देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ४ ] माहात्म्य ५१
अ० ४ ] माहात्म्य ५१
अथ चतुर्थोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवतके माहात्म्यके प्रसंगमें रेवती नक्षत्रके पतन और पुनः स्थापनकी कथा तथा श्रीमद्देवीभागवतके श्रवणसे राजा दुर्दमको मन्वन्तराधिप-पुत्रकी प्राप्ति
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| इति श्रुत्वा कथां दिव्यां विचित्रां कुम्भसम्भवः।<br>शुश्रूषुः पुनराहेदं विशाखं विनयान्वितः॥ १ | इस अलौकिक एवं विचित्र कथाको सुनकर पुनः सुननेकी इच्छावाले अगस्त्यजीने बड़ी विनम्रतापूर्वक भगवान् कार्तिकेयसे कहा— ॥ १ ॥ |
| अगस्त्य उवाच<br>देवसेनापते देव विचित्रेयं श्रुता कथा।<br>पुनरन्यच्च माहात्म्यं वद भागवतस्य मे॥ २ | अगस्त्यजी बोले— हे देवसेनापते! हे देव! मैंने यह विचित्र कथा सुन ली, अब आप श्रीमद्देवीभागवतका दूसरा माहात्म्य मुझे बतायें ॥ २ ॥ |
| स्कन्द उवाच<br>मित्रावरुणसम्भूत मुने शृणु कथामिमाम्।<br>यत्रैकदेशमहिमा प्रोक्तो भागवतस्य तु॥ ३<br>वर्ण्यते धर्मविस्तारो गायत्रीमधिकृत्य च।<br>गायत्र्या महिमा यत्र तद् भागवतमिष्यते॥ ४ | कार्तिकेयजी बोले— हे मित्रावरुणसे प्रकट होनेवाले मुने! अब आप यह कथा सुनें, जिसके एक अंशमें भागवतकी महिमा कही गयी हो, धर्मका विशद वर्णन किया गया हो और गायत्रीका प्रसंग आरम्भ करके उसकी महिमा दर्शायी गयी हो, उसे भागवतके रूपमें जाना जाता है ॥ ३-४ ॥ |
| भगवत्या इदं यस्मात्तस्माद् भागवतं विदुः।<br>ब्रह्मविष्णुशिवारध्या परा भगवती हि सा॥ ५ | यह पुराण देवी भगवतीके माहात्म्यसे परिपूर्ण होनेके कारण देवीभागवत कहा जाता है। वे परा भगवती ब्रह्मा, विष्णु और महेशकी आराध्या हैं ॥ ५ ॥ |
| ऋतवागिति विख्यातो मुनिरासीन्महामतिः।<br>तस्य पुत्रोऽभवत्काले गण्डान्ते पौष्णभान्तिमे॥ ६ | ऋतवाक् नामसे विख्यात एक महान् बुद्धिसम्पन्न मुनि थे। रेवती नक्षत्रके अन्तिम भाग गण्डान्तयोगमें उनके यहाँ समयानुसार एक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ ६ ॥ |
| स तस्य जातकर्मादिक्रियाश्चक्रे यथाविधि।<br>चूड़ोपनयनादींश्च संस्कारानपि सोऽकरोत्॥ ७ | उन्होंने उस पुत्रकी जातकर्म आदि क्रियाएँ तथा चूड़ाकरण एवं उपनयन आदि संस्कार भी विधिपूर्वक सम्पन्न किये ॥ ७ ॥ |
| यत आरभ्य जातोऽसौ पुत्रस्तस्य महात्मनः।<br>तत एवाथ स मुनिः शोकरोगाकुलोऽभवत्॥ ८<br>रोषलोभपरीतात्मा तथा मातापि तस्य च।<br>बहुरोगार्दिता नित्यं शुचा दुःखीकृता भृशम्॥ ९ | महात्मा ऋतवाक्के यहाँ जबसे वह पुत्र उत्पन्न हुआ, उसी समयसे वे शोक तथा रोगसे ग्रस्त रहने लगे और क्रोध एवं लोभने उन्हें घेर लिया। उस बालककी माता भी अनेक रोगोंसे ग्रसित होकर नित्य शोकाकुल और अति दुःखी रहने लगीं ॥ ८-९ ॥ |
| ऋतवाक् स मुनिश्चिन्तामवाप भृशदुःखितः।<br>किमेतत् कारणं जातं पुत्रो मेऽत्यन्तदुर्मतिः॥ १० | मुनि ऋतवाक् अत्यन्त दुःखी और चिन्तित होकर सोचने लगे कि ऐसा क्या कारण है कि मेरे यह अत्यन्त दुर्मति पुत्र उत्पन्न हुआ ॥ १० ॥ |
| कस्यचिन्मुनिपुत्रस्य बलात् पत्नीं जहार च।<br>मेने शिक्षां पितुर्नासौ न च मातुर्विमूढधीः॥ ११ | [तरुणावस्थाको प्राप्त होनेपर] उसने किसी मुनिपुत्रकी पत्नीका बलपूर्वक हरण कर लिया। वह दुर्बुद्धि अपने माता-पिताकी शिक्षाओंपर कभी भी ध्यान नहीं देता था ॥ ११ ॥ |
| ५२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| ततो विषण्णचित्तस्तु ऋतवागब्रवीदिदम्।<br>अपुत्रता वरं नृणां न कदाचित् कुपुत्रता ॥ १२ | तदनन्तर अत्यन्त दुःखित मनवाले ऋतवाक्ने यह कहा कि मनुष्योंके लिये पुत्रहीन रह जाना अच्छा है, किंतु कुपुत्रकी प्राप्ति कभी भी ठीक नहीं है ॥ १२ ॥ |
| पितॄन् कुपुत्रः स्वर्गातान्निरये पातयत्यपि।<br>यावज्जीवेत् सदा पित्रोः केवलं दुःखदायकः ॥ १३ | कुपुत्र स्वर्गमें गये हुए पितरोंको भी नरकमें गिरा देता है। वह जबतक जीवित रहता है, तबतक माता-पिताको केवल कष्ट ही देता रहता है ॥ १३ ॥ |
| पित्रोर्दुःखाय धिग्जन्म कुपुत्रस्य च पापिनः।<br>सुहृदां नोपकाराय नापकाराय वैरिणाम् ॥ १४ | अतएव माता-पिताको कष्ट पहुँचानेवाले पापी कुपुत्रके जन्मको धिक्कार है। ऐसा पुत्र मित्रोंका न तो उपकार कर सकता है और न शत्रुओंका अपकार ही ॥ १४ ॥ |
| धन्यास्ते मानवा लोके सुपुत्रो यद्गृहे स्थितः।<br>परोपकारशीलश्च पितुर्मातुः सुखावहः ॥ १५ | संसारमें वे मानव धन्य हैं, जिनके घरमें परोपकारपरायण तथा माता-पिताको सुख देनेवाला पुत्र हुआ करता है ॥ १५ ॥ |
| कुपुत्रेण कुलं नष्टं कुपुत्रेण हतं यशः।<br>कुपुत्रेणेह चामुत्र दुःखं निरययातनाः ॥ १६ | कुपुत्रसे कुल नष्ट हो जाता है, कुपुत्रसे यश नष्ट हो जाता है और कुपुत्रसे लौकिक तथा पारलौकिक—दोनों जगत्में दुःख तथा नारकीय यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं ॥ १६ ॥ |
| कुपुत्रेणान्वयो नष्टो जन्म नष्टं कुभार्यया।<br>कुभोजनेन दिवसः कुमित्रेण सुखं कुतः ॥ १७ | कुपुत्रसे वंश नष्ट हो जाता है, दुष्ट पत्नीसे जीवन नष्ट हो जाता है, विकृत भोजनसे दिन व्यर्थ चला जाता है और दुरात्मा मित्रसे सुख कहाँसे मिल सकता है ! ॥ १७ ॥ |
| स्कन्द उवाच<br>एवं दुष्टस्य पुत्रस्य दुष्टैराचरणैर्मुनिः।<br>तप्यमानोऽनिशं काले गत्वा गर्गमपृच्छत ॥ १८ | कार्तिकेयजी बोले— [ हे अगस्त्यजी ! ] अपने दुष्ट पुत्रके दुराचरणोंसे निरन्तर सन्तप्त रहते हुए मुनि ऋतवाक्ने किसी दिन गर्गऋषिके पास जाकर पूछा— ॥ १८ ॥ |
| ऋतवागुवाच<br>भगवंस्त्वामहं प्रष्टुमिच्छामि वद तत् प्रभो।<br>ज्योतिश्शास्त्रस्य चाचार्य पुत्रदौःशील्यकारणम् ॥ १९ | ऋतवाक् बोले— हे भगवन् ! हे ज्योतिषशास्त्रके आचार्य ! मैं आपसे अपने पुत्रकी दुःशीलताका कारण पूछना चाहता हूँ। हे प्रभो ! आप उसे बतायें ॥ १९ ॥ |
| गुरुशुश्रूषया वेदा अधीता विधिवन्मया।<br>ब्रह्मचारिव्रतं तीर्त्वा विवाहो विधिवत् कृतः ॥ २० | गुरुकी निरन्तर सेवा करते हुए मैंने विधिपूर्वक वेदाध्ययन किया और ब्रह्मचर्यव्रत पूर्ण करके विधि-विधानके साथ विवाह किया ॥ २० ॥ |
| भार्यया सह गार्हस्थ्यधर्मश्चानुष्ठितोऽनिशम्।<br>पञ्चयज्ञविधानं च मयाकारि यथाविधि ॥ २१ | अपनी भार्याके साथ मैंने गृहस्थधर्मका सदैव यथोचित पालन किया और विधिपूर्वक पंचयज्ञका अनुष्ठान किया ॥ २१ ॥ |
| नरकाद् बिभ्यता विप्र न तु कामसुखेच्छया।<br>गर्भाधानं च विधिवत् पुत्रप्राप्त्यै मया कृतम् ॥ २२ | हे विप्र ! नरकप्राप्तिके भयसे बचनेके लिये पुत्र प्राप्त करनेकी कामनासे मैंने विधिवत् गर्भाधान किया था न कि वासनात्मक सुखप्राप्तिकी इच्छासे ॥ २२ ॥ |
| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पुत्रोऽयं मम दोषेण मातुर्दोषेण वा मुने।<br>जातो दुःखাবহः पित्रोर्दुःशीलो बन्धुशोकदः॥ २३ | हे मुने! दुःखदायी, माता-पिताके प्रति उद्दण्ड तथा बन्धु-बान्धवोंको पीड़ा पहुँचानेवाला यह पुत्र मेरे दोषसे अथवा अपनी माताके दोषसे उत्पन्न हुआ ? ॥ २३ ॥ |
| एतन्निशम्य वचनं गर्गाचार्यो मुनेस्तदा।<br>विचार्य सर्वं तद्धेतुं ज्योतिर्विद्वाचमब्रवीत्॥ २४ | तब ज्योतिषशास्त्रके ज्ञाता गर्गाचार्यने मुनि ऋतवाक्का यह वचन सुनकर सभी कारणोंपर सम्यक् रूपसे विचार करके कहा॥ २४॥ |
| गर्ग उवाच | गर्गाचार्यजी बोले— |
| मुने नैवापराधस्ते न मातुर्न कुलस्य च।<br>रेवत्यन्तं तु गण्डान्तं पुत्रदौःशील्यकारणम्॥ २५ | हे मुने! इसमें न तो आपका दोष है, न बालककी माताका दोष है और न तो कुलका दोष है। रेवती नक्षत्रका अन्तिम भाग—गण्डान्तयोग ही इस बालककी दुर्विनीतताका कारण है॥ २५॥ |
| दुष्टे काले यतो जन्म पुत्रस्य तव भो मुने।<br>तेनैव तव दुःखाय नान्यो हेतुर्मनागपि॥ २६ | हे मुने! अशुभ वेलामें आपके पुत्रका जन्म हुआ है, इसी कारण यह आपको दुःख दे रहा है; इसमें लेशमात्र भी अन्य कोई कारण नहीं है॥ २६॥ |
| तद्दुःखशान्तये ब्रह्मञ्जगतां मातरं शिवाम्।<br>समाराधय यत्नेन दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्॥ २७ | अतः हे ब्रह्मन्! इस दुःखके शमनके लिये आप प्रयत्नपूर्वक समस्त दुर्गत्तियोंका विनाश करनेवाली कल्याणी जगदम्बा दुर्गाकी आराधना कीजिये॥ २७॥ |
| गर्गस्य वचनं श्रुत्वा ऋतवाक् क्रोधमूर्च्छितः।<br>रेवतीं तु शशापासौ व्योम्नः पततु रेवती॥ २८ | गर्गाचार्यजीका वचन सुनकर ऋतवाङ्मुनि क्रोधसे मूर्च्छित हो गये और उन्होंने रेवतीको शाप दे दिया कि वह आकाशसे नीचे गिर जाय॥ २८॥ |
| दत्ते शापे तु तेनाथ पूष्णो भञ्च पपात खात्।<br>कुमुदाद्रौ भासमानं सर्वलोकस्य पश्यतः॥ २९ | ऋतवाक्के शाप देते ही चमकता हुआ रेवती नक्षत्र सभी लोगोंके देखते-देखते आकाशसे कुमुदपर्वतपर जा गिरा॥ २९॥ |
| ख्यातो रैवतकश्चाभूत्तत्पातात् कुमुदाचलः।<br>अतीव रमणीयश्च ततः प्रभृति सोऽप्यभूत्॥ ३० | वह कुमुदपर्वत रेवतीके गिरनेके कारण रैवतक नामसे प्रसिद्ध हुआ और उसी समयसे वह अत्यन्त रमणीक हो गया॥ ३०॥ |
| दत्त्वा शापं च रेवत्यै गर्गोक्तविधिना मुनिः।<br>समाराध्याम्बिकां देवीं सुखसौभाग्यभागभूत्॥ ३१ | रेवतीको शाप देकर मुनि ऋतवाक्ने महर्षि गर्गद्वारा बताये गये विधानके अनुसार देवी भगवतीकी सम्यक् आराधनाकर सुख और सौभाग्य प्राप्त किया॥ ३१॥ |
| स्कन्द उवाच | कार्तिकेयजी बोले— |
| रेवत्यृक्षस्य यत् तेजस्तस्माज्जाता तु कन्यका।<br>रूपेणाप्रतिमा लोके द्वितीया श्रीरिवाभवत्॥ ३२ | [हे अगस्त्यजी!] उस रेवती नक्षत्रके महान् तेजसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो अनुपम रूपवती होनेके कारण लोकमें दूसरी लक्ष्मीकी भाँति प्रतीत हो रही थी॥ ३२॥ |
| अथ तां प्रमुचः कन्यां रेवतीकान्तिसम्भवाम्।<br>दृष्ट्वा नाम चकारास्या रेवतीति मुदा मुनिः॥ ३३ | रेवती नक्षत्रकी कान्तिसे प्रादुर्भूत उस कन्याको देखकर मुनि प्रमुचने प्रसन्न होकर उसका ‘रेवती’—यह नाम रख दिया॥ ३३॥ |
| ५४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ४ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| निन्येऽथ स्वाश्रमे चैनां पोषयामास धर्मतः।<br>ब्रह्मर्षिः प्रमुचो नाम कुमुदाद्रौ सुतामिव॥ ३४ | तदनन्तर ब्रह्मर्षि प्रमुच उसे कुमुदाचलपर स्थित अपने आश्रममें ले आये और पुत्रीकी भाँति उसका धर्मपूर्वक पालन-पोषण करने लगे॥ ३४॥ |
| अथ कालेन च प्रौढां दृष्ट्वा तां रूपशालिनीम्।<br>स मुनिश्चिन्तयामास कोऽस्या योग्यो वरो भवेत्॥ ३५ | समय पाकर यौवनको प्राप्त उस रूपवती कन्याको देखकर मुनिने विचार किया कि इस कन्याके योग्य वर कौन होगा?॥ ३५॥ |
| बहुधान्वेषयंस्तस्या नाससादोचितं पतिम्।<br>ततोऽग्निशालां संविश्य मुनिस्तुष्टाव पावकम्॥ ३६ | बहुत अन्वेषणके बाद भी जब मुनिको उसके योग्य कोई वर नहीं मिला, तब वे अग्निशालामें प्रवेश करके अग्निदेवकी स्तुति करने लगे॥ ३६॥ |
| कन्यावरं तदाशंसत्प्रीतस्तमपि हव्यवाट्।<br>धर्म्मिष्ठो बलवान् वीरः प्रियवागपराजितः॥ ३७<br>दुर्दमो भविता भर्त्ता मुनेऽस्याः पृथिवीपतिः।<br>इति श्रुत्वा वचो वह्नेः प्रसन्नोऽभून्मुनिस्तदा॥ ३८ | प्रमुचऋषिके स्तुति-गानसे प्रसन्न होकर अग्निदेवने कन्याके योग्य वरका संकेत करते हुए कहा—हे मुने! इस कन्याके पति धर्मपरायण, बलशाली, वीर, प्रिय भाषण करनेवाले और अपराजेय राजा दुर्दम होंगे। तब अग्निदेवके इस वचनको सुनकर मुनि अत्यन्त प्रसन्न हुए॥ ३७-३८॥ |
| दैवादाखेटकव्याजात् तत्क्षणादागतो नृपः।<br>दुर्दमो नाम मेधावी तस्याश्रमपदं मुनेः॥ ३९ | संयोगसे उसी समय आखेटके बहाने दुर्दम नामक प्रतिभाशाली राजा मुनि प्रमुचके आश्रममें आ गये॥ ३९॥ |
| पुत्रो विक्रमशीलस्य बलवान् वीर्य्यवत्तरः।<br>कालिन्दीजठरे जातः प्रियव्रतकुलोद्भवः॥ ४० | बलवान् तथा अप्रतिम ओजसे सम्पन्न वे प्रियव्रतके वंशज राजा दुर्दम विक्रमशीलके पुत्र थे और कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे॥ ४०॥ |
| मुनेराश्रममाविश्य तमदृष्ट्वा महामुनिम्।<br>आमन्त्र्य तां प्रिये चेति रेवतीं पृष्टवान् नृपः॥ ४१ | मुनिके आश्रममें प्रवेशकर और उन्हें वहाँ न देखकर राजा दुर्दमने रेवतीको ‘प्रिये’—इस शब्दसे सम्बोधित करके पूछा॥ ४१॥ |
| राजोवाच<br>महर्षिर्भगवानस्मादाश्रमात् क्व गतः प्रिये।<br>तत्पादौ द्रष्टुमिच्छामि वद कल्याणि तत्त्वतः॥ ४२ | **राजा बोले—**हे प्रिये! महर्षि भगवान् प्रमुच इस आश्रमसे कहाँ गये हुए हैं? हे कल्याणि! मुझे सच-सच बताओ; मैं उनके चरणोंका दर्शन करना चाहता हूँ॥ ४२॥ |
| कन्योवाच<br>अग्निशालामुपगतो महाराज महामुनिः।<br>निश्चक्रामाश्रमात् तूर्णं राजाप्याकर्ण्य तद्वचः॥ ४३ | **कन्या बोली—**हे महाराज! महामुनि अग्निशालामें गये हुए हैं। राजा भी यह वचन सुनकर शीघ्रतापूर्वक आश्रमसे बाहर निकल आये॥ ४३॥ |
| अथाग्निशालाद्वारस्थं राजानं दुर्दमं मुनिः।<br>राजलक्षणसंयुक्तमपश्यत् प्रश्रयानतम्॥ ४४ | इसके बाद प्रमुचमुनिने राजलक्षणसम्पन्न एवं विनयावनत राजा दुर्दमको अग्निशालाके द्वारपर स्थित देखा॥ ४४॥ |
| प्रणनाम च तं राजा मुनिः शिष्यमुवाच ह।<br>गौतमानीयतामर्घ्यमर्घ्ययोग्योऽस्ति भूपतिः॥ ४५ | मुनिको देखकर राजाने प्रणाम किया और तदनन्तर मुनि प्रमुचने शिष्यसे कहा—हे गौतम! ये राजा अर्घ्य पानेके योग्य हैं, अतः शीघ्र ही इनके लिये |
| अ० ४ ] | माहात्म्य | ५५ |
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| आगतश्चिरकालेन जामातेति विशेषतः।<br>इत्युक्त्वार्घ्यं ददौ तस्मै सोऽपि जग्राह चिन्तयन्॥ ४६<br><br>मुनिरासनमासीनं गृहीतार्घ्यं च भूपतिम्।<br>आशीर्भिरभिनन्द्याथ कुशलं चाप्यपृच्छत॥ ४७<br><br>अपि तेऽनामयं राजन् बले कोशे सुहृत्सु च।<br>भृत्येष्वमात्ये पुरे देशे तथात्मनि जनाधिप॥ ४८<br><br>भार्यास्ति ते कुशलिनी यतः सात्रैव तिष्ठति।<br>अतो न पृच्छाम्यस्यास्ते चान्यासां कुशलं वद॥ ४९ | अर्घ्य ले आओ। बहुत दिन बाद ये पधारे हुए हैं और विशेषरूपसे ये हमारे जामाता हैं—ऐसा कहकर मुनिने राजाको अर्घ्य प्रदान किया और राजाने भी विचार करते हुए उसे ग्रहण किया॥ ४५-४६॥<br><br>तत्पश्चात् राजाके अर्घ्य ग्रहण करके आसनपर बैठ जानेके उपरान्त मुनि प्रभुने उन्हें आशीर्वचनोंसे अभिनन्दित करके उनका कुशल-क्षेम पूछा—हे राजन्! आप स्वस्थ तो हैं? आपकी सेना, कोष, बन्धु-बान्धव, सेवकगण, सचिव, नगर, देश आदिकी सर्वविध कुशलता तो है? हे नरेश! आपकी भार्या तो यहीं विद्यमान है और वह सकुशल है। अतएव, मैं उसकी कुशलता नहीं पूछूँगा, आप अपनी अन्य स्त्रियोंका कुशल-क्षेम बताइये॥ ४७-४९॥ |
| <center>राजोवाच</center>भगवंस्त्वत्प्रसादेन सर्वत्रानामयं मम।<br>एतत् कुतूहलं ब्रह्मन् मद्भार्या कात्र विद्यते॥ ५० | **राजा बोले—**हे भगवन्! आपके कृपाप्रभावसे मेरी सर्वविध कुशलता है। हे ब्रह्मन्! अब मेरी यह जिज्ञासा है कि मेरी कौन-सी भार्या यहाँ है?॥ ५०॥ |
| <center>ऋषिरुवाच</center>रेवती नाम ते भार्या रूपेणाप्रतिमा भुवि।<br>विद्यतेऽत्र कथं पत्नीं तां न वेत्सि महीपते॥ ५१ | **ऋषि बोले—**हे पृथ्वीपते! संसारमें अप्रतिम लावण्यसे सम्पन्न रेवती नामक आपकी पत्नी यहाँ ही रहती है। क्या आप उसे नहीं जानते?॥ ५१॥ |
| <center>राजोवाच</center>सुभद्राद्यास्तु या भार्या मम सन्ति गृहे विभो।<br>जानामि तास्तु भगवन् नैव जानामि रेवतीम्॥ ५२ | **राजा बोले—**हे प्रभो! सुभद्रा आदि मेरी पत्नियाँ तो घरपर ही हैं। हे भगवन्! मैं तो केवल उन्हें ही जानता हूँ। मैं रेवतीको तो नहीं जानता॥ ५२॥ |
| <center>ऋषिरुवाच</center>प्रियेति साम्प्रतं राजंस्त्वयोक्ता या महामते।<br>सा विस्मृता क्षणादेव या ते श्लाघ्यतमा प्रिया॥ ५३ | **ऋषि बोले—**हे महामते! हे राजन्! इसी समय 'प्रिये' के सम्बोधनसे आपने जिससे पूछा था, अपनी उस योग्यतम प्रियाको आपने क्षणभरमें ही भुला दिया!॥ ५३॥ |
| <center>राजोवाच</center>त्वयोक्तं यन्मृषा तन्नो तथैवामन्त्रिता मया।<br>मुने दुष्टो न मे भावः कोपं मा कर्तुमर्हसि॥ ५४ | **राजा बोले—**हे मुने! आपने जो कहा, वह असत्य नहीं है; किंतु मैंने तो सामान्यरूपसे ऐसा कह दिया था। इसमें मेरा कोई दूषित भाव नहीं था, अतः आप मेरे ऊपर क्रोध न करें॥ ५४॥ |
| <center>ऋषिरुवाच</center>राजन्नुक्तं त्वया सत्यं न भावो दूषितस्तव।<br>वह्निना प्रेरितेनेत्थं भवता व्याहृतं वचः॥ ५५<br><br>अद्य पृष्टो मया वह्निः कोऽस्या भर्ता भविष्यति।<br>तेनोक्तं दुर्दमॊ राजा भवितास्याः पतिर्ध्रुवम्॥ ५६ | **ऋषि बोले—**हे राजन्! आपका भाव दूषित नहीं था अपितु आपने सत्य ही कहा था। अग्निदेवके द्वारा प्रेरित किये जानेपर ही आपने ऐसा कहा था॥ ५५॥<br><br>'इसका पति कौन होगा'—ऐसा मेरे द्वारा आज अग्निदेवसे पूछे जानेपर उन्होंने कहा था कि इसके पति निश्चितरूपसे राजा दुर्दम ही होंगे॥ ५६॥ |