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गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

महिमा एवं सपिण्डीकरण-श्राद्धका स्वरूप

५५२संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड-

जलमें, तेजस्तत्त्व तेजमें, वायुतत्त्व वायुमें, आकाशतत्त्व आकाशमें तथा सर्वव्यापी आत्मतत्त्व शिवमें लीन हो जाता है।

हे तार्क्ष्य ! काम-क्रोध तथा पञ्चेन्द्रियोंका समूह शरीरमें चोरके समान स्थित कहा गया है। देहमें काम-क्रोध तथा अहंकारसहित मन भी रहता है, वही सबका नायक है। पुण्य-पापसे संयुक्त होकर काल उसका संहारक बन जाता है। संसारमें भोगके लिये योग्य शरीरका निर्माण अपने कर्मके अनुसार होता है। मनुष्य अपने सत्कर्म और दुष्कर्मसे दूसरे शरीरमें प्रविष्ट होता है। जिस प्रकार पुराने घरके जल जानेपर गृही नये घरमें जाकर शरण लेता है, उसी प्रकार यह जीव भी विषयोंके साथ पञ्चेन्द्रियोंसे युक्त नौ द्वारवाले एक शरीरको छोड़कर दूसरे शरीरमें आश्रय ग्रहण करता है। शरीरमें विद्यमान धातुएँ माता-पितासे ही प्राप्त हैं, इन्हींसे निर्मित यह शरीर षाट्कौशिक* कहलाता है। हे गरुड ! शरीरमें सभी प्रकारके वायु रहते हैं, मूत्र-पुरीष तथा उन्हींके योगसे उत्पन्न अन्यान्य व्याधियाँ रहती हैं। अस्थि, शुक्र तथा स्नायु शरीरके साथ ही जल जाते हैं।

हे पक्षिन् ! सभी प्राणियोंके शरीरका विनाशक्रम यही है, इसे मैंने कह दिया। प्राणियोंका शरीर कैसा होता है, उसको अब मैं फिरसे कह रहा हूँ।

हे गरुड ! पुरुषका शरीर छोटी-बड़ी नसोंसे बँधा हुआ एक स्तम्भ है, जिसको नीचेसे पैररूपी दो अन्य स्तम्भ धारण किये हैं। पञ्चेन्द्रियोंसहित उसमें नौ द्वार हैं। सांसारिक विषयोंसे युक्त एवं काम-क्रोधसे बेचैन जीव इसी शरीरमें रहता है। राग-द्वेषसे व्याप्त यह शरीर तृष्णाका दुस्तर दुर्ग है। नाना प्रकारके लोभोंसे भरे हुए जीवका यह शरीर पुर है। यही स्थिति सभी शरीरोंकी है। इसी शरीरमें सभी देवता और चौदहों लोक स्थित हैं। जो लोग अपनेको नहीं पहचानते, वे पशुके समान माने गये हैं।

हे पक्षिराज ! इस प्रकार ऊपर बतायी गयी प्रक्रियासे निर्मित शरीरका वर्णन मैंने किया। सृष्टिमें चौरासी लाख योनियाँ बतायी गयी हैं, जो उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज और जरायुज—इन चार मुख्य भागोंमें विभक्त हैं। (अध्याय ३१)


शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव, गर्भमें जीवका स्वरूप तथा उसकी वृद्धिका क्रम, शरीरके निर्माणमें पञ्चतत्त्वादिका अवदान, षाट्कौशिक शरीर, गर्भसे जीवके बाहर निकलनेपर विष्णुमायाद्वारा मोहित होना, आतुर व्यक्तिके लिये क्रियमाण कर्म तथा उनका फल, पिण्ड और ब्रह्माण्डकी समान स्थिति

तार्क्ष्यने कहा— हे प्रभो ! उद्भिज्ज, स्वेदज, अण्डज तथा जरायुज—ये चार प्रकारके प्राणी किस प्रकार उत्पन्न होते हैं? त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा और अस्थिमें जीव कैसे आता है? दो पैर, दो हाथ, गुह्यभाग, जिह्वा, केश, नख, सिर, संधिमार्ग तथा नाना प्रकारकी बहुत-सी रेखाओंकी उत्पत्ति कैसे होती है? काम, क्रोध, भय, लज्जा, हर्ष, सुख और दुःखका भाव मनमें कैसे आता है?


* त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, मज्जा तथा अस्थि—इन षट् धातुओंसे निर्मित शरीर 'षाट्कौशिक' कहलाता है।

प्रेतकल्प ] शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव ५५३

इस शरीरका चित्रण, छिद्रण और विभिन्न प्रकारकी नसोंसे वेष्टन कैसे हुआ है? हे हृषीकेश! इस असार भवसागरमें शारीरिक रचनाको मैं इन्द्रजाल ही मानता हूँ। हे स्वामिन्! नाना दुःखोंसे भरे हुए इस असार सागररूप संसारका कर्ता कौन है?

श्रीविष्णुने कहा— हे गरुड! कोशके निर्माणकी परम गोपनीय प्रक्रियाको मैं कहता हूँ, इसके जाननेमात्रसे व्यक्ति सर्वज्ञ हो जाता है। हे वैनतेय! संसारके प्रति दया करते हुए तुमने जीवके कारण-तत्त्वपर अच्छा प्रश्न किया है। एकाग्रचित्त होकर तुम उसे सुनो।

स्त्रियाँ ऋतुकालमें चार दिन त्याज्य होती हैं, क्योंकि प्राचीन कालमें ब्रह्माने वृत्रासुरके मारे जानेपर लगी हुई ब्रह्महत्याको इन्द्रके शरीरसे निकालकर एक चौथाई भाग स्त्रियोंको दे दिया था, उसीके कारण स्त्रियाँ ऋतुकालके आरम्भमें चार दिन अपवित्र मानी जाती हैं और उस समयतक इनका मुख नहीं देखना चाहिये, जबतक वह पाप उनके शरीरमें विद्यमान रहता है। स्त्रीको ऋतुकालके पहले दिन चाण्डाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन रजकी मानना चाहिये। चौथे दिन वह शुद्ध होती है। एक सप्ताहमें वह देवता और पितरोंके पूजनयोग्य हो जाती है। प्रथम सप्ताहके बीच जो गर्भ स्त्रीमें रुक जाता है, उसकी उत्पत्ति मलिम्लुचसे माननी चाहिये। वीर्यस्थापनके समय माता-पिताके चित्तमें जैसी कल्पना होगी, वैसे ही गर्भका जन्म होगा, इसमें संदेह नहीं है।

युग्म तिथिवाली रात्रियोंमें सहवास करनेसे पुत्र और अयुग्म रात्रियोंमें सहवास करनेसे कन्याका जन्म होता है। अतः ऋतुकालके पहले सप्ताहको छोड़कर दूसरे सप्ताहकी युग्म तिथियोंमें सहवासमें प्रवृत्त होना चाहिये। सामान्यतः स्त्रियोंका ऋतुकाल सोलह रात्रियोंका होता है। यदि चौदहवीं रात्रिमें गर्भाधानकी क्रिया होती है तो उस गर्भसे गुणवान्, भाग्यवान्, धनवान् तथा धर्मनिष्ठ पुत्रका जन्म होता है। हे पक्षिराज! वह रात्रि सामान्य लोगोंको प्राप्त होना सम्भव नहीं है। प्रायः स्त्रीमें गर्भोत्पत्ति आठवीं रात्रियोंके मध्यमें ही हो जाती है। ऋतुकालके पाँचवें दिन स्त्रियोंको कटु, क्षार, तीक्ष्ण और उष्ण भोजनका परित्याग करके मधुर भोजन करना चाहिये; क्योंकि उनकी कोख औषधिपात्र है और पुरुषका बीज अमृततुल्य है। उसमें (स्त्रीरूप औषधिपात्रमें) बीज वपन करके मनुष्य सम्यक् फल प्राप्त कर सकता है, इसलिये उसको क्रोधादिकी ज्वालासे बचाकर मधुर भोजन तथा मृदु स्वभावकी शीतलतासे अभिसिंचित करना चाहिये। पुरुषको चाहिये कि वह पहले ताम्बूल और पुष्पोंकी माला तथा चन्दनसे सुवासित होकर स्वच्छ एवं सुन्दर वस्त्र धारण करे। तदनन्तर शुद्ध मनसे स्त्रीकी शय्यापर शयन करनेके लिये जाय। वीर्य-वपनके समय उसके चित्तमें जैसी कल्पना होगी, उसी स्वभाववाली संतान जन्म लेगी। प्रारम्भमें शुक्र और रक्तके संयोगसे जीव पिण्डरूपमें अस्तित्वको प्राप्त करता है और गर्भमें वह उसी प्रकार बढ़ता है, जिस प्रकार आकाशमें चन्द्रमाकी अभिवृद्धि होती है।

शुक्रमें चैतन्य बीजरूपसे स्थित रहता है। जब काम चित्त तथा शुक्र ऐक्यभावको प्राप्त हों, उस समय स्त्रीके गर्भाशयमें जीव एक निश्चित रूप धारण करनेकी पूर्वावस्थामें आता है। रक्ताधिक्य होनेपर कन्या और शुक्राधिक्य होनेपर पुत्र होता है। जब रक्त तथा शुक्र समान होते हैं तो गर्भमें स्थित संतानें नपुंसक होती हैं। शुक्र तथा शोणित पहले दिन और रातमें कलल, पाँचवें दिन बुद्बुद तथा चौदहवें दिन मांस-रूपमें हो जाता है। उसके बाद वह घनीभूत मांस गर्भमें रहता हुआ क्रमशः

५५४संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बीसवें दिनतक पिण्डरूपमें बढ़ता है। तदनन्तर पचीसवें दिन उसमें शक्ति और पुष्टताका संचार होने लगता है। एक मास पूरा होते ही वह पञ्चतत्त्वोंसे युक्त हो जाता है। तत्पश्चात् उस गर्भस्थ जीवके शरीरपर दूसरे मासमें त्वचा और मेदा, तीसरे मासमें मज्जा तथा अस्थि, चौथे मासमें केश एवं अँगुली, पाँचवें मासमें कान, नाक तथा वक्षःस्थलका निर्माण होता है। उसके बाद छठे मासमें कण्ठ, रन्ध्र और उदर, सातवें मासमें गुह्यादि भाग तथा आठवें मासमें वह सभी अङ्ग-प्रत्यङ्गोंसे पूर्ण हो जाता है। आठवें मासमें ही वह जीव माताके गर्भमें बार-बार चलने लगता है और नवें मासमें उस गर्भस्थ शिशुका ओजगुण परिपक्व हो जाता है। उसके बाद गर्भवासका काल बीतनेपर वह गर्भस्थ शिशु गर्भसे निकलना चाहता है। वह चाहे कन्या हो, चाहे पुत्र, चाहे नपुंसक हो, फिर उसका जन्म होता है।

इस प्रकार जन्म, पुष्टि तथा संहार—इन तीनोंकी शक्तिसे युक्त षट्कोशोंके भीतर विद्यमान पाँच इन्द्रिय, दस नाड़ी, दस प्राण और दस गुणसे समन्वित शरीरको जो जान लेता है, वही योगी है। जीवका पाञ्चभौतिक शरीर मज्जा, अस्थि, शुक्र, मांस, रोम तथा रक्त—इन छः कोशोंसे निर्मित पिण्ड एक है। नवें या दसवें मासमें इसका पाञ्चभौतिक स्वरूप अत्यन्त स्पष्ट हो जाता है। प्रसवकालीन वायुसे आकृष्ट, तात्कालिक पीड़ासे बेचैन, माताकी सुषुम्णा नाड़ीके द्वारा दी जा रही शक्तिसे पुष्ट वह जीव गर्भसे निकलनेका यथाशीघ्र प्रयास करता है। पृथ्वी, जल, हवि, भोक्ता, वायु तथा आकाश—इन छः भूतोंसे पीड़ित होता हुआ जीव स्नायु-तन्त्रिकाओंसे आबद्ध रहता है। इन्हींको विद्वानोंने मूलभूत तत्त्व कहा है, ये शरीरमें फैली हुई सात नाड़ियोंके बीचमें रहते हैं। त्वचा, अस्थि, नाड़ी, रोम और मांस—ये पाँच पृथ्वीतत्त्वके कारण-शरीरमें आते हैं।

हे काश्यप! इसी प्रकार लार, मूत्र, शुक्र, मज्जा तथा रक्त—ये पाँच जलतत्त्वके कारण-शरीरमें पाये जाते हैं। हे तार्क्ष्य! क्षुधा, तृषा, निद्रा, आलस्य एवं कान्ति—ये पाँच तेजस्तत्त्वके कारण-शरीरमें पाये जाते हैं। ऐसे ही राग, द्वेष, लज्जा, भय और मोह—ये पाँच वायुतत्त्वके कारण-शरीरमें पाये जाते हैं। आकुञ्चन, धावन, लंघन, प्रसारण तथा निरोध—ये भी पाँचों वायुतत्त्वके कारण-शरीरमें ही पाये जाते हैं। हे गरुड! शब्द, चिन्ता, गाम्भीर्य, श्रवण और सत्यसंक्रम (सत्य और असत्यका विवेक)—ये पाँच आकाशतत्त्वके कारण-शरीरमें आते हैं, ऐसा तुम्हें जानना चाहिये।

श्रोत्र, त्वक्, नेत्र, जिह्वा तथा नाक—ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, जबकि हाथ, पैर, गुदा, वाणी और गुह्य—ये कर्मेन्द्रियाँ हैं। इडा, पिंगला, सुषुम्णा, गान्धारी, गजजिह्वा, पूषा, यशा, अलम्बुषा, कुहू तथा शंखिनी—ये दस नाड़ियाँ मानी गयी हैं। यही प्रधान दस नाड़ियाँ पिण्ड (शरीर)-के मध्य स्थित रहती हैं। प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त तथा धनञ्जय नामके दस वायु प्राणियोंके शरीरमें विद्यमान रहते हैं। केवल खाया गया अन्न ही देहधारियोंके शरीरको पुष्ट करता है और इस खाये गये अन्नको प्राणवायु ही शरीरमें तथा उसकी सभी संधियोंमें पहुँचाता है। भोजनके रूपमें ग्रहण किया गया आहार वायुके द्वारा दो रूपोंमें विभक्त किया जाता है। इसके अनन्तर यह प्राणवायु ही गुदाभागमें प्रविष्ट होकर अन्न और जलको पृथक्-पृथक् कर देता है तथा यही प्राणवायु अग्निके ऊपर जलको एवं जलके ऊपर अन्नको पहुँचाकर स्वयं अग्निके नीचे रहते हुए अग्निको धीरे-धीरे उद्दीप्त करता है। तत्पश्चात्

प्रेतकल्प ] शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव ५५५


वायुसे उद्दीप्त किया हुआ अग्नि अन्नके रसभागको अलग और शुष्कभागको अलग कर देता है। यही शुष्कभाग बारह प्रकारके मलोंके रूपमें शरीरसे बाहर आता है। शरीरमें विद्यमान कान, नेत्र, नाक, जिह्वा, दाँत, नाभि, गुदा तथा नख—ये सब मलके आश्रय हैं। ऐसे ही विष्ठा, मूत्र, शुक्र एवं शोणित-रूपसे ये मल अनन्त प्रकारके हैं।

हे विनतासुत! मनुष्यके शरीरमें सामान्यतः साढ़े तीन करोड़ रोम और बत्तीस दाँत होते हैं। सिरमें बालोंकी संख्या सात लाख तथा नख बीस हैं। हे तार्क्ष्य! पुराने लोगोंने सामान्य रूपसे शरीरमें एक हजार पल मांस, सौ पल रक्त, दस पल मेदा, दस पल त्वचा, बारह पल मज्जा, तीन पल महारक्त, दो कुडव (अन्नकी एक माप जो बारह मुट्ठीके बराबर होती है) शुक्र तथा एक कुडव संतानोत्पत्तिके लिये उपयोगी स्त्रीके विद्यमान शोणित (रज)-को माना है। इसी प्रकार मानव-शरीरमें छः प्रकारके कफ, छः प्रकारकी विष्ठा, छः प्रकारके मूत्र और तीन सौ साठसे अधिक अस्थियाँ होती हैं। इस प्रकार पिण्ड (शरीर)-के विषयमें बताया गया। इसे ही शरीरका वैभव कहते हैं। इन सबके अतिरिक्त शरीरमें कुछ नहीं है।

कर्मानुसार ही मनुष्यको सुख-दुःख, भय तथा कल्याण प्राप्त होता है। कर्मका अनुष्ठान शरीरके द्वारा ही सम्भव होनेसे शरीरका महत्त्व है। इस शरीरके द्वारा ही जीव उत्तम-से-उत्तम अथवा अधम-से-अधम गति प्राप्त करता है। इसलिये शरीरकी उत्पत्तिकी प्रक्रिया यहाँ बतायी जा रही है—वायु जीवको गर्भसे बाहर करता है। उस समय उसके दोनों पैर ऊपर और मुख नीचेकी ओर रहता है। ऐसा जीव पहले तो यथाक्रम माँके गर्भमें रहकर ही धीरे-धीरे बढ़ता है। माताके द्वारा ग्रहण किये गये अन्न, फल, दूध, घृत और जलके आहारसे उस जीवके शरीरकी हड्डियाँ पुष्ट होती हैं तथा वह जीवित रहता है। उस जीवके नाभिप्रान्तसे शक्तिवर्धिनी नाड़ी जुड़ी रहती है, जिसको आप्यायनी कहा जाता है। उसका सम्बन्ध स्त्रियोंके आँत-छिद्रसे होता है। उनके द्वारा खाया-पिया गया पदार्थ गर्भमें स्थित प्राणीके पेटमें आप्यायनी नाड़ीके द्वारा पहुँचता है। माँके द्वारा भुक्त पदार्थोंसे पुष्ट देहवाला होकर वह जीव प्रतिदिन वृद्धिको प्राप्त होता है। इसी वृद्धिक्रममें संसारकी पूर्वानुभूत अनेक विषयोंकी स्मृतियाँ उसे होती हैं और इन्हीं स्मृतियोंके कारण दुःखित वह प्राणी खिन्न हो जाता है तथा अनेक प्रकारकी पीड़ाका अनुभव कर इधर-उधर गतिमान् होता है एवं 'गर्भसे निकल करके मैं पुनः ऐसा कुछ नहीं करूँगा जिससे मुझे पुनः गर्भकी प्राप्ति हो'—यह सोचकर जीव अपने उन सैकड़ों पूर्वजन्मोंका स्मरण करता है, जिनमें उसको सांसारिक, देवयोनियों और मृत्युलोककी नाना योनियोंके सुख-दुःखका अनुभव प्राप्त हुआ था। उसके बाद समयानुसार वह प्राणी अधोमुख होकर नवें या दसवें मासमें गर्भसे बाहर आता है।

प्राजापत्य वायुके प्रभावसे गर्भ छोड़कर बाहर निकलता हुआ वह जीव दुःखी होता है। उस समय दुःखसे पीड़ित वह प्राणी विलाप करता हुआ बाहर निकलता है। उदरसे बाहर होते हुए उस जीवको असह्य कष्ट देनेवाली मूर्च्छा आ जाती है, किंतु कुछ ही क्षणमें वह जीव पुनः चेतनामें आ जाता है। वायुके स्पर्शसे उसको सुखानुभूति होती है। तत्पश्चात् संसारको मोहित करनेवाली विष्णुकी माया उसके ऊपर अपना प्रभाव जमा लेती है। उस मायाशक्तिसे विमोहित जीवात्माका पूर्व ज्ञान नष्ट हो जाता है। ज्ञान नष्ट होनेके बाद वह जीव बालभावको प्राप्त करता है। तदनन्तर उसे कौमार्य, यौवन और वृद्धावस्था भी प्राप्त होती है। उसके

५५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ धर्मकाण्ड—

बाद मनुष्य पुनः उसी प्रकार मरता है और जन्म लेता है। इस संसार-चक्रमें वह घड़ा बनानेवाले चक्रयन्त्रके समान घूमता रहता है। प्राणी कभी स्वर्ग प्राप्त करता है और कभी नरकमें जाता है।

स्वर्ग तथा नरक मनुष्यको अपने कर्मानुसार ही प्राप्त होते हैं। हे पक्षिश्रेष्ठ ! स्वर्ग और नरकमें कर्मफलका भोग करके प्राणी कभी थोड़ेसे शेष पाप-पुण्यका भोग करनेके लिये पृथ्वीपर आ जाता है। जो स्वर्गमें निवास करते हैं, उन लोगोंको यह दिखायी देता है कि नरकलोकोंमें प्राणियोंको बहुत दुःख है। यहाँपर यमराजके दूतोंसे प्रताड़ित वे नरकवासी कभी प्रसन्न नहीं होते हैं, उन्हें तो दुःख-ही-दुःख झेलना पड़ता है। जबसे मनुष्य विमानमें चढ़कर ऊपरकी ओर प्रस्थान करता है तभीसे उसके मनमें यह भाव स्थान बना लेता है कि पुण्यके समाप्त होनेपर मैं स्वर्गसे नीचे आ जाऊँगा। इसलिये स्वर्गमें भी बहुत दुःख है। नरकवासियोंको देख करके जीवको महान् दुःख होता है; क्योंकि मेरी भी इसी प्रकारकी गति होगी—इस चिन्तासे वह रात-दिन मुक्त ही नहीं होता है। गर्भवासमें प्राणीको योनिजन्य बहुत कष्ट होते हैं। योनिसे पैदा होते समय उसे महान् दुःख होता है। उत्पन्न होनेके बाद बालपनमें भी उसे दुःख है और वृद्धावस्थामें भी दुःख है। काम, क्रोध तथा ईर्ष्याका सम्बन्ध होनेसे युवावस्थामें भी उसके लिये असहनीय दुःख है। दुःस्वप्न, वृद्धावस्थामें तथा मरणके समय भी उत्कट दुःख उसे होता है। यमदूतोंके द्वारा खींचकर नरकमें भी ले जाये जा रहे जीवको अधोगति प्राप्त होती है। उसके बाद फिर जीवका गर्भसे जन्म होता है और मृत्यु होती है। ऐसे संसार-चक्रमें प्राणी कुम्भकारके चक्रके समान घूमते रहते हैं। पूर्वजन्ममें किये गये पुण्य-पापसे बँधे जीव बार-बार इसी संसारके आवागमनका दुःख भोगते हैं।

हे पक्षिन् ! सैकड़ों प्रकारके दुःखसे व्याप्त इस संसारक्षेत्रमें रञ्चमात्र भी सुख नहीं है। हे विनतासुत ! इसलिये मनुष्योंको मुक्तिके लिये प्रयत्न करना चाहिये। जीवकी जैसी स्थिति गर्भमें होती है, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया है। अब मैं पूर्वक्रमसे पूछे गये प्रश्नका ही उत्तर दूँ या इसी अन्तरालमें कुछ अन्य प्रश्न करनेकी तुम्हारी इच्छा है?

गरुडने कहा—हे देवेश ! पूछे गये प्रश्नोंमेंसे दो महत्त्वपूर्ण प्रश्नोंके उत्तर तो मुझे प्राप्त हो गये हैं, अब मुझे तीसरे प्रश्नका उत्तर प्रदान करनेकी कृपा करें।

श्रीकृष्णने कहा—हे पक्षीन्द्र ! मरणासन्न प्राणीके लिये क्या करना चाहिये? यह तुमने प्रश्न किया है? उसका उत्तर सुनो ! मैं संक्षेपमें उसे कह रहा हूँ।

मृत्युको संनिकट जानकर मनुष्यको सबसे पहले गोमूत्र, गोमय, तीर्थोदक और कुशोदकसे स्नान कराये। तदनन्तर स्वच्छ एवं पवित्र वस्त्र पहना दे और गोमयसे लिपी हुई भूमिपर दक्षिणाग्र कुशोंका एवं तिलका आस्तरण करके सुला दे। सुलाते समय उस मरणासन्न प्राणीके सिरको पूर्व अथवा उत्तरकी ओर करके उसके मुखमें सोनेका टुकड़ा डाले। हे खगेश ! उसीके संनिकट भगवान् शालग्रामकी मूर्ति और तुलसीका वृक्ष लाकर रख दे। तत्पश्चात् वहींपर घीका एक दीपक जलाये और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’—इस मन्त्रका जप करे। पूजा-दान तथा नाम-स्मरण आदिमें मन्त्रसे **‘ॐ’**का योग करे। पुष्प-धूपादिसे भली प्रकार हृषीकेश विष्णुदेवकी पूजा करे। तदनन्तर विनम्रभावसे स्तुति-पाठ करते हुए उनका ध्यान करे। उसके बाद ब्राह्मणों, दीनों और अनाथोंको दान देकर, भगवान् विष्णुके चरणोंको हृदयमें स्थान देते हुए पुत्र, मित्र, स्त्री, खेती-बारी तथा

प्रेतकल्प ] शुक्र-शोणितके संयोगसे जीवका प्रादुर्भाव ५५७


धन-धान्यादिके प्रति अपनी ममताका परित्याग कर दे। उस समय जीवको बहुत ही कष्ट होता है। उसके निवारणके लिये पुत्रादि सभी परिजनोंको मरणासन्न प्राणीके कल्याण-हेतु ऊँचे स्वरमें 'पुरुषसूक्त'का पाठ करना चाहिये।

हे गरुड! मृत्युके आ जानेपर जो कर्म करना चाहिये, वह सब मैंने तुम्हें सुना दिया। अब इस समस्त कर्मका फल क्या है? उसको मैं संक्षेपमें कहता हूँ, तुम सुनो।

हे पक्षिराज! स्नान करनेसे प्राणीको स्वच्छता प्राप्त होती है। उससे शरीरकी अपवित्रता दूर होती है। उसके बाद भगवान् विष्णुका स्मरण होता है और उनका स्मरण सभी प्रकारके उत्तम फल प्रदान करता है। कुश और कपास आतुर प्राणीको स्वर्ग ले जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है। तिल तथा कुश जलमें डालकर मरणासन्न व्यक्तिको कराया गया स्नान यज्ञमें किये गये अवभृथ-स्नानके समान होता है। ऐसे ही गोमयसे लिपी हुई भूमिपर मण्डल बनाकर उसपर तिल, कुश आदि डालकर यदि मरणासन्न व्यक्तिको सुलाया जाय तो विष्णु आदि देव प्रसन्न होते हैं; क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लक्ष्मी और अग्निदेव मण्डलमें रहते हैं। इसीलिये मरणासन्न व्यक्तिको जिस भूमिपर शयन कराना है, वहाँपर मण्डलका निर्माण करना चाहिये। हे खगेश! पूर्व अथवा उत्तरकी ओर यदि मरणासन्न व्यक्तिका सिर कर दिया जाय, यदि उसके पाप कम हों तो इतनेमात्रसे उसे उत्तम लोक प्राप्त हो सकते हैं। आतुर व्यक्तिके मुखमें पञ्चरत्न डालनेपर उसमें ज्ञानका उदय होता है। हे पक्षिन्! तुलसी, ब्राह्मण, गौ, विष्णु और एकादशीव्रत—ये पाँच संसार-सागरमें डूबते हुए मनुष्योंके लिये नौकाके समान हैं।* विष्णु, एकादशी, गीता, तुलसी, ब्राह्मण एवं गौ—यह षट्पदी इस असार और जटिल संसारमें प्राणीको भक्ति प्रदान कराती है। 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस प्रकार भगवान् विष्णुके मन्त्रका जप करता हुआ मनुष्य निस्संदेह उन्हींका सायुज्य प्राप्त करता है। पूजा करनेसे भी मेरे (भगवान् विष्णु) लोककी प्राप्ति होती है, मेरी पूजा करनेवाला साक्षात् स्वर्गलोकको जाता है। हे काश्यप! 'पुरुषसूक्त'के पाठसे अपने परिजनोंके व्यामोहमें फँसा हुआ प्राणी बन्धनसे मुक्त हो जाता है। परलोक-प्राप्तिके जितने साधन बताये गये हैं, उनमें जिन साधनोंकी अधिकता होगी, उन्हींका फल मनुष्यको अधिकाधिक प्राप्त होगा। यथाशक्ति ब्राह्मणों, दीनों और अनाथोंको दान देना चाहिये ऐसा करनेसे वह सदैव प्रसन्न रहता है।

हे साधो! स्नानादि करनेपर मनुष्यको प्राप्त होनेवाले समस्त फलोंका विवरण यही है, इसको मैंने कह दिया। अब इस ब्रह्माण्डमें जो गुण विद्यमान हैं, उन्हें तुम सुनो! वे सब तुम्हारे शरीरमें भी हैं। पाताल, पर्वत, लोक, द्वीप, सागर, सूर्यादि सभी ग्रह तुम्हारे शरीरमें ही स्थित हैं। यथा—पैरके नीचे तललोक, पैरके ऊपर वितललोक, दोनों जानुओंमें सुतललोक और सक्थि-प्रदेशमें महातल नामक लोक समझने चाहिये। वैसे ही ऊरु-भागमें तलातललोक तथा गुह्य-स्थानमें रसातललोक स्थित है। ऐसे ही प्राणीके कटिप्रदेशमें पाताललोककी स्थिति समझे। नाभिके मध्यमें भूर्लोक, उसके ऊपर भुवर्लोक, हृदयमें स्वर्गलोक, कण्ठदेशमें महर्लोक, मुखमें जनलोक, मस्तकमें तपोलोक एवं


* पञ्चरत्ने मुखे मुक्ते जीवे ज्ञानं प्ररोहति। तुलसी ब्राह्मणा गावो विष्णुरेकादशी खग ॥
पञ्चप्रवहणान्येव भवाब्धौ मजतां नृणाम्। विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनवः ॥
असारे दुर्गसंसारे षट्पदी भक्तिदायिनी। नमो भगवते वासुदेवायति जपेन्नरः ॥ (३२।९९-१०१)

५५८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ धर्मकाण्ड-

महारन्ध्रमें सत्यलोक है। इस प्रकार मनुष्यके इसी शरीरमें चौदह भुवन विद्यमान हैं।

शरीरके त्रिकोणमें मेरु, अधःकोणमें मन्दर, दक्षिणमें कैलास, वामभागमें हिमालय, ऊर्ध्वभागमें निषध, दक्षिणमें गन्धमादन और वामरेखामें मलय—इन सात कुल पर्वतोंकी स्थिति है। इस देहके अस्थिभागमें जम्बूद्वीप, मज्जामें शाकद्वीप, मांसमें कुशद्वीप, शिराओंमें क्रौञ्चद्वीप, त्वचामें शाल्मलिद्वीप, रोम-समूहमें प्लक्षद्वीप और नखोंमें पुष्कर नामका द्वीप है। उसके बाद शरीरमें सागरोंका स्थान है। जैसे मूत्रमें क्षारोदसागर, शरीरके क्षारतत्त्वमें क्षीरसागर, श्लेष्मामें सुरोदधिसাগর, मज्जामें घृतसागर, रसमें रसोदधिसাগর, रक्तमें दधिसागर, काकुमें लटकते हुए मांसलभागमें स्वादूदक-सागर तथा शुक्रमें गर्भोदकसागर है। नादचक्रमें सूर्य, बिन्दुचक्रमें चन्द्रमा, नेत्रमें मंगल, हृदयमें बुध, विष्णुस्थानमें गुरु, शुक्रमें शुक्र, नाभिस्थानमें शनि, मुखमें राहु और पायुमें केतुको माना गया है। इस प्रकार शरीरमें ग्रहमण्डलकी स्थिति है।

मनुष्यका आपादमस्तक—सम्पूर्ण शरीर इसी सृष्टिके रूपमें विभक्त है। जो लोग इस संसारमें उत्पन्न होते हैं, वे मृत्युको निश्चित ही प्राप्त होते हैं। भूख, प्यास, क्रोध, दाह, मूर्च्छा, बिच्छूके डंक तथा सर्पके दंशसे उत्पन्न कष्ट सब इसी शरीरमें हैं। समयके पूरा हो जानेपर सभी प्राणियोंका विनाश निश्चित है। यमलोकमें गये हुए जीवके आगे-आगे वही लोग दौड़ते हैं, जो पापी हैं, अधम हैं और दया-धर्मसे दूर हैं। यमदूत उनके बाल पकड़कर घसीटते हुए अत्यन्त संतप्त मरुस्थल तथा दहकते हुए अंगारोंके बीचसे ले जाते हैं। अत्यन्त दुःखसे कातर इन पापियोंको यमलोककी एक झोपड़ीमें तबतक रहना पड़ता है, जबतक पुनर्जन्म नहीं होता है।

हे तार्क्ष्य! इस प्रकार जीव कर्मानुसार जन्म लेता है और मृत्युको प्राप्त होता है। इस संसारमें जो उत्पन्न हुए हैं, वे अवश्य ही मरेंगे—इसमें संदेह नहीं है। 'आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—ये पाँचों गर्भमें प्राणीके रहनेके समय ही निश्चित हो जाते हैं'—

आयुः कर्म च वित्तं च विद्या निधनमेव च॥
पञ्चैतानि हि सृज्यन्ते गर्भस्थस्यैव देहिनः।
(३२। १२५-१२६)

जीव कर्मसे ही जन्म लेता है और विनष्ट होता है। सुख-दुःख, भय एवं कल्याण कर्मसे ही प्राप्त होते हैं। नीचेकी ओर मुख तथा ऊपरकी ओर पैर किये हुए प्राणीको गर्भसे वायु ही खींचकर बाहर लाता है। जन्म लेते ही उस देहधारीको सद्यः विष्णुकी माया सम्मोहित कर लेती है। अपने द्वारा किये गये पाप-पुण्यसे सम्बन्धित योनिमें जीवको जन्म प्राप्त होता है।

हे खगेश्वर! उत्तम प्रकृतिवाला व्यक्ति अपने सुकृतसे अच्छे भोग भोगता है, उसका जन्म भी सत्कुलमें होता है। किंतु जैसे-जैसे उसके द्वारा दुष्कृत होता है, वैसे-ही-वैसे उसका जन्म भी नीच कुलमें होने लगता है। वह उसी दुष्कर्मसे दरिद्र, रोगी, मूर्ख और अन्यान्य दुःखोंका पात्र बन जाता है। (अध्याय ३२)


यमलोक, यममार्ग, यमराजके भवन तथा चित्रगुप्तके भवनका वर्णन, यमदूतोंद्वारा पापियोंको पीड़ित करना

गरुडने कहा— हे तात! आपने अपने इस पुत्रको जीवकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण लक्षण बता दिया, किंतु सचराचर—इन तीनों लोकोंके बीच यमलोकका कितना परिमाण है? उसका विस्तार मुझे बतायें। उसके मार्गकी कितनी दूरी है? हे देव! किन पापोंके करनेसे अथवा किस शुभ कर्मके प्रभावसे मानवजाति वहाँ जाती है? विशेष रूपसे बतानेकी कृपा करें।

श्रीभगवान्ने कहा— हे पक्षिराज! प्रमाणतः

प्रेतकल्प ]    यमलोक, यममार्ग, यमराजके भवन    ५५९


यमलोकका विस्तार छियासी हजार योजन है। मनुष्यलोकके बीचसे ही उस लोकका मार्ग है, जो धौकनीसे दहकाये गये ताँबेके समान प्रज्वलित और दुर्गम महापथ है। पापी तथा मूर्ख व्यक्ति वहाँ जाते हैं। अत्यन्त तेज, देखनेमें महाभयंकर लगनेवाले अनेक प्रकारके काँटे उस महापथमें हैं। उन्हीं काँटोंसे परिव्याप्त, ऊँची-नीची, अग्निके समान दहकती हुई उस महापथकी भूमि है। वहाँ वृक्षोंकी कोई छाया भी नहीं है, जहाँपर ऐसा मनुष्य रुक करके विश्राम कर सके। उस मार्गमें अन्नादिकी भी व्यवस्था नहीं है, जिसके द्वारा प्राणी अपने प्राणोंकी रक्षा कर सके। वहाँ जल भी नहीं दिखायी देता है, जिससे उसकी प्यास बुझ जाती हो। भूख-प्याससे पीड़ित वह पापी उसी महापथमें चलता है। अत्यन्त दुर्गम उस यममार्गमें वह ठंडकसे काँपने लगता है। जिसका जितना और जिस प्रकारका पाप है, उसका उतना वैसा ही मार्ग है। अत्यन्त दीन-हीन-कृपण और मूर्ख तथा दुःखसे व्याप्त प्राणी उसी मार्गको पार करते हैं। आत्मकृत दोषोंसे बारम्बार संतप्त कुछ लोग वहाँके असह्य कष्टसे व्यथित होकर करुण चीत्कार करते हैं, कुछ लोग वहाँकी कुव्यवस्थाके प्रति विद्रोह कर देते हैं।

हे खगेश ! उस कठोर मार्गको ऐसा ही जानना चाहिये। जो लोग इस संसारके प्रति किसी प्रकारकी तृष्णा नहीं रखते हैं, वे उस मार्गपर सुखपूर्वक जाते हैं। पृथ्वीपर मनुष्य जिन-जिन वस्तुओंका दान देता है, वे सभी वस्तुएँ यमलोक तथा उस महापथमें उसके सामने उपस्थित रहती हैं। जिस पापीको श्राद्ध और जलाञ्जलि नहीं प्राप्त होती है, वे पाप-कर्म करनेवाले क्षुद्र प्राणी वायु बनकर भटका करते हैं।

हे सुव्रत ! मैंने इस प्रकारके उस रौद्र पथको तुम्हें बता दिया है। अब मैं पुनः यममार्गकी स्थिति बताऊँगा।

दक्षिण और नैर्ऋत दिशाके मध्यमें विवस्वत्पुत्र यमराजकी पुरी है। वह सम्पूर्ण नगर वज्रमय तथा दिव्य है। देवता और असुर भी उसका भेदन नहीं कर सकते हैं। वह चौकोर है, उसमें चार द्वार तथा सात चहारदीवारी एवं तोरण हैं। यमराज स्वयं अपने दूतोंके साथ उसीमें निवास करते हैं। प्रमाणतः उसका विस्तार एक हजार योजन है। सभी प्रकारके रत्नोंसे परिव्याप्त, चमकती हुई बिजली तथा सूर्यके तेजस्वी स्वरूपके समान वह पुरी दिव्य है। उस पुरीमें धर्मराजका जो भवन है, वह स्वर्णके समान कान्तिमान् है। उसका विस्तार पाँच सौ योजन ऊँचा है। हजार खंभोंवाले उस भवनको वैदूर्य मणियोंसे सुसज्जित किया गया है। उसके जालमार्ग अर्थात् गवाक्ष मुक्तामणियोंसे बने हैं। सैकड़ों पताकाएँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं। घण्टोंकी सैकड़ों ध्वनियाँ उस भवनमें होती रहती हैं। उसमें सैकड़ों तोरणद्वार बनाये गये हैं। इसी प्रकारसे वह भवन अन्यान्य आभूषणोंसे विभूषित रहता है।

वहाँ दस योजनमें विस्तृत नीले मेघके समान शोभा-सम्पन्न, सम एवं शुभ आसनपर भगवान् धर्मराज स्थित रहते हैं। ये धर्मज्ञ, धर्मशील, धर्मयुक्त और कल्याणकारी हैं। ये ही पापियोंको भय देनेवाले तथा धार्मिकोंको सुख देनेवाले हैं। यहाँपर शीतल मन्द वायु बहती रहती है, अनेक प्रकारके उत्सव और व्याख्यान होते रहते हैं, सदैव शंख आदि माङ्गलिक वाद्योंकी ध्वनियाँ सुनायी देती हैं। उन्हींके बीच धर्मराजका सम्पूर्ण समय बीतता है।

उस पुरके मध्यभागमें प्रवेश करनेपर चित्रगुप्तका