देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी-
| ७२२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३५ |
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| यः शृणोति नरो नित्यमेतदाख्यानमुत्तमम्।<br>सम्प्राप्नोति नरः सत्यं संसासुखमद्भुतम्॥ ५०<br><br>ज्ञानदं मोक्षदं चैव कीर्तिदं सुखदं तथा।<br>पावनं श्रवणान्नूनमेतदाख्यानमद्भुतम्॥ ५१<br><br>अखिलार्थप्रदं नृणां सर्वधर्मसमावृतम्।<br>धर्मार्थकाममोक्षाणां कारणं परमं मतम्॥ ५२<br><br>सूत उवाच<br>जनमेजयेन राज्ञासौ पृष्टः सत्यवतीसुतः।<br>उवाच संहितां दिव्यां व्यासः सर्वार्थतत्त्ववित्॥ ५३<br><br>चरितं चण्डिकायास्तु शुम्भदैत्यवधाश्रितम्।<br>कथयामास भगवान्कृष्णः कारुणिको मुनिः।<br>इति वः कथितः सारः पुराणानां मुनीश्वराः॥ ५४ | जो मनुष्य उनके इस उत्तम आख्यानको नित्य सुनता है, वह संसारमें अद्भुत सुख प्राप्त करता है, यह सत्य है। इस पवित्र और अद्भुत आख्यानका श्रवण करनेसे यह ज्ञान, मोक्ष, कीर्ति और सुख प्रदान करता है। यह मनुष्योंकी सभी कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा समस्त धर्मोंका सार और धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिका परम कारण बताया गया है॥ ५०—५२॥<br><br>सूतजी बोले— राजा जनमेजयके पूछनेपर सभी अर्थ-तत्त्वोंको जाननेवाले सत्यवतीपुत्र व्यासने उनसे यह दिव्य देवीभागवतसंहिता कही। परम दयालु भगवान् कृष्णद्वैपायन मुनि व्यासने शुम्भदैत्यके वधकी कथापर आधारित देवी चण्डिकाके चरित्रका वर्णन किया था। हे मुनीश्वरो! समस्त पुराणोंका सारस्वरूप यह इतिहास मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ५३-५४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे सुरथराजसमाधिवैश्ययोर्देवी-
भक्त्येष्टप्राप्तिवर्णनं नाम पञ्चत्रिंशोऽध्यायः॥ ३५॥
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॥ पंचमः स्कन्धः समाप्तः॥
श्रुतिस्मृती तु नेत्रे द्वे पुराणं हृदयं स्मृतम्। श्रुतिस्मृतिभ्यां हीनोऽन्धः काणः स्यादेकया विना॥
पुराणहीनाद्धृच्छून्यात् काणान्धावपि तौ वरौ। श्रुतिस्मृत्युदितो धर्मः पुराणे परिगीयते॥
यस्य धर्मेऽस्ति जिज्ञासा यस्य पापाद्भयं महत्। श्रोतव्यानि पुराणानि धर्ममूलानि तेन वै॥
चतुर्दशसु विद्यासु पुराणं दीप उत्तमः। अन्धोऽपि न तदालोकात् संसाराब्धौ क्वचित् पतेत्॥
विद्वानोंके श्रुति-स्मृति—ये दो नेत्र हैं और पुराण हृदय है। इनमेंसे जिसे श्रुति-स्मृतिमेंसे किसी एकका ज्ञान नहीं है; वह काना, दोनोंके ज्ञानसे हीन अन्धा है, किंतु जो पुराणरूपी विद्यासे हीन है वह तो हृदयहीन या शून्य होनेके कारण इन दोनोंसे भी निकृष्ट है। श्रुति तथा स्मृतियोंमें कहा गया धर्म पुराणमें प्रतिपादित है। जिसकी धर्ममें जिज्ञासा या रुचि हो, जो पापोंसे डरता हो, उसे पुराणोंका श्रवण करना चाहिये; क्योंकि वे ही धर्मके मूल हैं। चौदहों विद्याओंमें पुराण-विद्या ही उत्तम दीपक है। इसके आलोक—प्रकाशमें स्थित अन्धा भी संसार-सागरमें कभी नहीं गिरता।
[ स्कन्दपु० का० २।९६-९७, ९९-१०० ]
॥ श्रीजगदम्बिकायै नमः ॥
॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
श्रीमद्देवीभागवतमहापुराण
षष्ठः स्कन्धः
अथ प्रथमोऽध्यायः
त्रिशिराकी तपस्यासे चिन्तित इन्द्रद्वारा तपभंगहेतु अप्सराओंको भेजना
| ऋषय ऊचुः<br>सूत सूत महाभाग मिष्टं ते वचनामृतम्।<br>न तृप्ताः स्मो वयं पीत्वा द्वैपायनकृतं शुभम्॥ १<br><br>पुनस्त्वां प्रष्टुमिच्छामः कथां पौराणिकीं शुभाम्।<br>वेदेऽपि कथितां रम्यां प्रसिद्धां पापनाशिनीम्॥ २ | ऋषिगण बोले—हे महाभाग सूतजी! आपकी वाणीरूपी अत्यन्त मधुर सुधाका पान करके अभी हम सन्तुप्त नहीं हुए हैं। कृष्णद्वैपायन वेदव्यासजीने जिस उत्तम श्रीमद्देवीभागवत-महापुराणका प्रणयन किया है; उस पुराणकी मंगलमयी, वेदवर्णित, मनोहर, प्रसिद्ध और पापोंका नाश करनेवाली कथाको हम आपसे पुनः पूछना चाहते हैं॥ १-२॥ |
|---|---|
| वृत्रासुर इति ख्यातो वीर्यवांस्त्वष्टुरात्मजः।<br>स कथं निहतः संख्ये वासवेन महात्मना॥ ३<br><br>त्वष्टा वै सुरपक्षीयस्तत्पुत्रो बलवत्तरः।<br>शक्रेण घातितः कस्माद् ब्रह्मयोनिर्महाबलः॥ ४<br><br>देवाः सत्त्वगुणोत्पन्ना मानुषा राजसाः स्मृताः।<br>तिर्यञ्चस्तामसाः प्रोक्ताः पुराणागमवादिभिः॥ ५<br><br>विरोधोऽत्र महान् भाति नूनं शतमखेन ह।<br>छलेन बलवान् वृत्रः शक्रेण विनिपातितः॥ ६<br><br>विष्णुः प्रेरयिता तत्र स तु सत्त्वधरः परः।<br>प्रविष्टः पविमध्ये स छद्मना भगवान् प्रभुः॥ ७<br><br>सन्धिं विधाय स ह्येवं मन्त्रितोऽसौ महाबलः।<br>हरिभ्यां सत्यमुत्सृज्य जलफेनेन शातितः॥ ८ | त्वष्टाका वृत्रासुर नामसे विख्यात पराक्रमी पुत्र महात्मा इन्द्रके द्वारा क्यों मारा गया? त्वष्टा तो देवपक्षके थे और उनका पुत्र अत्यन्त बलवान् था, ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न उस महाबलीका इन्द्रके द्वारा क्यों वध किया गया? पुराणों और शास्त्रोंके तत्त्वज्ञलोगोंने देवताओंको सत्त्वगुणसे, मनुष्योंको रजोगुणसे और पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनियोंको तमोगुणसे उत्पन्न कहा है, परंतु यहाँ तो महान् विरोध प्रतीत होता है कि बलवान् वृत्रासुर सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्रके द्वारा छलपूर्वक मारा गया और इसके लिये भगवान् विष्णुद्वारा प्रेरणा दी गयी जो कि स्वयं महान् सत्त्वगुणी हैं तथा वे परम प्रभु छलपूर्वक वज्रमें प्रविष्ट हुए! सन्धि करके उस महाबली वृत्रको पहले आश्वस्त कर दिया गया, किंतु पुनः विष्णु और इन्द्रने सत्य (सन्धिकी बात)-को छोड़कर जलके फेनसे उसे मार डाला!॥ ३–८॥ |
| कृतमिन्द्रेण हरिणा किमेतत्सत साहसम्।<br>महान्तोऽपि च मोहेन वञ्चिताः पापबुद्धयः॥ ९ | हे सूतजी! इन्द्र और विष्णुके द्वारा ऐसा दुःसाहस क्यों किया गया? महान् लोग भी मोहमें फँसकर पापबुद्धि हो जाते हैं॥ ९॥ |
| ७२४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| अन्यायवर्तिनोऽत्यर्थं भवन्ति सुरसत्तमाः।<br>सदाचारेण युक्तेन देवाः शिष्टत्वमागताः॥ १०॥<br>एवं विशिष्टधर्मेण शिष्टत्वं कीदृशं पुनः।<br>हत्वा वृत्रं तु विश्वस्तं शक्रेण छद्मना पुनः॥ ११॥<br>प्राप्तं पापफलं नो वा ब्रह्महत्यासमुद्भवम्।<br>किं च त्वया पुरा प्रोक्तं वृत्रासुरवधः कृतः॥ १२॥<br>श्रीदेव्या इति तच्चापि चित्तं मोहयतीह नः। | श्रेष्ठ देवगण भी घोर अन्याय-मार्गके अनुगामी हो जाते हैं, जबकि सदाचारके कारण ही देवताओंको विशिष्टता प्राप्त है॥ १०॥<br>इन्द्रके द्वारा विश्वासमें लेकर वृत्रासुरकी हत्या कर दी गयी—ऐसे विशिष्ट धर्मके द्वारा उनका सदाचार कहाँ रह गया? उन्हें इस ब्रह्महत्या-जनित पापका फल मिला या नहीं? आपने पहले कहा था कि वृत्रासुरका वध स्वयं देवीने ही किया था—इससे हमारा चित्त और भी मोहमें पड़ गया है॥ ११-१२½॥ |
| सूत उवाच<br>शृण्वन्तु मुनयो वृत्तं वृत्रासुरवधाश्रयम्॥ १३॥<br>यथेन्द्रेण च सम्प्राप्तं दुःखं हत्यासमुद्भवम्।<br>एवमेव पुरा पृष्टो व्यासः सत्यवतीसुतः॥ १४॥<br>पारीक्षितेन राज्ञापि स यदाह च तद् ब्रुवे। | सूतजी बोले—हे मुनिगण! वृत्रासुरके वधसे सम्बन्धित और उस हत्यासे इन्द्रको प्राप्त महान् दुःखकी कथा सुनें। ऐसा ही पूर्वकालमें परीक्षित्पुत्र राजा जनमेजयने सत्यवतीनन्दन व्यासजीसे पूछा था; तब उन्होंने जो कहा, उसे मैं कहता हूँ॥ १३-१४½॥ |
| जनमेजय उवाच<br>कथं वृत्रासुरः पूर्वं हतो मघवता मुने॥ १५॥<br>सहायं विष्णुमासाद्य छद्मना सात्त्विकेन ह।<br>कथं च देव्या निहतो दैत्योऽसौ केन हेतुना॥ १६॥<br>कथमेकवधो द्वाभ्यां कृतः स्यान्मुनिपुङ्गव।<br>तदेतच्छ्रोतुमिच्छामि परं कौतूहलं हि मे॥ १७॥<br>महतां चरितं शृण्वन् को विरज्येत मानवः।<br>कथयाम्बावैभवं त्वं वृत्रासुरवधाश्रितम्॥ १८॥ | जनमेजय बोले—हे मुने! सत्त्वगुणसे सम्पन्न इन्द्रने भगवान् विष्णुकी सहायता लेकर वृत्रासुरको पूर्वकालमें छलपूर्वक क्यों मारा? देवीके द्वारा उस दैत्यका क्यों और किस प्रकार वध किया गया? हे मुनिश्रेष्ठ! एक व्यक्तिका दो लोगोंके द्वारा कैसे वध किया गया—इसे मैं सुनना चाहता हूँ; मुझे महान् कौतूहल है॥ १५—१७॥<br>कौन मनुष्य महापुरुषोंके चरित्रको सुननेसे विरत होगा। अतः आप वृत्रासुरके वधपर आधारित जगदम्बाके माहात्म्यको कहिये॥ १८॥ |
| व्यास उवाच<br>धन्योऽसि राजंस्तव बुद्धिरीदृशी<br>जाता पुराणश्रवणेऽतिसादरा।<br>पीत्वामृतं देववरास्तु सर्वथा<br>पाने वितृष्णाः प्रभवन्ति वै पुनः॥ १९॥<br>दिने दिने तेऽधिकभक्तिभावः<br>कथासु राजन् महनीयकीर्तेः।<br>श्रोता यदैकप्रवणः शृणोति<br>वक्ता तदा प्रीतमना ब्रवीति॥ २०॥<br>युद्धं पुरा वासववृत्रयोर्यद्<br>वेदे प्रसिद्धं च तथा पुराणे।<br>दुःखं सुरेन्द्रेण तथैव लब्धं<br>हत्वा रिपुं त्वाष्ट्रमपापमेव॥ २१॥ | व्यासजी बोले—हे राजन्! आप धन्य हैं, जो कि आपकी इस प्रकारकी बुद्धि पुराणश्रवणमें अत्यन्त आदरपूर्वक लगी हुई है। श्रेष्ठ देवगण अमृतका पान करके पूर्ण तृप्त हो जाते हैं, परंतु आप इस कथामृतका बार-बार पान करके भी अतृप्त ही हैं। हे राजन्! महान् कीर्तिवाले आपका भक्तिभाव कथाओंमें दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। श्रोता जब एकाग्रमनसे सुनता है तब वक्ता भी प्रसन्नमनसे कथा कहता है॥ १९-२०॥<br>पूर्वकालमें इन्द्र तथा वृत्रासुरका जो युद्ध हुआ था और निरपराध शत्रु वृत्रासुरका वध करके देवराज इन्द्रको जो दुःख प्राप्त हुआ था, वह वेद और पुराणमें प्रसिद्ध है॥ २१॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| चित्रं किमत्र नृपते हरिवज्रभृद्भ्यां<br> यच्छद्मना विनिहतस्त्रिशिरोऽथ वृत्रः।<br>मायाबलेन मुनयोऽपि विमोहितास्ते<br> चक्रुश्च निन्द्यमनिशं किल पापभीताः॥ २२ | जब मायाके बलसे मुनिगण भी मोहमें पड़ जाते हैं और वे पापभीरु होकर निरन्तर निन्दनीय कर्म करने लग जाते हैं तब हे राजन्! विष्णु और वज्रधारी इन्द्रने छलसे त्रिशिरा और वृत्रासुरका वध कर दिया तो इसमें आश्चर्यकी क्या बात है?॥ २२॥ |
| विष्णुः सदैव कपटेन जघान दैत्यान्<br> सत्त्वात्ममूर्तिरपि मोहमवाप्य कामम्।<br>कोऽन्योऽस्ति तां भगवतीं मनसापि जेतुं<br> शक्तः समस्तजनमोहकरीं भवानीम्॥ २३ | सत्त्वगुणके मूर्तिमान् विग्रह होते हुए भी भगवान् विष्णुने जिनकी मायासे मोहित होकर सदैव छलपूर्वक दैत्योंका संहार किया तब भला ऐसा कौन प्राणी होगा जो सब लोगोंको मोहमें डाल देनेवाली उन भगवती भवानीको अपने मनोबलसे जीतनेमें सक्षम हो सके!॥ २३॥ |
| मत्स्यादियोनिषु सहस्रयुगेषु सद्यः<br> साक्षाद्भवत्यपि यया विनियोजितोऽत्र।<br>नारायणो नरसखो भगवाननन्तः<br> कार्यं करोति विहिताविहितं कदाचित्॥ २४ | भगवतीकी ही प्रेरणासे नरऋषिके सखा नारायण भगवान् अनन्त हजारों युगोंमें मत्स्यादि योनियोंमें अवतार लेते हैं और कभी अनुकूल तथा कभी प्रतिकूल कार्य करते हैं॥ २४॥ |
| देहं धनं गृहमिदं स्वजना मदीयं<br> पुत्राः कलत्रमिति मोहमुपेत्य सर्वः।<br>पुण्यं करोत्यथ च पापचयं करोति<br> मायागुणैरतिबलैर्विकलीकृतो यत्॥ २५ | यह मेरा शरीर है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है, ये मेरे स्त्री-पुत्र और बन्धु-बान्धव हैं—इस मोहमें पड़कर सभी प्राणी पुण्य तथा पापकर्म करते रहते हैं; क्योंकि अत्यन्त बलशाली मायागुणोंसे वे मोहित कर दिये गये हैं॥ २५॥ |
| न जातु मोहं क्षपितुं नरः क्षमः<br> कश्चिद्भवोद्भूप परावरार्थवित्।<br>विमोहितस्तैस्त्रिभिरेव मूलतो<br> वशीकृतात्मा जगतीतले भृशम्॥ २६ | हे राजन्! इस पृथ्वीपर कार्य और कारणका विज्ञ कोई भी व्यक्ति [उन जगदम्बाकी मायाके] मोहसे छुटकारा नहीं पा सकता; क्योंकि भगवती महामायाके तीनों गुणोंसे मोहित होकर वह पूर्णरूपसे सदा उनके अधीन रहता है॥ २६॥ |
| अथ तौ मायया विष्णुवासवौ मोहितौ भृशम्।<br>जघ्नतुश्छद्मना वृत्रं स्वार्थसाधनतत्परौ॥ २७<br><br>तदहं सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तान्तमवनीपते।<br>कारणं पूर्ववैरस्य वृत्रवासवयोर्मिथः॥ २८ | इसलिये [उन्हीं देवीकी] मायासे मोहित होकर अपना स्वार्थ साधनेमें तत्पर रहनेवाले विष्णु और इन्द्रने छलपूर्वक वृत्रासुरको मार डाला। हे पृथ्वीपते! अब मैं वृत्रासुर और इन्द्रके पारस्परिक पूर्ववैरके कारणकी कथा बताता हूँ॥ २७-२८॥ |
| त्वष्टा प्रजापतिर्ह्यासीद्देवश्रेष्ठो महातपाः।<br>देवानां कार्यकर्ता च निपुणो ब्राह्मणप्रियः॥ २९ | देवताओंमें श्रेष्ठ त्वष्टा नामके एक प्रजापति थे। वे महान् तपस्वी, देवताओंका कार्य करनेवाले, अति कुशल तथा ब्राह्मणोंके प्रिय थे॥ २९॥ |
| स पुत्रं वै त्रिशिरसमिन्द्रद्वेषात्किलासृजत् ।<br>विश्वरूपेति विख्यातं नाम्ना रूपेण मोहनम्॥ ३० | उन्होंने इन्द्रसे द्वेषके कारण तीन मस्तकोंसे सम्पन्न एक पुत्र उत्पन्न किया, जो विश्वरूप नामसे विख्यात हुआ। वह परम मनोहर रूपवाला था॥ ३०॥ |
| ७२६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० १ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| त्रिभिः स वदनैः श्रेष्ठैर्व्यरोचत मनोहरैः ।<br>त्रिभिर्भिन्नानि कार्याणि मुखैः समकरोन्मुनिः ॥ ३१<br><br>वेदानेकेन सोऽधीते सुरां चैकेन सोऽपिबत् ।<br>तृतीयेन दिशः सर्वा युगपच्च निरीक्षते ॥ ३२ | अपने तीन श्रेष्ठ तथा मनोहर मुखोंके कारण वह अत्यन्त शोभासम्पन्न दिखायी देता था। वह मुनि अपने तीन मुखोंसे तीन भिन्न-भिन्न कार्य करता था। वह एक मुखसे वेदाध्ययन करता था, एक मुखसे मधुपान करता था और तीसरे मुखसे सब दिशाओंका एक साथ निरीक्षण करता था॥ ३१-३२॥ |
| त्रिशिरा भोगमुत्सृज्य तपश्चक्रे सुदुष्करम् ।<br>तपस्वी स मृदुर्दान्तो धर्ममेव समाश्रितः ॥ ३३ | वह त्रिशिरा भोगका त्याग करके मृदु, संयमी और धर्मपरायण तपस्वी होकर अत्यन्त कठोर तप करने लगा॥ ३३॥ |
| पञ्चाग्निसाधनं काले पादपाग्रे निवेशनम् ।<br>जलमध्ये निवासं च हेमन्ते शिशिरे तथा ॥ ३४<br><br>निराहारो जितात्मासौ त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।<br>तपश्चचार मेधावी दुष्करं मन्दबुद्धिभिः ॥ ३५ | ग्रीष्मकालमें पंचाग्नि तापते, वृक्षकी डालीमें पैरके बल अधोमुख लटके रहते एवं हेमन्त और शिशिर ऋतुमें जलमें स्थित रहते थे। सब कुछ त्याग करके जितेन्द्रिय भावसे निराहार रहकर उस बुद्धिमान् [त्रिशिरा]-ने मन्दबुद्धि प्राणियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या आरम्भ कर दी॥ ३४-३५॥ |
| तं च दृष्ट्वा तपस्यन्तं खेदमाप शचीपतिः ।<br>विषादमगमत्तत्र शक्रोऽयं मास्मभूदिति ॥ ३६ | उसको तप करते देखकर शचीपति इन्द्र दुःखित हुए। उन्हें यह विषाद हुआ कि कहीं यह इन्द्र न बन जाय॥ ३६॥ |
| दृष्ट्वा तस्य तपो वीर्यं सत्यं चामिततेजसः ।<br>चिन्तां च महतीं प्राप ह्यनिशं पाकशासनः ॥ ३७<br><br>विवर्धमानस्त्रिशिरा मामयं शातयिष्यति ।<br>नोपेक्ष्यः सर्वथा शत्रुर्वर्धमानबलो बुधैः ॥ ३८<br><br>तस्मादुपायः कर्तव्यस्तपोनाशाय साम्प्रतम् ।<br>कामस्तु तपसां शत्रुः कामान्नश्यति वै तपः ॥ ३९<br><br>तथैवाद्य प्रकर्तव्यं भोगासक्तो भवेद्यथा । | उस अत्यन्त तेजस्वी [विश्वरूप]-का तप, पराक्रम और सत्य देखकर इन्द्र निरन्तर इस प्रकार चिन्तित रहने लगे—उत्तरोत्तर वृद्धिको प्राप्त होता हुआ यह त्रिशिरा मुझे ही समाप्त कर देगा, इसीलिये बुद्धिमानोंने कहा है कि बढ़ते हुए पराक्रमवाले शत्रु की कभी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। इसलिये इसके तपके नाशका उपाय इसी समय करना चाहिये। कामदेव तपस्वियोंका शत्रु है, कामसे ही तपका नाश होता है। अतः मुझे वैसा ही करना चाहिये, जिससे यह भोगोंमें आसक्त हो जाय॥ ३७-३९ ½॥ |
| इति सञ्चिन्त्य मनसा बुद्धिमान्बलमर्दनः ॥ ४०<br><br>आज्ञापयत्सोऽप्सरसस्त्वाष्ट्रपुत्रप्रलोभने ।<br>उर्वशीं मेनकां रम्भां घृताचीं च तिलोत्तमाम् ॥ ४१<br><br>समाहूयाब्रवीच्छक्रस्तास्तदा रूपगर्विताः ।<br>प्रियं कुरुध्वं मे सर्वाः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४२ | ऐसा मनमें विचारकर बल नामक दैत्यका नाश करनेवाले उन बुद्धिमान् इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र त्रिशिराको प्रलोभनमें डालनेके लिये अप्सराओंको आज्ञा दी। उन्होंने उर्वशी, मेनका, रम्भा, घृताची, तिलोत्तमा आदिको बुलाकर कहा—अपने रूपपर गर्व करनेवाली हे अप्सराओ! आज मेरा कार्य आ पड़ा है, तुम सब मेरे उस प्रिय कार्यको सम्पन्न करो॥ ४०-४२॥ |
| यत्तो मेऽद्य महाञ्छत्रुस्तपस्तपति दुर्जयः ।<br>कार्यं कुरुत गच्छध्वं प्रलोभयत माचिरम् ॥ ४३ | मेरा एक महान् दुर्धर्ष शत्रु संयत होकर तपस्या कर रहा है। शीघ्र ही उसके पास जाओ और उसे प्रलोभित करो; इस प्रकार शीघ्र ही मेरा कार्य करो॥ ४३॥ |
| अ० १ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शृङ्गारवेशैर्विविधैर्भावैर्देहसमुद्भवैः ।<br>प्रलोभयत भद्रं वः शमयध्वं ज्वरं मम ॥ ४४ | अनेक प्रकारके शृंगार-वेशों तथा शरीरके हाव-भावोंसे उसे प्रलोभित करो और मेरे मानसिक सन्तापको शान्त करो; तुमलोगोंका कल्याण हो ॥ ४४ ॥ |
| अस्वस्थोऽहं महाभागास्तस्य ज्ञात्वा तपोबलम् ।<br>बलवानासनं मेऽद्य ग्रहीष्यत्यविलम्बितः ॥ ४५ | हे महाभागा अप्सराओ! उसके तपोबलको जानकर मैं व्याकुल हो गया हूँ, वह बलवान् शीघ्र ही मेरा पद छीन लेगा ॥ ४५ ॥ |
| भयं मे समुपायातं क्षिप्रं नाशयताबलाः ।<br>उपकुर्वन्तु सहिताः कार्येऽद्य समुपस्थिते ॥ ४६ | हे अबलाओ! मेरे सामने यह भय आ गया है, तुमलोग शीघ्र ही इसका नाश कर दो। इस कार्यके आ पड़नेपर तुम सब मिलकर आज मेरा उपकार करो ॥ ४६ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं नार्य ऊचुस्तं प्रणताः पुरः ।<br>मा भयं कुरु देवेश यतिष्यामः प्रलोभने ॥ ४७ | उनके इस वचनको सुनकर नारियों (अप्सराओं)-ने उन्हें नमन करते हुए कहा—हे देवराज! आप भय न करें, हम उसे प्रलोभनमें डालनेका प्रयत्न करेंगी ॥ ४७ ॥ |
| यथा न स्याद्भयं तस्मात्तथा कार्यं महाद्युते ।<br>नृत्यगीतविहारैश्च मुनेस्तस्य प्रलोभने ॥ ४८<br><br>कटाक्षैरङ्गभेदैश्च मोहयित्वा मुनिं विभो ।<br>लोलुपं वशमस्माकं करिष्यामो नियन्त्रितम् ॥ ४९ | हे महातेजस्विन्! जिस प्रकारसे आपको भय न हो, हम वैसा ही करेंगी। उस मुनिको लुभानेके लिये हम नृत्य, गीत और विहार करेंगी। हे विभो! कटाक्षों और अंगोंकी विविध भंगिमाओंसे मुनिको मोहित करके उन्हें लोलुप, अपने वशीभूत तथा नियन्त्रणमें कर लेंगी ॥ ४८-४९ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याभाष्य हरिं नार्यो ययुस्त्रिशिरसोऽन्तिकम् ।<br>कुर्वन्त्यो विविधान्भावान्कामशास्त्रोचितानपि ॥ ५० | व्यासजी बोले—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं और कामशास्त्रमें कहे गये विभिन्न प्रकारके हाव-भावका प्रदर्शन करने लगीं ॥ ५० ॥ |
| गायन्त्यस्तालभेदैस्ता नृत्यन्त्यः पुरतो मुनेः ।<br>तं प्रलोभयितुं चक्रुर्नानाभावान्वराङ्गनाः ॥ ५१ | वे अप्सराएँ मुनिके सम्मुख अनेक प्रकारके तालोंमें गाती और नाचती हुई उन्हें मोहित करनेके लिये विविध प्रकारके हाव-भाव करती थीं ॥ ५१ ॥ |
| नापश्यत्स तपोराशिरङ्गनानां विडम्बनम् ।<br>इन्द्रियाणि वशे कृत्वा मूकान्धबधिरः स्थितः ॥ ५२ | किंतु उन तपस्वीने अप्सराओंकी चेष्टाको देखातक नहीं और इन्द्रियोंको वशमें करके वे गूँगे, अन्धे और बहरेकी तरह बैठे रहे ॥ ५२ ॥ |
| दिनानि कतिचित्तस्थुर्नार्यस्तस्याश्रमे वरे ।<br>कुर्वन्त्यो गाननृत्यादिप्रपञ्चानतिमोहदान् ॥ ५३ | वे अप्सराएँ गान, नृत्य आदि मोहित करनेवाले प्रपंच करती हुई कुछ दिनोंतक उनके श्रेष्ठ आश्रममें रहीं ॥ ५३ ॥ |
| न चचाल यदा कामं ध्यानाच्च त्रिशिरा मुनिः ।<br>परावृत्य तदा देव्यः पुनः शक्रमुपस्थिताः ॥ ५४ | जब उनकी कामचेष्टाओंसे मुनि त्रिशिराका ध्यान विचलित नहीं हुआ, तब वे अप्सराएँ पुनः लौटकर इन्द्रके सम्मुख उपस्थित हुईं ॥ ५४ ॥ |
| कृताञ्जलिपुटाः सर्वा देवराजमथाब्रुवन् ।<br>श्रान्ता दीना भयत्रस्ता विवर्णवदना भृशम् ॥ ५५ | अत्यन्त थकी हुई, दीन अवस्थावाली, भयभीत और उदास मुखवाली उन सबने हाथ जोड़कर देवराजसे इस प्रकार कहा— ॥ ५५ ॥ |
| ७२८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| देवदेव महाराज यत्नश्च परमः कृतः।<br>न स शक्यो दुराधर्षो धैर्याच्चालयितुं विभो॥ ५६ | हे देवदेव! हे महाराज! हे विभो! हमने महान् प्रयत्न किया, परंतु हम उस दुर्धर्ष मुनिको धैर्यसे विचलित करनेमें समर्थ नहीं हो पायीं॥ ५६॥ |
| उपायोऽन्यः प्रकर्तव्यः सर्वथा पाकशासन।<br>नास्माकं बलमेतस्मिंस्तापसे विजितेन्द्रिये॥ ५७ | हे पाकशासन! आपको कोई दूसरा ही उपाय करना चाहिये, उन जितेन्द्रिय तपस्वीपर हमारा कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ सकता॥ ५७॥ |
| दिष्ट्या वयं न शप्ताः स्म यदनेन महात्मना।<br>मुनिना वह्नितुल्येन तपसा द्योतितेन हि॥ ५८ | हमारा बड़ा भाग्य है कि तपस्यासे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले उन महात्मा मुनिने हमें शाप नहीं दिया॥ ५८॥ |
| विसृज्याप्सरसः शक्रश्चिन्तयामास मन्दधीः।<br>तस्यैव च वधोपायं पापबुद्धिरसाम्प्रतम्॥ ५९ | अप्सराओंको विदा करके क्षुद्रबुद्धि तथा पापबुद्धि इन्द्र उसके ही वधका अनुचित उपाय सोचने लगे॥ ५९॥ |
| विसृज्य लोक लज्जां स तथा पापभयं भृशम्।<br>चकार पापबुद्धिं तु तद्वधाय महीपते॥ ६० | हे राजन्! लोक-लज्जा और महान् पापके भयको छोड़कर उन्होंने उसके वधके लिये अपनी बुद्धिको पापमय बना दिया॥ ६०॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां षष्ठस्कन्धे
त्रिशिरसस्तपोभङ्गार्थं देवराजेन्द्रद्वारा नानोपायचिन्तनवर्णनं
नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥
### अथ द्वितीयोऽध्यायः
**इन्द्रद्वारा त्रिशिराका वध, क्रुद्ध त्वष्टाद्वारा अथर्ववेदोक्त मन्त्रोंसे**
**हवन करके वृत्रासुरको उत्पन्न करना और उसे**
**इन्द्रके वधके लिये प्रेरित करना**
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| व्यास उवाच | व्यासजी बोले— |
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| अथ स लोभमुपेत्य सुराधिपः<br>समधिगम्य गजासनसंस्थितः।<br>त्रिशिरसं प्रति दुष्टमतिस्तदा<br>मुनिमपश्यदमयपराक्रमम् ॥ १ | व्यासजी बोले—इस प्रकार लोभके वशीभूत होकर पापबुद्धि देवराज इन्द्रने ऐरावत हाथीपर सवार हो त्रिशिराके पास जाकर उस अमेय पराक्रमवाले मुनिको देखा॥ १॥ |
| तमभिवीक्ष्य दृढासनसंस्थितं<br>जितगिरं सुसमाधिवशं गतम्।<br>रविविभावसुसन्निभमोजसा<br>सुरपतिः परमापदमभ्यगात् ॥ २ | उसे दृढ़ आसनपर बैठे, वाणीको वशमें किये, पूर्ण समाधिमें स्थित और सूर्य तथा अग्निके समान तेजस्वी देखकर देवराज इन्द्र बहुत दुःखित हुए॥ २॥ |
| कथमसौ विनिहन्तुमहो मया<br>मुनिरपापमतिः किल सम्मतः।<br>रिपुरयं सुसमिद्धतपोबलः<br>कथमुपेक्ष्य इहासनकामुकः ॥ ३ | यह मुनि निष्पापबुद्धि है; इसे मारनेमें मैं कैसे समर्थ हो सकूँगा? तपोबलसे अत्यन्त समृद्ध तथा मेरा आसन प्राप्त करनेकी इच्छावाले इस शत्रु की उपेक्षा भी कैसे करूँ—ऐसा सोचकर देवसंघके |
| अ० २ ] | षष्ठ स्कन्ध | ७२९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| इति विचिन्त्य पविं परमायुधं<br>प्रति मुमोच मुनिं तपसि स्थितम्।<br>शशिदिवाकरसन्निभमाशुगं<br>त्रिशिरसं सुरसङ्घपतिः स्वयम्॥ ४ | स्वामी इन्द्रने अपने तीव्रगामी तथा श्रेष्ठ आयुध वज्रको सूर्य-चन्द्रमाके समान तेजस्वी, तपमें स्थित मुनि त्रिशिराके ऊपर चला दिया॥ ३-४॥ |
| तदभिघातहतः स धरातले<br>किल पपात ममार च तापसः।<br>शिखरिणः शिखरं कुलिशार्दितं<br>निपतितं भुवि चाद्भुतदर्शनम्॥ ५ | उसके प्रहारसे घायल होकर वे तपस्वी उसी प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़े और निष्प्राण हो गये, जैसे वज्रसे विदीर्ण होकर पर्वतोंके शिखर पृथ्वीपर गिर पड़ते हैं; यह घटना देखनेमें बड़ी अद्भुत थी॥ ५॥ |
| तं निहत्य मुदमाप सुरेश-<br>श्चुक्रुशुश्च मुनयस्तु संस्थिताः।<br>हा हतेति भृशमार्तनिस्वनाः<br>किं कृतं शतमखेन पापिना॥ ६ | उनको मारकर इन्द्र प्रसन्न हो गये, परंतु वहाँ स्थित अन्य मुनिगण आर्तस्वरमें चिल्लाने लगे कि हाय! हाय! सौ यज्ञ करनेवाले पापी इन्द्रने यह क्या कर डाला!॥ ६॥ |
| विनापराधं तपसां निधिर्हतः<br>शचीपतिः पापमतिर्दुरात्मा।<br>फलं किलायं तरसा कृतस्य<br>प्राप्नोतु पापी हननोद्भवस्य॥ ७ | पापबुद्धि और दुष्टात्मा शचीपति इन्द्रने इस निरपराध तपोनिधिको मार डाला। इस हत्याजनित पापका फल यह पापी अब शीघ्र ही प्राप्त करे॥ ७॥ |
| तं निहत्य तरसा सुरराजो<br>निजगाम निजमन्दिरमाशु।<br>स हतोऽपि विरराज महात्मा<br>जीवमान इव तेजसां निधिः॥ ८ | उन्हें मारकर देवराज तुरंत ही अपने भवनको जानेके लिये उद्यत हुए। तेजके निधि वे महात्मा (त्रिशिरा) मर जानेपर भी जीवितकी भाँति प्रतीत होते थे॥ ८॥ |
| तं दृष्ट्वा पतितं भूमौ जीवन्तमिव वृत्रहा।<br>चिन्तामापातिखिन्नाङ्गः किं वा जीवेदयं पुनः॥ ९ | उसे जीवितकी भाँति भूमिपर गिरा हुआ देखकर अति उदास मनवाले वे वृत्रहन्ता इन्द्र इस चिन्तामें पड़ गये कि कहीं यह फिर जीवित न हो जाय॥ ९॥ |
| विमृश्य मनसातीव तक्षाणं पुरतः स्थितम्।<br>मघवा वीक्ष्य तं प्राह स्वकार्यसदृशं वचः॥ १० | मनमें बहुत देरतक विचार करनेके बाद इन्द्रने सामने खड़े तक्षा (बढ़ई)-को देखकर अपने कार्यके अनुरूप बात कही॥ १०॥ |
| तक्षंश्छिन्धि शिरांस्यस्य कुरुष्व वचनं मम।<br>मा जीवतु महातेजा भाति जीवन्निव स्वयम्॥ ११<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्य तक्षोवाच विगर्हयन्। | हे तक्षन्! मेरा कहा हुआ करो; इसके सिर काट लो, जिससे यह जीवित न रहे। यह महातेजस्वी जीवित न होते हुए भी जीवितकी भाँति प्रतीत होता है। उनकी यह बात सुनकर तक्षाने धिक्कारते हुए कहा—॥ ११ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>महास्कन्धो भृशं भाति परशुर्न तरिष्यति॥ १२<br>ततो नाहं करिष्यामि कार्यमेतद्विगर्हितम्।<br>त्वया वै निन्दितं कर्म कृतं सद्भिर्विगर्हितम्॥ १३<br>अहं बिभेमि पापाद्वै मृतस्यैव च मारणे।<br>मृतोऽयं मुनिरस्त्येव शिरसः कृन्तनेन किम्॥ १४<br>भयं किं तेऽत्र सञ्जातं पाकशासन कथ्यताम्। | तक्षा बोला— ये अति विशाल कन्धेवाले प्रतीत हो रहे हैं। मेरा परशु इस कन्धेको काट नहीं सकेगा। अतः मैं इस निन्दनीय कार्यको नहीं करूँगा, आपने तो निन्दित और सत्पुरुषोंद्वारा गर्हित कर्म कर डाला है, मैं पापसे डरता हूँ; फिर मरे हुएको क्यों मारूँ? ये मुनि तो मर गये हैं, फिर इनका सिर काटनेसे क्या प्रयोजन? हे पाकशासन! कहिये, इनसे आपको क्या भय उत्पन्न हुआ है?॥ १२-१४ १/२॥ |
| ७३० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २ |
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| इन्द्र उवाच<br>सजीव इव देहोऽयमाभाति विशदाकृतिः॥ १५<br>तस्माद् बिभेमि मा जीवेन्मुनिः शत्रुरयं मम। | **इन्द्र बोले—**यह निर्मल आकृतिवाली देह सजीवकी भाँति दिखायी देती है। यह मेरा शत्रु मुनि पुनः न जीवित हो जाय, इसलिये मैं डरता हूँ॥ १५ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>नात्र किं त्रपसे विद्वन् क्रूरेणानेन कर्मणा॥ १६<br>ऋषिपुत्रमिमं हत्वा ब्रह्महत्याभयं न किम्। | **तक्षा बोला—**हे विद्वन्! क्या इस क्रूर कर्मको करते हुए आपको लज्जा नहीं आती? इस ऋषिपुत्रको मारकर क्या आपको ब्रह्महत्याका भय नहीं है?॥ १६ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>प्रायश्चित्तं करिष्यामि पश्चात्तापक्षयाय वै॥ १७<br>शत्रुस्तु सर्वथा वध्यश्छलेनापि महामते। | **इन्द्र बोले—**मैं बादमें पापके नष्ट होनेके लिये प्रायश्चित्त कर लूँगा। हे महामते! शत्रुको तो सब प्रकारसे छलके द्वारा भी मार देना चाहिये॥ १७ १/२॥ |
| तक्षोवाच<br>त्वं लोभाभिहतः पापं करोषि मघवन्निह॥ १८<br>तं विनाहं कथं पापं करोमि वद मे विभो। | **तक्षा बोला—**हे इन्द्र! आप लोभके वशीभूत होकर पाप कर रहे हैं। हे विभो! बतायें, मैं उसके बिना पाप क्यों करूँ?॥ १८ १/२॥ |
| इन्द्र उवाच<br>मखेषु खलु भागं ते करिष्यामि सदैव हि॥ १९<br>शिरः पशोस्तु ते भागं यज्ञे दास्यन्ति मानवाः।<br>शुल्कनानेन छिन्धि त्वं शिरांस्यस्य कुरु प्रियम्॥ २० | **इन्द्र बोले—**मैं सदैवके लिये तुम्हारे यज्ञभागकी व्यवस्था कर दूँगा। मनुष्य यज्ञभागके रूपमें पशुका सिर तुम्हें देंगे। इस शुल्कके बदलेमें तुम इसके सिर काट दो और मेरा प्रिय कार्य कर दो॥ १९-२०॥ |
| व्यास उवाच<br>एतच्छ्रुत्वा महेन्द्रस्य वचस्तक्षा मुदान्वितः।<br>कुठारेण शिरांस्यस्य चकर्त सुदृढेन हि॥ २१ | **व्यासजी बोले—**देवराज इन्द्रका यह वचन सुनकर प्रसन्न हो बढ़ईने अपने सुदृढ़ कुठारसे उसके सिर काट डाले॥ २१॥ |
| छिन्नानि त्रीणि शीर्षाणि पतितानि यदा भुवि।<br>तेभ्यस्तु पक्षिणः क्षिप्रं विनिष्पेतुः सहस्रशः॥ २२<br>कलविङ्कास्तित्तिरयस्तथैव च कपिञ्जलाः।<br>पृथक्पृथग्विनिष्पेतर्मुखतस्तरसा तदा॥ २३ | कटे हुए तीनों सिर जब भूमिपर गिरे तब उनमेंसे हजारों पक्षी शीघ्रतापूर्वक निकल पड़े। तब गौरैया, तित्तिर और कपिंजल पक्षी शीघ्रतापूर्वक उसके अलग-अलग मुखोंसे निकले॥ २२-२३॥ |
| येन वेदानधीते स्म सोमं च पिबते तथा।<br>तस्माद्वक्त्रात्किलोत्पेतुः सद्य एव कपिञ्जलाः॥ २४<br>येन सर्वा दिशः कामं पिबन्निव निरीक्षते।<br>तस्मात्तु तित्तिरास्तत्र निःसृतास्तिग्मतेजसः॥ २५<br>यत्सुरापं तु तद्वक्त्रं तस्मात्तु चटकाः किल।<br>विनिष्पेतुस्त्रिशिरस एवं ते विहगा नृप॥ २६ | जिस मुखसे वह वेदपाठ और सोमपान करता था, उस मुखसे तत्काल बहुत-से कपिंजल पक्षी निकले; जिससे वह सभी दिशाओंका निरीक्षण करता था, उससे अत्यन्त तेजस्वी तित्तिर निकले और हे राजन्! जिससे वह मधुपान करता था, उस मुखसे गौरैया पक्षी निकले। इस प्रकार त्रिशिरासे वे पक्षी निकले॥ २४—२६॥ |
| एवं विनिःसृतान्दृष्ट्वा तेभ्यः शक्रस्तदाण्डजान्।<br>मुमोद मनसा राजन् जगाम त्रिदिवं पुनः॥ २७ | हे राजन्! इस प्रकार उन मुखोंसे पक्षियोंको निकला हुआ देखकर इन्द्रके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; वे पुनः स्वर्गको चल दिये॥ २७॥ |
| गते शक्रे तु तक्षापि स्वगृहं तरसा ययौ।<br>यज्ञभागं परं लब्ध्वा मुदमाप महीपते॥ २८ | हे पृथिवीपते! इन्द्रके चले जानेपर तक्षा भी शीघ्र ही अपने घर चल दिया। श्रेष्ठ यज्ञभाग पाकर वह बहुत प्रसन्न था॥ २८॥ |
| इन्द्रोऽथ स्वगृहं गत्वा हत्वा शत्रुं महाबलम्।<br>मेने कृतार्थमात्मानं ब्रह्महत्यामचिन्तयन्॥ २९ | इन्द्रने भी अपने महाबली शत्रुको मारकर अपने भवन जा करके ब्रह्महत्याकी चिन्ता न करते हुए अपनेको कृतकृत्य मान लिया॥ २९॥ |