देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमाहात्म्यम्
अथ प्रथमोऽध्यायः
सूतजीके द्वारा ऋषियोंके प्रति श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणकी महिमाका कथन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सृष्टौ या सर्गरूपा जगदवनविधौ<br> पालनी या च रौद्री<br>संहारे चापि यस्या जगदिदमखिलं<br> क्रीडनं या पराख्या।<br>पश्यन्ती मध्यमाथो तदनु भगवती<br> वैखरी वर्णरूपा<br>सास्मद्वाचं प्रसन्ना विधिहरिगिरिशा-<br> राधितालङ्करोतु ॥ १॥ | जगत्के सृष्टिकार्यमें जो उत्पत्तिरूपा, रक्षाकार्यमें पालनशक्तिरूपा, संहारकार्यमें रौद्ररूपा हैं, सम्पूर्ण विश्व-प्रपंच जिनके लिये क्रीडास्वरूप है, जो परा-पश्यन्ती-मध्यमा तथा वैखरी वाणीमें अभिव्यक्त होती हैं और जो ब्रह्मा-विष्णु-महेशद्वारा निरन्तर आराधित हैं, वे प्रसन्न चित्तवाली देवी भगवती मेरी वाणीको अलंकृत (परिशुद्ध) करें॥ १॥ |
| नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥ २ | [बदरिकाश्रमनिवासी प्रसिद्ध ऋषि] श्रीनारायण तथा नरोंमें श्रेष्ठ श्रीनर, भगवती सरस्वती और महर्षि वेदव्यासको प्रणाम करनेके पश्चात् ही जय (इतिहासपुराणादि सद्ग्रन्थों)-का पाठ-प्रवचन करना चाहिये॥ २॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>सूत जीव समा बह्वीर्यस्त्वं श्रावयसीह नः।<br>कथा मनोहराः पुण्या व्यासशिष्य महामते॥ ३ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! हे महामते! हे व्यासशिष्य! आप दीर्घजीवी हों; आप हमलोगोंको नानाविध पुण्यप्रदायिनी एवं मनोहारिणी कथाएँ सुनाते रहते हैं॥ ३॥ |
| सर्वपापहरं पुण्यं विष्णोश्चरितमद्भुतम्।<br>अवतारकथोपेतमस्माभिर्भक्तितः श्रुतम्॥ ४ | भगवान् विष्णुके सर्वपापविनाशक, परम पवित्र एवं उन अवतार-कथाओंसे सम्बन्धित अद्भुत चरित्रोंको हमने भक्तिपूर्वक सुना और इसी प्रकार हमने भगवान् शिवके अलौकिक चरित्र तथा भस्म और रुद्राक्षके ऐतिहासिक माहात्म्यका श्रवण आपके मुखारविन्दसे किया॥ ४-५॥ |
| शिवस्य चरितं दिव्यं भस्मरुद्राक्षयोस्तथा।<br>सेतिहासञ्च माहात्म्यं श्रुतं तव मुखाम्बुजात्॥ ५ | |
| अधुना श्रोतुमिच्छामः पावनात् पावनं परम्।<br>भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणामनायासेन सर्वशः॥ ६ | हमलोग अब ऐसी परम पावन कथा सुनना चाहते हैं, जो बिना प्रयासके ही मनुष्योंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेमें पूर्णरूपसे सहायक हो॥ ६॥ |
| तत् त्वं ब्रूहि महाभाग येन सिध्यन्ति मानवाः।<br>कलावपि परं त्वत्तो न विद्मः संशयच्छिदम्॥ ७ | हे महाभाग! अतः आप उस कथाका वर्णन करें, जिसके द्वारा मानव कलियुगमें भी सिद्धियाँ प्राप्त कर लें; क्योंकि हम आपसे बढ़कर किसी अन्यको नहीं जानते हैं, जो हमारी शंकाओंका निवारण कर सके॥ ७॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 A
| ३४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| सूत उवाच<br>साधु पृष्टं महाभागा लोकानां हितकाम्यया।<br>सर्वशास्त्रस्य यत् सारं तद्वो वक्ष्याम्यशेषतः॥ ८ | **सूतजी बोले—**हे महाभाग ऋषियो! आपलोगोंने लोककल्याणकी भावनासे अत्यन्त उत्तम प्रश्न किया है, अतः मैं आप सभीके लिये समस्त शास्त्रोंका जो सार है, उसे पूर्णरूपसे बताऊँगा॥ ८॥ |
| तावद् गर्जन्ति तीर्थानि पुराणानि व्रतानि च।<br>यावन्न श्रूयते सम्यग् देवीभागवतं नरैः॥ ९ | समस्त तीर्थ, पुराण और व्रत [अपनी श्रेष्ठताका वर्णन करते हुए] तभीतक गर्जना करते हैं, जबतक मनुष्य श्रीमद्देवीभागवतका सम्यक्रूपसे श्रवण नहीं कर लेते॥ ९॥ |
| तावत् पापाटवी नृणां क्लेशदादभ्रकण्टका।<br>यावन्न परशुः प्राप्तो देवीभागवताभिधः॥ १० | मनुष्योंके लिये पापरूपी अरण्य तभीतक दुःखप्रद एवं कंटकमय रहता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी परशु (कुठार) उपलब्ध नहीं हो जाता॥ १०॥ |
| तावत् क्लेशावहं नृणामुपसर्गमहातमः।<br>यावन्नैवोदयं प्राप्तो देवीभागवतोष्णगुः॥ ११ | मनुष्योंको उपसर्ग (ग्रहण)-रूपी घोर अन्धकार तभीतक कष्ट पहुँचाता है, जबतक श्रीमद्देवीभागवतरूपी सूर्य उनके सम्मुख उदित नहीं हो जाते॥ ११॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग वद नो वदतां वर।<br>कीदृशं तत्पुराणं हि विधिश्चाच्छ्रवणे च कः॥ १२<br><br>कतिभिर्वासरैरेतच्छ्रोतव्यं किञ्च पूजनम्।<br>कैर्मानवैः श्रुतं पूर्वं कान्कान्कामानवाप्नुयुः॥ १३ | **ऋषिगण बोले—**हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाभाग सूतजी! आप हमें बतायें कि वह श्रीमद्देवीभागवतपुराण कैसा है और उसके श्रवणकी विधि क्या है? उस पुराणको कितने दिनोंमें सुनना चाहिये, [उसके श्रवणकी अवधिमें] पूजन-विधान क्या है, प्राचीन कालमें किन-किन मनुष्योंने इसे सुना और उनकी कौन-कौनसी कामनाएँ पूर्ण हुईं?॥ १२-१३॥ |
| सूत उवाच<br>विष्णोरंशो मुनिर्जातः सत्यवत्यां पराशरात्।<br>विभज्य वेदांश्चतुरः शिष्यानध्यापयत्पुरा॥ १४ | **सूतजी बोले—**प्राचीन कालमें पराशरऋषिद्वारा सत्यवतीके गर्भसे विष्णुके अंशस्वरूप मुनि व्यास उत्पन्न हुए, जिन्होंने वेदोंका चार विभाग करके उन्हें अपने शिष्योंको पढ़ाया॥ १४॥ |
| व्रात्यानां द्विजबन्धूनां वेदेष्वनधिकारिणाम्।<br>स्त्रीणां दुर्मेधसां नृणां धर्मज्ञानं कथं भवेत्॥ १५<br><br>विचार्यैतत् तु मनसा भगवान् बादरायणः।<br>पुराणसंहितां दध्यौ तेषां धर्मविवित्सया॥ १६ | पतितों, ब्राह्मणाधमों, वेदाध्ययनके अनधिकारियों, स्त्रियों एवं दूषित बुद्धिवाले मनुष्योंको धर्मका ज्ञान कैसे हो—मनमें ऐसा विचार करके भगवान् बादरायण व्यासजीने उनके धर्मज्ञानार्थ पुराण-संहिताका प्रणयन किया॥ १५-१६॥ |
| अष्टादश पुराणानि स कृत्वा भगवान् मुनिः।<br>मामेवाध्यापयामास भारताख्यानमेव च॥ १७ | उन भगवान् व्यासमुनिने अठारह पुराणों एवं महाभारतका प्रणयन करके सर्वप्रथम मुझे ही पढ़ाया॥ १७॥ |
| देवीभागवतं तत्र पुराणं भोगमोक्षदम्।<br>स्वयं तु श्रावयामास जनमेजयभूपतिम्॥ १८ | उन पुराणोंमें श्रीमद्देवीभागवतपुराण भोग एवं मोक्षको देनेवाला है। व्यासजीने राजा जनमेजयको यह पुराण स्वयं सुनाया था॥ १८॥ |
1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—2 B