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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१५८- ग्रहणी, अतिसार, अग्निमान्द्य, छर्दि तथा अर्श आदि रोगोंका उपचार

काण्ड ] ज्वर-चिकित्सा ३२९


एक प्रस्थ घृतको अग्निपर सिद्ध करना चाहिये। इस घृतपाकके प्रयोगसे प्राणियोंका लँगड़ापन, बौनापन, लुंजता, बधिरता, व्यंगदोष और कुष्ठरोग विनष्ट हो जाता है। वायुदोषके कारण जिनका शरीर दुर्बल हो गया है, जो मैथुनमें अशक्त हैं, वृद्धावस्थाके कारण जो जर्जर शरीरवाले हो गये हैं, आध्मान नामक रोगके कुप्रभावसे जिनके मुख शुष्क हो गये हैं, उनके उन सभी विकारोंका यह घृत-पदार्थ विनाशक है। जिन प्राणियोंके चर्म, शिरा और स्नायु-तन्त्रिकाओंमें विकृत वायु-समूह प्रविष्ट होकर रोगका रूप धारण कर चुका है, वह सब इस सिद्ध तेलके सेवनसे नष्ट हो जाता है। इस तेलका नाम नारायणतेल है। इस रोगविनाशक तेलकी सिद्धिका विधान स्वयं भगवान् विष्णुने बताया था, इसीलिये इस सिद्ध तेलका नाम उन्हींके नामपर पड़ा है। इन्हीं औषधियोंसे पृथक्-पृथक् अथवा मिश्रण-रूपमें घृत एवं तैलपाक बनाना चाहिये।

शतावरी, गुडूची, चित्रक, बिजौरा नीबूका रस अथवा कण्टकारीके रसादिसे समन्वित निर्गुण्डीका रस या पुनर्नवा और चमेली अथवा त्रिफलाके साथ अडूसा या ब्राह्मी, एरण्ड, भृंगराज, कुष्ठ, मूसली, दशमूल और खदिरकी घिसकर बनायी गयी वटी, वटिका, मोदक या चूर्ण सभी रोगोंको दूर करनेवाला है। घृत, मधु, जल, शर्करा, गुड़, नमक तथा सोंठ, काली मिर्च अथवा पिप्पलीके साथ सेवन करनेसे सभी रोगोंमें यथोचित लाभ होता है। इन औषधियोंका योग सर्व-रोगविनाशक है।

चित्रक, मन्दार और निसोत अथवा अजवाइन तथा कनेर या सुधा (गुडूची), बाला (चमेली), गणिका (गनियारी), सप्तपर्णी (छितवन), सुवर्चिका (पित्तपापड़ा) और ज्योतिष्मती (मालकँगनी) नामकी औषधियोंको एकत्र करके विद्वान्को उनका तैल पाक सिद्ध करना चाहिये। इस योगसे सिद्ध तेलका प्रयोग भगंदर-रोगमें करना चाहिये। शोधन, रोपण तथा सर्ववर्णकारक चित्रकादिक जो महातेल हैं, वे सभी प्रकारके रोगोंका निवारण करते हैं।

अजमोदा, सिन्दूर, हरताल, हल्दी, दारुहल्दी, यवक्षार, छज्जी, समुद्रफेन, अदरक, सरलद्रव, इन्द्रायण, अपामार्ग, केला तथा तिन्दुकको समान भागमें लेकर सरसोंका तेल बकरीके मूत्र तथा गोदुग्धको मिलाकर मन्द-मन्द अग्निकी आँचपर पाक करना चाहिये। इस सिद्ध तैल पाकका नाम अजमोदादि-तेल है। यह गण्डमाला नामक रोगको दूर करता है। विद्वान् व्यक्तिको सबसे पहले इस गण्डमाला नामक रोगमें होनेवाली फुंसियोंको पकाना चाहिये। तदनन्तर उनका शोधन करके इसी अजमोदादि तेलसे घावोंको भरते हुए उसमें कोमलता लानेका प्रयास करे। (अध्याय १७४)


ज्वर-चिकित्सा

श्रीहरिने कहा— हे शंकर! सभी ज्वरोंमें सबसे पहला कार्य लंघन है। उसके बाद क्वाथ, उदकपान तथा वातशून्य स्थानका सेवन करना चाहिये।

हे ईश्वर! अग्निसे तथा स्वेदनकी क्रियाओंको करनेसे सभी ज्वर विनष्ट हो जाते हैं। गुडूची और मोथेका क्वाथ वातज्वर-विनाशक है। दुरालभा* अर्थात् धमासा नामक औषधिके घृतका पान


* च०सू० २५, भा०प्र०, च०द०।

३३०संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

करनेसे पित्त-ज्वर दूर होता है। सोंठ, पित्तपापड़ा, नागरमोथा, बालक (हीवेर) खस और चन्दनके क्वाथसे सिद्ध, पित्त-ज्वरका विनाश करता है। दुरालभा तथा सोंठसे सिद्ध घृत-मिश्रित क्वाथ कफ-ज्वरका नाशक है। बालक, सोंठ और पित्तपापड़ासे सभी ज्वर विनष्ट हो जाते हैं। चिरायता, एरण्ड, गुडूची, सोंठ, नागरमोथाके क्वाथसे पित्त-ज्वर दूर होता है। हीवेर, खस, पाठा, कण्टकारी और नागरमोथाका क्वाथ ज्वरका विनाश करता है। देवदारुकी छालका क्वाथ भी लाभदायक है।

हे शंकर! मधुसहित धनिया, नीम, नागरमोथा, परवलकी पत्ती, गुडूची और त्रिफलाका क्वाथ समस्त ज्वरोंका विनाशक है। इसके सेवनसे रोगीकी क्षुधा बढ़ने लगती है एवं वायु-विकार दूर हो जाता है।

हरीतकी, पिप्पली, आँवला, चित्रक, धनिया, खस तथा पित्तपापड़ाका चूर्ण और क्वाथ दोनों ज्वरनाशक हैं। मधुके साथ आँवला, गुडूची तथा चन्दनका सेवन सभी ज्वर-रोगोंको दूर करनेवाला है।

अब आप सन्निपातज ज्वरके विनाशक औषधियोंको सुनें।

हल्दी, नीम, त्रिफला, नागरमोथा, देवदारु, अदरक, चन्दन, परवलकी पत्तीका क्वाथ पीनेसे त्रिदोषजन्य अर्थात् संनिपातज ज्वर दूर हो जाता है।

कण्टकारी, सोंठ, गुडूची, कमल तथा नागबला नामक औषधियोंके योगसे बने चूर्णका सेवन करके रोगी श्वास और खाँसी आदिसे विमुक्त हो जाता है। कफ-वातज ज्वरसे ग्रसित रोगीको प्यास लगनेपर गर्म जल देना चाहिये। सोंठ, पित्तपापड़ा, खस, नागरमोथा तथा चन्दनसे सिद्ध क्वाथ शीतल जलके साथ देना चाहिये। यह तृष्णा, वमन, (पित्त) ज्वर और दाहसे ग्रस्त रोगीके लिये हितकारी है। बिल्व आदि पञ्चमूलका क्वाथ वातज ज्वरमें लाभ करता है। पिप्पलीमूल, गुडूची और सोंठका योग पाचक है। वात-ज्वर होनेपर इसका क्वाथ देना चाहिये। यह परम शान्ति देनेवाला है। मधुके सहित पित्तपापड़ा एवं नीमका क्वाथ पित्तज ज्वरका विनाश करता है।

समुचित उपचार करनेपर भी यदि रोगीकी चेतना नहीं लौटती तो उस रोगीके दोनों पैरके तलुओंमें अथवा मस्तक-भागमें लोहेके गर्म शलाकासे दग्ध(गर्म) करना चाहिये। चिरायता, पाढ़ा, पित्तपापड़ा, विशाला (इन्द्रायण), त्रिफला तथा निसोतका क्वाथ दूधके साथ ग्राह्य है। यह मलावरोधका भेदन करनेवाला एवं समस्त ज्वरोंका विनाशक है।

(अध्याय १७५)


पलितकेश तथा कर्णशूलके उपचार

श्रीभगवान्‌ने कहा— हाथी-दाँतका भस्म एव बकरीके दूधमें मिश्रित रसाञ्जन (रसौत)-का लेप सिरपर करनेसे खल्वाट अर्थात् गंजे प्राणीके सिरमें सात रात्रियोंके बीतते-ही-बीतते सुन्दर बाल उग आते हैं। चार भाग भृंगराजरससे सिद्ध गुंजाफलके चूर्णयुक्त तिलका तेल केशराशिका अभिवृद्धिकारक होता है।

इलायची, जटामांसी, मुरा (शल्लकी), शिव (काला धतूरा), गुंजा (घुँघची)-को समभागमें लेकर उनसे बनाया गया लेप सिरमें लगानेसे इन्द्रलुप्त नामक रोग दूर हो जाता है। आमकी गुठलियोंके चूर्णका लेप करनेसे केश सूक्ष्म अर्थात् पतले हो जाते हैं। करंज, आँवला, इलायची और लाहका लेप बालोंकी लालिमाका विनाशक है।