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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१३५- अतिसार-ग्रहणी-निदान

२७०संक्षिप्त गरुड़पुराण[ आचार-

हृदय-तृषारोगका निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं आपसे हृदयरोगका निदान कहूँगा।

हृदयको सामान्यतः सभी रोगोंसे रुग्ण बनानेवाले प्रतीक दोष वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातके साथ कृमिदोष भी है। जिसके कारण हृदयमें वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज और कृमिज—ये पाँच प्रकारके रोग माने गये हैं।

वातदोषके कारण वातज हृदयरोगीको अपने हृदयमें तीव्र शूलका अनुभव होता है, सूईके चुभने और फटनेकी-सी पीड़ा होती है। दोषके कुप्रभावसे हृदयमें उठी हुई असह्य वेदनासे व्यथित होकर रोगी रोता रहता है। यह वातज दोष हृदयको विदीर्ण कर देता है। उसके दुष्प्रभावसे शरीरपर शुष्कता छायी रहती है। रोगी दुःख-सुखकी अनुभूतिमें स्तब्ध (अवाक्) बना रहता है। स्वयंमें उसे शून्यताकी अनुभूति होती है। मनमें भ्रमकी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अकस्मात् उसमें दीनता, शोक, भय, शब्द-श्रवणमें असहिष्णुता, कम्पन, मोह, श्वासरोध तथा अल्पनिद्राके लक्षण भी उत्पन्न हो जाते हैं।

पित्तदोषसे हृदयरोगीको तृष्णा, थकान, दाह, स्वेद, अम्ल उद्गार, क्लम (थकान), अम्लपित्तात्मक वमन, धूम्रदर्शन और ज्वर होता है। कफजन्य दोष होनेसे हृदयमें स्तब्धता तथा हृदयके अंदर पत्थरके समान भारीपन हो जाता है। इन दोषोंके अतिरिक्त ऐसे रोगीको खाँसी, अस्थि, पीड़ा, थूक, निद्रा, आलस्य, अरुचि और ज्वरका भी उपद्रव होता है।

हृदयरोगमें जब उपर्युक्त तीनों दोषोंके लक्षण शरीरमें प्रकट हो उठते हैं तो वह सन्निपातज हृदयरोग हो जाता है। कृमिजन्य हृदयरोगमें रोगीके नेत्रोंका वर्ण काला हो जाता है। उसके नेत्रोंके सामने अन्धकार छाया रहता है। उसको हल्लास, शोथ, खुजलाहट तथा मुँहसे कफ आता है। इस रोगमें रोगीका हृदय ऐसी असह्य पीड़ासे व्यथित होता है, जैसे वह आरेसे चीरा जा रहा हो। यह रोग बड़ा भयंकर और शीघ्र प्राणघातक होता है। इसलिये इस रोगकी शीघ्र चिकित्सा करनी चाहिये।

वात, पित्त, कफ, सन्निपात, रसक्षय तथा बलकी अल्पता और उपसर्ग—इस प्रकार तृषा (तृष्णा या तृषारोग) छः प्रकारका होता है (उनके नाम हैं—वातज, पित्तज, कफज, सन्निपातज, बल (रस)-क्षयज तथा उपसर्गज)। इस प्रकारके सब तृषारोगोंका मुख्य कारण तो वात-पित्तसंश्रित दोषमें विद्यमान रहता है। इन दोषोंके द्वारा रोगीके शरीरकी धातु (शक्ति)-का शोषण होनेसे चक्कर, कम्पन, ताप, हृद्दाह, मोह तथा मूर्च्छाका उपद्रव होता है। इस रोगमें जिह्वाके मूलभाग, कण्ठ और तालुमें सञ्चार करनेवाली जलवाही शिराओंको शुष्क बनाकर तृष्णा (प्यास) उत्पन्न होती है।

इस तृषारोगमें मुखशोष, जलसे अतृप्ति, अन्नके प्रति घृणा, स्वरभंग तथा कण्ठ-ओष्ठ, तालुकी कर्कशताके कारण जिह्वा निकालनेमें रोगीको कष्ट होता है। वह असह्य वेदनाके कारण प्रलाप करता है, उसका चित्त स्थिर नहीं रहता तथा मनमें अनेक प्रकारके उद्गार उठते हैं। वायु-प्रकोपके कारण उत्पन्न तृषासे शरीरमें कृशता और दीनता आ जाती है, सिरमें शंखोद्भेद, असह्य पीड़ा और भ्रम उत्पन्न होता है। पित्तदोषके कारण तृषारोगी गन्ध-ज्ञानकी क्षमतासे रहित, श्रवण-शक्तिसे निर्बल, निद्राहीन तथा अन्य शारीरिक क्षमताओंके ह्रासोन्मुख होनेसे बलहीन हो जाता है। उसको शीतलताका अनुभव


१-च०चि०अ० २६, सु०उ० ४३, च०चि०अ० ४३। २-च०चि०अ०२६, सु०उ०अ० ४३।

कांड ] मदात्यय-निदान २७१

होता है और मुखसे अम्लयुक्त फेन निकला करता है।

पित्तज तृषारोगमें रोगीके मुखमें तिक्तता बनी रहती है और मूर्च्छाका भी प्रकोप होता है। रोगीके नेत्र रक्तवर्णके हो जाते हैं। उसके मुखमें निरन्तर शुष्कता बनी रहती है। शरीरमें दाह रहता है और मुँहसे अत्यन्त धूमायित वायु छूटती है।

कफज तृषारोगमें वायु प्रकुपित हो उठती है। उसके कुप्रभावसे अन्तःस्थ स्रोत कफयुक्त हो जाता है और उसके बाद वह उसमें पंकवत् सूख जाता है। उसका कण्ठभाग काँटोंसे चुभते हुएके समान व्यथित होता है। रोगीमें निद्रा छायी रहती है और उसका मुख सदैव मधुर (मीठा) बना रहता है। ऐसा रोगी पेट फूलने, सिरपीड़ा, जडता, शुष्कता, वमन, अरुचि, आलस्य तथा अग्निमान्द्यके दोषसे युक्त होता है।

जिस तृषारोगमें तीनों दोषोंके मिले हुए लक्षण पाये जाते हैं, वह त्रिदोषसे उत्पन्न होती है। इस रोगमें आँवकी उत्पत्तिके कारण रक्तवाही स्रोतका अवरोध होता है। जिसके कुप्रभावसे वात-पित्तका दोष शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। उससे रोगीके शरीरमें उष्णता बढ़ जाती है, जिसके कारण शीतल जल प्राप्त करनेकी अभिलाषिणी तृष्णाका प्रादुर्भाव होता है अर्थात् रोगी इस कालमें प्याससे बेचैन हो उठता है। उसी उष्णताके कारण शरीरमें प्रविष्ट हुआ जल जब ऊपरी कोष्ठमें जाता है, तब उसे पित्तजा नामक तृष्णाकी उत्पत्ति होती है। अत्यधिक जल पीनेसे जो तृष्णा शान्त नहीं होती, अपितु तीव्रगतिसे बढ़ती ही जाती है, वह शरीरके स्निग्ध अंशको जला देनेवाली होती है। उसको स्नेहपाकजा अथवा पित्तजा नामकी तृष्णा कहा गया है।

स्निग्ध, कटु, अम्ल तथा लवणरससंश्लिष्ट भोजन करनेसे कफोद्भव तृष्णाका जन्म होता है। जब तृष्णा शरीरके रसको विनष्ट करनेवाले उपर्युक्त लक्षणसे समन्वित हो जाती है, तब वह क्षयात्मिका तृष्णा कहलाती है। जो शोष-मोह-ज्वर आदि अन्य दीर्घकालतक रहनेवाले रोगोंके कारण शरीरमें तीव्र तृष्णा उत्पन्न होती है, उसे उपसर्गात्मिका तृष्णाके नामसे स्वीकार किया गया है।

(अध्याय १५४)


मदात्यय-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत! अब मैं प्राचीन मुनियोंके द्वारा प्रतिपादित मदाधिक्यके निदानको कहता हूँ।

मद्य, तीक्ष्ण, उष्ण, रूक्ष, सूक्ष्म, अम्ल, व्यवायी, आशुकारी, लघु, विकाशी तथा विशद होता है। ओज इसके विपरीत होता है अर्थात् ओज मन्द, शीत, मधुर, सान्द्र, स्निग्ध, स्थूल, चिरकारी, गुरु और पिच्छल होता है। तीक्ष्णादि दस गुण मद्यमें होता है और यही गुण विषमें भी होते हैं, जो प्राणियोंके चित्तमें हलचल मचानेवाले तथा प्राणघातक होते हैं। प्रथम मदमें मद्य अपने तीक्ष्णादि दस गुणोंसे ओजके मन्दादि दस गुणोंको संक्षुभित करके चित्तमें विकार उत्पन्न कर देता है। दूसरा मद प्रमादका स्थान है।<sup>२</sup> इसमें दुष्ट विकल्पोंसे उपहत मनुष्य कर्तव्याकर्तव्यसे अज्ञान होकर मद्यके द्वितीय वेगको अधिक सुखकर मानता है। रजोगुणी या तमोगुणी मनुष्य मध्यम और उत्तमकी संधि अर्थात् द्वितीय और तृतीय मदकी मध्यावस्थामें पहुँचकर अंकुशरहित मदोन्मत्त निरंकुश हाथीकी तरह कुछ भी नहीं करता। यह मद्यावस्था निन्दनीय


१-च०चि० २२, सु०उ०तं० अ० ४८, अ०हृ०जि०अ० ५। २-च०चि०अ० २४, १२, अ०हृ०नि०अ० ६।