनाश कुष्ठ नामक औषधिके पीनेसे भी सम्भव है। हे शिव! बासी जलमें मधु मिलाकर पीनेसे वह पाप-रोगको दूर कर देता है। गोघृत और लाक्षारसको समभागमें लेकर दूधके साथ उसे पीनेसे प्रदररोग दूर हो जाता है। हे हर! द्विज्यष्टी (ब्रह्मदण्डी), त्रिकटु (सोंठ, काली मिर्च, पिप्पली)-का चूर्ण तिलके काढ़ेमें मिलाकर पीनेसे स्त्रियोंका रक्तगुल्म रोग दूर हो जाता है। हे महेश! लाल कमलका कन्द, तिल तथा शर्कराका औषधिक योग, स्त्रियोंमें गर्भधारणकी क्षमता उत्पन्न कर देता है। शर्कराके साथ इन औषधियोंको पीनेसे स्त्रियोंका गर्भपात रुक जाता है तथा शीतल जलके साथ सेवन करनेसे रक्तस्राव भी बंद हो जाता है। हे रुद्र! शरपोङ्खाकी जड़का क्वाथ और काँजी, हींग तथा