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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २

५४० श्रीमद्देवीभागवत [ अ० २


संस्कृतहिन्दी
स्वरक्षार्थं समागत्य महिषं समताडयत्।<br>सोऽपि तं निजघानाशु शृङ्गाभ्यां काममोहितः॥ ३८अपनी रक्षाके लिये रम्भने उस महिषपर कठोर प्रहार किया। तब उस कामातुर महिषने भी अपनी सींगोंसे रम्भपर शीघ्रतासे प्रहार करना आरम्भ कर दिया॥ ३७-३८॥
ताडितस्तेन तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदये भृशम्।<br>भूमौ पपात तरसा ममार च विमूर्च्छितः॥ ३९उस महिषके द्वारा तीक्ष्ण सींगोंसे हृदयस्थलमें गहरी चोट पहुँचानेके कारण रम्भ शीघ्र ही मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और मर गया॥ ३९॥
मृते भर्तरि सा दीना भयार्ता विद्रुता भृशम्।<br>सा वेगात्तं वटं प्राप्य यक्षाणां शरणं गता॥ ४०पतिके मर जानेपर अत्यन्त शोकाकुल तथा भयग्रस्त वह महिषी वहाँसे भाग चली। वेगपूर्वक भागती हुई वह एक वटवृक्षके नीचे पहुँचकर वहाँ रहनेवाले यक्षोंकी शरणमें जा पहुँची॥ ४०॥
पृष्ठतस्तु गतस्तत्र महिषः कामपीडितः।<br>कामयानस्तु तां कामी बलवीर्यमदोद्धतः॥ ४१वह कामार्त और बल तथा वीर्यसे मदोन्मत्त कामासक्त महिष भी उसकी कामना करता हुआ उसके पीछे-पीछे गया॥ ४१॥
रुदती सा भृशं दीना दृष्टा यक्षैर्भयातुरा।<br>धावमानं च तं वीक्ष्य यक्षास्त्रातुं समाययुः॥ ४२यक्षोंने उस महिषसे पीड़ित तथा भयभीत होकर रोती हुई उस महिषीको देख लिया और महिषको दौड़ता हुआ देखकर उस महिषीकी रक्षाके लिये वे यक्ष वहाँ आ गये॥ ४२॥
युद्धं समभवद् घोरं यक्षाणां च हयारिणा।<br>शरेण ताडितस्तूर्णं पपात धरणीतले॥ ४३अब उस महिषके साथ यक्षोंका विकराल युद्ध होने लगा और अन्तमें बाणसे आहत होकर वह महिष शीघ्र ही भूमिपर गिर पड़ा॥ ४३॥
मृतं रम्भं समानीय यक्षास्ते परमं प्रियम्।<br>चितायां रोपयामासुस्तस्य देहस्य शुद्धये॥ ४४<br><br>महिषी सा पतिं दृष्ट्वा चितायां रोपितं तदा।<br>प्रवेष्टुं सा मतिं चक्रे पतिना सह पावकम्॥ ४५तदनन्तर उन यक्षोंने परम प्रिय मृत रम्भको लाकर उसकी देह-शुद्धिके लिये उसे चितापर रख दिया। तब उस महिषीने अपने पतिको चितापर रखा हुआ देखकर उसके साथ स्वयं भी अग्निमें प्रवेश करनेका निश्चय किया॥ ४४-४५॥
वार्यमाणापि यक्षैः सा प्रविवेश हुताशनम्।<br>ज्वालामालाकुलं साध्वी पतिमादाय वल्लभम्॥ ४६यक्षोंके मना करनेपर भी अपने प्रिय पतिके साथ वह महिषी विकराल लपटोंवाली अग्निमें प्रविष्ट हो गयी॥ ४६॥
महिषस्तु चितामध्यात्समुत्तस्थौ महाबलः।<br>रम्भोऽप्यन्यद्वपुः कृत्वा निःसृतः पुत्रवत्सलः॥ ४७<br><br>रक्तबीजोऽप्यसौ जातो महिषोऽपि महाबलः।<br>अभिषिक्तस्तु राज्येऽसौ हयारिरसुरोत्तमैः॥ ४८उसी समय एक महाबली महिष चिताके मध्यसे प्रकट हो गया तथा अन्य शरीर धारण करके वह पुत्रप्रेमी रम्भ भी चिताके मध्यभागसे निकल पड़ा। इस प्रकार रक्तबीज तथा महान् बलशाली महिषासुर उत्पन्न हुए। तदनन्तर श्रेष्ठ दानवोंने उस महिषासुरका राज्याभिषेक कर दिया॥ ४७-४८॥
एवं स महिषो जातो रक्तबीजश्च वीर्यवान्।<br>अवध्यस्तु सुरैर्दैत्यैर्मानवैश्च नृपोत्तम॥ ४९हे नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार महिषासुर तथा पराक्रमी रक्तबीज उत्पन्न हुए। वह महिषासुर देवताओं, दानवों तथा मनुष्योंसे अवध्य था॥ ४९॥
अ० ३ ]पञ्चम स्कन्ध५४१

| इत्येतत्कथितं राजन् जन्म तस्य महात्मनः।<br>वरप्रदानञ्च तथा प्रोक्तं सर्वं सविस्तरम्॥ ५० | हे राजन्! इस प्रकार मैंने आपको उस महान् महिषासुरके जन्म तथा उससे सम्बन्धित वरदान-प्राप्तिका प्रसंग विस्तारपूर्वक बता दिया॥ ५०॥ |

इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्रयां संहितायां पञ्चमस्कन्धे महिषासुरोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः॥ २॥


अथ तृतीयोऽध्यायः

महिषासुरका दूत भेजकर इन्द्रको स्वर्ग खाली करनेका आदेश देना, दूतद्वारा इन्द्रका युद्धहेतु आमन्त्रण प्राप्तकर महिषासुरका दानववीरोंको युद्धके लिये सुसज्जित होनेका आदेश देना

व्यास उवाचव्यासजी बोले—
एवं स महिषो नाम दानवो वरदर्पितः।<br>प्राप्य राज्यं जगत्सर्वं वशे चक्रे महाबलः॥ १इस प्रकार वरदान पानेके कारण अभिमानयुक्त उस महाबली दानव महिषासुरने राज्य प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को अपने अधीन कर लिया॥ १॥
पृथिवीं पालयामास सागरान्तां भुजार्जिताम्।<br>एकच्छत्रां निरातङ्कां वैरिवर्गविवर्जिताम्॥ २उसने समुद्रपर्यन्त सारी पृथिवीको अपने बाहुबलसे जीतकर शत्रु-समुदायसे रहित कर दिया तथा वह निर्भय होकर एकच्छत्र राज्य करने लगा॥ २॥
सेनानीश्चिक्षुरस्तस्य महावीर्यो मदोत्कटः।<br>धनाध्यक्षस्तथा ताम्रः सेनायुतसमावृतः॥ ३उसका सेनाध्यक्ष चिक्षुर महापराक्रमी एवं मदमत्त था। ताम्र उसका कोषाध्यक्ष था, जिसके पास दस हजार सैनिक थे॥ ३॥
असिलोमा तथोदर्को बिडालाख्यश्च बाष्कलः।<br>त्रिनेत्रोऽथ तथा कालबन्धको बलदर्पितः॥ ४<br><br>एते सैन्ययुताः सर्वे दानवा मेदिनीं तदा।<br>आवृत्य संस्थिताः काममृद्धां सागरमेखलाम्॥ ५उस समय असिलोमा, उदर्क, बिडालाख्य, बाष्कल, त्रिनेत्र तथा बलोन्मत्त कालबन्धक—इन दानवोंने अपनी-अपनी विशाल सेनाओंके साथ सागरान्त समृद्धिशालिनी पृथिवीको घेरकर राज्य स्थापित किया॥ ४-५॥
करदाश्च कृताः सर्वे भूमिपालाः पुरातनाः।<br>निहता ये बलोदग्राः क्षात्रधर्मव्यवस्थिताः॥ ६जो पुराने नरेश थे, वे भी अब महिषासुरको कर देने लगे। उनमें भी जो स्वाभिमानी थे और क्षात्र-धर्मानुसार जिन्होंने उसका सामना किया, वे मार डाले गये॥ ६॥
ब्राह्मणा वशगा जाता यज्ञभागसमर्पकाः।<br>महिषस्य महाराज निखिले क्षितिमण्डले॥ ७हे महाराज! सम्पूर्ण भूमण्डलपर ब्राह्मणलोग महिषासुरके अधीन हो गये और उसे यज्ञभाग देने लगे॥ ७॥
एकातपत्रं तद्राज्यं कृत्वा स महिषासुरः।<br>स्वर्गं जेतुं मनश्चक्रे वरदानेन गर्वितः॥ ८इस प्रकार एकच्छत्र राज्य स्थापित करके वरदानसे गर्वित वह महिषासुर स्वर्गपर भी विजय प्राप्त करनेकी अभिलाषा करने लगा॥ ८॥