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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

१२५- ज्वर-निदान

काण्ड ]भगवान्‌के विभिन्न अवतारोंकी कथा तथा पतिव्रता-माहात्म्य२४५

मन्थनके समय अमृतसे परिपूर्ण कमण्डलुको लिये हुए धन्वन्तरि वैद्यके रूपमें समुद्रसे वे ही प्रकट हुए। उन्हींके द्वारा सुश्रुतको अष्टाङ्ग आयुर्वेदकी शिक्षा दी गयी थी। उन श्रीहरिने स्त्री (मोहिनी)-का रूप धारण करके देवोंको अमृतका पान कराया।

वराहका अवतार लेकर उन्होंने हिरण्याक्षको मारा। उसके अधिकारसे पृथिवीको छीनकर पुनः स्थापित किया और देवताओंकी रक्षा की। तदनन्तर नरसिंहरूपमें इन्होंने हिरण्यकशिपु तथा अन्य दैत्योंका विनाशकर वैदिकधर्मका पालन किया। तत्पश्चात् इस सम्पूर्ण संसारके स्वामी उन विष्णुने जमदग्निसे परशुरामका अवतार लेकर इक्कीस बार पृथिवीको क्षत्रियजातिसे रहित किया था।<sup>१</sup> कृतवीर्यके पुत्र कार्तवीर्य सहस्रार्जुनको युद्धमें मार करके इन्हीं भगवान् परशुरामने यज्ञानुष्ठानमें उसके सम्पूर्ण राज्यका आधिपत्य महर्षि कश्यपको सौंप दिया और स्वयं महाबाहु (परशुराम) महेन्द्रगिरिपर जाकर तपमें स्थित हो गये।

इसके बाद दुष्टोंका मर्दन करनेवाले भगवान् विष्णु राम आदि चार स्वरूपोंमें राजा दशरथके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण हुए। जिनके नाम राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न हैं। रामकी पत्नी जानकी हुईं। पिताके वचनको सत्य करनेके लिये तथा माता (कैकेयी)-के हितकी रक्षा करते हुए रामने अयोध्याका राजवैभव त्यागकर शृंगवेरपुर, चित्रकूट तथा दण्डकारण्यमें निवास किया। तदनन्तर वहींपर शूर्पणखाकी नाक कटवाकर उसके भाई खर तथा दूषण नामक दो राक्षसोंको मारा। तत्पश्चात् जानकीका अपहरण करनेवाले दैत्याधिपति रावणका वधकर उसके छोटे भाई विभीषणको लङ्कापुरीमें राक्षसोंके राजाके रूपमें अभिषिक्त किया। उसके बाद अपने मुख्य सहयोगी सुग्रीव तथा हनुमानादिके साथ पुष्पक विमानपर आरूढ़ होकर पतिपरायणा सीता एवं लक्ष्मणके साथ वे अपनी पुरी अयोध्या आ गये। यहाँ उन्होंने राज्यसिंहासन प्राप्तकर देवताओं, ऋषियों, ब्राह्मणों तथा प्रजाका पालन किया।

उन्होंने धर्मकी भलीभाँति रक्षा की। अश्वमेधादि अनेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। भगवती सीताने राजा रामके साथ सुखपूर्वक रमण किया। यद्यपि सीता रावणके घरमें रहीं, फिर भी उन्होंने रावणको अंगीकार नहीं किया और सर्वदा मन, वचन तथा कर्मसे राममें ही अनुरक्त रहीं। वे सीता तो अनसूयाके समान पतिव्रता थीं।

**ब्रह्माजीने पुनः कहा—**अब मैं पतिव्रता स्त्रीका माहात्म्य कह रहा हूँ, आप सुनें।

पुराने समयमें प्रतिष्ठानपुरमें कौशिक नामका एक कुष्ठरोगी ब्राह्मण रहता था। उस ब्राह्मणकी पत्नी अपने पतिकी देवताके समान ही सेवा-शुश्रूषा करती थी। पतिके द्वारा तिरस्कार मिलनेपर भी वह पतिव्रता पतिको देवता-रूप ही मानती थी। एक बार पतिके द्वारा कहे जानेपर वेश्याको शुल्क देनेके लिये अधिकतम धन साथ लेकर वह उन्हें कन्धेपर बैठाकर वेश्याके घर पहुँचाने निकल पड़ी।

मार्गमें माण्डव्य ऋषि थे। यद्यपि वे ऋषि परम तपस्वी महात्मा थे, तथापि उन्हें चोर समझकर राजदण्डके रूपमें लोहेके लम्बे शङ्कुपर बिठा दिया गया था। अतः शरीरके नीचेके छिद्रसे ऊपर सिरके छिद्र ब्रह्मरन्ध्रतक शरीरके भीतर-ही-भीतर लौह शङ्कुके प्रवेशके कारण माण्डव्य ऋषिका असह्य तीव्र वेदनासे ग्रस्त होना स्वाभाविक


१. यहाँ क्षत्रिय जातिसे रहित करनेका तात्पर्य इतना ही है कि श्रीपरशुरामने क्षत्रियोंके दर्पका मर्दन किया और उनकी कर्तव्यविमुखताको नष्ट किया।

२४६ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार-

था। इसीलिये माण्डव्य ऋषि वेदनाके अनुभवसे स्वयंको बचानेकी दृष्टिसे समाधिस्थ हो गये थे।

कुष्ठ-व्याधियुक्त ब्राह्मण कौशिककी पतिव्रता पत्नी रातमें ही अपने पतिकी इच्छाके अनुसार वेश्याके यहाँ जा रही थी, इसलिये अन्धकार रहनेके कारण अपनी पत्नीके कन्धेपर बैठे कौशिकने माण्डव्य ऋषिको नहीं देखा और अपना पाँव स्वभावतः हिलाया-डुलाया। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि कौशिकके पाँवोंसे माण्डव्य ऋषि आहत हो गये और उनकी समाधि टूट गयी। समाधि-भंग होनेसे उन्हें असह्य वेदना होने लगी। इससे माण्डव्य ऋषिका क्रुद्ध होना स्वाभाविक था। अतः क्रोधवश उन्होंने शाप देते हुए कहा— जिसने मेरे ऊपर यह अपना पैर चलाया है, उसकी सूर्योदय होते ही मृत्यु हो जायगी। यह सुनकर उस ब्राह्मण-पत्नीने कहा कि (यदि ऐसी बात है तो) अब सूर्योदय ही नहीं होगा। इसके बाद सूर्योदय न होनेसे बहुत वर्षोंतक निरन्तर रात्रि ही छायी रही। जिससे देवता भी भयभीत हो गये।

देवताओंने ब्रह्माकी शरण ली। ब्रह्माने उन देवोंसे कहा कि पतिव्रताके इस तेजसे तो तपस्वियोंके तेजका भी ह्रास हो रहा है। पातिव्रत-धर्मके माहात्म्यसे सूर्यदेव उदित नहीं हो रहे हैं। उनके उदय न होनेसे मानवों और आप सभीको यह हानि उठानी पड़ रही है। अतः सूर्योदयकी कामनासे आप सब अत्रिमुनिकी धर्म-पत्नी तपस्विनी पतिपरायणा अनसूयाको प्रसन्न करें। वे ही सूर्योदय कराके पतिव्रता ब्राह्मणीके पतिको भी जीवित कर सकती हैं। ब्रह्माजीके कथनानुसार अनसूयाकी शरणमें जाकर देवताओंने उनकी प्रार्थना की। देवताओंकी प्रार्थनासे अनसूया प्रसन्न हो गयीं। अपने तपःप्रभावसे सूर्योदय कराके उन्होंने ब्राह्मणीके पति कौशिकको जीवित कर दिया। इन महातपस्विनी पतिव्रताकी अपेक्षा सीता और अधिक पतिपरायणा थीं।

(अध्याय १४२)


रामचरितवर्णन (रामायणकी कथा)

ब्रह्माजीने कहा— अब मैं रामायणका वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे समस्त पापोंका विनाश हो जाता है।

भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे मरीचि, मरीचिसे कश्यप, कश्यपसे सूर्य, सूर्यसे वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनुसे इक्ष्वाकु हुए। इन्हीं इक्ष्वाकुके वंशमें रघुका जन्म हुआ। रघुके पुत्र अजसे दशरथ नामक महाप्रतापी राजाने जन्म लिया। उनके महान् बल और पराक्रमवाले चार पुत्र हुए। कौसल्यासे राम, कैकेयीसे भरत और सुमित्रासे लक्ष्मण तथा शत्रुघ्नका जन्म हुआ।

माता-पिताके भक्त श्रीरामने महामुनि विश्वामित्रसे अस्त्र-शस्त्रकी शिक्षा प्राप्तकर ताड़का नामक

काण्ड ]
रामचरितवर्णन ( रामायणकी कथा )
२४७


यक्षिणीका विनाश किया। विश्वामित्रके यज्ञमें बलशाली रामके द्वारा ही सुबाहु नामक राक्षस मारा गया। जनकराजके यज्ञस्थलमें पहुँचकर उन्होंने जानकीका पाणिग्रहण किया। वीर लक्ष्मणने उर्मिला, भरतने कुशध्वजकी पुत्री माण्डवी तथा शत्रुघ्नने कीर्तिमतीका पाणिग्रहण किया, ये महाराज कुशध्वजकी पुत्री थीं।

विवाहके पश्चात् अयोध्यामें जाकर चारों भाई पिताके साथ रहने लगे। भरत और शत्रुघ्न अपने मामा युधाजित्‌के यहाँ चले गये। उन दोनोंके ननिहाल जानेके बाद नृपश्रेष्ठ महाराज दशरथ रामको राज्य देनेके लिये उद्यत हुए। उसी समय कैकेयीने रामको चौदह वर्ष वनमें रहनेका दशरथजीसे वर माँग लिया। अतः लक्ष्मण और सीतासहित मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम पिताके हितकी रक्षाके लिये राज्यको तृणवत् त्यागकर शृंगवेरपुर चले गये। वहाँपर रथका भी परित्यागकर वे सभी प्रयाग गये और वहाँसे चित्रकूटमें जाकर रहने लगे।

इधर रामके वियोगसे दुःखित महाराज दशरथ शरीरका परित्याग कर स्वर्ग पधार गये। मामाके घरसे आकर भरतने पिताका अन्तिम संस्कार किया। तदनन्तर वे दल-बलके साथ रामके पास पहुँचे। उन्होंने विनम्रतापूर्वक अपने ज्येष्ठ भ्राता श्रीरामसे कहा—‘हे महामते ! आप अयोध्या लौट चलें और वहाँका राज्य करें।' रामने राज्यके प्रति अनिच्छा प्रकट कर दी और भरतको अपनी पादुका देकर राज्यकी रक्षाके लिये वापस अयोध्या भेज दिया। भरत वहाँसे लौटकर रामके प्रतिनिधिरूपमें राज्यकार्य देखने लगे। तपस्वी भरतने नन्दिग्राममें ही रहकर राज्यका संचालन किया, वे अयोध्यामें नहीं गये।

राम भी चित्रकूट छोड़कर अत्रिमुनिके आश्रममें चले आये। तदनन्तर वहाँ उन्होंने सुतीक्ष्ण और अगस्त्यमुनिके आश्रममें जाकर उन्हें प्रणाम किया और उसके बाद वे दण्डकारण्य चले गये। वहाँ उन सभीका भक्षण करनेके लिये शूर्पणखा नामकी एक राक्षसी आ धमकी। अतः रामचन्द्रने नाक-कान कटवाकर उस राक्षसीको वहाँसे भगा दिया। उसने जाकर खर-दूषण तथा त्रिशिरा नामके राक्षसोंको युद्धके लिये प्रेरित किया। चौदह हजार राक्षसोंकी सेना लेकर उन लोगोंने रामपर आक्रमण कर दिया। रामने अपने बाणोंसे उन राक्षसोंको यमपुर भेज दिया। राक्षसी शूर्पणखासे प्रेरित रावण सीताका हरण करनेके लिये वहाँ त्रिदण्डी संन्यासीका वेश धारणकर मृगरूपधारी मारीचकी अगुवाईमें आ पहुँचा। मृगका चर्म प्राप्त करनेके लिये सीतासे प्रेरित रामने मारीचको मार डाला। मरते समय उसने ‘हा सीते ! हा लक्ष्मण !' ऐसा कहा।

इसके बाद सीताकी सुरक्षामें लगे लक्ष्मण भी सीताके कहनेपर वहाँ जा पहुँचे। लक्ष्मणको देखकर रामने कहा— यह निश्चित ही राक्षसी माया है। सीताका हरण अवश्य हो गया होगा। इसी बीच बली रावण अवसर पाकर अङ्कमें सीताको लेकर, जटायुको क्षत-विक्षतकर लङ्का चला गया। वहाँ पहुँचकर उसने राक्षसियोंकी निगरानीमें सीताको अशोक-वृक्षकी छायामें ठहरा दिया।

रामने आकर पर्णशालाको सूनी देखा। वे अत्यन्त दुःखित हो उठे। उसके बाद वे सीताकी खोजमें निकल पड़े। मार्गमें उन्होंने जटायुका अन्तिम संस्कार किया और उसीके कहनेसे वे दक्षिण दिशाकी ओर चल पड़े। उस दिशामें आगे बढ़नेपर सुग्रीवके साथ रामकी मित्रता हुई। उन्होंने अपने तीक्ष्ण बाणसे सात तालवृक्षोंका भेदन किया तथा वालीको मारकर किष्किन्धामें रहनेवाले वानरोंके राजाके रूपमें सुग्रीवको अभिषिक्त किया और

२४८संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

स्वयं जाकर ऋष्यमूक पर्वतपर निवास करने लगे।
सुग्रीवने पर्वताकार शरीरवाले उत्साहसे भरे हुए वानरोंको सीताकी खोजमें पूर्वादि दिशाओंमें भेजा। वे सभी वानर जो पूर्व, पश्चिम और उत्तरकी दिशाओंमें गये थे, खाली हाथ वापस लौट आये, किंतु जो लोग दक्षिण दिशामें गये थे उन्होंने वन, पर्वत, द्वीप तथा नदियोंके तटोंको खोज डाला; पर जानकीका कुछ भी पता न चल सका। अन्तमें हताश होकर उन सबने मरनेका निश्चय कर लिया। सम्पातिके वचनसे सीताकी जानकारी प्राप्त करके कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जीने शतयोजन (चार सौ कोस) विस्तृत समुद्रको लाँघकर लङ्कामें अशोकवाटिकाके अन्दर रह रही सीताका दर्शन किया, जिनका तिरस्कार राक्षसियाँ और रावण स्वयं करता था। इन सबके द्वारा बराबर यह कहा जा रहा था कि तुम रावणकी पत्नी बन जाओ, किंतु वे हृदयमें सदैव रामका ही चिन्तन करती थीं।
हनुमान्‌ने (ऐसी दयनीय स्थितिमें रह रही) सीताको कौसल्यानन्दन रामके द्वारा दी गयी अंगूठी देकर अपना परिचय देते हुए कहा कि 'हे मैथिलि ! मैं श्रीरामका दूत हूँ। आप अब दुःख न करें। आप मुझे कोई अपना चिह्नविशेष दें, जिससे भगवान् श्रीराम आपको समझ सकें।' हनुमान्‌का यह वचन सुनकर सीताने अपना चूडामणि उतारकर दे दिया और कहा कि 'हे कपिराज ! राम जितना ही शीघ्र हो सके उतना ही शीघ्र मुझको यहाँसे ले चलें।' ऐसा आप उनसे कहियेगा। हनुमान्‌ने कहा कि ऐसा ही होगा। तदनन्तर वे उस दिव्य अशोक वनको विध्वंस करने लगे। उसे विनष्टकर उन्होंने रावणके पुत्र अक्ष तथा अन्य राक्षसोंको मार डाला और स्वयं मेघनादके पाशमें बन्दी भी बन गये। रावणको देखकर हनुमान्‌ने कहा कि हे रावण ! मैं श्रीरामका दूत हनुमान् हूँ। आप रामको सीता लौटा दें। यह सुनकर रावण क्रुद्ध हो उठा। उसने उनकी पूँछमें आग लगवा दी।
महाबली हनुमान्‌ने उस जलती हुई पूँछसे लंकाको जला डाला। वे पुनः रामके पास लौट आये और बताया कि मैंने सीता माताको देखा, तदनन्तर हनुमान्‌जीने सीताद्वारा दिया गया चूडामणि उन्हें दे दिया। इसके बाद सुग्रीव, हनुमान्, अंगद तथा लक्ष्मणके साथ राम लङ्कापुरीमें जा पहुँचे। रावणका भाई विभीषण भी रामकी शरणमें आ गया। श्रीरामने उसे लङ्काके राजपदपर अभिषिक्त कर दिया। रामने नलके द्वारा सेतुका निर्माण कराकर समुद्रको पार किया था। (समुद्रके तटपर) सुवेल पर्वतपर उपस्थित होकर उन्होंने लङ्कापुरीको देखा।
तदनन्तर नील, अंगद, नलादि मुख्य वानरों तथा धूम्राक्ष, वीरेन्द्र तथा ऋक्षपति जाम्बवान्, मैन्द, द्विविद आदि मुख्य वीरोंने लङ्कापुरीको नष्ट कर डाला। विशाल शरीरवाले काले-काले पहाड़के समान राक्षसोंको अपनी वानरी सेनाके साथ राम-लक्ष्मणने मार गिराया। विद्युज्जिह्व, धूम्राक्ष, देवान्तक, नरान्तक, महोदर, महापार्श्व, महाबल, अतिकाय, कुम्भ, निकुम्भ, मत्त, मकराक्ष, अकम्पन, प्रहस्त, उन्मत्त, कुम्भकर्ण तथा मेघनादको अस्त्रादिसे राम-लक्ष्मणने काट डाला। तदनन्तर उन महापराक्रमी श्रीरामने बीस भुजाओंके समूहको छिन्न-भिन्न करके रावणको भी धराशायी कर दिया।
उसके बाद अग्निमें प्रविष्ट होकर अपनी शुद्धताको प्रमाणित की हुई सीताके साथ लक्ष्मण एवं वानरोंसे युक्त राम पुष्पक विमानमें बैठकर अपनी श्रेष्ठतम नगरी अयोध्या लौट आये। वहाँपर राज्य-सिंहासन प्राप्तकर उन्होंने प्रजाका पुत्रवत् पालन करते हुए राज्य किया। दस अश्वमेध-यज्ञोंका अनुष्ठान करके रामने गयातीर्थमें पितरोंको विधिवत् पिण्डदान दिया और ब्राह्मणोंको विभिन्न

काण्ड ] हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्णकथा ) २४१

प्रकारका दान देकर कुश और लवको राज्यसिंहासन सौंप दिया।

रामने ग्यारह हजार वर्षतक राज्य किया।* शत्रुघ्नने लवण नामक दैत्यका विनाश किया। भरतके द्वारा शैलूष नामक गन्धर्व मारे गये। इसके पश्चात् उन सभीने अगस्त्यादि मुनियोंको प्रणाम करके उनसे राक्षसोंकी उत्पत्तिकी कथा सुनी। तदनन्तर अपने अवतारका प्रयोजन पूर्ण करके भगवान् श्रीराम अयोध्यामें रहनेवाली प्रजाके साथ स्वर्गलोकको चले गये। (अध्याय १४३)

हरिवंशवर्णन ( श्रीकृष्णकथा )

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं हरिवंशका वर्णन करूँगा, जो भगवान् कृष्णके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण श्रेष्ठतम है।

पृथिवीपर धर्म आदिकी रक्षा और अधर्मादिके विनाशके लिये वसुदेव तथा देवकीसे कृष्ण और बलरामका प्रादुर्भाव हुआ। जन्मके कुछ ही दिन बाद कृष्णने पूतनाके स्तनोंको दृढ़तापूर्वक पीकर उसे मृत्युके पास पहुँचा दिया था। तदनन्तर शकट (छकड़े)-को बालक्रीडामें उलटकर सभीको विस्मित करते हुए इन्होंने यमलार्जुन-उद्धार, कालियनाग-दमन, धेनुकासुर-वध, गोवर्धन-धारण आदि अनेक लीलाएँ कीं और इन्द्रद्वारा पूजित होकर पृथिवीको भारसे विमुक्त किया तथा अर्जुनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की।

इनके द्वारा अरिष्टासुर आदि अनेक बलवान् शत्रु मारे गये। इन्होंने केशी नामक दैत्यका वध किया तथा गोपोंको संतुष्ट किया। उसके बाद चाणूर और मुष्टिक नामक मल्ल इनके द्वारा ही पराजित हुए। ऊँचे मंचपर अवस्थित कंसको वहाँसे नीचे पटककर इन्होंने ही मारा था।

श्रीकृष्णकी रुक्मिणी, सत्यभामा आदि आठ प्रधान पत्नियाँ थीं। इनके अतिरिक्त महात्मा श्रीकृष्णकी सोलह हजार अन्य स्त्रियाँ थीं। उन स्त्रियोंसे उत्पन्न हुए पुत्र-पौत्रोंकी संख्या सैकड़ों-हजारोंमें थी। रुक्मिणीके गर्भसे प्रद्युम्न उत्पन्न हुए, जिन्होंने शम्बरासुरका वध किया था। इनके पुत्र अनिरुद्ध हुए, जो बाणासुरकी पुत्री उषाके पति थे। अनिरुद्धके विवाहमें कृष्ण और शङ्करका महाभयंकर युद्ध हुआ और इसी युद्धमें हजार भुजाओंवाले बाणासुरकी दो भुजाओंको छोड़कर शेष सभी भुजाएँ कृष्णके द्वारा काट डाली गयीं।

नरकासुरका वध इन्हीं महात्मा श्रीकृष्णने किया था। नन्दनवनसे बलात् पारिजात-वृक्ष सत्यभामाके लिये ये ही उखाड़कर लाये थे। बल नामक दैत्य, शिशुपाल नामक राजा तथा द्विविद नामक बन्दरका वध इन्हींके द्वारा हुआ था।

अनिरुद्धसे वज्र नामका पुत्र हुआ। कृष्णके स्वर्गारोहणके पश्चात् वही इस वंशका राजा बना था। सान्दीपनि नामक मुनि कृष्णके गुरु थे। कृष्णने ही गुरु सान्दीपनिकी पुत्रप्राप्तिकी अभिलाषाको पूर्ण किया था। मथुरामें उग्रसेन और देवताओंकी रक्षा इन्होंने ही की थी। (अध्याय १४४)


* एकादशसहस्राणि रामो राज्यमकारयत्। (ग०पु० १४३। ५०)

२५० संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा—अब मैं महाभारतके युद्धकी कथाका वर्णन करूँगा, जो पृथिवीपर बढ़े हुए अत्याचारके भारको उतारनेके लिये हुआ था, जिसकी योजना युधिष्ठिरादि पाण्डवोंकी रक्षाके लिये तत्पर कृष्णने स्वयं की थी।

भगवान् विष्णुके नाभिकमलसे ब्रह्माकी उत्पत्ति हुई। ब्रह्मासे अत्रि, अत्रिसे सोम, सोमसे बुध हुए। बुधने इला नामक अपनी पत्नीसे पुरूरवाको उत्पन्न किया। पुरूरवासे आयु, आयुसे ययाति और ययातिके वंशमें भरत, कुरु तथा शान्तनु हुए। राजा शान्तनुकी पत्नी गङ्गासे भीष्म हुए। भीष्म सर्वगुणसम्पन्न तथा ब्रह्मविद्याके पारङ्गत विद्वान् थे।

शान्तनुकी सत्यवती नामक एक दूसरी पत्नी थी। उस पत्नीके दो पुत्र हुए, जिनका नाम चित्रांगद तथा विचित्रवीर्य था। चित्रांगद नामवाले गन्धर्वके द्वारा युद्धमें चित्रांगद मार डाला गया। विचित्रवीर्यका विवाह काशिराजकी पुत्री अम्बिका और अम्बालिकाके साथ हुआ। विचित्रवीर्य भी निःसंतान ही मर गये थे। अतः व्याससे उनके दो क्षेत्रज पुत्रों—अम्बिकाके गर्भसे धृतराष्ट्र तथा अम्बालिकाके गर्भसे पाण्डुका जन्म हुआ। उन्हीं व्यासके द्वारा दासीके गर्भसे विदुरका जन्म हुआ। धृतराष्ट्रके गान्धारीसे सौ पराक्रमी पुत्र हुए, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था। पाण्डुपत्नी कुन्ती और माद्रीसे पाँच पुत्रोंका जन्म हुआ। युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल तथा सहदेव—ये पाँचों पुत्र बड़े ही बलवान् और पराक्रमशाली थे।

दैववशात् कौरव और पाण्डवोंमें वैरभाव उत्पन्न हो गया। उद्धत स्वभाववाले दुर्योधनद्वारा पाण्डवजन बहुत ही सताये गये। लाक्षागृहमें उन्हें विश्वासघातसे जलाया गया, किंतु वे अपनी बुद्धिमत्तासे बच गये। उसके बाद उन लोगोंने एकचक्रा नामक पुरीमें जाकर एक ब्राह्मणके घरमें शरण ली। वहाँ रहते हुए उन सभीने बक नामक राक्षसका संहार किया। तदनन्तर पाञ्चाल नगरमें हो रहे द्रौपदीके स्वयंवरको जानकर वे सभी वहाँ पहुँचे। वहाँ अपने पराक्रमका परिचय देकर उन पाण्डवोंने द्रौपदीको पत्नीके रूपमें प्राप्त किया।

इसके बाद द्रोणाचार्य और भीष्मकी अनुमतिसे धृतराष्ट्रने पाण्डवोंको अपने पास बुला लिया और आधा राज्य उन्हें दे दिया। आधा राज्य प्राप्त करनेके पश्चात् इन्द्रप्रस्थ नामक एक सुन्दर नगरीमें रहकर वे राज्य करने लगे। उन तपस्वी पाण्डवोंने वहाँपर एक सभामण्डपका निर्माण करके राजसूय-यज्ञका अनुष्ठान किया।

तत्पश्चात् मुरारि भगवान् वासुदेवकी अनुमतिसे ही द्वारकापुरीमें जाकर अर्जुनने उनकी बहन सुभद्राका पाणिग्रहण किया। उन्हें अग्निदेवसे नन्दिघोष नामक दिव्य रथ, तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध गाण्डीव नामका श्रेष्ठतम दिव्य धनुष, अविनाशी बाण तथा अभेद्य कवच प्राप्त हुआ। उसी धनुषसे कृष्णके सहचर वीर अर्जुनने अग्निको खाण्डव-वनमें संतुष्ट किया था। दिग्विजयमें देश-देशान्तरके राजाओंको जीतकर उनसे प्राप्त रत्नराशि लाकर उन्होंने अपने नीति-परायण ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिरको सौंप दी।

भाइयोंके साथ धर्मराज युधिष्ठिर कर्ण, दुःशासन और शकुनिके मतमें स्थित पापी दुर्योधनके द्वारा द्यूतक्रीड़ाके मायाजालमें जीत लिये गये। उसके बाद बारह वर्षोंतक उन्हें वनमें महान् कष्ट उठाना पड़ा। तदनन्तर धौम्य ऋषि तथा अन्य मुनियोंके साथ द्रौपदीसहित वे पाँचों पाण्डव विराट-नगर गये और गुप्तरूपसे वहाँ रहने लगे। एक वर्षतक वहाँ रहकर दुर्योधनद्वारा हरण की जाती हुई गायोंका प्रत्याहरण करके अर्थात् वापस लौटाकर वे अपने राज्यमें जा पहुँचे। सम्मानपूर्वक दुर्योधनसे उन्होंने अपने आधे राज्यके हिस्सेके रूपमें पाँच गाँव माँगे, किंतु दुर्योधनसे वे भी प्राप्त न हो सके। अतः कुरुक्षेत्रके मैदानमें उन वीरोंको युद्ध करना पड़ा। उसमें पाण्डवोंकी ओर सात दिव्य अक्षौहिणी सेना थी और दुर्योधनादि

काण्ड ] महाभारतकी कथा एवं बुद्ध आदि अवतारोंकी कथाका वर्णन २५१


ग्यारह अक्षौहिणी सेनासे युक्त थे। यह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान महाभयंकर हुआ था।

सबसे पहले दुर्योधनकी सेनाके सेनापति भीष्म हुए और पाण्डवोंका सेनापति शिखण्डी बना। उन दोनोंके बीचमें शस्त्र-से-शस्त्र तथा बाण-से-बाण भिड़ गये। दस दिनोंतक महाभयंकर युद्ध होता रहा। शिखण्डी और अर्जुनके सैकड़ों बाणोंसे बिंधकर भीष्म धराशायी हो गये, किंतु इच्छामृत्युका वरदान होनेसे भीष्मकी उस समय मृत्यु नहीं हुई। जब सूर्य उत्तरायणमें आ गये तब धर्म-सम्बन्धित विभिन्न उपदेश देकर उन्होंने अपने पितरोंका तर्पण किया और भगवान् गदाधरका ध्यान करते हुए अन्तमें वे उस परमपदको प्राप्त हुए, जहाँपर आनन्द-ही-आनन्द है और जो निर्मल आत्माओंके लिये मुक्तिका स्थान है।

तदनन्तर सेनापतिके पदपर द्रोणाचार्य आसीन हुए। उनका युद्ध पाण्डव-सेनापति धृष्टद्युम्नके साथ हुआ। यह परम दारुण युद्ध पाँच दिनोंतक चलता रहा। जितने भी राजा इस युद्धमें सम्मिलित हुए, वे सभी अर्जुनके द्वारा मारे गये। पुत्रशोकका समाचार सुनकर द्रोणाचार्य उस शोकके सागरमें डूबकर मर गये।

इसके बाद वीर अर्जुनसे लड़नेके लिये कर्ण युद्धभूमिमें आया। दो दिनोंतक महाभयानक युद्ध करके वह भी उनके द्वारा प्रयुक्त अस्त्रोंसे न बच सका। तत्पश्चात् शल्य धर्मराजसे युद्ध करनेके लिये गया। अपराह्नकाल होनेके पूर्व ही धर्मराजके तीक्ष्ण बाणोंसे वह भी चल बसा।

तदनन्तर कालान्तक यमराजके समान क्रुद्ध दुर्योधन गदा लेकर भीमसेनको मारनेके लिये दौड़ा, किंतु वीर भीमसेनने अपनी गदासे उसे गिरा दिया। उसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने रात्रिमें सोयी हुई पाण्डवोंकी सेनापर आक्रमण कर दिया। अपने पिताके वधका स्मरण करके उसने बड़ी ही बहादुरीसे बहुतोंको मौतके घाट उतार दिया। धृष्टद्युम्नका वध करके उसने द्रौपदीके पुत्रोंको भी मार डाला। इस प्रकार पुत्रोंका वध होनेसे दुःखित एवं रोती हुई द्रौपदीको देखकर अर्जुनने अश्वत्थामाको परास्तकर ऐषिक नामक अस्त्रसे उसकी शिरोमणिको निकाल लिया।

उसके बाद अत्यन्त शोकसन्तप्त स्त्रीजनोंको आश्वस्त करके धर्मराज युधिष्ठिरने स्नान करके देवता और पितृजनोंका तर्पण किया। तत्पश्चात् भीष्मके द्वारा दिये गये सदुपदेशोंसे आश्वस्त महात्मा युधिष्ठिर पुनः राज्यकार्यमें लग गये। अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान करके उन्होंने भगवान् विष्णुका पूजन किया तथा विधिवत् ब्राह्मणोंको दक्षिणादि देकर संतुष्ट किया। साम्बके पेटसे निकले हुए मूसलके द्वारा यदुवंशियोंके विनाशका समाचार सुनकर उन्होंने राज्यसिंहासनपर अभिमन्युके पुत्र परीक्षित्को बैठाकर भीमादि अपने सभी भाइयोंसहित विष्णुसहस्रनामका जप करते हुए स्वयं भी स्वर्गके मार्गका अनुगमन किया।

वासुदेव कृष्ण असुरोंको व्यामोहित करनेके लिये बुद्धरूपमें अवतरित हुए। अब वे कल्कि होकर फिर सम्भल ग्राममें अवतार लेंगे और घोड़ेपर सवार होकर वे संसारके सभी विधर्मियोंका विनाश करेंगे।

अधर्मको दूर करनेके लिये, सत्त्वगुण-प्रधान देवता आदिकी रक्षा और दुष्टोंका संहार करनेके निमित्त भगवान् विष्णुका समय-समयपर वैसे ही अवतार होता है, जैसे समुद्रमन्थनके समय धन्वन्तरि होकर उन्होंने देवता आदिकी रक्षाके लिये विश्वामित्रके पुत्र महात्मा सुश्रुतको आयुर्वेदका उपदेश किया।

इस तरह महाभारतकी कथा एवं भगवान्के अवतारोंकी कथाका मैंने वर्णन किया, इसे सुनकर मनुष्य स्वर्गको प्राप्त करता है। (अध्याय १४५)


२५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

आयुर्वेद-प्रकरण

[गरुडपुराणका आयुर्वेद-प्रकरण अत्यन्त महत्त्वका है। इस प्रकरणके प्रथम बीस अध्यायोंमें निदान-स्थानके विषय वर्णित हैं। किस कारणसे रोग उत्पन्न हुआ है और रोगके लक्षण क्या हैं जिससे रोगका निर्णय हो सके इत्यादि विषय 'निदान' शब्दसे अभिप्रेत हैं। इसके बाद लगभग चालीस अध्यायोंमें रोगोंकी चिकित्सा-हेतु औषधियोंका निरूपण हुआ है तथा उन औषधियोंके निर्माणकी विधि बतायी गयी है। इस औषधिका यह अनुपान है, किस प्रकार इसका सेवन करना चाहिये आदि बताया गया है। एक ही रोगके लिये अनेक औषधिक योगोंको भी बताया गया है, पर यह सब किसी सुयोग्य वैद्यके परामर्शसे ही करना उचित है।

उपलब्ध गरुडपुराणका पाठ कहीं-कहीं अस्पष्ट तथा खण्डित भी प्रतीत होता है। आयुर्वेदके आर्षग्रन्थोंका आश्रय करके यथासम्भव अर्थ ठीक करनेकी चेष्टा की गयी है, पाठकोंको इससे लाभ उठाना चाहिये—सम्पादक]

निदानका अर्थ तथा रोगोंका सामान्य निदान-निरूपण

धन्वन्तरिजीने कहा— हे सुश्रुत! प्राचीन कालमें आत्रेय आदि श्रेष्ठ मुनियोंने जिस प्रकार सभी रोगोंका निदान बताया है, वैसे ही मैं तुम्हें सुनाऊँगा। पाप्मा, ज्वर, व्याधि, विकार, दुःख, आमय, यक्ष्मा, आतङ्क, गद और आबाध—ये पर्यायवाची शब्द हैं।

रोगके ज्ञानके पाँच उपाय हैं—निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति। निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान तथा कारण—इन पर्यायोंसे निदान कहा जाता है अर्थात् निमित्त आदि शब्दोंसे जिस वस्तुका निश्चय होता है वही निदान है। दोष-विशेषके ज्ञानके बिना ही उत्पन्न होनेवाला रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उसे पूर्वरूप कहते हैं। यह पूर्वरूप सामान्य और विशिष्ट-भेदसे दो प्रकारका होता है। यह उत्पद्यमान रोग जिन लक्षणोंसे जाना जाता है, उन लक्षणोंको अल्पताके कारण थोड़ा व्यक्त होनेसे पूर्वरूप कहा जाता है। वही पूर्वरूप व्यक्त हो जानेपर रूप कहलाता है। संस्थान, व्यञ्जन, लिङ्ग, लक्षण, चिह्न और आकृति—ये रूपके पर्यायवाची शब्द हैं। हेतु-विपरीत, व्याधि-विपरीत, हेतु-व्याधि-उभय-विपरीत तथा हेतु-विपरीत अर्थकारी (हेतुके समान प्रतीत होनेपर भी विपरीत क्रिया करनेवाला), व्याधि-विपरीत अर्थकारी और हेतु-व्याधि-उभय-विपरीत अर्थकारी औषध, अन्न तथा विहारके परिणाममें सुखदायक उपयोगको उपशय कहते हैं, इसीका नाम सात्म्य भी है। उपशयके विपरीत अनुपशय होता है। इसका दूसरा नाम व्याध्यसात्म्य भी है। दोष जिस प्रकार (प्राकृत आदि विविध) निदानोंसे दूषित होकर (ऊर्ध्व आदि भिन्न गतियोंके द्वारा शरीरमें) विसर्पण करते हुए (धातु आदिको दूषित कर) रोगको उत्पन्न करता है, उसे सम्प्राप्ति कहा जाता है। उसके पर्यायवाची शब्द हैं—जाति तथा आगति।

संख्या, विकल्प, प्राधान्य, बल और व्याधि कालकी विशेषताओंके आधारपर उस सम्प्राप्तिके भेद किये जाते हैं। जैसे इसी शास्त्रमें बताया जायगा कि ज्वरके आठ भेद होते हैं (यह संख्यासम्प्राप्ति हुई)। रोगोत्पत्तिमें कारणभूत दोषोंकी अंशांशकल्पना (न्यूनाधिक्य आदि)-का विवेचन विकल्पसम्प्राप्ति, स्वतन्त्रता और परतन्त्रताद्वारा दोषोंका प्राधान्य या अप्राधान्य-विवेचन प्राधान्यसम्प्राप्ति, हेतु-पूर्वरूप और रूपकी सम्पूर्णता अथवा अल्पताके द्वारा बल या अबलका विवेचन बलसम्प्राप्ति और दोषानुसार रात्रि, दिन, ऋतु एवं भोजन (-के परिपाक)-के अंश (आदि, मध्य और अन्त)-द्वारा रोगकालके ज्ञानको कालसम्प्राप्ति समझना चाहिये।

इस प्रकार निदानके सामान्य अभिधेयों (निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और सम्प्राप्ति)-का निरूपण किया गया। सम्प्रति उनका विस्तारसे वर्णन किया