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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० ३२] पञ्चम स्कन्ध ७०५

अ० ३२] पञ्चम स्कन्ध ७०५

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गुरुं पूज्यं द्विजं द्वेष्टि लोभाविष्टः सदा नरः ॥ १७<br>तस्मान्मया न कर्तव्यो विश्वासः सर्वथाधुना ।<br>मन्त्रिवर्गेऽतिपापिष्ठे शत्रुपक्षसमाश्रिते ॥ १८बन्धु-बान्धव, पूजनीय गुरु तथा ब्राह्मणसे भी सदा द्वेष करता है। अतएव इस समय शत्रुपक्षके आश्रयको प्राप्त अत्यन्त पापपरायण अपने मन्त्रिसमुदायपर मुझे बिलकुल विश्वास नहीं करना चाहिये॥ १२—१८॥
इति सञ्चिन्त्य मनसा राजा परमदुर्मनाः ।<br>एकाकी हयमारुह्य निर्जगाम पुरान्नतः ॥ १९इस प्रकार अपने मनमें भलीभाँति विचार करके अत्यन्त दुःखीचित्त राजा सुरथ घोड़ेपर आरूढ होकर अकेले ही उस नगरसे निकल पड़े॥ १९॥
असहायोऽथ निर्गत्य गहनं वनमाश्रितः ।<br>चिन्तयामास मेधावी क्व गन्तव्यं मया पुनः ॥ २०वे बिना किसी सहायकको साथ लिये ही नगरसे बाहर निकलकर एक घने जंगलमें चले गये। प्रतिभासम्पन्न राजा सुरथ सोचने लगे कि अब मुझे कहाँ चलना चाहिये ? ॥ २०॥
योजनत्रयमात्रे तु मुनेराश्रममुत्तमम् ।<br>ज्ञात्वा जगाम भूपालस्तापसस्य सुमेधसः ॥ २१तपस्वी सुमेधाका पवित्र आश्रम यहाँसे मात्र तीन योजनकी दूरीपर है—यह जानकर राजा सुरथ वहाँ चले गये॥ २१॥
बहुवृक्षसमायुक्तं नदीपुलिनसंश्रितम् ।<br>निर्वैरश्वापदाकीर्णं कोकिलारावमण्डितम् ॥ २२<br>शिष्याध्ययनशब्दाढ्यं मृगयूथशतावृत्तम् ।<br>नीवारान्नसुपक्वाढ्यं सुपुष्पफलपादपम् ॥ २३<br>होमधूमसुगन्धेन प्रीतिदं प्राणिनां सदा ।<br>वेदध्वनिसमाक्रान्तं स्वर्गादपि मनोहरम् ॥ २४<br>दृष्ट्वा तमाश्रमं राजा बभूवासौ मुदान्वितः ।<br>भयं त्यक्त्वा मतिं चक्रे विश्रामाय द्विजाश्रमे ॥ २५बहुत प्रकारके वृक्षोंसे युक्त, नदीके तटपर विराजमान, वैरभावसे रहित होकर विचरण करनेवाले पशुओंसे समन्वित, कोयलोंकी मधुर ध्वनिसे मण्डित, अध्ययनरत शिष्योंके स्वरसे निनादित, सैकड़ों मृगसमूहोंसे घिरे हुए, भलीभाँति पके हुए नीवारान्नसे परिपूर्ण, सुन्दर फल-फूलसे लदे हुए पादपोंसे सुशोभित, होमके सुगन्धित धूमसे प्राणियोंको सदा आनन्दित करनेवाले, निरन्तर वेदध्वनिसे परिव्याप्त तथा स्वर्गसे भी मनोहर उस आश्रमको देखकर वे राजा अत्यन्त आनन्दित हुए और उन्होंने भय त्यागकर मुनिके आश्रममें विश्राम करनेका निश्चय कर लिया॥ २२—२५॥
आसज्य पादपेऽश्वं तु जगाम विनयान्वितः ।<br>दृष्ट्वा तं मुनिमासीनं सालच्छायासु संश्रितम् ॥ २६<br>मृगाजिनासनं शान्तं तपसातिकृशं ऋजुम् ।<br>अध्यापयन्तं शिष्यांश्च वेदशास्त्रार्थदर्शिनम् ॥ २७<br>रहितं क्रोधलोभाद्यैर्द्वन्द्वातीतं विमत्सरम् ।<br>आत्मज्ञानरतं सत्यवादिनं शमसंयुतम् ॥ २८<br>तं वीक्ष्य भूपतिर्भूमौ पपात दण्डवत्तदा ।<br>तदग्रेऽश्रुजलापूर्णनयनः प्रेमसंयुतः ॥ २९तत्पश्चात् अपने घोड़ेको एक वृक्षमें बाँधकर उन्होंने विनम्रतापूर्वक आश्रममें प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देखा कि मुनि एक सालवृक्षकी छायामें मृगचर्मके आसनपर बैठे हुए हैं, उनकी आकृति शान्त है, तपस्या करनेके कारण उनका शरीर क्षीण हो गया है, उनका स्वभाव अति कोमल है, वे शिष्योंको पढ़ा रहे हैं, वे वेद-शास्त्रोंके तत्त्वदर्शी विद्वान् हैं, क्रोध-लोभ आदि विकारोंसे मुक्त हैं, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे परे हैं, ईर्ष्यारहित हैं, आत्मज्ञानके चिन्तनमें संलग्न हैं, सत्यवादी तथा जितेन्द्रिय हैं। उन्हें देखकर अश्रुपूरित नयनोंवाले राजा सुरथ प्रेमपूर्वक उनके आगे दण्डकी भाँति भूतलपर गिर पड़े॥ २६—२९॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 A

७०६ श्रीमद्देवीभागवत [ अ० ३२

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते तमुवाच तदा मुनिः।<br>शिष्यो ददौ बृसीं तस्मै गुरुणा नोदितस्तदा॥ ३०तब मुनिने उनसे कहा—उठिये-उठिये, आपका कल्याण हो। तत्पश्चात् गुरुसे आदेश पाकर एक शिष्यने उन्हें आसन प्रदान किया॥ ३०॥
उत्थाय नृपतिस्तस्यां समासीनस्तदाज्ञया।<br>अर्घ्यपाद्यार्हणं चक्रे सुमेधा विधिपूर्वकम्॥ ३१<br><br>पप्रच्छात्र कुतः प्राप्तः कस्त्वं चिन्तापरः कथम्।<br>कथयस्व यथाकामं संवृतं कारणं त्विह॥ ३२<br><br>किमागमनकृत्यं ते ब्रूहि कार्यं मनोगतम्।<br>करिष्ये वाञ्छितं काममसाध्यमपि यत्तव॥ ३३तब वे उठकर मुनिसे आज्ञा लेकर उस आसनपर बैठ गये। इसके बाद सुमेधाऋषिने अर्घ्य-पाद्य आदिसे उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। मुनिने उनसे पूछा कि आप यहाँ कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं तथा चिन्तित क्यों हैं? यहाँ आनेका जो भी कारण हो, उसे आप यथारुचि बतायें। आपके आगमनका प्रयोजन क्या है? आप अपने मनके विचारोंको अवश्य बताइये। आपका कोई असाध्य मनोरथ होगा तो उसे भी मैं पूर्ण करूँगा॥ ३१–३३॥
राजोवाच<br>सुरथो नाम राजाहं शत्रुभिश्च पराजितः।<br>त्यक्त्वा राज्यं गृहं भार्यामहं ते शरणं गतः॥ ३४<br><br>यदाज्ञापयसे ब्रह्मंस्तदहं भक्तितत्परः।<br>करिष्यामि न मे त्राता त्वदन्यः पृथिवीतले॥ ३५<br><br>शत्रुभ्यो मे भयं घोरं प्राप्तोऽस्म्यद्य तवान्तिकम्।<br>त्रायस्व मुनिशार्दूल शरणागतवत्सल॥ ३६राजा बोले—मैं सुरथ नामवाला राजा हूँ। शत्रुओंसे पराजित होकर मैं राज्य, महल तथा स्त्री—सब कुछ छोड़कर आपकी शरणमें आया हूँ॥ ३४॥<br><br>हे ब्रह्मन्! अब आप मुझे जो भी आज्ञा देंगे, मैं श्रद्धापूर्वक वही करूँगा। इस पृथ्वीतलपर आपके अतिरिक्त अब कोई दूसरा मेरा रक्षक नहीं है॥ ३५॥<br><br>हे मुनिराज! हे शरणागतवत्सल! शत्रुओंसे मुझे महान् भय उपस्थित है, अतएव मैं आपके पास आया हूँ; अब आप मेरी रक्षा कीजिये॥ ३६॥
ऋषिरुवाच<br>निर्भयं वस राजेन्द्र नात्र ते शत्रवः किल।<br>आगमिष्यन्ति बलिनो निश्चयं तपसो बलात्॥ ३७<br><br>नात्र हिंसा प्रकर्तव्या वनवृत्त्या नृपोत्तम।<br>कर्तव्यं जीवनं शस्तैर्नीवारफलमूलकैः॥ ३८ऋषि बोले—हे राजेन्द्र! आप निर्भीक होकर यहाँ रहिये। यह निश्चित है कि मेरी तपस्याके प्रभावसे आपके पराक्रमी शत्रु यहाँ नहीं आ सकेंगे॥ ३७॥<br><br>हे नृपश्रेष्ठ! यहाँपर आपको हिंसा नहीं करनी चाहिये और वनवासियोंकी भाँति पवित्र नीवार तथा फल-मूल आदिके द्वारा जीवन-निर्वाह करना चाहिये॥ ३८॥
व्यास उवाच<br>इति तस्य वचः श्रुत्वा निर्भयः स नृपस्तदा।<br>उवासाश्रम एवासौ फलमूलाशनः शुचिः॥ ३९<br><br>कदाचित्स नृपस्तत्र वृक्षच्छायां समाश्रितः।<br>चिन्तयामास चिन्तार्तो गृह एव गताशयः॥ ४०<br><br>राज्यं मे शत्रुभिः प्राप्तं म्लेच्छैः पापरतैः सदा।<br>सम्पीडिताः स्युर्लोकास्तैर्दुराचारैर्गतत्रपैः॥ ४१व्यासजी बोले—तब मुनिकी यह बात सुनकर राजा सुरथ निर्भय हो गये। अब वे फल-मूलका आहार करते हुए पवित्रताके साथ उस आश्रममें ही रहने लगे॥ ३९॥<br><br>किसी समय उस आश्रममें एक वृक्षकी छायामें बैठे हुए चिन्ताकुल राजा सुरथका चित्त घरकी ओर चला गया और वे सोचने लगे—॥४०॥<br><br>निरन्तर पापकर्ममें लगे रहनेवाले म्लेच्छ शत्रुओंने मेरा राज्य छीन लिया है। उन दुराचारी तथा निर्लज्ज म्लेच्छोंके द्वारा मेरी प्रजा बहुत सतायी जाती होगी॥ ४१॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 B

अ० ३२ ]पञ्चम स्कन्ध७०७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
गजाश्च तुरगाः सर्वे दुर्बला भक्ष्यवर्जिताः।<br>जाताः स्युर्र्नात्र सन्देहः शत्रुणा परिपीडिताः॥ ४२मेरे सभी हाथी तथा घोड़े आहार न पाने तथा शत्रुसे प्रताड़ित किये जानेके कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये होंगे; इसमें तो कोई सन्देह नहीं है॥ ४२॥
सेवका मम सर्वे ते शत्रूणां वशवर्तिनः।<br>दुःखिता एव जाताः स्युः पालिता ये मया पुरा॥ ४३अपने जिन सेवकोंका मैंने पहले पालन-पोषण किया था, वे सब शत्रुओंके अधीन हो जानेके कारण कष्टका अनुभव करते होंगे॥ ४३॥
धनं मे सुदुराचारैरसद्व्ययपरैः परैः।<br>द्यूतासवभुजिष्यादिस्थाने स्यात्प्रापितं किल॥ ४४उन अति दुराचारी तथा अपव्यय करनेके स्वभाववाले शत्रुओंने मेरा धन द्यूत, मदिरालय एवं वेश्यालयोंमें निश्चित-रूपसे खर्च कर दिया होगा॥ ४४॥
कोशक्षयं करिष्यन्ति व्यसनैः पापबुद्धयः।<br>न पात्रदाननिपुणा म्लेच्छास्ते मन्त्रिणोऽपि मे॥ ४५वे पापबुद्धि मेरा समस्त राजकोष व्यसनोंमें नष्ट कर डालेंगे, सत्पात्रोंको दान देनेकी योग्यता भी उन म्लेच्छोंमें नहीं है और मेरे मन्त्री भी अधीनतामें रहनेके कारण उन्हींके जैसे हो गये होंगे॥ ४५॥
इति चिन्तापरो राजा वृक्षमूलस्थितो यदा।<br>तदाजगाम वैश्यस्तु कश्चिदार्तिपरस्तथा॥ ४६महाराज सुरथ वृक्षके नीचे बैठकर इसी चिन्तामें पड़े हुए थे कि उसी समय एक विषादग्रस्त वैश्य वहाँ आ पहुँचा॥ ४६॥
नृपेण पुरतो दृष्टः पार्श्वे तत्रोपवेशितः।<br>पप्रच्छ तं नृपः कोऽसि कुत एवागतो वनम्॥ ४७<br><br>कोऽसि कस्माच्च दीनोऽसि हरिणः शोकपीडितः।<br>ब्रूहि सत्यं महाभाग मैत्री साप्तपदी मता॥ ४८राजाने उस वैश्यको सामने देख लिया। उन्होंने उसे अपने समीपमें बैठा लिया और पुनः उससे पूछा—आप कौन हैं तथा इस वनमें कहाँसे आये हैं? आप कौन हैं, आप उदास क्यों हैं? चिन्ताग्रस्त रहनेके कारण आप तो पीले वर्णके हो गये हैं? हे महाभाग! सात पग एक साथ चलनेपर ही मैत्री समझ ली जाती है, अतः आप मुझे सब कुछ सच-सच बता दीजिये॥ ४७-४८॥
व्यास उवाच<br>तच्छ्रुत्वा वचनं राज्ञस्तमुवाच विशोत्तमः।<br>उपविश्य स्थिरो भूत्वा मत्वा साधुसमागमम्॥ ४९व्यासजी बोले—राजाका वचन सुनकर वह वैश्यश्रेष्ठ उनके पास बैठ गया और इसे सज्जनसमागम समझकर शान्तचित्त होकर उनसे कहने लगा॥ ४९॥
वैश्य उवाच<br>मित्राहं वैश्यजातीयः समाधिर्नाम विश्रुतः।<br>धनवान्धर्मनिपुणः सत्यवागनसूयकः॥ ५०<br><br>पुत्रदारैर्निरस्तोऽहं धनलुब्धैरर्साधुभिः।<br>(कृपणेति मिषं कृत्वा त्यक्त्वा मायां सुदुस्त्यजाम्।)<br>स्वजनेन च संत्यक्तः प्राप्तोऽस्मि वनमाशु वै॥ ५१<br>कोऽसि त्वं भाग्यवान्भासि कथयस्व प्रियाधुना।वैश्य बोला—हे मित्र! मैं वैश्यजातिमें उत्पन्न हूँ और समाधि नामसे प्रसिद्ध हूँ। मैं धनवान्, धर्मकार्योंमें निपुण, सत्यवादी और ईर्ष्यासे रहित हूँ, फिर भी धनके लोभी और कुटिल स्त्री-पुत्रोंने मुझे घरसे निकाल दिया (उन्होंने मुझे कृपण कहकर कठिनाईसे टूटनेवाला माया-बन्धन भी तोड़ दिया), अतः अपने कुटुम्बियोंसे परित्यक्त होकर मैं अभी-अभी इस वनमें आया हूँ। हे प्रिय! आप कौन हैं? मुझे बतायें; आप भाग्यवान् प्रतीत होते हैं॥ ५०-५१ १/२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 C

| ७०८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३२ |
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राजोवाचराजा बोले—
सुरथो नाम राजाहं दस्युभिः पीडितोऽभवम्॥ ५२<br><br>प्राप्तोऽस्मि गतराज्यॊऽत्र मन्त्रिभिः परिवञ्चितः।<br>दिष्ट्या त्वमत्र मित्रं मे मिलितोऽसि विशोत्तम॥ ५३<br><br>सुखेन विहरिष्यावो वनेऽत्र शुभपादपे।<br>शोकं त्यज महाबुद्धे स्वस्थो भव विशोत्तम॥ ५४<br>( अत्रैव च यथाकामं सुखं तिष्ठ मया सह।)मैं सुरथ नामका राजा हूँ, मैं दस्युओंसे पीड़ित हूँ। मन्त्रियोंके द्वारा ठगे जानेके कारण राज्यविहीन होकर मैं यहाँ आया हूँ। हे वैश्यश्रेष्ठ! भाग्यवश आप मुझे यहाँ मित्रके रूपमें मिल गये हैं। अब हम दोनों सुन्दर वृक्षोंसे युक्त इस वनमें विहार करेंगे। हे महाबुद्धिमान् वैश्यश्रेष्ठ! चिन्ता छोड़िये और प्रसन्नचित्त होइये (अब आप मेरे साथ यहींपर इच्छानुसार सुखपूर्वक रहिये)॥ ५२—५४॥
वैश्य उवाच<br>कुटुम्बं मे निरालम्बं मया हीनं सुदुःखितम्।<br>भविष्यति च चिन्तार्तं व्याधिशोकोपतापितम्॥ ५५वैश्य बोला—मेरा परिवार आश्रयरहित है, मेरे बिना परिवारके लोग अत्यन्त दुःखी होंगे। मेरे बारेमें चिन्ता करते हुए वे रोग तथा शोकसे व्याकुल हो जायँगे॥ ५५॥
भार्यादेहे सुखं नो वा पुत्रदेहे न वा सुखम्।<br>इति चिन्तातुरं चेतो न मे शाम्यति भूमिप॥ ५६हे राजन्! मेरी पत्नी तथा पुत्र शारीरिक सुख पा रहे होंगे अथवा नहीं, इसी चिन्तासे व्याकुल रहनेके कारण मेरा मन शान्त नहीं रह पाता॥ ५६॥
कदा द्रक्ष्ये सुतं भार्यां गृहं स्वजनमेव च।<br>स्वस्थं न मन्मनो राजन् गृहचिन्ताकुलं भृशम्॥ ५७हे राजन्! मैं पुत्र, पत्नी, घर और स्वजनोंको कब देख सकूँगा? गृहकी चिन्तासे अत्यन्त व्याकुल मेरा मन स्वस्थ नहीं हो पाता है॥ ५७॥
राजोवाच<br>यैर्निरस्तोऽसि पुत्राद्यैरसद्वृत्तैः सुबालिशैः।<br>तान्दृष्ट्वा किं सुखं तेऽद्य भविष्यति महामते॥ ५८<br><br>हितकारी वरः शत्रुदुर्दुःखदाः सुहृदः कुतः।<br>तस्मात्स्थिरं मनः कृत्वा विहरस्व मया सह॥ ५९राजा बोले—हे महामते! जिन दुराचारी तथा महामूर्ख पुत्र आदिके द्वारा आप घरसे निकाल दिये गये, उन्हें देखकर अब आपको कौन-सा सुख मिलेगा? दुःख देनेवाले सुहृदोंकी अपेक्षा सुख देनेवाला शत्रु श्रेष्ठ है; अतः अपने मनको स्थिर करके आप मेरे साथ आनन्द कीजिये॥ ५८-५९॥
वैश्य उवाच<br>मनो मे न स्थिरं राजन् भवत्यद्य सुदुःखितम्।<br>चिन्तयात्र कुटुम्बस्य दुस्त्यजस्य दुरात्मभिः॥ ६०वैश्य बोला—हे राजन्! दुर्जनोंके द्वारा भी अत्यन्त कठिनतासे त्यागे जानेवाले कुटुम्बकी चिन्तासे अत्यन्त दुःखित मेरा मन इस समय स्थिर नहीं हो पा रहा है॥ ६०॥
राजोवाच<br>ममापि राज्यजं दुःखं दुनोति किल मानसम्।<br>पृच्छावोऽद्य मुनिं शान्तं शोकनाशनमौषधम्॥ ६१राजा बोले—राज्यसम्बन्धी चिन्ता मेरे मनको भी दुःखी करती रहती है। अतः अब हम दोनों शान्त प्रकृतिवाले मुनिसे शोकके नाशकी औषधि पूछें॥ ६१॥
व्यास उवाच<br>इति कृत्वा मतिं तौ तु राजा वैश्यश्च जग्मतुः।<br>मुनिं तौ विनयोपेतौ प्रष्टुं शोकस्य कारणम्॥ ६२व्यासजी बोले—ऐसा विचार करके राजा और वैश्य—दोनों ही अत्यन्त विनम्र होकर शोकका कारण पूछनेके लिये मुनिके पास गये॥ ६२॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—23 D