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सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

| ६७० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ |
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श्लोकअर्थ
कार्यमित्रं परिक्षिप्य धर्ममित्रं समाश्रयेत्।<br>देवाः स्वार्थपराः कामं त्वामहं सत्यमब्रवम्॥ १५<br><br>भज शुम्भं सुरेशानं जेतारं भुवनेश्वरम्।<br>चतुरं सुन्दरं शूरं कामशास्त्रविशारदम्॥ १६<br><br>ऐश्वर्यं सर्वलोकानां प्राप्स्यसे शुम्भशासनात्।<br>निश्चयं परमं कृत्वा भर्तारं भज शोभनम्॥ १७अपना ही कार्य साधनेमें तत्पर रहनेवाले मित्रका त्यागकर धर्ममार्गपर चलनेवाले मित्रका ही अवलम्बन करना चाहिये। देवता बड़े ही स्वार्थी हैं, मैंने तुमसे यह सत्य कहा है, अतः तुम देवताओंके शासक, विजेता, तीनों लोकोंके स्वामी, चतुर, सुन्दर, वीर और कामशास्त्रमें प्रवीण शुम्भको स्वीकार कर लो। शुम्भके अधीन रहनेसे तुम समस्त लोकोंका वैभव प्राप्त करोगी। अतएव दृढ़ निश्चय करके तुम सौन्दर्यसम्पन्न शुम्भको अपना पति बना लो॥ १५-१७॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा चण्डस्य जगदम्बिका।<br>मेघगम्भीरनिनदं जगर्ज पुनरब्रवीत्॥ १८<br><br>गच्छ जाल्म मृषा किं त्वं भाषसे वञ्चकं वचः।<br>त्यक्त्वा हरिहरादींश्च शुम्भं कस्माद्भजे पतिम्॥ १९व्यासजी बोले— चण्डकी यह बात सुनकर जगदम्बाने मेघके समान गम्भीर ध्वनिमें गर्जना की और वे बोलीं— धूर्त! भाग जाओ; तुम यह छलयुक्त बात व्यर्थ क्यों बोल रहे हो? विष्णु, शिव आदिको छोड़कर मैं शुम्भको अपना पति किसलिये बनाऊँ?॥ १८-१९॥
न मे कश्चित्पतिः कार्यों न कार्यं पतिना सह।<br>स्वामिनी सर्वभूतानामहमेव निशामय॥ २०न तो मुझे किसीको पति बनाना है और न तो पतिसे मेरा कोई काम ही है; क्योंकि जगत्के सभी प्राणियोंकी स्वामिनी मैं ही हूँ; इसे तुम सुन लो॥ २०॥
शुम्भा मे बहवो दृष्टा निशुम्भाश्च सहस्रशः।<br>घातिताश्च मया पूर्वं शतशो दैत्यदानवाः॥ २१मैंने हजारों-हजार शुम्भ तथा निशुम्भ देखे हैं और पूर्वकालमें मैंने सैकड़ों दैत्यों तथा दानवोंका वध किया है॥ २१॥
ममाग्रे देववृन्दानि विनष्टानि युगे युगे।<br>नाशं यास्यन्ति दैत्यानां यूथानि पुनरद्य वै॥ २२<br><br>काल एवागतोऽस्त्यत्र दैत्यसंहारकारकः।<br>वृथा त्वं कुरुषे यत्नं रक्षणायात्मसन्ततेः॥ २३प्रत्येक युगमें अनेक देवसमुदाय मेरे सामने ही नष्ट हो चुके हैं। दैत्योंके समूह अब फिर विनाशको प्राप्त होंगे। दैत्योंका विनाशकारी समय अब आ ही गया है। अतएव तुम अपनी सन्ततिकी रक्षाके लिये व्यर्थ प्रयत्न कर रहे हो॥ २२-२३॥
कुरु युद्धं वीरधर्मरक्षायै त्वं महामते।<br>मरणं भावि दुस्त्याज्यं यशो रक्ष्यं महात्मभिः॥ २४हे महामते! तुम वीरधर्मकी रक्षाके लिये मेरे साथ युद्ध करो। मृत्यु तो अवश्यम्भावी है, इसे टाला नहीं जा सकता। अतः महात्मा लोगोंको यशकी रक्षा करनी चाहिये॥ २४॥
किं ते कार्यं निशुम्भेन शुम्भेन च दुरात्मना।<br>वीरधर्मं परं प्राप्य गच्छ स्वर्गं सुरालयम्॥ २५दुराचारी शुम्भ तथा निशुम्भसे तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? अतः अब तुम श्रेष्ठ वीरधर्मका आश्रय लेकर देवलोक स्वर्ग चले जाओ॥ २५॥
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्ये ये चात्र तव बान्धवाः।<br>सर्वे तवानुगाः पश्चादागमिष्यन्ति साम्प्रतम्॥ २६अब शुम्भ, निशुम्भ तथा तुम्हारे जो अन्य बन्धु-बान्धव हैं, वे सब भी बादमें तुम्हारा अनुसरण करते हुए वहाँ पहुँचेंगे॥ २६॥
अ० २६ ]पञ्चम स्कन्ध६७१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्रमशः सर्वदैत्यानां करिष्याम्यद्य संक्षयम्।<br>विषादं त्यज मन्दात्मन् कुरु युद्धं विशांपते॥ २७हे मन्दात्मन्! मैं अब क्रमशः सभी दैत्योंका संहार कर डालूँगी। हे विशांपते! अब विषाद त्यागो और मेरे साथ युद्ध करो॥ २७॥
त्वामहं निहनिष्यामि भ्रातरं तव साम्प्रतम्।<br>ततः शुम्भं निशुम्भं च रक्तबीजं मदोत्कटम्॥ २८<br><br>अन्यांश्च दानवान्सर्वान्‌हत्त्वाहं समराङ्गणे।<br>गमिष्यामि यथास्थानं तिष्ठ वा गच्छ वा द्रुतम्॥ २९मैं इसी समय तुम्हारा तथा तुम्हारे भाईका वध कर दूँगी। तत्पश्चात् शुम्भ, निशुम्भ, मदोन्मत्त रक्तबीज तथा अन्य दानवोंको रणभूमिमें मारकर मैं अपने धामको चली जाऊँगी। अब तुम यहाँ ठहरो अथवा शीघ्र भाग जाओ॥ २८-२९॥
गृहाणास्त्रं वृथापुष्ट कुरु युद्धं मयाधुना।<br>किं जल्पसि मृषा वाक्यं सर्वथा कातरप्रियम्॥ ३०व्यर्थ ही स्थूल शरीर धारण करनेवाले हे दैत्य! तुरंत शस्त्र उठा लो और मेरे साथ अभी युद्ध करो। कायरोंको सदा प्रिय लगनेवाली व्यर्थ बातें क्यों बोल रहे हो?॥ ३०॥
व्यास उवाच<br>तयेत्थं प्रेरितौ दैत्यौ चण्डमुण्डौ क्रुधान्वितौ।<br>ज्याशब्दं तरसा घोरं चक्रतुर्बलदर्पितौ॥ ३१व्यासजी बोले— देवीके इस प्रकार उत्तेजित करनेपर दैत्य चण्ड-मुण्ड क्रोधसे भर उठे और अपने बलके अभिमानमें चूर उन दोनोंने वेगपूर्वक अपने धनुषकी प्रत्यंचाकी भीषण टंकार की॥ ३१॥
सापि शङ्खस्वनं चक्रे पूरयन्ती दिशो दश।<br>सिंहोऽपि कुपितस्तावन्नादं समकरोद् बली॥ ३२<br><br>तेन नादेन शक्राद्या जहर्षुरमरास्तदा।<br>मुनयो यक्षगन्धर्वाः सिद्धाः साध्याश्च किन्नराः॥ ३३उसी समय दसों दिशाओंको गुंजित करती हुई भगवतीने भी शंखनाद किया और बलवान् सिंहने भी कुपित होकर गर्जन किया। उस गर्जनसे इन्द्र आदि देवता, मुनि, यक्ष, गन्धर्व, सिद्ध, साध्य और किन्नर बहुत हर्षित हुए॥ ३२-३३॥
युद्धं परस्परं तत्र जातं कातरभीतिदम्।<br>चण्डिकाचण्डयोस्तीव्रं बाणखड्गगदादिभिः॥ ३४तदनन्तर चण्डिका और चण्डमें परस्पर बाण, तलवार, गदा आदिके द्वारा भीषण संग्राम होने लगा; जो कायरोंके लिये भयदायक था॥ ३४॥
चण्डमुक्ताञ्छरान्देवी चिच्छेद निशितैः शरैः।<br>मुमोच पुनरुग्रान्सा बाणांश्च पन्नगानिव॥ ३५चण्डिकाने दैत्य चण्डके द्वारा छोड़े गये बाणोंको अपने तीक्ष्ण बाणोंसे काट दिया और फिर वे चण्डपर अपने सर्पसदृश भयंकर बाण छोड़ने लगीं॥ ३५॥
गगनं छादितं तत्र संग्रामे विशिखैस्तदा।<br>शलभैरिव मेघान्ते कर्षकाणां भयप्रदैः॥ ३६उस समय संग्राममें आकाशमण्डल बाणोंसे उसी प्रकार आच्छादित हो गया, जैसे वर्षारितुके अन्तमें किसानोंको भय प्रदान करनेवाली टिड्डियोंसे आकाश छा जाता है॥ ३६॥
मुण्डोऽपि सैनिकैः सार्धं पपात तरसा रणे।<br>मुमोच बाणवृष्टिं वै क्रुद्धः परमदारुणः॥ ३७उसी समय अतीव भयंकर मुण्ड भी सैनिकोंके साथ बड़ी तेजीसे रणभूमिमें आ पहुँचा और क्रोधित होकर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ३७॥
बाणजालं महत् दृष्ट्वा क्रुद्धा तत्राम्बिका भृशम्।<br>कोपेन वदनं तस्या बभूव घनसन्निभम्॥ ३८<br>कदलीपुष्पनेत्राञ्च भृकुटीकुटिलं तदा।तब [मुण्डके द्वारा प्रक्षिप्त] महान् बाण-समूहको देखकर अम्बिका बहुत कुपित हुईं। क्रोधके कारण उनका मुख मेघके समान काला, आँखें केलेके पुष्पके समान लाल और भौंहें टेढ़ी हो गयीं॥ ३८ ½॥

| ६७२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २६ |
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निष्क्रान्ता च तदा काली ललाटफलकाद् द्रुतम्॥ ३९<br><br>व्याघ्रचर्माम्बरा क्रूरा गजचर्मोत्तरीयाका।<br>मुण्डमालाधरा घोरा शुष्कवापीसमोदरा॥ ४०<br><br>खड्गपाशधरातीव भीषणा भयदायिनी।<br>खट्वाङ्गधारिणी रौद्रा कालरात्रिरिवापरा॥ ४१उसी समय देवीके ललाटपटलसे सहसा भगवती काली प्रकट हुईं। अत्यन्त क्रूर वे काली व्याघ्रचर्म पहने थीं और गजचर्मके उत्तरीय वस्त्रोंसे सुशोभित थीं। उन भयानक कालीने गलेमें मुण्डमाला धारण कर रखी थी और उनका उदर सूखी बावलीके समान प्रतीत हो रहा था। अत्यन्त भीषण तथा भय प्रदान करनेवाली वे भगवती काली हाथमें खड्ग, पाश तथा खट्वांग धारण किये हुई थीं। रौद्र रूपवाली वे काली साक्षात् दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत हो रही थीं॥ ३९–४१॥
विस्तीर्णवदना जिह्वां चालयन्ती मुहुर्मुहुः।<br>विस्तारजघना वेगाज्जघानासुरसैनिकान्॥ ४२विशाल मुख तथा विस्तृत जघनप्रदेशवाली वे भगवती काली बार-बार जिह्वा लपलपाती हुई बड़े वेगसे असुर-सैनिकोंका संहार करने लगीं॥ ४२॥
करे कृत्वा महावीरांस्तरसा सा रुषान्विता।<br>मुखे चिक्षेप दैत्यान्यपेष दशनैः शनैः॥ ४३वे कुपित होकर बड़े-बड़े दैत्यवीरोंको हाथमें पकड़कर अपने मुखमें डाल लेती थीं और धीरे-धीरे उन्हें दाँतोंसे पीस डालती थीं॥ ४३॥
गजान्घण्टान्वितान्हस्ते गृहीत्वा निदधौ मुखे।<br>सारोहान्भक्षयित्वाजौ साट्टहासं चकार ह॥ ४४घंटा तथा आरोहियोंसमेत हाथियोंको अपने हाथमें पकड़कर वे देवी उन्हें मुखमें डाल लेती थीं और उन्हें चबा-चबाकर अट्टहास करने लगती थीं।
तथैव तुरगानुष्ट्रांस्तथा सारथिभिः सह।<br>निक्षिप्य वक्त्रे दशनैश्चर्वयत्यतिभैरवम्॥ ४५उसी प्रकार वे घोड़ों, ऊँटों और सारथियोंसहित रथोंको अपने मुखमें डालकर दाँतोंसे अत्यन्त भयानक रूपसे चबाने लगती थीं॥ ४४–४५॥
हन्यमानं बलं प्रेक्ष्य चण्डमुण्डौ महासुरौ।<br>छादयामासतुर्देवीं बाणासारैरनन्तरैः॥ ४६अपनी सेनाको मारे जाते देखकर महान् असुर चण्ड-मुण्डने निरन्तर बाण-वृष्टिके द्वारा भगवतीको आच्छादित कर दिया॥ ४६॥
चण्डश्चण्डकरच्छायं चक्रं चक्रधरायुधम्।<br>चिक्षेप तरसा देवीं ननाद च मुहुर्मुहुः॥ ४७चण्डने सूर्यके समान तेजस्वी तथा भगवान् विष्णुके सुदर्शनचक्रके तुल्य प्रभाववाला चक्र बड़े वेगसे देवीपर चला दिया और वह बार-बार गरजने लगा॥ ४७॥
नदन्तं वीक्ष्य तं काली रथाङ्गञ्च रविप्रभम्।<br>बाणेनैकेन चिच्छेद सुप्रभं तत्सुदर्शनम्॥ ४८उसे गर्जन करते देखकर कालीने अपने एक ही बाणसे उसके सूर्य-तुल्य तेजस्वी तथा सुदर्शनचक्र-सदृश प्रभाववाले चक्रको काट डाला॥ ४८॥
तं जघान शरैस्तीक्ष्णैश्चण्डं चण्डी शिलाशितैः।<br>मूर्च्छितोऽसौ पपातोर्व्यां देवीबाणार्दितो भृशम्॥ ४९तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने पत्थरकी सानपर चढ़ाये हुए अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उस चण्डपर प्रहार किया। देवीके बाणोंसे अत्यधिक घायल होकर वह मूर्च्छित हो गया और पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४९॥

अ० २६ ] पञ्चम स्कन्ध [ ६७३

अ० २६ ] पञ्चम स्कन्ध [ ६७३

संस्कृत श्लोकहिन्दी टीका
पतितं भ्रातरं वीक्ष्य मुण्डो दुःखार्दितस्तदा।<br>चकार शरवृष्टिश्च कालिकोपरि कोपतः॥ ५०उस समय अपने भाईको पृथ्वीपर गिरा हुआ देखकर मुण्ड दुःखसे व्याकुल हो उठा और कुपित होकर कालिकाके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा॥ ५०॥
चण्डिका मुण्डनिर्मुक्तां शरवृष्टिं सुदारुणाम्।<br>ईषिकास्त्रैर्बलान्मुक्तैश्चकार तिलशः क्षणात्॥ ५१भगवती चण्डिकाने मुण्डके द्वारा की गयी अत्यन्त भीषण बाणवर्षाको अपने द्वारा छोड़े गये ईषिकास्त्रोंसे बलपूर्वक तिल-तिल करके क्षणभरमें ही नष्ट कर डाला॥ ५१॥
अर्धचन्द्रेण बाणेन ताडयामास तं पुनः।<br>पतितोऽसौ महावीर्यो मेदिन्यां मदवर्जितः॥ ५२तत्पश्चात् चण्डिकाने एक अर्धचन्द्राकार बाणसे मुण्डपर पुनः प्रहार किया, जिससे वह महाशक्तिशाली दैत्य मदहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५२॥
हाहाकारो महानासीद्दानवानां बले तदा।<br>जहर्षुरमराः सर्वे गगनस्था गतव्यथाः॥ ५३[यह देखकर] उस समय दानवोंकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया। आकाशमें विद्यमान सभी देवताओंकी व्यथा दूर हो गयी और वे हर्षसे भर उठे॥ ५३॥
विहाय मूर्च्छां चण्डस्तु संगृह्य महतीं गदाम्।<br>तरसा ताडयामास कालिकां दक्षिणे भुजे॥ ५४इसके बाद कुछ देरमें मूर्च्छा दूर होनेपर चण्डने एक विशाल गदा लेकर बड़े वेगसे कालिकाकी दाहिनी भुजापर प्रहार किया॥ ५४॥
वञ्चयित्वा गदाघातं तं बबन्ध महासुरम्।<br>तरसा बाणपाशेन मन्त्रमुक्तेन कालिका॥ ५५भगवती कालिकाने उसके गदाप्रहारको रोककर अभिमन्त्रित करके छोड़े गये बाण-पाशसे उस महान् असुरको शीघ्र ही बाँध लिया॥ ५५॥
उत्थितस्तु तदा मुण्डो बद्धं दृष्ट्वानुजं बलात्।<br>आजगाम सुसन्नद्धः शक्तिं कृत्वा करे दृढाम्॥ ५६उधर जब मुण्ड चेतनामें आया तब अपने अनुजको पाशास्त्रमें बलपूर्वक बँधा देखकर कवच पहने हुए वह अपने हाथमें एक सुदृढ़ शक्ति लेकर आ गया॥ ५६॥
आगच्छन्तं तदा काली दानवं वीक्ष्य सत्वरम्।<br>बबन्ध तरसा तं तु द्वितीयं भ्रातरं भृशम्॥ ५७तब भगवती कालीने उस दूसरे भाई दानव मुण्डको बड़े वेगसे अपनी ओर आता हुआ देखकर उसे भी बड़ी मजबूतीसे बाँध लिया॥ ५७॥
गृहीत्वा तौ महावीर्यौ चण्डमुण्डौ शशाविव।<br>कुर्वती विपुलं हासमाजगामाम्बिकां प्रति॥ ५८<br><br>आगत्य तामथोवाच गृहाणेमौ पशू प्रिये।<br>रणयज्ञार्थमानीतौ दानवौ रणदुर्जयौ॥ ५९इस प्रकार महाबली चण्ड-मुण्डको खरगोशकी तरह पकड़कर जोर-जोरसे हँसती हुई वे कालिका अम्बिकाके पास जा पहुँची। उनके पास आकर कालिका कहने लगीं—हे प्रिये! मैं रणयज्ञमें पशुबलिके लिये इन रणदुर्जय दानवोंको यहाँ ले आयी हूँ, आप इन्हें स्वीकार करें॥ ५८-५९॥
तावानीतौ तदा वीक्ष्य चण्डिका तौ वृकाविव।<br>अम्बिका कालिकां प्राह माधुरीसंयुतं वचः॥ ६०<br><br>वधं मा कुरु मा मुञ्च चतुरासि रणप्रिये।<br>देवानां कार्यसंसिद्धिः कर्तव्या तरसा त्वया॥ ६१तब उन लाये गये दोनों दानवोंको भेड़ियेकी तरह दीन-हीन देखकर भगवती अम्बिकाने कालिकासे मधुरताभरी वाणीमें कहा—हे रणप्रिये! न इनका वध करो और न छोड़ो ही। तुम चतुर हो अतः किसी उपायसे अब तुम्हें शीघ्र ही देवताओंका कार्य सिद्ध करना चाहिये॥ ६०-६१॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 A

६७४ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २७

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—अम्बिकाकी यह बात सुनकर कालिकाने उनसे पुनः कहा—जिस प्रकार यज्ञभूमिमें यूप स्थापित किये जाते हैं, उसी प्रकार विख्यात युद्धयज्ञमें बलिदान-स्तम्भके रूपमें प्रतिष्ठित खड्गके द्वारा मैं आलम्भनपूर्वक इस तरह इनका वध करूँगी, जिससे हिंसा नहीं होगी॥ ६२ ½ ॥ |
| इति तस्या वचः श्रुत्वा कालिका प्राह तां पुनः।<br>युद्धयज्ञेऽतिविख्याते खड्गयूपे प्रतिष्ठिते॥ ६२ | |
| आलम्भञ्च करिष्यामि यथा हिंसा न जायते।<br>इत्युक्त्वा सा तदा देवी खड्गेन शिरसी तयोः॥ ६३ | ऐसा कहकर देवी कालिकाने तुरंत तलवारसे उन दोनोंका सिर काट लिया और वे आनन्दपूर्वक रुधिरपान करने लगीं॥ ६३ ½ ॥ |
| चकर्त तरसा काली पपौ च रुधिरं मुदा।<br>एवं दैत्यौ हतौ दृष्ट्वा मुदितोवाच चाम्बिका॥ ६४ | इस प्रकार उन दोनों दैत्योंको मारा गया देखकर अम्बिकाने प्रसन्न होकर कहा—तुमने आज देवताओंका महान् कार्य किया है इसीलिये मैं तुम्हें एक शुभ वरदान दे रही हूँ। हे कालिके! चूँकि तुमने चण्ड-मुण्डका वध किया है, इसलिये अब तुम इस पृथ्वीलोकमें 'चामुण्डा'—इस नामसे अत्यधिक विख्यात होओगी॥ ६४-६५॥ |
| कृतं कार्यं सुराणां ते ददाम्यद्य वरं शुभम्।<br>चण्डमुण्डौ हतौ यस्मात्तस्मात्ते नाम कालिके।<br>चामुण्डेति सुविख्यातं भविष्यति धरातले॥ ६५ | |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे चण्डमुण्डवधेन देव्याश्चामुण्डेतिनामवर्णनं नाम षड्विंशोऽध्यायः॥ २६॥


अथ सप्तविंशोऽध्यायः

शुम्भका रक्तबीजको भगवती अम्बिकाके पास भेजना और उसका देवीसे वार्तालाप

| व्यास उवाच | व्यासजी बोले—[हे राजन्!] उन दोनों दैत्योंको मारा गया देखकर मरनेसे बचे सभी सैनिक भागकर राजा शुम्भके पास गये। कुछ सैनिकोंके अंग बाणोंसे छिद गये थे, कुछके हाथ कट गये थे, उनके पूरे शरीरसे रक्त बह रहा था; वे सब रोते हुए नगरमें पहुँचे॥ १-२॥ |
| हतौ तौ दानवौ दृष्ट्वा हतशेषाश्च सैनिकाः।<br>पलायनं ततः कृत्वा जग्मुः सर्वे नृपं प्रति॥ १<br><br>भिन्नाङ्गा विशिखैः केचित्केचिच्छिन्नकरास्तथा।<br>रुधिरस्रावदेहाश्च रुदन्तोऽभिययुः पुरे॥ २ | |
| गत्वा दैत्यपतिं सर्वे चक्रुर्बुम्बारवं मुहुः।<br>रक्ष रक्ष महाराज भक्षयत्यद्य कालिका॥ ३<br><br>तया हतौ महावीरो चण्डमुण्डौ सुरार्दनौ।<br>भक्षिताः सैनिकाः सर्वे वयं भग्ना भयातुराः॥ ४ | दैत्यराज शुम्भके पास जाकर वे सब बार-बार चीख-पुकार करने लगे—हे महाराज! हमें बचा लीजिये, बचा लीजिये; नहीं तो आज हमें कालिका खा जायगी। उसने देवताओंका मर्दन करनेवाले महावीर चण्ड-मुण्डको मार डाला और वह बहुत-से सैनिकोंको खा गयी। अंग-भंग हुए हमलोग इस समय भयसे व्याकुल हैं॥ ३-४॥ |
| भीतिदञ्च रणस्थानं कृतं कालिकया प्रभो।<br>पातितैर्गजवीराश्वैर्दासेरकपदातिभिः॥ ५ | हे प्रभो! मरे पड़े हाथियों, घोड़ों, ऊँटों तथा पैदल सैनिकोंसे उस कालिकाने युद्धभूमिको अत्यन्त डरावना बना दिया है॥ ५॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 B

अ० २७]पञ्चम स्कन्ध६७५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शोणितौघवहा कुल्या कृता मांसातिकर्दमा।<br>केशशैवलिनी भग्नरथचक्रविराजिता॥ ६<br>छिन्नबाह्वादिमत्स्याढ्या शीर्षतुम्बीफलान्विता।<br>भयदा कातराणां वै सुराणां मोदवर्धिनी॥ ७उसने समरभूमिमें रक्तकी नदी बना डाली है, जिसमें मांस कीचड़की भाँति, मस्तकके केश सेवारके सदृश और टूटे हुए रथोंके पहिये भँवरके समान, सैनिकोंके कटे हाथ आदि मछलीके समान और सिर तुम्बीके फलके तुल्य प्रतीत हो रहे हैं। वह [रुधिर-नदी] कायरोंको भयभीत करनेवाली तथा देवताओंके हर्षको बढ़ानेवाली है॥ ६-७॥
कुलं रक्ष महाराज पातालं गच्छ सत्वरम्।<br>क्रुद्धा देवी क्षयं सद्यः करिष्यति न संशयः॥ ८हे महाराज! अब आप दैत्यकुलकी रक्षा कीजिये और शीघ्र पाताललोक चले जाइये; अन्यथा क्रोधमें भरी वह देवी आज ही [सभी दानवोंका] विनाश कर डालेगी; इसमें सन्देह नहीं है॥ ८॥
सिंहोऽपि भक्षयत्याजौ दानवान्दनुजेश्वर।<br>तथैव कालिका देवी हन्ति बाणैरनेकधा॥ ९<br>तस्मात्त्वमपि राजेन्द्र मरणाय मृषा मतिम्।<br>करोषि सहितो भ्रात्रा शुम्भेन कुपिताशयः॥ १०हे दानवेन्द्र! अम्बिकाका वाहन सिंह भी युद्धभूमिमें दानवोंको खाता जा रहा है और कालिकादेवी अपने बाणोंसे [दैत्य सैनिकोंका] अनेक तरहसे वध कर रही है। अतएव हे राजेन्द्र! आप भी कोपके वशीभूत होकर अपने भाई निशुम्भसहित मरनेका व्यर्थ विचार कर रहे हैं॥ ९-१०॥
किं करिष्यति नार्यैषा क्रूरा कुलविनाशिनी।<br>यस्या हेतोर्महाराज हन्तुमिच्छसि बान्धवान्॥ ११हे महाराज! राक्षसकुलका नाश करनेवाली यह क्रूर स्त्री, जिसके लिये आप अपने बन्धुओंको मरवा डालना चाहते हैं, यदि आपको प्राप्त हो ही गयी तो यह आपको क्या सुख प्रदान करेगी?॥ ११॥
दैवाधीनौ महाराज लोके जयपराजयौ।<br>अल्पार्थाय महद्दुःखं बुद्धिमान्न प्रकल्पयेत्॥ १२हे महाराज! जगत्में जय तथा पराजय दैवके अधीन होती है। बुद्धिमान्‌को चाहिये कि अल्प प्रयोजनके लिये भारी कष्ट न उठाये॥ १२॥
चित्रं पश्य विधेः कर्म यदधीनं जगत् प्रभो।<br>निहता राक्षसाः सर्वे स्त्रिया पश्यैकयानया॥ १३हे प्रभो! जिसके अधीन यह सारा जगत् रहता है, उस विधाताका अद्भुत कर्म देखिये कि इस स्त्रीने अकेले ही सम्पूर्ण राक्षसोंका संहार कर डाला॥ १३॥
जेता त्वं लोकपालानां सैन्ययुक्तो हि साम्प्रतम्।<br>एका प्रार्थयते बाला युद्धायेति सुसम्भ्रमः॥ १४आप लोकपालोंको जीत चुके हैं और इस समय आपके पास बहुत-से सैनिक भी हैं तथापि एक स्त्री युद्धके लिये आपको ललकार रही है; यह महान् आश्चर्य है!॥ १४॥
पुरा त्वया तपस्तप्तं पुष्करे देवतायने।<br>वरदानाय सम्प्राप्तो ब्रह्मा लोकपितामहः॥ १५<br>धात्रोक्तस्त्वं महाराज वरं वरय सुव्रत।<br>तदा त्वयामृत्वं च प्रार्थितं ब्रह्मणः किल॥ १६पूर्वकालमें आपने पुष्कर तीर्थमें एक देवालयमें तप किया था। उस समय वर प्रदान करनेके लिये लोकपितामह ब्रह्माजी आपके पास आये थे। हे महाराज! जब ब्रह्माजीने आपसे कहा—‘हे सुव्रत! वर माँगो’ तब आपने ब्रह्माजीसे अमर होनेकी यह

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 C

६७६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| देवदैत्यमनुष्येभ्यो न भवेन्मरणं मम।<br>सर्पकिन्नरयक्षेभ्यः पुंल्लिङ्गवाचकादपि ॥ १७ | प्रार्थना की थी—‘देवता, दैत्य, मनुष्य, सर्प, किन्नर, यक्ष और पुरुषवाचक जो भी प्राणी हैं—इनमें किसीसे भी मेरी मृत्यु न हो’ ॥ १५–१७ ॥ |
| तस्मात्त्वां हन्तुकामैषा प्राप्ता योषिद्वरा प्रभो।<br>युद्धं मा कुरु राजेन्द्र विचार्यैवं धियाधुना ॥ १८ | हे प्रभो! इसी कारणसे यह श्रेष्ठ स्त्री आपका वध करनेकी इच्छासे आयी हुई है। अतएव हे राजेन्द्र! बुद्धिसे ऐसा विचार करके अब आप युद्ध मत कीजिये ॥ १८ ॥ |
| देवी ह्येषा महामाया प्रकृतिः परमा मता।<br>कल्पान्तकाले राजेन्द्र सर्वसंहारकारिणी ॥ १९ | इन देवी अम्बिकाको ही महामाया और परमा प्रकृति कहा गया है। हे राजेन्द्र! कल्पके अन्तमें ये भगवती ही सम्पूर्ण सृष्टिका संहार करती हैं ॥ १९ ॥ |
| उत्पादयित्री लोकानां देवानामेश्वरी शुभा।<br>त्रिगुणा तामसी देवी सर्वशक्तिसमन्विता ॥ २०<br><br>अजय्या चाक्षया नित्या सर्वज्ञा च सदोदिता।<br>वेदमाता च गायत्री सन्ध्या सर्वसुरालया ॥ २१<br><br>निर्गुणा सगुणा सिद्धा सर्वसिद्धिप्रदाव्यया।<br>आनन्दानन्दा गौरी देवानामभयप्रदा ॥ २२ | सबपर शासन करनेवाली ये कल्याणमयी देवी सम्पूर्ण लोकों तथा देवताओंको भी उत्पन्न करनेवाली हैं। ये देवी तीनों गुणोंसे युक्त हैं, फिर भी ये विशेषरूपसे तमोगुणसे युक्त और सभी प्रकारकी शक्तियोंसे सम्पन्न हैं। ये अजेय, विनाशरहित, नित्य, सर्वज्ञ तथा सदा विराजमान रहती हैं। वेदमाता गायत्री और सन्ध्याके रूपमें प्रतिष्ठित ये देवी सम्पूर्ण देवताओंको आश्रय प्रदान करती हैं। ये देवी निर्गुण तथा सगुण-रूपवाली, स्वयं सिद्धस्वरूपिणी, सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाली, अविनाशिनी, आनन्दस्वरूपा, सबको आनन्द देनेवाली, गौरी नामसे विख्यात तथा देवताओंको अभय प्रदान करनेवाली हैं ॥ २०–२२ ॥ |
| एवं ज्ञात्वा महाराज वैरभावं त्यजानया।<br>शरणं व्रज राजेन्द्र देवी त्वां पालयिष्यति ॥ २३<br><br>आज्ञाकरो भवैतस्याः सञ्जीवय निजं कुलम्।<br>हतशेषाश्च ये दैत्यास्ते भवन्तु चिरायुषः ॥ २४ | हे महाराज! ऐसा जानकर आप इनके साथ वैरभावका परित्याग कर दीजिये। हे राजेन्द्र! आप इनकी शरणमें चले जाइये; ये भगवती आपकी रक्षा करेंगी। आप इनके सेवक बन जाइये [और इस प्रकार] अपने कुलका जीवन बचा लीजिये; मरनेसे बचे हुए जो दैत्य हैं, वे भी दीर्घजीवी हो जायँ ॥ २३–२४ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भः सुरबलार्दनः।<br>उवाच वचनं तथ्यं वीरवर्यगुणान्वितम् ॥ २५ | व्यासजी बोले—उनका यह वचन सुनकर देवसेनाका मर्दन करनेवाले शुम्भने महान् वीरोंके पराक्रम-गुणसे सम्पन्न यथार्थ वचन कहना आरम्भ किया ॥ २५ ॥ |
| शुम्भ उवाच<br>मौनं कुर्वन्तु भो मन्दा यूयं भग्ना रणाजिरात्।<br>शीघ्रं गच्छत पातालं जीविताशा बलीयसी ॥ २६ | शुम्भ बोला—अरे मूर्खो! चुप रहो; तुमलोग युद्धभूमिसे भाग आये हो। तुम्हें यदि जीवित रहनेकी प्रबल अभिलाषा है तो तुम सब अभी पाताललोक चले जाओ ॥ २६ ॥ |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—22 D

अ० २७ ]पञ्चम स्कन्ध६७७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दैवाधीनं जगत्सर्वं का चिन्तात्र जये मम।<br>देवास्तथैव ब्रह्माद्या दैवाधीना वयं यथा॥ २७<br>ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रोऽयं यमोऽग्निर्वरुणस्तथा।<br>सूर्यश्चन्द्रस्तथा शक्रः सर्वे दैववशाः किल॥ २८<br>का चिन्ता तर्हि मे मन्दा यद्भावि तद्भविष्यति।<br>उद्यमस्तादृशो भूयाद्यादृशी भवितव्यता॥ २९<br>सर्वथैवं विचार्यैव न शोचन्ति बुधाः क्वचित्।<br>स्वधर्मं न त्यजन्तीह ज्ञानिनो मरणाद्भयात्॥ ३०जब यह सारा संसार ही दैवके अधीन है, तब विजयके सम्बन्धमें मुझे क्या चिन्ता हो सकती है? जैसे हमलोग दैवके अधीन हैं, वैसे ही ब्रह्मा आदि देवता भी सदा दैवके अधीन रहते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, यम, अग्नि, वरुण, सूर्य, चन्द्र और इन्द्र—ये सब देवता सदा दैवके अधीन हैं। हे मूर्खो! तब मुझे किस बातकी चिन्ता? जो होना होगा, वह तो होकर रहेगा। जैसी भवितव्यता होती है, उसी प्रकारका उद्यम भी आरम्भ हो जाता है। सब प्रकारसे ऐसा विचार करके विद्वान् लोग कभी शोक नहीं करते। ज्ञानी लोग मृत्युके भयसे अपने धर्मका त्याग नहीं करते॥ २७—३०॥
सुखं दुःखं तथैवायुर्जीवितं मरणं नृणाम्।<br>काले भवति सम्प्राप्ते सर्वथा दैवनिर्मितम्॥ ३१<br>ब्रह्मा पतति काले स्वे विष्णुश्च पार्वतीपतिः।<br>नाशं गच्छन्त्यायुषोऽन्ते सर्वे देवाः सवासवाः॥ ३२<br>तथाहमपि कालस्य वशगः सर्वथाधुना।<br>नाशं जयं वा गन्तास्मि स्वधर्मपरिपालनात्॥ ३३समय आनेपर दैवकी प्रेरणासे मनुष्योंको सुख, दुःख, आयु, जीवन तथा मरण—ये सब निश्चितरूपसे प्राप्त होते हैं। अपना-अपना समय पूरा हो जानेपर ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी नष्ट हो जाते हैं। इन्द्रसहित सभी देवता भी अपनी आयुके अन्तमें विनाशको प्राप्त होते हैं। उसी प्रकार मैं भी सर्वथा कालका वशवर्ती हूँ। अतः अब मुझे विनाश अथवा विजय जो भी प्राप्त होगी, उसे मैं अपने धर्मका सम्यक् पालन करते हुए स्वीकार करूँगा॥ ३१—३३॥
आहूतोऽप्यनया कामं युद्धायाबलया किल।<br>कथं पलायनपरो जीवेयं शरदां शतम्॥ ३४<br>करिष्याम्यद्य संग्रामं यद्भावि तद्भवत्विह।<br>जयो वा मरणं वापि स्वीकरोमि यथा तथा॥ ३५जब इस स्त्रीने मुझे युद्धके लिये ललकारा है, तब [उसके भयसे] भागकर मैं सैकड़ों वर्ष जीवित रहनेकी आशा क्यों करूँ? मैं आज ही उसके साथ युद्ध करूँगा, फिर जो होना है वह होवे। युद्धमें विजय अथवा मृत्यु जो भी प्राप्त होगी, उसे मैं स्वीकार करूँगा॥ ३४-३५॥
दैवं मिथ्येति विद्वांसो वदन्त्युद्यमवादिनः।<br>युक्तियुक्तं वचस्तेषां ये जानन्त्यभिभाषितम्॥ ३६‘दैव मिथ्या है’—ऐसा उद्यमवादी विद्वान् कहते हैं। इस प्रकार जो शास्त्रको जानते हैं, उन उद्यमवादी विद्वानोंकी बात युक्तियुक्त भी है॥ ३६॥
उद्यमेन विना कामं न सिध्यन्ति मनोरथाः।<br>कातरा एव जल्पन्ति यद्भाव्यं तद्भविष्यति॥ ३७<br>अदृष्टं बलवन्मूढाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।<br>प्रमाणं तस्य सत्त्वे किमदृश्यं दृश्यते कथम्॥ ३८बिना उद्यम किये मनोरथ कभी सिद्ध नहीं होते। केवल कायरलोग ही कहते हैं कि जो होना होगा, वह तो होकर रहेगा। अदृष्ट—प्रारब्ध बलवान् होता है—ऐसी बात मूर्ख कहते हैं न कि पण्डितजन। प्रारब्धकी सत्ता है—इसमें क्या प्रमाण हो सकता है? क्योंकि जो स्वयं अदृष्ट है, वह भला कैसे दिखायी पड़ सकता है?॥ ३७-३८॥
६७८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २७

| अदृष्टं क्वापि दृष्टं स्यादेषा मूर्खविभीषिका।<br>अवलम्बं विनैवैषा दुःखे चित्तस्य धारणा ॥ ३९ | अदृष्टको कभी किसीने देखा भी है क्या ? यह तो मूर्खोंके लिये विभीषिकामात्र है। इसका कोई आधार नहीं है; केवल कष्टकी स्थितिमें मनको ढाँढ़स देनेके लिये वह सहारामात्र अवश्य बन जाता है॥ ३९॥ |
| चक्रीसमीपे संविष्टा संस्थिता पिष्टकारिणी।<br>उद्यमेन विना पिष्टं न भवत्येव सर्वथा ॥ ४० | आटा पीसनेवाली कोई स्त्री चक्कीके पास चुपचाप बैठी रहे, तो बिना उद्यम किये किसी प्रकार भी आटा तैयार नहीं हो सकता ॥ ४० ॥ |
| उद्यमे च कृते कार्यं सिद्धिं यात्येव सर्वथा।<br>कदाचित्तस्य न्यूनत्वे कार्यं नैव भवेदपि ॥ ४१ | उद्यम करनेपर ही हर प्रकारसे कार्य सिद्ध होता है। जब कभी उद्यम करनेमें कमी रह जाती है, तब कार्य किसी तरह सिद्ध नहीं हो पाता है ॥ ४१ ॥ |
| देशं कालञ्च विज्ञाय स्वबलं शत्रुजं बलम्।<br>कृतं कार्यं भवत्येव वृहस्पतिवचो यथा ॥ ४२ | देश, काल, अपना बल तथा शत्रुंका बल—इन सबकी पूरी जानकारी करके किया गया कार्य निश्चय ही सिद्ध होता है—यह आचार्य बृहस्पतिका वचन है ॥ ४२ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इति निश्चित्य दैत्येन्द्रो रक्तबीजं महासुरम्।<br>प्रेषयामास संग्रामे सैन्येन महताऽवृतम् ॥ ४३ | व्यासजी बोले—ऐसा निश्चय करके दैत्यराज शुम्भने महान् असुर रक्तबीजको विशाल सेनाके साथ समरभूमिमें जानेकी आज्ञा दी ॥ ४३ ॥ |
| शुम्भ उवाच<br>रक्तबीज महाबाहो गच्छ त्वं समराङ्गणे।<br>कुरु युद्धं महाभाग यथा ते बलमाहितम् ॥ ४४ | शुम्भ बोला—हे विशाल भुजाओंवाले रक्तबीज ! तुम युद्धभूमिमें जाओ; और हे महाभाग ! अपनी पूरी शक्ति लगाकर युद्ध करो ॥ ४४ ॥ |
| रक्तबीज उवाच<br>महाराज न ते कार्या चिन्ता स्वल्पतरापि वा।<br>अहमेनां हनिष्यामि करिष्यामि वशे तव ॥ ४५<br><br>पश्य मे युद्धचातुर्यं क्वेयं बाला सुरप्रिया।<br>दासीं तेऽहं करिष्यामि जित्वेमां समरे बलात् ॥ ४६ | रक्तबीज बोला—हे महाराज ! आपको तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये। मैं इस स्त्रीको या तो मार डालूँगा और या तो इसे आपके अधीन कर दूँगा। आप मेरा बुद्धिचातुर्य देखें। [मेरे आगे] देवताओंकी प्रिय यह बाला है ही क्या ? मैं इसे युद्धमें बलपूर्वक जीतकर आपकी दासी बना दूँगा ॥ ४५-४६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याभाष्य कुरुश्रेष्ठ रक्तबीजो महासुरः।<br>जगाम रथमारुह्य स्वसैन्यपरिवारितः ॥ ४७ | व्यासजी बोले—हे कुरुश्रेष्ठ ! ऐसा कहकर महान् असुर रक्तबीज रथपर आरूढ होकर अपनी सेनाके साथ चल पड़ा ॥ ४७ ॥ |
| हस्त्यश्वरथपादातवृन्दैश्च परिवेष्टितः।<br>निर्जगाम रथारूढो देवीं शैलोपरिस्थिताम् ॥ ४८ | हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकोंसे चारों ओरसे आवृत हुआ रक्तबीज रथपर आरूढ़ होकर पर्वतपर विराजमान भगवतीकी ओर चल दिया ॥ ४८ ॥ |
| तमागतं समालोक्य देवी शङ्खमवादयत्।<br>भयदं सर्वदैत्यानां देवानां मोदवर्धनम् ॥ ४९ | उसे आया हुआ देखकर देवीने शंख बजाया। वह शंखनाद सभी दैत्योंके लिये भयदायक तथा देवताओंके लिये हर्षवर्धक था ॥ ४९ ॥ |

अ० २७ ]पञ्चम स्कन्ध६७१
Sanskrit ShlokaHindi Translation
श्रुत्वा शङ्खस्वनं चोग्रं रक्तबीजोऽतिवेगवान् ।<br>गत्वा समीपे चामुण्डां बभाषे वचनं मृदु ॥ ५०उस भीषण शंखध्वनिको सुनकर वह रक्तबीज बड़े वेगसे देवी चामुण्डाके पास पहुँचकर मधुर वाणीमें उनसे कहने लगा ॥ ५० ॥
रक्तबीज उवाच<br>बाले किं मां भीषयसि मत्वा त्वं कातरं किल ।<br>शङ्खनादेन तन्वङ्गि वेत्सि किं धूम्रलोचनम् ॥ ५१रक्तबीज बोला— हे बाले! क्या तुम कायर समझकर अपने शंखनादसे मुझको डरा रही हो ? हे कोमलांगि! क्या तुमने मुझे धूम्रलोचन समझ रखा है ? ॥ ५१ ॥
रक्तबीजोऽस्मि नाम्नाहं त्वत्सकाशमिहागतः ।<br>युद्धेच्छा चेत्पिकालापे सज्जा भव भयं न मे ॥ ५२मेरा नाम रक्तबीज है। मैं यहाँ तुम्हारे ही पास आया हूँ। हे पिकभाषिणि! यदि तुम्हारी युद्ध करनेकी इच्छा हो तो तैयार हो जाओ; मुझे तुमसे भय नहीं है ॥ ५२ ॥
पश्याद्य मे बलं कान्ते दृष्टा ये कातरास्त्वया ।<br>नाहं पङ्क्तिगतस्तेषां कुरु युद्धं यथेच्छसि ॥ ५३हे कान्ते ! अब तुम मेरा पराक्रम देखो। अभीतक तुमने जिन-जिन कायर दैत्योंको देखा है, उनकी श्रेणीका मैं नहीं हूँ। तुम जिस तरहसे चाहो, वैसे लड़ लो ॥ ५३ ॥
वृद्धाश्च सेविताः पूर्वं नीतिशास्त्रं श्रुतं त्वया ।<br>पठितं चार्थविज्ञानं विद्वद्गोष्ठी कृताथ वा ॥ ५४हे सुन्दरि! यदि तुमने वृद्धजनोंकी सेवा की हो, नीतिशास्त्रका अध्ययन किया हो, अर्थशास्त्र पढ़ा हो, विद्वानोंकी गोष्ठीमें भाग लिया हो और यदि तुम्हें साहित्य तथा तन्त्रविज्ञानका ज्ञान हो, तो मेरी हितकर, यथार्थ तथा प्रामाणिक बात सुन लो ॥ ५४-५५ ॥
साहित्यतन्त्रविज्ञानं चेदस्ति तव सुन्दरि ।<br>शृणु मे वचनं पथ्यं तथ्यं प्रमितिबृंहितम् ॥ ५५
रसानाञ्च नवानां वै द्वावेव मुख्यतां गतौ ।<br>शृङ्गारकः शान्तरसो विद्वज्जनसभासु च ॥ ५६विद्वानोंकी सभाओंमें नौ रसोंके अन्तर्गत शृंगाररस तथा शान्तरस—ये दो रस ही मुख्य माने गये हैं। उन दोनोंमें भी शृंगाररस रसोंके राजाके रूपमें प्रतिष्ठित है। [इसीके प्रभावसे] विष्णु लक्ष्मीके साथ, ब्रह्मा सावित्रीके साथ, इन्द्र शचीके साथ और भगवान् शिव पार्वतीके साथ निवास करते हैं; उसी प्रकार वृक्ष लताके साथ, मृग मृगीके साथ और कपोत कपोतीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं ॥ ५६—५८ ॥
तयोः शृङ्गार एवादौ नृपभावे प्रतिष्ठितः ।<br>विष्णुर्लक्ष्म्या सहास्ते वै सावित्र्या चतुराननः ॥ ५७
शच्येन्द्रः शैलसुतया शङ्करः सह शेरते ।<br>वल्ल्या वृक्षो मृगो मृग्या कपोत्या च कपोतकः ॥ ५८
एवं सर्वे प्राणभृतः संयोगरसिका भृशम् ।<br>अप्राप्तभोगविभवा ये चान्ये कातरा नराः ॥ ५९इस प्रकार जगत्के समस्त जीवधारी संयोगजनित सुखका अत्यधिक उपभोग करते हैं। जो लोग भोग तथा वैभवका सुख नहीं प्राप्त कर सके हैं और अन्य जो कातर मनुष्य हैं, वे निश्चय ही मूर्ख हैं और दैवसे वंचित होकर यति हो जाते हैं। संसारके रसका ज्ञान न रखनेवाले वे लोग मीठी-मीठी बात बोलनेमें निपुण धूर्तों तथा वंचकोंद्वारा ठग लिये जाते हैं और सदा शान्तरसमें निमग्न रहते हैं; किंतु काम, लोभ, भयंकर क्रोध और बुद्धिनाशक मोहके उत्पन्न होते ही
भवन्ति यतयस्ते वै मूढा दैवेन वञ्चिताः ।<br>असंसाररसज्ञास्ते वञ्चिता वञ्चनापरैः ॥ ६०
मधुरालापनिपुणै रताः शान्तरसे हि ते ।<br>क्व ज्ञानं क्व च वैराग्यं वर्तमाने मनोभवे ॥ ६१
६८०श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २८
लोभे क्रोधे च दुर्धर्षे मोहे मतिविनाशके।<br>तस्मात्त्वमपि कल्याणि कुरु कान्तं मनोहरम्॥ ६२<br>शुम्भं सुराणां जेतारं निशुम्भं वा महाबलम्।कहाँ ज्ञान रह जाता है और कहाँ वैराग्य! अतएव हे कल्याणि! तुम भी देवताओंपर विजय प्राप्त कर लेनेवाले मनोहर तथा महाबली शुम्भ अथवा निशुम्भको पति बना लो॥ ५९—६२ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा रक्तबीजोऽसौ विरराम पुरःस्थितः।<br>श्रुत्वा जहास चामुण्डा कालिका चाम्बिका तथा॥ ६३व्यासजी बोले— इतना कहकर वह रक्तबीज देवीके सामने चुपचाप खड़ा हो गया। उसकी बातें सुनकर चामुण्डा, कालिका और अम्बिका हँसने लगीं॥ ६३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजद्वारा देवीसमीपे शुम्भनिशुम्भसंवादवर्णनं नाम सप्तविंशोऽध्यायः॥ २७॥


अथाष्टाविंशोऽध्यायः

देवीके साथ रक्तबीजका युद्ध, विभिन्न शक्तियोंके साथ भगवान् शिवका रणस्थलमें आना तथा भगवतीका उन्हें दूत बनाकर शुम्भके पास भेजना, भगवान् शिवके सन्देशसे दानवोंका क्रुद्ध होकर युद्धके लिये आना

व्यास उवाच<br>कृत्वा हास्यं ततो देवी तमुवाच विशांपते।<br>मेघगम्भीरया वाचा युक्तियुक्तमिदं वचः॥ १<br><br>पूर्वमेव मया प्रोक्तं मन्दात्मन् किं विकत्थसे।<br>दूतस्याग्रे यथायोग्यं वचनं हितसंयुतम्॥ २<br><br>सदृशो मम रूपेण बलेन विभवेन च।<br>त्रिलोक्यां यदि कोऽपि स्यात्तं पतिं प्रवृणोम्यहम्॥ ३<br><br>ब्रूहि शुम्भं निशुम्भञ्च प्रतिज्ञा मे पुरा कृता।<br>तस्माद्युध्यस्व जित्वा मां विवाहं विधिवत्कुरु॥ ४व्यासजी बोले— हे राजन्! तत्पश्चात् वे देवी हँसकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें उस रक्तबीजसे यह युक्तिसंगत वचन बोलीं— हे मन्दबुद्धि! तुम क्यों व्यर्थ प्रलाप कर रहे हो? मैं तो पहले ही दूतके सामने उचित और हितकर बात कह चुकी हूँ कि यदि तीनों लोकोंमें कोई भी पुरुष रूप, बल और वैभवमें मेरे समान हो तो मैं पतिरूपमें उसका वरण कर लूँगी। अब तुम शुम्भ-निशुम्भसे कह दो कि मैं पूर्वकालमें ऐसी प्रतिज्ञा कर चुकी हूँ, अतः मेरे साथ युद्ध करो और रणमें मुझे जीतकर [मेरे साथ] विधिवत् विवाह कर लो॥ १—४॥
त्वं वै तदाज्ञया प्राप्तस्तस्य कार्यार्थसिद्धये।<br>संग्रामं कुरु पातालं गच्छ वा पतिना सह॥ ५तुम भी शुम्भकी आज्ञासे उसका कार्य सिद्ध करनेके लिये यहाँ आये हो। अतएव यदि चाहो तो मेरे साथ युद्ध करो अथवा अपने स्वामीके साथ पाताललोक चले जाओ॥ ५॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं देव्याः स दैत्योऽमर्षपूरितः।<br>मुमोच तरसा बाणान्सिंहस्योपरि दारुणान्॥ ६व्यासजी बोले— देवीकी बात सुनकर वह दैत्य क्रोधमें भर उठा और बड़े वेगसे देवीके सिंहपर भीषण बाण छोड़ने लगा॥ ६॥
अम्बिका ताञ्छरान्वीक्ष्य गगने पन्नगोपमान्।<br>चिच्छेद सायकैस्तीक्ष्णैर्लघुहस्ततया क्षणात्॥ ७सर्पसदृश उन बाणोंको देखकर अम्बिकाने दक्षतापूर्वक बड़ी फुर्तीके साथ अपने तीखे बाणोंसे उन्हें आकाशमें ही क्षणभरमें काट डाला॥ ७॥
अ० २८ ]पञ्चम स्कन्ध६८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अन्यैर्जघान विशिखै रक्तबीजं महासुरम्।<br>अम्बिका चापनिर्मुक्तैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ ८इसके बाद अम्बिकाने कानतक खींचकर धनुषसे छोड़े गये तथा पत्थरपर घिसकर तीक्ष्ण बनाये गये अन्य बाणोंसे महान् असुर रक्तबीजपर प्रहार किया॥ ८॥
देवीबाणहतः पापो मूर्च्छामप रथोपरि।<br>पतिते रक्तबीजे तु हाहाकारो महानभूत्॥ ९भगवतीके बाणोंसे आहत होकर पापी रक्तबीज रथपर ही मूर्च्छित हो गया। रक्तबीजके गिर जानेपर बड़ा हाहाकार मच गया। उसके सभी सैनिक चीखने-चिल्लाने लगे और 'हाय! हम मारे गये'—ऐसा कहने लगे॥ ९ १/२॥
सैनिकाश्चुक्रुशुः सर्वे हताः स्म इति चाब्रुवन्।<br>ततो बुम्बारवं श्रुत्वा शुम्भः परमदारुणम्॥ १०<br>उद्योगं सर्वसैन्यानां दैत्यानामादिदेश ह।तब अपने सैनिकोंका अत्यन्त भीषण क्रन्दन सुनकर शुम्भने सभी दैत्ययोद्धाओंको शस्त्रास्त्रसे सुसज्जित होनेका आदेश दिया॥ १० १/२॥
शुम्भ उवाच<br>निर्यान्तु दानवाः सर्वे काम्बोजाः स्वबलैर्वृताः॥ ११<br>अन्येऽप्यतिबलाः शूराः कालकेया विशेषतः।शुम्भ बोला—कम्बोजदेशके सभी दानव तथा उनके अतिरिक्त अन्य महाबली वीर विशेष करके कालकेयसंज्ञक पराक्रमी योद्धा भी अपनी-अपनी सेनाके साथ निकल पड़ें॥ ११ १/२॥
व्यास उवाच<br>इत्याज्ञप्तं बलं सर्वं शुम्भेन च चतुर्विधम्॥ १२<br>निर्जगाम मदाविष्टं देवीसमरमण्डले।<br>तमागतं समालोक्य चण्डिका दानवं बलम्॥ १३<br>घण्टानादं चकाराशु भीषणं भयदं मुहुः।<br>ज्यास्वनं शङ्खनादञ्च चकार जगदम्बिका॥ १४<br>तेन नादेन सा जाता काली विस्तारितानना।<br>श्रुत्वा तन्निनादं घोरं सिंहो देव्याश्च वाहनम्॥ १५व्यासजी बोले—इस प्रकार शुम्भके आदेश देनेपर उसकी सारी चतुरंगिणी सेना मदमत्त होकर देवीके संग्रामस्थलके लिये निकल पड़ी। समरभूमिमें आयी हुई उस दानवी सेनाको देखकर भगवती चण्डिका बार-बार भीषण तथा भयदायक घण्टानाद करने लगीं। जगदम्बाने धनुषका टंकार तथा शंखनाद किया। उस नादके होते ही भगवती काली भी अपना मुख फैलाकर घोर ध्वनि करने लगीं॥ १२—१४ १/२॥
जगर्ज सोऽपि बलवाञ्जनयन्भयमद्भुतम्।<br>तन्निनादमुपश्रुत्य दानवाः क्रोधमूर्च्छिताः॥ १६उस भयंकर शब्दको सुनकर भगवतीका वाहन बलशाली सिंह भी अद्भुत भय उत्पन्न करता हुआ बड़े जोरका गर्जन करने लगा। वह निनाद सुनकर सभी दैत्य क्रोधके मारे बौखला उठे और वे महाबली दैत्य देवीपर अस्त्र छोड़ने लगे॥ १५-१६ १/२॥
सर्वे चिक्षिपुरस्त्राणि देवीं प्रति महाबलाः।<br>तस्मिन्नेवायते युद्धे दारुणे लोमहर्षणे॥ १७<br>ब्रह्मादीनाञ्च देवानां शक्तयश्चण्डिकां ययुः।<br>यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम्॥ १८<br>तादृग्रूपास्तदा देव्यः प्रययुः समराङ्गणे।उस भयानक तथा रोमांचकारी महासंग्राममें ब्रह्मा आदि देवताओंकी विभिन्न शक्तियाँ भी चण्डिकाके पास पहुँच गयीं। जिस देवताका जैसा रूप, भूषण तथा वाहन था; ठीक उसी प्रकारके रूप, भूषण तथा वाहनसे युक्त होकर सभी देवियाँ रणक्षेत्रमें पहुँची थीं॥ १७-१८ १/२॥
६८२श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २८
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्रह्माणी वरटारूढा साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ १९<br><br>आगता ब्रह्मणः शक्तिर्ब्रह्माणीति परिश्रुता।<br>वैष्णवी गरुडारूढा शङ्खचक्रगदाधरा॥ २०<br><br>पद्महस्ता समायाता पीताम्बरविभूषिता।<br>शाङ्करी तु वृषारूढा त्रिशूलवरधारिणी॥ २१<br><br>अर्धचन्द्रधरा देवी तथाहिवलया शिवा।ब्रह्माजीकी शक्ति, जो ब्रह्माणी नामसे प्रख्यात हैं, हाथमें अक्षसूत्र तथा कमण्डलु धारण करके हंसपर आरूढ़ हो वहाँ आयीं। भगवान् विष्णुकी शक्ति वैष्णवी गरुडपर सवार होकर रणभूमिमें आयीं। वे पीताम्बरसे विभूषित थीं तथा उन्होंने हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण कर रखा था। शंकरकी शक्ति भगवती शिवा बैलपर सवार होकर हाथमें उत्तम त्रिशूल लिये मस्तकपर अर्धचन्द्र धारण किये तथा सर्पोंके कंगन पहने वहाँ उपस्थित हुईं॥ १९-२१३॥
कौमारी शिखिसंरूढा शक्तिहस्ता वरानना॥ २२<br><br>युद्धकामा समायाता कार्तिकेयस्वरूपिणी।<br>इन्द्राणी सुष्ठुवदना सुश्वेतगजवाहना॥ २३<br><br>वज्रहस्तातिरोषाढ्या संग्रामाभिमुखी ययौ।<br>वाराही शूकराकारा प्रौढप्रेतासना मता॥ २४<br><br>नारसिंही नृसिंहस्य बिभ्रती सदृशं वपुः।<br>याम्य‍ा च महिषारूढा दण्डहस्ता भयप्रदा॥ २५<br><br>समायाताथ संग्रामे यमरूपा शुचिस्मिता।<br>तथैव वारुणी शक्तिः कौबेरी च मदोत्कटा॥ २६<br><br>एवंविधास्तथाकारा ययुः स्वस्वबलैर्वृताः।<br>आगतास्ताः समालोक्य देवी मुदमवाप च॥ २७<br><br>स्वस्था मुमुदिरे देवा दैत्याश्च भयमाययुः।भगवान् कार्तिकेयके समान ही रूप धारण करके सुन्दर मुखवाली भगवती कौमारी युद्धकी इच्छासे हाथमें शक्ति धारण करके मयूरपर आरूढ़ होकर आयीं। सुन्दर मुखवाली इन्द्राणी अतिशय उज्ज्वल हाथीपर सवार होकर हाथमें वज्र लिये उग्र क्रोधसे आविष्ट हो समरभूमिमें पहुँचीं। इसी प्रकार सूकरका रूप धारण करके एक विशाल प्रेतपर सवार होकर भगवती वाराही, नृसिंहके समान रूप धारण करके भगवती नारसिंही और यमराजके ही समान रूपवाली भयदायिनी शक्ति भगवती याम्या हाथमें दण्ड धारण किये तथा महिषपर आरूढ़ होकर मधुर-मधुर मुसकराती हुई संग्राममें आयीं। उसी प्रकार वरुणकी शक्ति वारुणी तथा कुबेरकी मदोन्मत्त शक्ति कौबेरी भी समरभूमिमें पहुँच गयीं। इसी तरह अन्य देवताओंकी शक्तियाँ भी उन्हीं देवोंका रूप धारणकर अपनी-अपनी सेनाओंके साथ रणभूमिमें उपस्थित हुईं। उन शक्तियोंको वहाँ उपस्थित देखकर भगवती अम्बिका बहुत हर्षित हुईं। इससे देवता निश्चिन्त तथा प्रसन्न हो गये और दैत्य भयभीत हो उठे॥ २२-२७३॥
ताभिः परिवृतस्तत्र शङ्करो लोकशङ्करः॥ २८<br><br>समागम्य च संग्रामे चण्डिकामित्युवाच ह।<br>हन्यन्तामसुराः शीघ्रं देवानां कार्यसिद्धये॥ २९<br><br>निशुम्भं चैव शुम्भं च ये चान्ये दानवाः स्थिताः।<br>हत्वा दैत्यबलं सर्वं कृत्वा च निर्भयं जगत्॥ ३०लोककल्याणकारी शिवजी भी उन शक्तियोंके साथ वहाँ संग्राममें भगवती चण्डिकाके पास आकर उनसे कहने लगे—देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये आप शुम्भ-निशुम्भ तथा अन्य जो भी दानव उपस्थित हैं, उन सबका वध कर दीजिये। साथ ही सारी असुर-सेनाका संहार करके और इस प्रकार संसारको भयमुक्त करके ये समस्त शक्तियाँ अपने-अपने

अ० २८ ] पञ्चम स्कन्ध ६८३

अ० २८ ] पञ्चम स्कन्ध ६८३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
स्वानि स्वानि च धिष्ण्यानि समागच्छन्तु शक्तयः।<br>देवा यज्ञभुजः सन्तु ब्राह्मणा यजने रताः॥ ३१<br><br>प्राणिनः सन्तु सन्तुष्टाः सर्वे स्थावरजङ्गमाः।<br>शमं यान्तु तथोत्पाता ईतयश्च तथा पुनः॥ ३२<br><br>घनाः काले प्रवर्षन्तु कृषिर्बहुफला तथा।स्थानोंको चली जायें। [आप यह कार्य सम्पन्न करें जिससे] देवता यज्ञभाग पाने लगें, ब्राह्मण [निर्भय होकर] यज्ञ आदि करनेमें तत्पर हो जायँ, सभी स्थावर-जंगम प्राणी सन्तुष्ट हो जायँ, सब प्रकारके उपद्रव और अकाल आदि आपदाएँ समाप्त हो जायें, मेघ समयपर वृष्टि करें और कृषि लोगोंके लिये अधिक फलदायिनी हो॥ २८—३२ १/२॥
व्यास उवाच<br>एवं ब्रुवति देवेशे शङ्करे लोकशङ्करे॥ ३३<br><br>चण्डिकायाः शरीरात्तु निर्गता शक्तिरद्भुता।<br>भीषणातिप्रचण्डा च शिवाशतनिनादिनी॥ ३४<br><br>घोररूपाथ पञ्चास्यमित्युवाच स्मितानना।<br>देवदेव व्रजाशु त्वं दैत्यानामधिपं प्रति॥ ३५<br><br>दूतत्वं कुरु कामारे ब्रूहि शुम्भं स्मराकुलम्।<br>निशुम्भञ्च मदोत्सिक्तं वचनान्मम शङ्कर॥ ३६<br><br>मुक्त्वा त्रिविष्टपं यात यूयं पातालमाशु वै।<br>देवाः स्वर्गे सुखं यान्तु तुराषाट् स्वासनं शुभम्॥ ३७<br><br>प्राप्नोतु त्रिदिवं स्थानं यज्ञभागांश्च देवताः।<br>जीवितेच्छा च युष्माकं यदि स्यात्तु महत्तरा॥ ३८<br><br>तर्हि गच्छत पातालं तरसा यत्र दानवाः।<br>अथवा बलमास्थाय युद्धेच्छा मरणाय चेत्॥ ३९<br><br>तदागच्छन्तु तृप्यन्तु मच्छिवाः पिशितेन वः।व्यासजी बोले—लोकका कल्याण करनेवाले देवेश्वर शिवके ऐसा कहनेपर भगवती चण्डिकाके शरीरसे एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। वह शक्ति अत्यन्त भयंकर तथा प्रचण्ड थी, वह सैकड़ों सियारिनोंके समवेत स्वरके समान ध्वनि कर रही थी और उसका रूप बहुत भयानक था। मन्द-मन्द मुसकानयुक्त मुखमण्डलवाली उस शक्तिने पंचमुख शिवजीसे कहा—हे देवदेव! आप दैत्यराज शुम्भके पास शीघ्र जाइये। हे कामरिपु! इस समय आप मेरे दूतका काम कीजिये। हे शंकर! कामपीड़ित शुम्भ तथा मदोन्मत्त निशुम्भसे मेरे शब्दोंमें कह दीजिये—‘तुम सब तत्काल स्वर्ग त्यागकर पाताललोक चले जाओ, जिससे देवगण सुखपूर्वक स्वर्गमें प्रविष्ट हो सकें और इन्द्रको स्वर्गलोक तथा अपना उत्तम इन्द्रासन पुनः प्राप्त हो जाय; साथ ही सभी देवताओंको उनके यज्ञभाग पुनः मिलने लगें। यदि जीवित रहनेकी तुमलोगोंकी बलवती इच्छा हो तो तुमलोग बहुत शीघ्र पाताललोक चले जाओ, जहाँ दानवलोग रहते हैं। अथवा अपने बलका आश्रय लेकर यदि तुम सब युद्धकी इच्छा रखते हो, तो मरनेके लिये आ जाओ, जिससे मेरी सियारिनें तुमलोगोंके कच्चे मांससे तृप्त हो जायँ॥ ३३—३९ १/२॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं तस्याः शूलपाणिस्त्वरान्वितः॥ ४०<br><br>गत्वाह दैत्यराजानं शुम्भं सदसि संस्थितम्।व्यासजी बोले—चण्डिकाका यह वचन सुनकर शिव अपनी सभामें बैठे हुए दैत्यराज शुम्भके पास शीघ्र जाकर उससे कहने लगे॥ ४० १/२॥
शिव उवाच<br>राजन् दूतोऽहमम्बायास्त्रिपुरान्तकरो हरः॥ ४१<br><br>त्वत्सकाशमिहायातो हितं कर्तुं तवाखिलम्।<br>त्यक्त्वा स्वर्गं तथा भूमिं यूयं गच्छत सत्वरम्॥ ४२शिवजी बोले—हे राजन्! मैं त्रिपुरासुरका संहार करनेवाला महादेव हूँ। अम्बिकाका दूत बनकर मैं इस समय तुम्हारा सम्पूर्ण हित करनेके लिये यहाँ तुम्हारे पास आया हूँ। [देवीने कहलाया है कि] तुमलोग स्वर्ग तथा भूलोक त्यागकर शीघ्र पाताललोक

| ६८४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २८ |
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| पातालं यत्र प्रह्लादो बलिश्च बलिनां वरः।<br>अथवा मरणेच्छा चेत्तर्ह्यागच्छत सत्वरम्॥ ४३<br><br>संग्रामे वो हनिष्यामि सर्वान्नेवाहमाशु वै।<br>इत्युवाच महाराज्ञी युष्मत्कल्याणहेतवे॥ ४४ | चले जाओ, जहाँ प्रह्लाद तथा बलवानोंमें श्रेष्ठ राजा बलि रहते हैं। अथवा यदि मरनेकी ही इच्छा हो तो तुरंत सामने आ जाओ; मैं तुम सबको संग्राममें शीघ्र ही मार डालूँगी। तुमलोगोंके कल्याणके लिये महारानी अम्बिकाने ऐसा कहा है॥ ४१–४४॥ |
| व्यास उवाच<br>इति दैत्यवरान्देवीवाक्यं पीयूषसन्निभम्।<br>हितकृच्छ्रावयित्वा स प्रत्यायातश्च शूलभृत्॥ ४५ | **व्यासजी बोले—**भगवतीका यह अमृत-तुल्य कल्याणकारी सन्देश उन प्रधान दैत्योंको सुनाकर शूलधारी भगवान् शंकर लौट आये॥ ४५॥ |
| ययासौ प्रेरितः शम्भूर्दूतत्वे दानवान्प्रति।<br>शिवदूतीति विख्याता जाता त्रिभुवनेऽखिले॥ ४६ | भगवती अम्बिकाने शिवजीको दूत बनाकर दानवोंके पास भेजा था, अतः वे सम्पूर्ण त्रिलोकीमें ‘शिवदूती’ इस नामसे विख्यात हुईं॥ ४६॥ |
| तेऽपि श्रुत्वा वचो देव्याः शङ्करोक्तं तु दुष्करम्।<br>युद्धाय निर्ययुः शीघ्रं दंशिताः शस्त्रपाणयः॥ ४७ | शंकरजीके मुखसे कहे गये भगवतीके इस दुष्कर सन्देशको सुनते ही वे दैत्य भी कवच धारण करके तथा हाथोंमें शस्त्र लेकर शीघ्र ही युद्धके लिये निकल पड़े॥ ४७॥ |
| तरसा रणमागत्य चण्डिकां प्रति दानवाः।<br>निर्जघ्नुश्च शरैस्तीक्ष्णैः कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः॥ ४८ | वे दानव बड़े वेगसे रणभूमिमें चण्डिकाके समक्ष आकर कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान चढ़े तीखे बाणोंसे प्रहार करने लगे॥ ४८॥ |
| कालिका शूलपातैस्तान् गदाशक्तिविदारितान्।<br>कुर्वन्ती व्यचरत्तत्र भक्षयन्ती च दानवान्॥ ४९ | भगवती कालिका त्रिशूल, गदा और शक्तिसे दानवोंको विदीर्ण करती हुई और उनका भक्षण करती हुई युद्धमें विचरने लगीं॥ ४९॥ |
| कमण्डलुजलाक्षेपगतप्राणान् महाबलान्।<br>ब्रह्माणी चाकरोत्तत्र दानवान्समराङ्गणे॥ ५० | भगवती ब्रह्माणी युद्धभूमिमें अपने कमण्डलुके जलके प्रक्षेपमात्रसे उन महाबली दानवोंको प्राणशून्य कर देती थीं॥ ५०॥ |
| माहेश्वरी वृषारूढा त्रिशूलेनातिरंहसा।<br>जघान दानवान्संख्ये पातयामास भूतले॥ ५१ | वृषभपर विराजमान भगवती माहेश्वरी अपने त्रिशूलसे रणमें दानवोंपर बड़े वेगसे प्रहार करती थीं और उन्हें मारकर धराशायी कर देती थीं॥ ५१॥ |
| वैष्णवी चक्रपातेन गदापातेन दानवान्।<br>गतप्राणांश्चकाराशु चोत्तमाङ्गविवर्जितान्॥ ५२ | भगवती वैष्णवी गदा तथा चक्रके प्रहारसे दानवोंको निष्प्राण तथा सिरविहीन कर डालती थीं॥ ५२॥ |
| ऐन्द्री वज्रप्रहारेण पातयामास भूतले।<br>ऐरावतकराघातपीडितान्दैत्यपुङ्गवान् ॥ ५३ | इन्द्रकी शक्ति देवी ऐन्द्री ऐरावत हाथीकी सूँड़की चोटसे पीड़ित बड़े-बड़े दैत्योंको अपने वज्रके प्रहारसे भूतलपर गिरा देती थीं॥ ५३॥ |
| वाराही तुण्डघातेन दंष्ट्राग्रपातनेन च।<br>जघान क्रोधसंयुक्ता शतशो दैत्यदानवान्॥ ५४ | देवी वाराही कुपित होकर अपने तुण्ड तथा भयंकर दाढ़ोंके प्रहारसे सैकड़ों दैत्यों और दानवोंको मार डालती थीं॥ ५४॥ |
| नारसिंही नखैस्तीव्रैर्दारितान्दैत्यपुङ्गवान्।<br>भक्षयन्ती चचाराजौ ननाद च मुहुर्मुहुः॥ ५५ | देवी नारसिंही अपने तीक्ष्ण नखोंसे बड़े-बड़े दैत्योंको फाड़-फाड़कर खाती हुई रणभूमिमें विचर रही थीं तथा बार-बार गर्जना कर रही थीं॥ ५५॥ |

अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८५

अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८५

शिवदूती अट्टहासैः पातयामास भूतले।<br>तांश्चखादाथ चामुण्डा कालिका च त्वरान्विता॥ ५६शिवदूती अपने अट्टहाससे ही दैत्योंको धराशायी कर देती थीं और चामुण्डा तथा कालिका बड़ी शीघ्रतासे उन्हें खाने लगती थीं॥ ५६॥
शिखिसंस्था च कौमारी कर्णाकृष्टैः शिलाशितैः।<br>निजघान रणे शत्रून्देवानां च हिताय वै॥ ५७मयूरपर विराजमान भगवती कौमारी देवताओंके कल्याणके लिये कानोंतक खींचे गये तथा पत्थरपर सान चढ़े तीक्ष्ण बाणोंसे शत्रुओंका संहार करने लगीं॥ ५७॥
वारुणी पाशसम्बद्धान्दैत्यान्समरमस्तके।<br>पातयामास तत्पृष्ठे मूर्च्छितानागतचेतनान्॥ ५८भगवती वारुणी समरांगणमें दैत्योंको अपने पाशमें बाँधकर उन्हें अचेत करके एकके ऊपर एकके क्रमसे गिरा देती थीं और वे निष्प्राण हो जाते थे॥ ५८॥
एवं मातृगणेनाजावतिवीर्यपराक्रमम्।<br>मर्दितं दानवं सैन्यं पलायनपरं ह्यभूत्॥ ५९इस प्रकार उन मातृशक्तियोंके प्रयाससे दानवोंकी वह ओजस्विनी तथा पराक्रमी सेना युद्धभूमिमें तहस-नहस होकर भाग खड़ी हुई॥ ५९॥
बुम्बारवस्तु सुमहानभूत्तत्र बलार्णवे।<br>पुष्पवृष्टिं तदा देवाश्चक्रुर्देव्या गणोपरि॥ ६०उस सेनारूपी समुद्रमें बड़े जोरसे रोने-चिल्लानेकी ध्वनि होने लगी। देवीके गणोंके ऊपर देवता पुष्पोंकी वर्षा करने लगे॥ ६०॥
तच्छ्रुत्वा निनदं घोरं जयशब्दं च दानवाः।<br>रक्तबीजश्चुकोपाशु दृष्ट्वा दैत्यान्पलायितान्॥ ६१<br><br>गर्जमानांस्तथा देवान्वीक्ष्य दैत्यो महाबलः।<br>रक्तबीजस्तु तेजस्वी रणमभ्याययौ तदा॥ ६२<br><br>सायुधो रथसंविष्टः कुर्वञ्ज्याशब्दमद्भुतम्।<br>आजगाम तदा देवीं क्रोधरक्तेक्षणोद्यतः॥ ६३दानवोंकी भयंकर चीत्कार तथा देवताओंकी जयध्वनि सुनकर रक्तबीज बहुत कुपित हुआ। उस समय दैत्योंको पलायित देखकर तथा देवताओंको गरजते हुए देखकर वह महाबली तथा तेजस्वी दैत्य रक्तबीज युद्धभूमिमें स्वयं आ डटा। वह आयुधोंसे सुसज्जित होकर रथपर सवार था और प्रत्यंचाकी अद्भुत टंकार करता हुआ क्रोधके मारे आँखें लाल किये युद्धके लिये देवीके सम्मुख आ गया॥ ६१–६३॥

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे रक्तबीजेन देव्या युद्धवर्णनं नामाष्टाविंशोऽध्यायः॥ २८॥


अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

रक्तबीजका वध और निशुम्भका युद्धक्षेत्रके लिये प्रस्थान

व्यास उवाचव्यासजी बोले— हे राजन्! किसी समय शंकरजीने
वरदानमिदं तस्य दानवस्य शिवार्पितम्।<br>अत्यद्भुततरं राजञ्छृणु तत्प्रब्रवीम्यहम्॥ १उस दानव रक्तबीजको यह बड़ा ही अद्भुत वर दे डाला था, मैं उसे बता रहा हूँ; आप सुनिये॥ १॥
तस्य देहाद्रक्तबिन्दुर्यदा पतति भूतले।<br>समुत्पतन्ति दैतेयास्तद्रूपास्तत्पराक्रमाः॥ २उस दानवके शरीरसे जब रक्तकी बूँद पृथ्वीपर गिरती थी, तब उसीके रूप तथा पराक्रमवाले दानव तुरंत उत्पन्न हो जाते थे। भगवान् शंकरने
६८६श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९

| असंख्याता महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः।<br>प्रभवन्विति रुद्रेण दत्तोऽस्त्यत्यद्भुतो वरः॥ ३ | उसे यह बड़ा ही अद्भुत वर दे दिया था कि तुम्हारे रक्तसे असंख्य महान् पराक्रमी दानव उत्पन्न हो जायँगे ॥ २-३ ॥ |
| स तेन वरदानेन दर्पितः क्रोधसंयुतः।<br>अभ्यगात्तरसा संख्ये हन्तुं देवीं सकालिकाम्॥ ४ | उस वरदानके कारण अभिमानमें भरा हुआ वह दैत्य अत्यन्त कुपित होकर कालिकासमेत अम्बिकाको मारनेके लिये बड़े वेगसे रणभूमिमें पहुँचा ॥ ४ ॥ |
| स दृष्ट्वा वैष्णवीं शक्तिं गरुडोपरिसंस्थिताम्।<br>शक्त्या जघान दैत्येन्द्रस्तां वै कमललोचनाम्॥ ५ | गरुडपर विराजमान वैष्णवी शक्तिको देखकर उस दैत्येन्द्रने उन कमलनयनी देवीपर शक्ति (बर्छी)-से प्रहार कर दिया ॥ ५ ॥ |
| गदया वारयामास शक्तिः सा शक्तिसंयुता।<br>अताडयच्च चक्रेण रक्तबीजं महासुरम्॥ ६ | तब उस शक्तिशालिनी वैष्णवी शक्तिने अपनी गदासे उस प्रहारको विफल कर दिया और अपने चक्रसे महान् असुर रक्तबीजपर आघात किया ॥ ६ ॥ |
| रथाङ्गहतदेहात्तु बहु सुस्राव शोणितम्।<br>वज्राहतगिरेः शृङ्गान्निर्झरा इव गैरिकाः॥ ७ | उस चक्रके लगनेपर रक्तबीजके घायल शरीरसे रक्तकी विशाल धारा बह चली मानो वज्रप्रहारसे घायल पर्वतके शिखरसे गेरूकी धारा बह चली हो ॥ ७ ॥ |
| यत्र यत्र यदा भूमौ पतन्ति रक्तबिन्दवः।<br>समुत्तस्थुस्तदाकाराः पुरुषाश्च सहस्रशः॥ ८ | पृथ्वीतलपर जहाँ-जहाँ रक्तकी बूँदें गिरती थीं, वहाँ-वहाँ उसीके समान आकारवाले हजारों पुरुष उत्पन्न हो जाते थे ॥ ८ ॥ |
| ऐन्द्री तमसुरं घोरं वज्रेणाभिजघान च।<br>रक्तबीजं क्रुधाविष्टा निःससार च शोणितम्॥ ९ | तदनन्तर इन्द्रकी शक्ति ऐन्द्रीने क्रोधमें भरकर उस महान् असुर रक्तबीजपर वज्रसे आघात किया, जिससे उसके शरीरसे और रक्त निकलने लगा ॥ ९ ॥ |
| ततस्तत्क्षतजाज्जाता रक्तबीजा ह्यनेकशः।<br>तद्वीर्याश्च तदाकाराः सायुधा युद्धदुर्मदाः॥ १० | तब उसके रक्तसे अनेक रक्तबीज उत्पन्न हो गये, जो उसीके समान पराक्रमी तथा आकारवाले थे। वे सब-के-सब शस्त्रसम्पन्न तथा युद्धोन्मत्त थे ॥ १० ॥ |
| ब्रह्माणी ब्रह्मदण्डेन कुपिता ह्यहनद् भृशम्।<br>माहेश्वरी त्रिशूलेन दारयामास दानवम्॥ ११<br><br>नारसिंही नखाघातैस्तं विव्याध महासुरम्।<br>अहनत्तुण्डघातेन क्रुद्धा तं राक्षसाधमम्॥ १२<br><br>कौमारी च तथा शक्त्या वक्षस्येनमताडयत्। | ब्रह्माणीने कुपित होकर उसे ब्रह्मदण्डसे बहुत मारा और देवी माहेश्वरीने अपने त्रिशूलसे उस दानवको विदीर्ण कर दिया। देवी नारसिंहीने अपने नखोंके प्रहारोंसे उस महान् असुरको बींध डाला, देवी वाराहीने क्रुद्ध होकर उस अधम राक्षसको अपने तुण्डप्रहारसे चोट पहुँचायी और भगवती कौमारीने अपनी शक्तिसे उसके वक्षपर प्रहार किया ॥ ११-१२ १/२ ॥ |
| सोऽपि क्रुद्धः शरासारैर्बिभेद निशितैश्च ताः॥ १३ | तब वह दानव रक्तबीज भी क्रुद्ध होकर अलग-अलग उन सभी देवियोंको तीखे बाणोंकी घोर वर्षा तथा गदा और शक्तिके प्रहारोंसे चोट पहुँचाने लगा। |

अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८७

अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गदाशक्तिप्रहारैस्तु मातृः सर्वाः पृथक्पृथक्।<br>शक्तयस्तं शराघातैर्विब्यधुस्तत्प्रकोपिताः॥ १४<br><br>तस्य शस्त्राणि चिच्छेद चण्डिका स्वशरैः शितैः।<br>जघानान्यैश्च विशिखैस्तं देवी कुपिता भृशम्॥ १५उसके आघातसे कुपित होकर सभी देवियोंने बाणोंके प्रहारसे उसको बींध डाला। भगवती चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके शस्त्रोंको काट डाला और अत्यन्त कुपित होकर वे अन्य बाणोंसे उस दानवको मारने लगीं॥ १३—१५॥
तस्य देहाच्च सुस्राव रुधिरं बहुधा तु यत्।<br>तस्मात्तत्सदृशाः शूराः प्रादुरासन्सहस्रशः॥ १६<br><br>रक्तबीजैर्जगद्व्याप्तं रुधिरौघसमुद्भवैः।<br>सन्नद्धैः सायुधैः कामं कुर्वद्भिर्युद्धमद्भुतम्॥ १७अब उसके शरीरसे अत्यधिक रक्त निकलने लगा। उस रक्तसे उसी रक्तबीजके समान हजारों वीर उत्पन्न हो गये। इस प्रकार उस रुधिर-राशिसे उत्पन्न रक्तबीजोंसे सारा जगत् भर गया; वे सब कवच पहने हुए थे, आयुधोंसे सुसज्जित थे और अद्भुत युद्ध कर रहे थे॥ १६-१७॥
प्रहरन्तश्च तान्दृष्ट्वा रक्तबीजाननेकशः।<br>भयभीताः सुरास्त्रेसुर्विषण्णाः शोककर्षिताः॥ १८<br><br>कथमद्य क्षयं दैत्या गमिष्यन्ति सहस्रशः।<br>महाकाया महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः॥ १९<br><br>एकैव चण्डिकात्रास्ति तथा काली च मातरः।<br>एताभिर्दानवाः सर्वे जेतव्याः कष्टमेव तत्॥ २०<br><br>निशुम्भो वाथ शुम्भो वा सहसा बलसंवृतः।<br>आगमिष्यति संग्रामे ततोऽनर्थो महान्भवेत्॥ २१उन असंख्य रक्तबीजोंको प्रहार करते देखकर देवता भयभीत, आतंकित, विषादग्रस्त और शोकसंतप्त हो गये। [वे सोचने लगे] इस समय रक्तबीजके रक्तसे उत्पन्न ये हजारों विशालकाय और महापराक्रमी दानव किस प्रकार विनष्ट होंगे? यहाँ रणभूमिमें केवल भगवती चण्डिका हैं और उनके साथमें देवी काली तथा कुछ मातृकाएँ हैं; केवल इन्हीं देवियोंको मिलकर सभी दानवोंको जीतना है—यह तो महान् कष्ट है। इसी समय यदि अचानक शुम्भ अथवा निशुम्भ भी सेनाके साथ संग्राममें आ जायगा, तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जायगा॥ १८—२१॥
व्यास उवाच<br>एवं देवा भयोद्विग्नाश्चिन्तामापुर्महत्तराम्।<br>यदा तदाम्बिका प्राह कालीं कमललोचनाम्॥ २२<br><br>चामुण्डे कुरु विस्तीर्णं वदनं त्वरिता भृशम्।<br>मच्छस्त्रपातसम्भूतं रुधिरं पिब सत्वरा॥ २३<br><br>भक्षयन्ती चर रणे दानवानद्य कामतः।<br>हनिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्गदासिसुमुसलैस्तथा॥ २४व्यासजी बोले— [हे राजन्!] इस प्रकार जब सभी देवता भयसे व्याकुल होकर अत्यधिक चिन्तित हो उठे, तब भगवती अम्बिकाने कमलसदृश नेत्रोंवाली कालीसे कहा—हे चामुण्डे! तुम शीघ्रतापूर्वक अपना मुख पूर्णरूपसे फैला लो और मेरे शस्त्राघातके द्वारा [रक्तबीजके शरीरसे] निकले रक्तको जल्दी-जल्दी पीती जाओ। तुम दानवोंका भक्षण करती हुई इच्छानुसार युद्धभूमिमें विचरण करो। मैं तीक्ष्ण बाणों, गदा, तलवार तथा मुसलोंसे इन दैत्योंको मार डालूँगी॥ २२—२४॥
तथा कुरु विशालाक्षि पानं तद्रुधिरस्य च।<br>बिन्दुमात्रं यथा भूम्यां न पतेदपि साम्प्रतम्॥ २५<br><br>भक्ष्यमाणास्तदा दैत्या न चोत्पत्स्यन्ति चापरे।<br>एवमेषां क्षयो नूनं भविष्यति न चान्यथा॥ २६हे विशाल नयनोंवाली! तुम इस प्रकारसे इस दैत्यके रुधिरका पान करो, जिससे कि अब एक भी बूँद रक्त भूमिपर न गिरने पाये; तब इस ढंगसे भक्षण किये जानेपर दूसरे दानव उत्पन्न नहीं हो सकेंगे। इस प्रकार इन दैत्योंका नाश अवश्य हो जायगा, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ २५-२६॥
६८८श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
घातयिष्याम्यहं दैत्यं त्वं भक्षय च सत्वरा।<br>पिबन्ती क्षतजं सर्वं यतमानारिसंक्षये ॥ २७<br><br>इत्थं दैत्यक्षयं कृत्वा दत्त्वा राज्यं सुरालयम्।<br>इन्द्राय सुस्थिरं सर्वं गमिष्यामो यथासुखम्॥ २८जब मैं इस दैत्यको मारूँ, तब तुम शत्रुसंहाररूपी इस कार्यमें प्रयत्नशील होकर सारा रक्त पीती हुई शीघ्रतापूर्वक इसका भक्षण कर जाना। इस प्रकार दैत्यवध करके स्वर्गका सारा राज्य इन्द्रको देकर हम सब आनन्दपूर्वक यहाँसे चली जायँगी॥ २७-२८॥
व्यास उवाच<br>इत्युक्ताम्बिकया देवी चामुण्डा चण्डविक्रमा।<br>पपौ च क्षतजं सर्वं रक्तबीजशरीरजम्॥ २९<br><br>अम्बिका तं जघानाशु खड्गेन मुसलेन च।<br>चखाद देहशकलांश्चामुण्डा तान्कृशोदरी ॥ ३०**व्यासजी बोले—**भगवती अम्बिकाके ऐसा कहनेपर प्रचण्ड पराक्रमवाली देवी चामुण्डा रक्तबीजके शरीरसे निकले हुए समस्त रुधिरको पीने लगीं। जगदम्बा खड्ग तथा मुसलसे उस दैत्यको मारने लगीं और कृशोदरी चामुण्डा उसके शरीरके कटे हुए अंगोंका भक्षण करने लगीं॥ २९-३०॥
सोऽपि क्रुद्धो गदाघातैश्चामुण्डां समघातयत्।<br>तथापि सा पपावाशु क्षतजं तमभक्षयत्॥ ३१अब वह रक्तबीज भी कुपित होकर गदाके प्रहारोंसे चामुण्डाको घायल करने लगा, फिर भी वे शीघ्रतापूर्वक उसका रुधिर पीती रहीं और उसका भक्षण करती रहीं॥ ३१॥
येऽन्ये रुधिरजाः क्रूरा रक्तबीजा महाबलाः।<br>तेऽपि निष्पातिताः सर्वे भक्षिता गतशोणिताः ॥ ३२उस दैत्यके रुधिरसे उत्पन्न हुए अन्य जो भी महाबली और क्रूर रक्तबीज थे, उन्हें भी चामुण्डांने मार डाला। वे देवी उनका भी रक्त पी गयीं और उन सबको खा गयीं॥ ३२॥
कृत्रिमा भक्षिताः सर्वे यस्तु स्वाभाविकॊऽसुरः।<br>सोऽपि प्रपातितो हत्वा खड्गेनातिविखण्डितः ॥ ३३इस प्रकार भगवतीने जब सभी कृत्रिम रक्तबीजोंका भक्षण कर लिया, तब जो वास्तविक रक्तबीज था, उसे भी मारकर उन्होंने खड्गसे उसके अनेक टुकड़े करके भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥
रक्तबीजे हते रौद्रे ये चान्ये दानवा रणे।<br>पलायनं ततः कृत्वा गतास्ते भयकम्पिताः ॥ ३४<br><br>हाहेति विब्रुवन्तस्ते शुम्भं प्रोचुः सविह्वलाः।<br>रुधिरारक्तदेहाश्च विगतास्त्रा विचेतसः ॥ ३५<br><br>राजन्नम्बिकया रक्तबीजोऽसौ विनिपातितः।<br>चामुण्डा तस्य देहात्तु पपौ सर्वं च शोणितम्॥ ३६<br><br>ये चान्ये दानवाः शूरा वाहनेनातिरंहसा।<br>सिंहेन निहताः सर्वे काल्या च भक्षिताः परे॥ ३७तत्पश्चात् भयंकर रक्तबीजका वध हो जानेपर जो अन्य दानव रणभूमिमें थे, वे भयसे काँपते हुए भाग करके शुम्भके पास पहुँचे। उनका चित्त बहुत व्याकुल था, उनका शरीर रुधिरसे लथपथ था, वे शस्त्रविहीन हो गये थे और अचेत-से हो गये थे। वे हाय, हाय—ऐसा पुकारते हुए शुम्भसे कहने लगे—हे राजन्! अम्बिकाने उस रक्तबीजको मार डाला और चामुण्डा उसकी देहसे निकला सारा रुधिर पी गयी। जो अन्य दानववीर थे, उन सबको देवीके वाहन सिंहने बड़ी तेजीसे मार डाला और शेष दानवोंको भगवती काली खा गयीं॥ ३४–३७॥
वयं त्वां कथितुं राजन्नागता युद्धचेष्टितम्।<br>चरितञ्च तथा देव्याः संग्रामे परमाद्भुतम्॥ ३८हे राजन्! हमलोग आपको युद्धका वृत्तान्त तथा संग्राममें देवीके द्वारा प्रदर्शित किये गये उनके अत्यन्त अद्भुत चरित्रको बतानेके लिये आपके पास आये हुए हैं॥ ३८॥

अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९

अ० २९ ] पञ्चम स्कन्ध ६८९


अजेयेयं महाराज सर्वथा दैत्यदानवैः।<br>गन्धर्वासुरयक्षैश्च पन्नगोरगराक्षसैः॥ ३९हे महाराज! यह देवी दैत्य, दानव, गन्धर्व, असुर, यक्ष, पन्नग, उरग और राक्षस—इन सभीसे सर्वथा अजेय है॥ ३९॥
अन्यास्तत्रागता देव्य इन्द्राणीप्रमुखा भृशम्।<br>युध्यमाना महाराज वाहनैरायुधैर्युताः॥ ४०<br><br>ताभिः सर्वं हतं सैन्यं दानवानां वरायुधैः।<br>रक्तबीजोऽपि राजेन्द्र तरसा विनिपातितः॥ ४१हे महाराज! इन्द्राणी आदि अन्य प्रमुख देवियाँ भी वहाँ आयी हुई हैं। वे अपने-अपने वाहनोंपर सवार होकर नानाविध आयुध धारण करके घोर युद्ध कर रही हैं। हे राजेन्द्र! उन देवियोंने अपने उत्तम अस्त्रोंसे दानवोंकी सारी सेनाका विध्वंस कर डाला और रक्तबीजको भी बड़ी शीघ्रतासे मार गिराया॥ ४०-४१॥
एकापि दुःसहा देवी किं पुनस्ताभिरन्विता।<br>सिंहोऽपि हन्ति संग्रामे राक्षसानमितप्रभः॥ ४२एकमात्र देवी अम्बिका ही हमलोगोंके लिये असह्य थी, और फिर जब वह उन देवियोंके साथ हो गयी है तब कहना ही क्या? असीम तेजवाला उसका वाहन सिंह भी संग्राममें राक्षसोंका वध कर रहा है॥ ४२॥
अतो विचार्य सचिवैर्यद्युक्तं तद्विधीयताम्।<br>न वैरमनया युक्तं सन्धिरैव सुखप्रदः॥ ४३अतएव मन्त्रियोंके साथ विचार-विमर्श करके जो उचित हो, वह कीजिये। इसके साथ शत्रुता उचित नहीं है, अपितु सन्धि कर लेना ही सुखदायक होगा॥ ४३॥
आश्चर्यमेतदखिलं यन्नारी हन्ति राक्षसान्।<br>रक्तबीजोऽपि निहतः पीतं तस्यापि शोणितम्॥ ४४<br><br>अन्ये निपातिता दैत्याः संग्रामेऽम्बिकया नृप।<br>चामुण्डया च मांसं वै भक्षितं सकलं रणे॥ ४५यह आश्चर्य है कि एक स्त्री राक्षसोंका संहार कर रही है! रक्तबीज भी मार डाला गया! देवी चामुण्डा उसका सारा रक्त भी पी गयी! हे नृप! अम्बिकाने संग्राममें अन्य दैत्योंको मार डाला और देवी चामुण्डा उनका सम्पूर्ण मांस खा गयी॥ ४४-४५॥
वरं पातालगमनं तस्याः सेवाथवा वरा।<br>न तु युद्धं महाराज कार्यमम्बिकया सह॥ ४६<br><br>न नारी प्राकृता ह्येषा देवकार्यार्थसाधिनी।<br>मायेयं प्रबला देवी क्षपयन्तीयमुत्थिता॥ ४७हे महाराज! अब हमलोगोंके लिये या तो पाताल चला जाना श्रेयस्कर है अथवा उसकी दासता स्वीकार कर लेना; किंतु उस अम्बिकाके साथ युद्ध नहीं करना चाहिये। यह साधारण स्त्री नहीं है, यह देवताओंका कार्य सिद्ध करनेवाली है और यह मायारूपिणी शक्तिसम्पन्न देवीके रूपमें दैत्योंका नाश करनेके लिये प्रकट हुई है॥ ४६-४७॥
व्यास उवाच<br>इति तेषां वचस्तथ्यं श्रुत्वा कालविमोहितः।<br>मुमूर्षुः प्रत्युवाचेदं शुम्भः प्रस्फुरिताधरः॥ ४८**व्यासजी बोले—**उन सैनिकोंकी यह यथार्थ बात सुनकर कालसे मोहित तथा मरनेके लिये उद्यत वह काँपते हुए ओठोंवाला शुम्भ उनसे कहने लगा॥ ४८॥
शुम्भ उवाच<br>यूयं गच्छत पातालं शरणं वा भयातुराः।<br>हनिष्याम्यहमद्यैव ताञ्च ताश्च समुद्यतः॥ ४९**शुम्भ बोला—**तुमलोग भयभीत होकर पाताल चले जाओ अथवा उसकी शरणमें चले जाओ, किंतु मैं तो युद्धमें पूर्णरूपसे तत्पर रहते हुए उस अम्बिका तथा उन देवियोंको आज ही मार डालूँगा॥ ४९॥