देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९
अ० ५ ] द्वितीय स्कन्ध १९९
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| श्रुत्वा वाक्यं तु दाशस्य राजा चिन्तातुरोऽभवत्।<br>गाङ्गेयं मनसा कृत्वा नोवाच नृपतिस्तदा॥ ३३ | निषादकी बात सुनकर राजा शन्तनु चिन्तित हो उठे। उस समय मनमें भीष्मका स्मरण करके राजा कुछ भी उत्तर न दे सके॥ ३३॥ |
| कामातुरो गृहं प्राप्तश्चिन्ताविष्टो महीपतिः।<br>न सस्नौ बुभुजे नाथ न सुष्वाप गृहं गतः॥ ३४ | तब कामातुर तथा चिन्तित राजा राजमहलमें चले गये। उन्होंने घर जानेपर न स्नान किया, न भोजन किया और न शयन ही किया॥ ३४॥ |
| चिन्तातुरं तु तं दृष्ट्वा पुत्रो देवव्रतस्तदा।<br>गत्वापृच्छन्महीपालं तदसन्तोषकारणम्॥ ३५<br>दुर्जयः कोऽस्ति शत्रुस्ते करोमि वशगं तव।<br>का चिन्ता नृपशार्दूल सत्यं वद नृपोत्तम॥ ३६ | तब उन्हें चिन्तित देखकर पुत्र देवव्रत राजाके पास जाकर उनकी इस चिन्ताका कारण पूछने लगे—हे नृपश्रेष्ठ! कौन-सा ऐसा शत्रु है जिसको आप जीत न सके; मैं उसे आपके अधीन कर दूँ। हे नृपोत्तम! आपकी क्या चिन्ता है, मुझे सही-सही बताइये॥ ३५-३६॥ |
| किं तेन जातेन सुतेन राजन्<br>दुःखं न जानाति न नाशयेद्यः।<br>ऋणं ग्रहीतुं समुपागतोऽसौ<br>प्राग्जन्मजं नात्र विचारणास्ति॥ ३७ | हे राजन्! भला उस उत्पन्न हुए पुत्रसे क्या लाभ? जो पैदा होकर अपने पिताका दुःख न समझे तथा उसको दूर करनेका उपाय न कर सके। ऐसा कुपुत्र तो पूर्वजन्मके किसी ऋणको वापस लेनेके लिये यहाँ आता है; इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है॥ ३७॥ |
| विमुच्य राज्यं रघुनन्दनोऽपि<br>ताताज्ञया दाशरथिस्तु रामः।<br>वनं गतो लक्ष्मणजानकीभ्यां<br>सहैव शैलं किल चित्रकूटम्॥ ३८ | दशरथके पुत्र रामचन्द्रजी भी पिताकी आज्ञासे राज्य त्यागकर लक्ष्मण और सीताके साथ वनमें चले गये तथा चित्रकूटपर्वतपर निवास करने लगे॥ ३८॥ |
| सुतो हरिश्चन्द्रनृपस्य राजन्<br>यो रोहितश्चेति प्रसिद्धनामा।<br>क्रीतोऽथ पित्रा विपणोद्यतश्च<br>दासार्पितो विप्रगृहे तु नूनम्॥ ३९ | इसी प्रकार हे राजन्! राजा हरिश्चन्द्रका पुत्र जो रोहित नामसे प्रसिद्ध था, अपने पिताके इच्छानुसार बिकनेके लिये तत्पर हो गया और खरीदा हुआ वह बालक ब्राह्मणके घरमें सेवकका कार्य करने लगा॥ ३९॥ |
| तथाजिगर्तस्य सुतो वरिष्ठो<br>नाम्ना शुनःशेप इति प्रसिद्धः।<br>क्रीतस्तु पित्राप्यथ यूपबद्धः<br>सम्मोचितो गाधिसुतेन पश्चात्॥ ४० | 'अजीगर्त' ब्राह्मणका एक श्रेष्ठ पुत्र था, जो शुनःशेप नामसे प्रसिद्ध था। खरीद लिये जानेपर वह पिताके द्वारा यूपमें बाँध दिया गया, जिसे बादमें विश्वामित्रने छुड़ाया था॥ ४०॥ |
| पित्राज्ञया जामदग्न्येन पूर्वं<br>छिन्नं शिरो मातुरिति प्रसिद्धम्।<br>अकार्यमप्याचरितं च तेन<br>गुरोरनुज्ञा च गरीयसी कृता॥ ४१ | पूर्वकालमें पिताकी आज्ञासे ही परशुरामने अपनी माताका सिर काट दिया था, ऐसा लोकमें प्रसिद्ध है। इस अनुचित कर्मको करके भी उन्होंने पिताकी आज्ञाका महत्त्व बढ़ाया था॥ ४१॥ |
| इदं शरीरं तव भूपते न<br>क्षमोऽस्मि नूनं वद किं करोम्यहम्।<br>न शोचनीयं मयि वर्तमाने-<br>ऽप्यसाध्यमर्थं प्रतिपादयाम्यदः॥ ४२ | हे पृथ्वीपते! यह मेरा शरीर आपका ही है। यद्यपि मैं समर्थ नहीं हूँ; फिर भी आप कहिये मैं आपकी क्या सेवा करूँ? मेरे रहते आपको किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं होनी चाहिये। मैं आपका असाध्य कार्य भी तत्काल पूरा करूँगा॥ ४२॥ |
| २०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ५ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| प्रब्रूहि राजंस्तव कास्ति चिन्ता निवारयाम्यद्य धनुर्गृहीत्वा।<br>देहेन मे चेच्चरितार्थता वा भवत्वमोघा भवतश्चिकीर्षा॥ ४३<br>धिक् तं सुतं यः पितुरीप्सितार्थं क्षमोऽपि सन् प्रतिपादयेन्न।<br>जातेन किं तेन सुतेन कामं पितुर्न चिन्तां हि समुद्धरेद्यः॥ ४४ | हे राजन्! आप बताइये कि आपको किस बातकी चिन्ता है? मैं अभी धनुष लेकर उसका निवारण कर दूँगा। यदि मेरे इस शरीरसे भी आपका कार्य सिद्ध हो सके तो मैं आपकी अभिलाषा पूर्ण करनेको तत्पर हूँ। उस पुत्रको धिक्कार है, जो समर्थ होकर भी अपने पिताकी इच्छाको पूर्ण नहीं करता। जिस पुत्रके द्वारा पिताकी चिन्ता दूर न हुई, उस पुत्रका जन्म लेनेका क्या प्रयोजन ?॥ ४३-४४॥ |
| सूत उवाच<br>निशम्येति वचस्तस्य पुत्रस्य शन्तनुर्नृपः।<br>लज्जमानस्तु मनसा तमाह त्वरितं सुतम्॥ ४५ | सूतजी बोले—अपने पुत्र गांगेयका वचन सुनकर महाराज शन्तनु मनमें लज्जित होते हुए उससे शीघ्र ही कहने लगे॥ ४५॥ |
| राजोवाच<br>चिन्ता मे महती पुत्र यस्त्वमेकोऽसि मे सुतः।<br>शूरोऽतिबलवान्मानी संग्रामेष्वपराङ्मुखः॥ ४६<br>एकापत्यस्य मे तात वृथेदं जीवितं किल।<br>मृते त्वयि मृधे क्वापि किं करोमि निराश्रयः॥ ४७<br>एषा मे महती चिन्ता तेनाद्य दुःखितोऽस्म्यहम्।<br>नान्या चिन्तास्ति मे पुत्र यां तवाग्रे वदाम्यहम्॥ ४८ | राजा बोले—हे पुत्र! मुझे यही महान् चिन्ता है कि तुम मेरे इकलौते पुत्र हो। यद्यपि तुम बलवान्, स्वाभिमानी, रणस्थलमें पीठ न दिखानेवाले साहसी पुत्र हो तथापि केवल एक पुत्र होनेके कारण मुझ पिताका जीवन व्यर्थ है; क्योंकि यदि कहीं किसी समरमें तुम्हें अमरगति प्राप्त हो गयी तो मैं असहाय होकर क्या कर सकूँगा ? यही मुझे सबसे बड़ी चिन्ता लगी है; इसी कारण मैं आजकल दुःखित रहता हूँ। हे पुत्र! इसके अतिरिक्त मुझे दूसरी कोई चिन्ता नहीं है, जिसे मैं तुम्हारे सामने कहूँ॥ ४६-४८॥ |
| सूत उवाच<br>तदाकर्ण्याथ गाङ्गेयो मन्त्रिवृद्धानपृच्छत।<br>न मां वदति भूपालो लज्जयाद्य परिप्लुतः॥ ४९ | सूतजी बोले—यह सुनकर गांगेयने वृद्ध मन्त्रियोंसे पूछा कि लज्जासे परिपूर्ण महाराज मुझे कुछ बता नहीं रहे हैं॥ ४९॥ |
| वित्त वार्तां नृपस्याद्य पृष्ट्वा यूयं विनिश्चयात्।<br>सत्यं ब्रुवन्तु मां सर्वं तत्करोमि निराकुलः॥ ५० | आपलोग राजाकी भावना जानकर सही एवं निश्चित कारण मुझे बताइये; मैं प्रसन्नतापूर्वक उसे सम्पन्न करूँगा॥ ५०॥ |
| तच्छ्रुत्वा ते नृपं गत्वा संविज्ञाय च कारणम्।<br>शशंसुर्विदितार्थैस्तु गाङ्गेयस्तदचिन्तयत्॥ ५१<br>सहितस्तैर्जगामाशु दाशस्य सदनं तदा।<br>प्रेमपूर्वमुवाचेदं विनम्रो जाह्नवीसुतः॥ ५२ | यह सुनकर मन्त्रिगण राजाके पास गये और सब कारण सही-सही जानकर उन्होंने युवराज गांगेयसे आकर कह दिया। तब उनका अभिप्राय जानकर गांगेय विचार करने लगे। मन्त्रियोंके साथ गंगापुत्र देवव्रत उस निषादके घर शीघ्र गये और प्रेमके साथ विनम्र होकर यह कहने लगे॥ ५१-५२॥ |
| गाङ्गेय उवाच<br>पित्रे देहि सुतां तेऽद्य प्रार्थयामि सुमध्यमाम्।<br>माता मेऽस्तु सुतेयं ते दासोऽस्म्यस्याः परन्तप॥ ५३ | गांगेय बोले—हे परन्तप! आप अपनी सुन्दरी कन्या मेरे पिताजीके लिये प्रदान कर दें—यही मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आपकी ये कन्या मेरी माता हों और मैं इनका सेवक रहूँगा॥ ५३॥ |
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०१ |
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| दाश उवाच | निषादने कहा—हे महाभाग! हे नृपनन्दन! |
| त्वं गृहाण महाभाग पत्नीं कुरु नृपात्मज।<br>पुत्रोऽस्या न भवेद् राजा वर्तमाने त्वयीति वै॥ ५४ | आप स्वयं ही इसे अपनी भार्या बनाइये; क्योंकि आपके रहते इसका पुत्र राजा नहीं हो सकेगा॥ ५४॥ |
| गाङ्गेय उवाच<br>मातेयं मम दाशेयी राज्यं नैव करोम्यहम्।<br>पुत्रोऽस्याः सर्वथा राज्यं करिष्यति न संशयः॥ ५५ | गांगेय बोले— आपकी यह कन्या मेरी माता है। मैं राज्य नहीं करूँगा। इसका पुत्र ही निश्चितरूपसे राज्य करेगा; इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है॥ ५५॥ |
| दाश उवाच<br>सत्यं वाक्यं मया ज्ञातं पुत्रस्ते बलवान्भवेत्।<br>सोऽपि राज्यं बलान्नूनं गृह्णीयादिति निश्चयः॥ ५६ | निषादने कहा— मैंने आपकी बात सही मान ली; परंतु यदि आपका पुत्र बलवान् हुआ तो वह बलपूर्वक राज्यको निश्चय ही ले लेगा॥ ५६॥ |
| गाङ्गेय उवाच<br>न दारसंग्रहं नूनं करिष्यामि हि सर्वथा।<br>सत्यं मे वचनं तात मया भीष्मं व्रतं कृतम्॥ ५७ | गांगेय बोले— हे तात! मैं कभी विवाह नहीं करूँगा; मेरा यह वचन सर्वथा सत्य है—यह मैंने भीष्म-प्रतिज्ञा कर ली॥ ५७॥ |
| सूत उवाच<br>एवं कृतां प्रतिज्ञां तु निशम्य झषजीवकः।<br>ददौ सत्यवतीं तस्मै राज्ञे सर्वाङ्गशोभनाम्॥ ५८ | सूतजी बोले— गांगेयद्वारा की गयी ऐसी प्रतिज्ञा सुनकर निषादने उन राजा शन्तनुको अपनी सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या सत्यवती सौंप दी॥ ५८॥ |
| अनेन विधिना तेन वृता सत्यवती प्रिया।<br>न जानाति परं जन्म व्यासस्य नृपसत्तमः॥ ५९ | इस प्रकार राजा शन्तनुने प्रिया सत्यवतीसे विवाह कर लिया। वे नृपश्रेष्ठ शन्तनु पूर्वमें सत्यवतीसे व्यासजीका जन्म नहीं जानते थे॥ ५९॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे देवव्रतप्रतिज्ञावर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥ ५॥
अथ षष्ठोऽध्यायः
दुर्वासाका कुन्तीको अमोघ कामद मन्त्र देना, मन्त्रके प्रभावसे कन्यावस्थामें ही कर्णका जन्म, कुन्तीका राजा पाण्डुसे विवाह, शापके कारण पाण्डुका सन्तानोत्पादनमें असमर्थ होना, मन्त्र-प्रयोगसे कुन्ती और माद्रीका पुत्रवती होना, पाण्डुकी मृत्यु और पाँचों पुत्रोंको लेकर कुन्तीका हस्तिनापुर आना
| सूत उवाच | सूतजी बोले—इस प्रकार उन शन्तनुने सत्यवतीसे |
|---|---|
| एवं सत्यवती तेन वृता शन्तनुना किल।<br>द्वौ पुत्रौ च तया जातौ मृतौ कालवशादपि॥ १ | विवाह कर लिया। उसको [चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक] दो पुत्र उत्पन्न हुए और कालवश वे दोनों मृत्युको भी प्राप्त हो गये॥ १॥ |
| व्यासवीर्यात्तु सञ्जातो धृतराष्ट्रोऽन्ध एव च।<br>मुनिं दृष्ट्वाथ कामिन्या नेत्रसम्मीलने कृते॥ २ | पुनः व्यासजीके तेजसे धृतराष्ट्र उत्पन्न हुए, जो जन्मसे ही अन्धे थे; क्योंकि मुनिको देखकर उस स्त्रीने अपने नेत्र बन्द कर लिये थे॥ २॥ |
| श्वेतरूपा यतो जाता दृष्ट्वा व्यासं नृपात्मजा।<br>व्यासकोपात्समुत्पन्नः पाण्डुस्तेन न संशयः॥ ३ | तत्पश्चात् छोटी रानी व्यासजीको देखकर पीली पड़ गयी, जिससे व्यासजीके कोपके कारण उससे पीतवर्ण पाण्डुका जन्म हुआ; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३॥ |
| २०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| सन्तोषितास्तया व्यासो दास्या कामकलाविदा।<br>विदुरस्तु समुत्पन्नो धर्मांशः सत्यवाक् शुचिः॥ ४ | निपुण दासीने व्यासजीको सन्तुष्ट किया, जिसके परिणामस्वरूप धर्मके अंश, सत्यवादी तथा पवित्र विचारवाले विदुर उत्पन्न हुए॥ ४॥ |
| राज्ये संस्थापितः पाण्डुः कनीयानपि मन्त्रिभिः।<br>अन्धत्वाद् धृतराष्ट्रोऽसौ नाधिकारे नियोजितः॥ ५<br><br>भीष्मस्यानुमते राज्यं प्राप्तः पाण्डुर्महाबलः।<br>विदुरोऽप्यथ मेधावी मन्त्रकार्ये नियोजितः॥ ६ | [बड़े होनेपर भी] अन्धे होनेके कारण धृतराष्ट्रको राज्य नहीं दिया गया और छोटे होते हुए भी पाण्डुको ही मन्त्रियोंने राजसिंहासनपर अभिषिक्त किया। भीष्मकी सम्मतिसे ही महाबली पाण्डुको राज्य प्राप्त हुआ तथा प्रतिभासम्पन्न विदुरजी मन्त्रणा-कार्यमें नियुक्त किये गये॥ ५-६॥ |
| धृतराष्ट्रस्य द्वे भार्ये गान्धारी सौबली स्मृता।<br>द्वितीया च तथा वैश्या गार्हस्थ्येषु प्रतिष्ठिता॥ ७ | धृतराष्ट्रकी दो स्त्रियाँ थीं। उनमें पहली सुबलपुत्री गान्धारी कही गयी है और दूसरी एक वैश्यपुत्री थी, जो गृहकार्योंमें प्रतिष्ठित की गयी थी॥ ७॥ |
| पाण्डोरपि तथा पत्न्यौ द्वे प्रोक्ते वेदवादिभिः।<br>शौरसेनी तथा कुन्ती माद्री च मद्रदेशजा॥ ८ | वेदवादी विद्वानोंने पाण्डुकी भी दो पत्नियाँ बतायी हैं। एक शूरसेनकी पुत्री कुन्ती और दूसरी मद्रदेशकी राजकुमारी माद्री॥ ८॥ |
| गान्धारी सुषुवे पुत्रशतं परमशोभनम्।<br>वैश्याप्येकं सुतं कान्तं युयुत्सुं सुषुवे प्रियम्॥ ९ | गान्धारीने परम सुन्दर सौ पुत्र उत्पन्न किये एवं वैश्या रानीने युयुत्सु नामका एक कान्तिमान् और प्रिय पुत्र उत्पन्न किया॥ ९॥ |
| कुन्ती तु प्रथमं कन्या सूर्यात्कर्णं मनोहरम्।<br>सुषुवे पितृगेहस्था पश्चात्पाण्डुपरिग्रहः॥ १० | कुन्तीने कुमारी अवस्थामें ही अपने पिताके घर रहते हुए सूर्यसे कर्ण नामक एक सुन्दर पुत्र उत्पन्न किया था; तदनन्तर कुन्तीका विवाह पाण्डुसे हुआ॥ १०॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>किमेतत्सूत चित्रं त्वं भाषसे मुनिसत्तम।<br>जनितश्च सुतः पूर्वं पाण्डुना सा विवाहिता॥ ११ | ऋषिगण बोले— हे मुनिवर सूतजी! आप यह कैसी आश्चर्यजनक बात बता रहे हैं? पहले पुत्र उत्पन्न हुआ और बादमें पाण्डुके साथ कुन्तीका विवाह हुआ!॥ ११॥ |
| सूर्यात्कर्णः कथं जातः कन्यायां वद विस्तरात्।<br>कन्या कथं पुनर्जाता पाण्डुना सा विवाहिता॥ १२ | सूर्यके द्वारा कन्या कुन्तीसे कर्णकी उत्पत्ति कैसे हुई? वह कुन्ती पुनः कन्या कैसे रह गयी, जो पाण्डुके साथ उसका विवाह हो गया। यह आप विस्तारपूर्वक बताइये॥ १२॥ |
| सूत उवाच<br>शूरसेनसुता कुन्ती बालभावे यदा द्विजाः।<br>कुन्तिभोजेन राज्ञा तु प्रार्थिता कन्यका शुभा॥ १३<br><br>कुन्तिभोजेन सा बाला पुत्री तु परिकल्पिता।<br>सेवनार्थं तु दीप्तस्य विहिता चारुहासिनी॥ १४ | सूतजी बोले— हे द्विजगण! शूरसेनकी वह पुत्री कुन्ती जब शिशु थी, तभी राजा कुन्तिभोजने उस सुन्दर कन्याको माँग लिया था। उन्होंने उस चारुहासिनी कन्याको अपनी पुत्री बनाकर रखा और उसे अग्निहोत्रके काममें नियुक्त कर दिया॥ १३-१४॥ |
| दुर्वासास्तु मुनिः प्राप्तश्चातुर्मास्ये स्थितो द्विजः।<br>परिचर्या कृता कुन्त्या मुनिस्तोषं जगाम ह॥ १५ | एक बार महर्षि दुर्वासा वहाँ आ पहुँचे और चातुर्मास्यके लिये वहीं रहने लगे। कुन्तीने उनकी सेवा की, जिससे मुनिवर सन्तुष्ट हुए और उसको |
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ददौ मन्त्रं शुभं तस्यै येनाहूतः सुरः स्वयम्।<br>समायाति तथा कामं पूरयिष्यति वाञ्छितम् ॥ १६ | एक ऐसे मन्त्रका उपदेश दिया, जिसके प्रयोगसे आवाहित किये गये देवता स्वयं उपस्थित होंगे और उसकी अभिलाषा पूर्ण करेंगे॥ १५-१६॥ |
| गते मुनौ ततः कुन्ती निश्चयार्थं गृहे स्थिता।<br>चिन्तयामास मनसा कं सुरं समचिन्तये ॥ १७ | दुर्वासामुनिके वहाँसे चले जानेपर अपने गृहमें बैठी हुई कुन्ती उस मन्त्रकी परीक्षाके लिये मनमें सोचने लगी कि मैं किस देवताका ध्यान करूँ?॥ १७॥ |
| उदितश्च तदा भानुस्तया दृष्टो दिवाकरः।<br>मन्त्रोच्चारं तया कृत्वा चाहूतस्तिग्मगुस्तदा ॥ १८ | उसने पूर्व दिशामें उदित होते हुए सूर्यको देखा और उस मन्त्रका उच्चारण करके उसने सूर्यका आवाहन किया। तब सूर्य अपने मण्डलसे अत्यन्त |
| मण्डलान्मानुषं रूपं कृत्वा सर्वातिपेशलम्।<br>अवातरत्तदाकाशात्समीपे तत्र मन्दिरे ॥ १९ | सुन्दर मनुष्यका रूप धारण करके आकाशसे कुन्तीके पास उस भवनमें उतर आये॥ १८-१९॥ |
| दृष्ट्वा देवं समायान्तं कुन्ती भानुं सुविस्मिता।<br>वेपमाना रजोदोषं प्राप्ता सद्यस्तु भामिनी ॥ २० | सूर्यदेवको आते हुए देखकर कुन्ती आश्चर्यचकित हो गयी। वह सुन्दरी काँपती हुई तत्काल रजोधर्मको प्राप्त हो गयी॥ २०॥ |
| कृताञ्जलिः स्थिता सूर्यं बभाषे चारुलोचना।<br>सुप्रीता दर्शनेनाद्य गच्छ त्वं निजमण्डलम्॥ २१ | उस समय सुन्दर नेत्रवाली कुन्ती हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी और सूर्यसे बोली—मैं आपके दर्शनसे प्रसन्न हो गयी; अब आप अपने मण्डलको चले जाइये॥ २१॥ |
| सूर्य उवाच<br>आहूतोऽस्मि कथं कुन्ति त्वया मन्त्रबलेन वै।<br>न मां भजसि कस्मात्त्वं समाहूय पुरोगतम् ॥ २२ | सूर्य बोले—हे कुन्ति! तुमने मन्त्रबलसे मुझे क्यों बुलाया है? तुम मुझे बुला करके भी अपने समक्ष उपस्थित मुझ सूर्यकी सेवा क्यों नहीं करती?॥ २२॥ |
| कामार्तोऽस्म्यसितापाङ्गि भज मां भावसंयुतम्।<br>मन्त्रेणाधीनतां प्राप्तं क्रीडितुं नय मामिति ॥ २३ | हे चारुलोचने! मैं इस समय कामार्त हूँ, अतः प्रेमके साथ मेरा सेवन करो। मन्त्रके द्वारा अधीनताको प्राप्त मुझको तुम विहार करनेके लिये ले चलो॥ २३॥ |
| कुन्त्युवाच<br>कन्यास्म्यहं तु धर्मज्ञ सर्वसाक्षिन्नमाम्यहम्।<br>तवाप्यहं न दुर्वाच्या कुलकन्यास्मि सुव्रत ॥ २४ | कुन्ती बोली—हे धर्मज्ञ! मैं अभी कन्या हूँ। हे सर्वसाक्षिन्! मैं आपको प्रणाम करती हूँ। हे सुव्रत! आप मेरे प्रति अनुचित बातें न कहें; क्योंकि मैं कुलीन कन्या हूँ॥ २४॥ |
| सूर्य उवाच<br>लज्जा मे महती चाद्य यदि गच्छाम्यहं वृथा।<br>वाच्यतां सर्वदेवानां यास्याम्यत्र न संशयः ॥ २५ | सूर्य बोले—यदि मैं इस समय व्यर्थ लौट जाता हूँ तो मेरे लिये बड़ी लज्जाकी बात होगी और मैं सभी देवताओंमें निन्दाका पात्र बनूँगा; इसमें संशय नहीं है॥ २५॥ |
| शप्स्यामि तं द्विजं चाद्य येन मन्त्रः समर्पितः।<br>त्वां चापि सुभृशं कुन्ति नोचेन्मां त्वं भजिष्यसि ॥ २६<br><br>कन्याधर्मः स्थिरस्ते स्यान्न ज्ञास्यन्ति जनाः किल।<br>मत्समस्तु तथा पुत्रो भविता ते वरानने॥ २७ | हे कुन्ति! यदि तुम मेरे साथ रमण नहीं करोगी तो मैं तुम्हें तथा उस मुनिको शाप दे दूँगा, जिसने तुम्हें वह मन्त्र बताया है। हे सुन्दरि! तुम्हारा कन्याधर्म स्थिर रहेगा। इस रहस्यको लोग नहीं जान सकेंगे तथा हे वरानने! मेरे समान ही तेजस्वी पुत्र तुमको प्राप्त होगा॥ २६-२७॥ |
| २०४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इत्युक्त्वा तरणिः कुन्तीं तन्मनस्कां सुलज्जिताम्।<br>भुक्त्वा जगाम देवेशो वरं दत्त्वातिवाञ्छितम्॥ २८ | यह कहकर सूर्यदेव अपनी ओर आसक्त मनवाली एवं लज्जाशील उस कुन्तीसे संसर्ग करके तथा उसे मनोवांछित वरदान देकर चले गये॥ २८॥ |
| गर्भं दधार सुश्रोणी सुगुप्ते मन्दिरे स्थिता।<br>धात्री वेद प्रिया चैका न माता न जनस्तथा॥ २९ | इस प्रकार उस सुश्रोणी कुन्तीने गर्भ धारण किया और वह अत्यन्त गुप्त भवनमें रहने लगी। केवल उसकी एक प्रिय दासी ही इस रहस्यको जानती थी, कुन्तीके माता-पिता भी इसे नहीं जानते थे॥ २९॥ |
| गुप्तः सद्मनि पुत्रस्तु जातश्चातिमनोहरः।<br>कवचेनातिरम्येण कुण्डलाभ्यां समन्वितः॥ ३० | यथासमय उसी गुप्त भवनमें कुन्तीको एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ, जो सुन्दर कवच तथा दो कुण्डलोंसे युक्त था और दूसरे सूर्य तथा कुमार कार्तिकेयके समान प्रतीत हो रहा था। धात्रीने उसे अपने हाथमें उठाकर लज्जायुक्त कुन्तीसे कहा—हे सुन्दरि! मैं यहाँ हूँ, अतः तुम किस बातकी चिन्ता कर रही हो?॥ ३०-३१ १/२॥ |
| द्वितीय इव सूर्यस्तु कुमार इव चापरः।<br>करे कृत्वाथ धात्रेयी तामुवाच सुलज्जिताम्॥ ३१ | |
| कां चिन्तां करभोरु त्वमाधत्सेऽद्य स्थितास्म्यहम्।<br>मञ्जूषायां सुतं कुन्ती मुञ्चन्ती वाक्यमब्रवीत्॥ ३२ | तत्पश्चात् काष्ठमञ्जूषामें पुत्रको छोड़ती हुई कुन्ती कहने लगी—हे पुत्र! मैं क्या करूँ? मैं अत्यन्त दुःखित हूँ, जो कि तुझ प्राणप्रियको त्याग रही हूँ। मैं अभागिन तुझ सर्वलक्षणसम्पन्नका परित्याग कर दे रही हूँ॥ ३२-३३॥ |
| किं करोमि सुतातार्हं त्यजे त्वां प्राणवल्लभम्।<br>मन्दभाग्या त्यजामि त्वां सर्वलक्षणसंयुतम्॥ ३३ | |
| पातु त्वां सगुणागुणा भगवती सर्वेश्वरी चाम्बिका<br>स्तन्यं सैव ददातु विश्वजननी कात्यायनी कामदा।<br>द्रक्ष्येऽहं मुखपङ्कजं सुललितं प्राणप्रियार्हं कदा<br>त्यक्त्वा त्वां विजने वने रविसुतं दुष्टा यथा स्वैरिणी॥ ३४ | सगुणा, निर्गुणा तथा सबकी स्वामिनी वे भगवती अम्बिका तुम्हारी रक्षा करें। वे जगज्जननी कामप्रदा कात्यायनी तुम्हें दुग्धपान करायें। हे पुत्र! तुम साक्षात् सूर्यनारायणके पुत्र हो और मेरे प्राणप्रिय हो—ऐसे तुमको इस निर्जन वनमें एक दुष्ट तथा कुलटा स्त्रीकी भाँति छोड़कर मैं कब तुम्हारा अति सुन्दर मुखकमल देख पाऊँगी॥ ३४॥ |
| पूर्वस्मिन्नपि जन्मनि त्रिजगतां माता न चाराधिता<br>न ध्यातं पदपङ्कजं सुखकरं देव्याः शिवायाश्चिरम्।<br>तेनाहं सुत दुर्भगास्मि सततं त्यक्त्वा पुनस्त्वां वने<br>तप्स्यामि प्रिय पातकं स्मृतवती बुद्ध्या कृतं यत्स्वयम्॥ ३५ | हे पुत्र! प्रतीत होता है कि मैंने पूर्वजन्ममें भी तीनों लोकोंकी जननी भगवतीकी आराधना नहीं की थी तथा भगवती शिवाके सुखदायक चरणकमलका भी मैंने कभी ध्यान नहीं किया था; इसी कारण मैं सदा अभागिनी हूँ। हे प्रिय! मैं तुम्हें इस वनमें त्यागकर जान-बूझकर स्वयं किये गये इस पापका स्मरण करती हुई सन्ताप सहूँगी॥ ३५॥ |
| सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा तं सुतं कुन्ती मञ्जूषायां धृतं किल।<br>धात्रीहस्ते ददौ भीता जनदर्शनतस्तथा॥ ३६ | सूतजी बोले— इस प्रकार कहकर कुन्तीने मंजूषामें रखे हुए उस पुत्रको लोगोंकी दृष्टिसे बचाते हुए भयभीतभावसे धात्रीके हाथमें दे दिया॥ ३६॥ |
| अ० ६ ] | द्वितीय स्कन्ध | २०५ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| स्नात्वा त्रस्ता तदा कुन्ती पितृवेश्मन्युवास सा।<br>मञ्जूषा वहमाना च प्राप्ता ह्याधिरथेन वै॥ ३७<br>राधा सूतस्य भार्या वै तयाऽसौ प्रार्थितः सुतः।<br>कर्णोऽभूद् बलवान्वीरः पालितः सूतसद्मनि॥ ३८ | तत्पश्चात् स्नान करके भयभीत वह कुन्ती अपने पिताके घरमें रहने लगी। जलमें बहती हुई वह मंजूषा अधिरथ नामक सूतको प्राप्त हुई। उस सूतकी भार्या राधा थी। उसने बच्चेको माँग लिया। इस प्रकार सूतके घरमें पलकर वह कर्ण बलवान् तथा वीर हो गया॥ ३७-३८॥ |
| कुन्ती विवाहिता कन्या पाण्डुना सा स्वयंवरे।<br>माद्री चैवापरा भार्या मद्रराजसुता शुभा॥ ३९ | इसके बाद स्वयंवरमें कुन्तीका विवाह पाण्डुके साथ हुआ। उनकी दूसरी पत्नी मद्रदेशके राजाकी सुलक्षणा कन्या माद्री थी॥ ३९॥ |
| मृगयां रममाणस्तु वने पाण्डुर्महाबलः।<br>जघान मृगबुद्ध्या तु रममाणं मुनिं वने॥ ४०<br>शप्तस्तेन तदा पाण्डुर्मुनिना कुपितेन च।<br>स्त्रीसङ्गं यदि कर्तासि तदा ते मरणं ध्रुवम्॥ ४१ | एक बार वनमें आखेट करनेमें तत्पर महाबली पाण्डुने मृग समझकर रमण करते हुए एक मुनिपर प्रहार कर दिया। तब उस कुपित मुनिने पाण्डुको शाप दे दिया कि यदि तुम स्त्रीके साथ संसर्ग करोगे तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है॥ ४०-४१॥ |
| इति शप्तस्तु मुनिना पाण्डुः शोकसमान्वितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं वने वासं चकार भृशदुःखितः॥ ४२ | मुनिके यह शाप दे देनेपर पाण्डु शोकाकुल हो गये। वे राज्य त्यागकर अत्यन्त दुःखित हो वनमें रहने लगे॥ ४२॥ |
| कुन्ती माद्री च भार्ये द्वे जग्मतुः सह सङ्गते।<br>सेवनार्थं सतीधर्मं संश्रिते मुनिसत्तमाः॥ ४३ | हे मुनिवरो! उनकी दोनों पत्नियाँ माद्री और कुन्ती भी सतीधर्मका आश्रय लेकर उनकी सेवा करनेके लिये उनके साथ ही वनमें चली गयीं॥ ४३॥ |
| गङ्गातीरे स्थितः पाण्डुर्मुनीनामाश्रमेषु च।<br>शृण्वानो धर्मशास्त्राणि चकार दुश्चरं तपः॥ ४४ | राजा पाण्डु गङ्गाजीके तटपर मुनियोंके आश्रमोंमें रहने लगे और धर्मशास्त्रोंका श्रवण करते हुए कठिन तपस्या करने लगे॥ ४४॥ |
| कथायां वर्तमानायां कदाचिद्धर्मसंश्रितम्।<br>अशृणोद्वचनं राजा सुपृष्टं मुनिभाषितम्॥ ४५<br>अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वर्गे गन्तुं परन्तप।<br>येन केनाप्युपायेन पुत्रस्य जननं चरेत्॥ ४६ | किसी समय कथाप्रसंगमें सम्यक् प्रकारसे पूछनेपर किसी मुनिके द्वारा कहा गया यह धार्मिक वचन राजाने सुना—हे परन्तप! अपुत्रकी गति नहीं होती; वह स्वर्ग जानेका अधिकारी नहीं होता अतएव जिस किसी भी उपायसे पुत्र उत्पन्न करना चाहिये॥ ४५-४६॥ |
| अंशजः पुत्रिकापुत्रः क्षेत्रजो गोलकस्तथा।<br>कुण्डः सहोढः कानीनः क्रीतः प्राप्तस्तथा वने॥ ४७<br>दत्तः केनापि चाशक्तौ धनग्राहिसुताः स्मृताः।<br>उत्तरोत्तरतः पुत्रा निकृष्टा इति निश्चयः॥ ४८ | अंशज, पुत्रिकापुत्र, क्षेत्रज , गोलक, कुण्ड, सहोढ, कानीन, क्रीत, वनमें प्राप्त, पालन करनेमें असमर्थ किसीका दिया हुआ—इतने प्रकारके पुत्र पिताकी सम्पत्तिके उत्तराधिकारी कहे गये हैं, इनमें उत्तरोत्तर एक दूसरेसे निकृष्ट पुत्र हैं; यह सुनिश्चित है॥ ४७-४८॥ |
| २०६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ६ |
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| इत्याकर्ण्य तदा प्राह कुन्तीं कमललोचनाम्।<br>सुतमुत्पादयाशु त्वं मुनिं गत्वा तपोऽन्वितम्॥ ४९<br>ममाज्ञया न दोषस्ते पुरा राज्ञा महात्मना।<br>वसिष्ठाज्जनितः पुत्रः सौदासेनेति मे श्रुतम्॥ ५० | यह सुनकर राजा पाण्डुने कमलके समान नेत्रवाली कुन्तीसे कहा—तुम किसी तपोनिष्ठ मुनिके पास जाकर शीघ्र पुत्र उत्पन्न करो। मेरी आज्ञा होनेके कारण तुम्हें दोष नहीं लगेगा। मैंने सुना है कि पूर्वकालमें महात्मा राजा सौदासेने वसिष्ठसे पुत्र उत्पन्न कराया था॥ ४९-५०॥ |
| तं कुन्ती वचनं प्राह मम मन्त्रोऽस्ति कामदः।<br>दत्तो दुर्वाससा पूर्वं सिद्धिदः सर्वथा प्रभो॥ ५१ | कुन्ती उनसे यह वचन बोली—सभी कामनाएँ पूर्ण करनेवाला एक मन्त्र मेरे पास है। हे प्रभो! पूर्वकालमें महर्षि दुर्वासाने सिद्धि प्रदान करनेवाला वह मन्त्र मुझे प्रदान किया था॥ ५१॥ |
| निमन्त्रयेऽहं यं देवं मन्त्रेणानेन पार्थिव।<br>आगच्छेत्सर्वथासौ वै मम पार्श्वं निमन्त्रितः॥ ५२ | हे राजन्! मैं इस मन्त्रद्वारा जिस देवताका आवाहन करूँगी, वह निमन्त्रित होकर निश्चय ही मेरे पास आ जायगा॥ ५२॥ |
| भर्तुर्वाक्येन सा तत्र स्मृत्वा धर्मं सुरोत्तमम्।<br>सङ्गम्य सुषुवे पुत्रं प्रथमं च युधिष्ठिरम्॥ ५३ | पतिकी आज्ञासे वहाँ कुन्तीने देवताओंमें श्रेष्ठ धर्मराजका स्मरण करके उनके संयोगसे सर्वप्रथम युधिष्ठिरको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया॥ ५३॥ |
| वायोर्वृकोदरं पुत्रं जिष्णुं चैव शतक्रतोः।<br>वर्षे वर्षे त्रयः पुत्राः कुन्त्या जाता महाबलाः॥ ५४ | तत्पश्चात् उसने वायुके द्वारा भीमको और इन्द्रके द्वारा अर्जुनको उत्पन्न किया। इस प्रकार एक-एक वर्षके अन्तरालमें कुन्तीके तीन महाबली पुत्र उत्पन्न हुए॥ ५४॥ |
| माद्री प्राह पतिं पाण्डुं पुत्रं मे कुरु सत्तम।<br>किं करोमि महाराज दुःखं नाशय मे प्रभो॥ ५५ | इसके बाद माद्रीने भी अपने पति पाण्डुसे कहा—हे श्रेष्ठ! मुझे भी पुत्र प्रदान कीजिये। हे महाराज! मैं क्या करूँ? हे प्रभो! मेरा दुःख दूर कीजिये॥ ५५॥ |
| प्रार्थिता पतिना कुन्ती ददौ मन्त्रं दयान्विता।<br>एकपुत्रप्रबन्धेन माद्री पतिमते स्थिता॥ ५६<br>स्मृत्वा तदाश्विनौ देवौ मद्रराजसुता सुतौ।<br>नकुलः सहदेवश्च सुषुवे वरवर्णिनी॥ ५७ | तब पति पाण्डुके प्रार्थना करनेपर दयालु कुन्तीने वह मन्त्र माद्रीको बता दिया। सुन्दरी माद्रीने भी एक पुत्रकी प्राप्तिके लिये पतिसे अनुमति पाकर अश्विनीकुमारोंका स्मरण करके नकुल और सहदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न किये॥ ५६-५७॥ |
| एवं ते पाण्डवाः पञ्च क्षेत्रोत्पन्नाः सुरात्मजाः।<br>वर्षवर्षान्तरे जाता वने तस्मिन्द्विजोत्तमाः॥ ५८ | हे मुनिवरो! इस प्रकार वे पाँचों पाण्डव देवताओंके पुत्र थे। वे क्षेत्रज पुत्रके रूपमें उस वनमें क्रमशः एक-एक वर्षके अन्तरसे उत्पन्न हुए॥ ५८॥ |
| एकस्मिन्समये पाण्डुर्माद्रीं दृष्ट्वाथ निर्जने।<br>आश्रम चातिकामातों जग्राहागतवैशसः॥ ५९ | एक बार राजा पाण्डुने माद्रीको निर्जन आश्रममें देखकर अपनी मृत्यु निकट आयी होनेके कारण अत्यन्त कामातुर हो पकड़ लिया। माद्रीके द्वारा 'नहीं-नहीं'—ऐसा कहकर बार-बार निषेध करनेपर |