देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३
अ० ३०] पञ्चम स्कन्ध ६९३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तां वीक्ष्य विपुलापाङ्गीं त्रैलोक्यवरसुन्दरीम्।<br>सुरक्तनयनां रम्यां क्रोधरक्तेक्षणां तथा॥ १९<br>विवाहेच्छां परित्यज्य जयाशां दूरतस्तथा।<br>मरणे निश्चयं कृत्वा तस्थावाहितकार्मुकः॥ २० | [स्वभावतः] लाल नेत्रोंवाली, किंतु उस समय कोपके कारण अतिरक्त नयनोंवाली, तीनों लोकोंमें परम सुन्दरी तथा विशाल नेत्रप्रान्तोंवाली उन मनोहर भगवतीको देखकर विजयकी आशा तथा विवाहकी अभिलाषाका दूरसे ही परित्याग करके वह दानव अब अपने मरणका निश्चय-कर हाथमें धनुष लिये हुए खड़ा ही रह गया॥ १९-२०॥ |
| तं तथा दानवं देवी स्मितपूर्वमिदं वचः।<br>बभाषे शृण्वतां तेषां दैत्यानां रणमस्तके॥ २१<br>गच्छध्वं पामरा यूयं पातालं वा जलार्णवम्।<br>जीविताशां स्थिरां कृत्वा त्यक्त्वात्रैवायुधानि च॥ २२<br>अथवा मच्छराघातहतप्राणा रणाजिरे।<br>प्राप्य स्वर्गसुखं सर्वे क्रीडन्तु विगतज्वराः॥ २३<br>कातरत्वं च शूरत्वं न भवत्येव सर्वथा।<br>ददाम्यभयदानं वै यान्तु सर्वे यथासुखम्॥ २४ | तब भगवतीने युद्धस्थलमें उपस्थित उन सभी दानवोंको सुनाते हुए मुसकराकर उस दैत्यसे यह वचन कहा—हे नीच दानवो! यदि तुम सब जीवित रहनेकी इच्छा रखते हो तो अपने आयुध यहीं छोड़कर पाताललोक या समुद्रमें चले जाओ अथवा तुमलोग समरांगणमें मेरे बाणोंके प्रहारसे निष्प्राण होकर स्वर्गमें सुख प्राप्तकर वहाँ निर्भय होकर विहार करो। कायरता तथा पराक्रम दोनोंका एक साथ रह पाना सम्भव नहीं है। मैं तुम सबको अभयदान देती हूँ; तुम सब सुखपूर्वक चले जाओ॥ २१-२४॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्याकर्ण्य वचस्तस्या निशुम्भो मदगर्वितः।<br>निशितं खड्गमादाय चर्म चैवाष्टचन्द्रकम्॥ २५<br>धावमानस्तु तरसासिना सिंहं मदोत्कटम्।<br>जघानातिबलामूर्ध्नि भ्रामयञ्जगदम्बिकाम्॥ २६ | व्यासजी बोले— उन भगवतीका वचन सुनकर मदोन्मत्त निशुम्भ तीक्ष्ण खड्ग तथा अष्टचन्द्र नामक ढाल लेकर बड़े वेगसे दौड़ा और उसने बलपूर्वक अपने खड्गसे मतवाले सिंहके मस्तकपर प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने तलवार घुमाकर जगदम्बापर भी प्रहार किया॥ २५-२६॥ |
| ततो देवी स्वगदया वञ्चयित्वासिपातनम्।<br>ताडयामास तं बाहोर्मूले परशुना तदा॥ २७ | तब भगवतीने अपनी गदासे उसके तलवारके प्रहारको रोककर अपने परशुसे उसके बाहुमूल (कन्धे)-पर आघात किया॥ २७॥ |
| खड्गेन निहतः सोऽपि बाहुमूले महामदः।<br>संस्तभ्य वेदनां भूयो जघान चण्डिकां तदा॥ २८ | अपने कन्धेपर खड्गसे प्रहार होनेपर भी उस महाभिमानी अहंकारी निशुम्भने उस आघातकी वेदना सहकर भगवती चण्डिकापर पुनः प्रहार किया॥ २८॥ |
| सापि घण्टास्वनं घोरं चकार भयदं नृणाम्।<br>पपौ पुनः पुनः पानं निशुम्भं हन्तुमिच्छती॥ २९ | तत्पश्चात् भगवती चण्डिकाने भी प्राणियोंको भयभीत कर देनेवाली भीषण घण्टाध्वनि की और निशुम्भको मारनेकी इच्छा प्रकट करती हुई उन्होंने बार-बार मधुपान किया॥ २९॥ |
| एवं परस्परं युद्धं बभूवातिभयप्रदम्।<br>देवानां दानवानाञ्च परस्परजयैषिणाम्॥ ३० | इस प्रकार एक-दूसरेको जीतनेकी प्रबल इच्छावाले देवताओं तथा दानवोंमें परस्पर अत्यन्त भयंकर युद्ध आरम्भ हो गया॥ ३०॥ |
| ६९४ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| संस्कृत मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पलादाः पक्षिणः क्रूराः सारमेयाश्च जम्बुकाः ।<br>ननृतुश्चातिसन्तुष्टा गृध्राः कङ्काश्च वायसाः ॥ ३१ | मांसाहारी क्रूर पक्षी, कुत्ते, सियार, गीध, कंक तथा कौए अति प्रसन्न होकर नृत्य करने लगे ॥ ३१ ॥ |
| रणभूर्भाति भूयिष्ठपतितासुरवर्ष्मकैः ।<br>रुधिरस्रावसंयुक्तैर्गजाश्वदेहसंकुला ॥ ३२ | उस समय बहुत-से गिरे हुए दैत्योंके रक्त बहते हुए शरीरोंसे तथा हाथियों और घोड़ोंके देहसे पटी हुई वह रणभूमि अत्यधिक [ भयानक ] प्रतीत हो रही थी ॥ ३२ ॥ |
| पतितान्दानवान्दृष्ट्वा निशुम्भोऽतिरुषान्वितः ।<br>प्रययौ चण्डिकां तूर्णं गदामादाय दारुणाम् ॥ ३३ | [ भूमिपर ] गिरे हुए दानवोंको देखकर निशुम्भ अत्यन्त कुपित हो उठा और एक भयंकर गदा लेकर शीघ्रतापूर्वक भगवतीके समक्ष पहुँच गया ॥ ३३ ॥ |
| सिंहं जघान गदया मस्तके मदगर्वितः ।<br>प्रहृत्य च स्मितं कृत्वा पुनर्देवीमताडयत् ॥ ३४ | अभिमानमें चूर उस निशुम्भने सिंहके मस्तकपर गदासे प्रहार किया। तत्पश्चात् उसने मुसकराकर पुनः देवीपर प्रहार करके उन्हें चोट पहुँचायी ॥ ३४ ॥ |
| सापि तं कुपितातीव निशुम्भं पुरतः स्थितम् ।<br>प्रहरन्तं समीक्ष्याथ देवी वचनमब्रवीत् ॥ ३५ | इससे वे भगवती भी अत्यन्त कुपित हो गयीं और समक्ष स्थित होकर प्रहार कर रहे उस निशुम्भको देखकर कहने लगीं— ॥ ३५ ॥ |
| देव्युवाच<br>तिष्ठ मन्दमते तावद्यावत्खड्गमिदं तव ।<br>ग्रीवायां प्रेरयाम्यस्माद् गन्तासि यमसादनम् ॥ ३६ | **देवी बोलीं—**हे मन्दबुद्धि! मैं तलवार चला रही हूँ। तुम तबतकके लिये ठहर जाओ, जबतक मेरी यह तलवार तुम्हारी गर्दनतक नहीं पहुँच जाती। इसके बाद तुम यमपुरी निश्चय ही पहुँच जाओगे ॥ ३६ ॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्त्वा तरसा देवी कृपाणेन समाहिता ।<br>चिच्छेद मस्तकं तस्य निशुम्भस्याथ चण्डिका ॥ ३७ | **व्यासजी बोले—**ऐसा कहकर भगवती चण्डिकाने एकाग्रचित्त होकर बड़ी शीघ्रतासे अपने कृपाणसे उस निशुम्भका मस्तक काट दिया ॥ ३७ ॥ |
| सच्छिन्नमस्तको देव्या कबन्धोऽतीव दारुणः ।<br>बभ्राम च गदापाणिस्त्रासयन्देवतागणान् ॥ ३८ | इस प्रकार भगवतीके द्वारा सिर कटा हुआ अत्यन्त विकराल वह धड़ हाथमें गदा धारण किये देवगणोंको भयभीत करता हुआ इधर-उधर घूमने लगा ॥ ३८ ॥ |
| देवी तस्य शितैर्बाणैश्चिच्छेद चरणौ करौ ।<br>पपातोर्व्यां ततः पापी गतासुः पर्वतोपमः ॥ ३९ | तत्पश्चात् भगवतीने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके दोनों हाथ तथा पैर भी काट दिये। इसके बाद पर्वतके समान शरीरवाला वह पापी दैत्य प्राणहीन होकर धरतीपर गिर पड़ा ॥ ३९ ॥ |
| तस्मिन्निपतिते दैत्ये निशुम्भे भीमविक्रमे ।<br>हाहाकारो महानासीत्तत्सैन्ये भयकम्पिते ॥ ४०<br><br>त्यक्त्वायुधानि सर्वाणि सैनिकाः क्षतजाप्लुताः ।<br>जग्मुर्बुम्बारवं सर्वे कुर्वाणा राजमन्दिरम् ॥ ४१ | प्रचण्ड पराक्रमवाले उस निशुम्भ दैत्यके गिर जानेपर भयसे कम्पित दानवसेनामें महान् हाहाकार मच गया। रक्तसे लथपथ समस्त दानवसैनिक अपने-अपने सभी आयुध फेंककर चीख-पुकार करते हुए राजभवनकी ओर भाग गये ॥ ४०-४१ ॥ |
| तानागतान्सम्प्रेक्ष्य शुम्भः शत्रुनिषूदनः ।<br>पप्रच्छ क्व निशुम्भोऽसौ कथं भग्नाः पलायिताः ॥ ४२ | शत्रुओंके संहारकी शक्ति रखनेवाले शुम्भने वहाँ आये हुए उन सैनिकोंको देखकर उनसे पूछा—निशुम्भ कहाँ है और घायल होकर तुम सब युद्धभूमिसे भाग क्यों आये ? ॥ ४२ ॥ |
| अ० ३० ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१५ |
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| तच्छ्रुत्वा वचनं राजंस्ते प्रोचुः प्रणता भृशम्।<br>राजंस्ते निहतो भ्राता शेते समरमूूर्धनि॥ ४३ | दानवराज शुम्भका वह वचन सुनकर उन सैनिकोंने अति विनम्रतापूर्वक कहा—हे राजन्! आपके भाई निशुम्भ मृत होकर रणभूमिमें सोये पड़े हैं॥ ४३॥ |
| तया निपातिताः शूरा ये च तेऽप्यनुजानुगाः।<br>वयं त्वां कथितुं सर्वं वृत्तान्तं समुपागताः॥ ४४ | उस स्त्रीने आपके अनुज (निशुम्भ)-के जो भी अनुचर दानववीर थे, उन्हें मार डाला। यही सब समाचार आपको बतानेके लिये हम यहाँ आये हुए हैं॥ ४४॥ |
| निशुम्भो निहतस्तत्र तया चण्डिकयाधुना।<br>न हि युद्धस्य कालोऽद्य तव राजन् रणाङ्गणे॥ ४५ | उस चण्डिकाने इसी समय युद्धभूमिमें निशुम्भका संहार किया है। अतएव हे राजन्! उसके साथ समरभूमिमें आपके लिये आज युद्ध करनेका [उचित] अवसर नहीं है॥ ४५॥ |
| देवकार्यं समुद्दिश्य कापीय परमाङ्गना।<br>हन्तुं दैत्यकुलं नूनं प्राप्तेति परिचिन्तय॥ ४६ | आप यह निश्चितरूपसे जान लीजिये कि देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके उद्देश्यसे दानवकुलका संहार करनेके लिये यह कोई अद्भुत देवी प्रकट हुई है॥ ४६॥ |
| नैषा प्राकृतयोषैव देवी शक्तिरनुत्तमा।<br>अचिन्त्यचरिता क्वापि दुर्ज्ञेया दैवतैरपि॥ ४७ | यह सामान्य नारी नहीं है, अपितु देवीरूपिणी कोई अत्युत्तम शक्ति है। अद्भुत चरित्रोंवाली ये देवी देवताओंके भी ज्ञानसे परे हैं॥ ४७॥ |
| नानारूपधरातीय मायामूलविशारदा।<br>विचित्रभूषणा देवी सर्वायुधधरा शुभा॥ ४८ | ये कल्याणी भगवती अनेक रूप धारण करनेमें समर्थ हैं, मायाके मूल तत्त्वका पूर्ण ज्ञान रखनेवाली हैं और अद्भुत भूषण तथा समस्त प्रकारके आयुध धारण करनेवाली हैं॥ ४८॥ |
| गहना गूढचरिता कालरात्रिरिवापरा।<br>अपारपारगा पूर्णा सर्वलक्षणसंयुता॥ ४९ | गूढ़ चरित्रोंवाली इन देवीको जान पाना अत्यन्त कठिन है। ये दूसरी कालरात्रिके समान प्रतीत होती हैं। असीमके भी पार जा सकनेमें समर्थ ये पूर्णतामयी देवी सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न हैं॥ ४९॥ |
| अन्तरिक्षस्थिता देवास्तां स्तुवन्त्यकुतोभयाः।<br>देवकार्यञ्च कुर्वाणां श्रीदेवीं परमाद्भुताम्॥ ५० | समस्त देवतागण अन्तरिक्षमें स्थित होकर देवकार्य सिद्ध करनेवाली परम अद्भुतस्वरूपिणी उन देवीका निर्भीकतापूर्वक स्तवन कर रहे हैं॥ ५०॥ |
| पलायनं परो धर्मः सर्वथा देहरक्षणम्।<br>रक्षिते किल देहेस्मिन्कालेऽस्मत्सुखताङ्गते॥ ५१ | यदि आप शरीरकी रक्षा करना चाहते हैं तो इस समय पलायन ही परम धर्म है। इस शरीरकी रक्षा हो जानेके बाद पुनः आनन्ददायक अनुकूल समय आनेपर संग्राममें आपकी विजय होगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है। |
| संग्रामे विजयो राजन् भविता ते न संशयः।<br>कालः करोति बलिनं समये निर्बलं क्वचित्॥ ५२ | हे राजन्! कभी-कभी काल बलवान्को भी बलहीन बना देता है और पुनः समय आनेपर उसे बलशाली बनाकर विजयकी प्राप्ति |
| ६९६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३० |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तं पुनः सबलं कृत्वा जायायोपदधाति हि।<br>दातारं याचकं कालः करोति समये क्वचित्॥ ५३<br><br>भिक्षुकं धनदातारं करोति समयान्तरे। | करा देता है। कभी-कभी काल विषम परिस्थितिमें दाताको भिखारी बना देता है और पुनः कुछ समय बीतनेपर उसी भिखारीको धन देनेवाला बना देता है॥ ५१–५३ १/२ ॥ |
| विष्णुः कालवशे नूनं ब्रह्मा वा पार्वतीपतिः॥ ५४<br><br>इन्द्राद्या निर्जराः सर्वे काल एव प्रभुः स्वयम्।<br>तस्मात्कालं प्रतीक्षस्व विपरीतं तवाधुना॥ ५५ | विष्णु, ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र आदि सभी देवता निश्चितरूपसे सदा कालके वशवर्ती हैं। यह काल स्वयं ही सबका स्वामी है। हे राजन्! अभी काल आपके लिये विपरीत है, अतएव आप समयकी प्रतीक्षा कीजिये॥ ५४–५५॥ |
| सम्मुखो देवतानाञ्च दैत्यानां नाशहेतुकः।<br>एकैव च गतिर्नास्ति कालस्य किल भूपते॥ ५६<br><br>नानारूपधराप्यस्ति ज्ञातव्यं तस्य चेष्टितम्।<br>कदाचित्सम्भवो नृणां कदाचित्प्रलयस्तथा॥ ५७<br><br>उत्पत्तिहेतुः कालोऽन्यः क्षयहेतुस्तथापरः। | हे पृथ्वीपते! इस समय काल देवताओंके लिये अनुकूल तथा दैत्योंके लिये विनाशकारी है। कालकी गति सर्वथा एक ही तरहकी नहीं बनी रहती है। यह काल-गति नानाविध रूप भी धारण करती है। अतः कालकी चेष्टापर विचार करते रहना चाहिये। कभी प्राणियोंका जन्म होता है और कभी उनका मरण उपस्थित हो जाता है। एक काल उत्पत्तिका हेतु होता है तो दूसरा काल विनाशका हेतु बन जाता है॥ ५६–५७ १/२ ॥ |
| प्रत्यक्षं ते महाराज देवाः सर्वे सवासवाः॥ ५८<br><br>करदास्ते कृताः पूर्वं कालेन सम्मुखेन च।<br>तेनैव विमुखेनाद्य बलिनोऽबलयासुराः॥ ५९<br><br>निहता नितरां कालः करोति च शुभाशुभम्।<br>नैवात्र कारणं काली नैव देवाः सनातनाः॥ ६० | हे महाराज! आपके समक्ष इसका प्रमाण विद्यमान है कि पहले इन्द्र आदि सभी देवता आपके लिये अनुकूल समय रहनेपर आपके करदाता बन गये थे, किंतु आज उसी कालके विपरीत हो जानेके कारण एक अबलाने बलशाली असुरोंका संहार कर डाला। यही काल हित भी करता है तथा अहित भी करता है। इस पराजयमें न तो काली कारण हैं और न तो सनातन देवता ही कारण हैं॥ ५८–६०॥ |
| यथा ते रोचते राजंस्तथा कुरु विमृश्य च।<br>कालोऽयं नात्र हेतुस्ते दानवानां तथा पुनः॥ ६१ | हे राजन्! आपको जैसा उचित जान पड़े भलीभाँति सोच-समझकर आप वैसा ही कीजिये। हमारी समझमें तो यह काल अभी आपके तथा अन्य दानवोंके लिये भी अनुकूल नहीं है॥ ६१॥ |
| त्वदग्रतो गतः शक्रो भग्नः संख्ये निरायुधः।<br>तथा विष्णुस्तथा रुद्रो वरुणो धनदो यमः॥ ६२<br><br>तथा त्वमपि राजेन्द्र वीक्ष्य कालवशं जगत्।<br>पातालं गच्छ तरसा जीवन्भद्रमवाप्स्यसि॥ ६३ | किसी समय संग्राममें घायल होकर तथा अपने आयुध छोड़कर इन्द्र आपके सामनेसे भाग गये थे। ऐसे ही विष्णु, रुद्र, वरुण, कुबेर, यम आदि देवता भी आपके समक्ष टिक नहीं पाये थे। अतः हे राजेन्द्र! इस समस्त जगत्को कालके अधीन मानकर आप भी तत्काल पाताललोक चले जाइये; जीवन बचा रहा तो आप कल्याण अवश्य प्राप्त करेंगे॥ ६२–६३॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६१७ |
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| मृते त्वयि महाराज शत्रवस्ते मुदान्विताः ।<br>मङ्गलानि प्रगायन्तो विचरिष्यन्ति सर्वतः ॥ ६४ | हे महाराज ! यदि कहीं आपका निधन हो गया तो आपके शत्रु प्रसन्नतापूर्वक मंगलगान करते हुए निर्भय होकर सर्वत्र विचरण करेंगे ॥ ६४ ॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे युद्धात्प्रत्यागतानां रक्षसां शुम्भाय वार्तावर्णनं नाम त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
अथैकत्रिंशोऽध्यायः
शुम्भका रणभूमिमें आना और देवीसे वार्तालाप करना, भगवती कालिकाद्वारा उसका वध, देवीके इस उत्तम चरित्रके पठन और श्रवणका फल
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| व्यास उवाच<br>इति तेषां वचः श्रुत्वा शुम्भो दैत्यपतिस्तथा।<br>उवाच सैनिकानाशु कोपाकुलितलोचनः ॥ १ | व्यासजी बोले—उन सैनिकोंका यह वचन सुनकर क्रोधसे आकुलित नेत्रोंवाले दानवराज शुम्भने उनसे तुरन्त कहा ॥ १ ॥ |
| शुम्भ उवाच<br>जाल्माः किं ब्रूत दुर्वाच्यं कृत्वा जीवितमुत्सहे।<br>निहत्य सचिवान्भ्रातृन्निर्लज्जो विचरामि किम्॥ २ | शुम्भ बोला—हे मूर्खों! तुम सब खोटी बात क्यों बोल रहे हो? तुम्हारे वचनोंको मानकर मैं भला अपने जीवनकी रक्षा क्यों करूँ? क्या अपने सचिवों तथा भाई-बन्धुओंका वध कराकर मैं निर्लज्ज बनकर विचरण करूँ? ॥ २ ॥ |
| कालः कर्ता शुभानां वाशुभानां बलवत्तरः।<br>का चिन्ता मम दुर्वारे तस्मिन्नीशेऽप्यरूपके ॥ ३ | प्राणियोंके शुभ अथवा अशुभका कर्ता जब एकमात्र वही अति बलवान् काल है तो मुझे चिन्ता क्या? क्योंकि परोक्षरूपसे सबपर शासन करनेवाला वह काल टाला नहीं जा सकता ॥ ३ ॥ |
| यद्भवति तद्भवतु यत्करोति करोतु तत्।<br>न मे चिन्तास्ति कुत्रापि मरणाजीवनात्तथा ॥ ४ | जो हो रहा है, वह होता रहे तथा काल जो कुछ भी कर रहा है, उसे करता रहे; अब तो मुझे जीवन तथा मृत्युके विषयमें किसी भी प्रकारकी चिन्ता नहीं है ॥ ४ ॥ |
| स कालोऽप्यन्यथाकर्तुं भावितो नेशते क्वचित्।<br>न वर्षति च पर्जन्यः श्रावणे मासि सर्वथा ॥ ५<br><br>कदाचिन्मार्गशीर्षे वा पौषे माघेऽथ फाल्गुने।<br>अकाले वर्षतीवाशु तस्मान्मुख्यो न चास्त्ययम्॥ ६ | वह काल भी भवितव्यताको मिटा सकनेमें समर्थ नहीं है। ऐसा भी होता है कि सावनके महीनेमें मेघ सदा नहीं बरसते; अपितु कभी-कभी अगहन, पौष, माघ तथा फाल्गुनमें असमय ही तेज वृष्टि होने लगती है। अतएव [समस्त कार्योंमें] काल ही प्रधान नहीं है ॥ ५-६ ॥ |
| कालो निमित्तमात्रं तु दैवं हि बलवत्तरम्।<br>दैवेन निर्मितं सर्वं नान्यथा भवतीत्यदः ॥ ७ | काल तो निमित्तमात्र है, अपितु [इसकी तुलनामें] दैव अधिक बलवान् है। सब कुछ देवनिर्मित है; इसके विपरीत कुछ नहीं होता ॥ ७ ॥ |
| दैवमेव परं मन्ये धिक्पौरुषमनर्थकम्।<br>जेता यः सर्वदेवानां निशुम्भोऽप्यनया हतः ॥ ८ | मैं तो दैवको ही प्रधान मानता हूँ। अनर्थकारी पुरुषार्थको धिक्कार है; क्योंकि जिस निशुम्भने सभी देवताओंपर विजय प्राप्त कर ली थी, उसे इस स्त्रीने मार डाला ॥ ८ ॥ |
| ६९८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| रक्तबीजो महाशूरः सोऽपि नाशं गतो यदा।<br>तदाहं कीर्तिमुत्सृज्य जीविताशां करोमि किम्॥ ९ | जब महान् शूरवीर रक्तबीज भी विनाशको प्राप्त हो गया, तब अपनी कीर्तिको कलंकित करके मैं ही जीवनकी आशा क्यों करूँ?॥ ९॥ |
| प्राप्ते काले स्वयं ब्रह्मा परार्धद्वयसम्मिते।<br>निधनं याति तरसा जगत्कर्ता स्वयं प्रभुः॥ १० | जगत्के रचयिता सर्वसमर्थ स्वयं ब्रह्मा भी दो परार्धका समय बीत जानेपर तत्क्षण ही निधनको प्राप्त हो जाते हैं॥ १०॥ |
| चतुर्युगसहस्रं तु ब्रह्मणो दिवसे किल।<br>पतन्ति भवनात्पञ्च नव चेन्द्रास्तथा पुनः॥ ११ | ब्रह्माजीके एक दिनमें एक हजार चतुर्युग समाप्त हो जाते हैं और इतनी ही अवधिमें चौदह इन्द्रोंका स्वर्गसे पतन हो चुकता है॥ ११॥ |
| तथैव द्विगुणे विष्णुर्मरणायोपकल्पते।<br>तथैव द्विगुणे काले शङ्करः शान्तिमेति च॥ १२ | इसी प्रकार [ब्रह्माजीके जीवनकालका] दुगुना समय बीतनेपर विष्णुका अन्त हो जाता है तथा इससे भी दूने समयके पश्चात् शंकर भी समाप्त हो जाते हैं॥ १२॥ |
| का चिन्ता मरणे मूढा निश्चले दैवनिर्मिते।<br>मही महीधराणाञ्च नाशः सूर्यशशाङ्कयोः॥ १३ | इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, सूर्य तथा चन्द्रमा आदिका भी विनाश हो जाता है, तब हे मूर्खो! दैवकी बनायी हुई इस अटल मृत्युके विषयमें क्या चिन्ता है?॥ १३॥ |
| जातस्य हि ध्रुवं मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।<br>अध्रुवेऽस्मिञ्छरीरे तु रक्षणीयं यशः स्थिरम्॥ १४ | जन्म लेनेवालेकी मृत्यु निश्चित है तथा मरनेवालेका जन्म निश्चित है। अतः इस अनित्य शरीरके द्वारा अपनी स्थिर कीर्तिकी रक्षा करनी चाहिये॥ १४॥ |
| रथो मे कल्प्यतां शीघ्रं गमिष्यामि रणाजिरे।<br>जयो वा मरणं वापि भवत्वद्यैव दैवतः॥ १५ | शीघ्रतापूर्वक मेरा रथ तैयार करो। मैं समरांगणमें जाऊँगा। विजय अथवा मरण प्रारब्धानुसार जो भी होनेवाला हो, वह आज ही हो जाय॥ १५॥ |
| इत्युक्त्वा सैनिकाञ्छुम्भो रथमास्थाय सत्वरः।<br>प्रययावम्बिका यत्र संस्थिता तु हिमाचले॥ १६ | सैनिकोंसे ऐसा कहकर वह शुम्भ तुरंत रथपर सवार होकर हिमालयकी ओर चल दिया, जहाँ भगवती विराजमान थीं॥ १६॥ |
| सैन्यं प्रचलितं तस्य सङ्गे तत्र चतुर्विधम्।<br>हस्त्यश्वरथपादातिसंयुक्तं सायुधं बहु॥ १७ | उस समय हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल चलने-वालोंसे सुसज्जित एवं नानाविध आयुधोंसे युक्त विशाल चतुरंगिणी सेना भी उसके साथ चल पड़ी॥ १७॥ |
| तत्र गत्वाचले शुम्भः संस्थितां जगदम्बिकाम्।<br>त्रैलोक्यमोहिनीं कान्तामपश्यत्सिंहवाहिनीम्॥ १८<br><br>सर्वाभरणभूषाढ्यां सर्वलक्षणसंवृताम्।<br>स्तूयमानां सुरैः खस्थैर्गन्धर्वयक्षकिन्नरैः॥ १९<br><br>पुष्पैश्च पूज्यमानाञ्च मन्दारपादपोद्भवैः।<br>कुर्वाणां शङ्खनिनदं घण्टानादं मनोहरम्॥ २० | उस पर्वतपर पहुँचकर शुम्भने त्रिभुवनको मोहित करनेवाली परम सुन्दरी सिंहवाहिनी भगवती जगदम्बिकाको वहाँ विराजमान देखा। वे सभी प्रकारके आभूषणोंसे अलंकृत थीं तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं; देवता, यक्ष तथा किन्नर आकाशमें स्थित होकर उनकी स्तुति कर रहे थे तथा मन्दारवृक्षके पुष्पोंसे पूजा कर रहे थे और वे मनोहर शंखध्वनि तथा घंटानाद कर रही थीं॥ १८-२०॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ६९९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| दृष्ट्वा तां मोहमगमच्छुम्भः कामविमोहितः।<br>पञ्चबाणाहतः कामं मनसा समचिन्तयत्॥ २१ | उन्हें देखकर शुम्भ मोहित हो गया। कामबाणसे आहत वह शुम्भ कामासक्त होकर मन-ही-मन सोचने लगा— ॥ २१ ॥ |
| अहो रूपमिदं सम्यगहो चातुर्यमद्भुतम्।<br>सौकुमार्यञ्च धैर्यञ्च परस्परविरोधि यत्॥ २२ | अहो, इसका ऐसा आकर्षक रूप तथा ऐसा अद्भुत चातुर्य है। सुकुमारता तथा धीरता—ये दोनों परस्पर विरोधीभाव इसमें एक साथ विद्यमान हैं!॥ २२॥ |
| सुकुमारातिन्वङ्गी सद्यः प्रकटयौवना।<br>चित्रमेतदसौ बाला कामभावविवर्जिता॥ २३ | अत्यन्त कृश शरीरवाली इस सुकुमारीमें अभी-अभी यौवन प्रस्फुटित हुआ है, किंतु आश्चर्य है कि यह रमणी कामभावनासे रहित है॥ २३॥ |
| कामकान्तासमा रूपे सर्वलक्षणलक्षिता।<br>अम्बिकेयं किमेतत्तु हन्ति सर्वान्महाबलान्॥ २४ | रूपमें कामदेवकी पत्नी रतिके समान सुन्दर तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न यह स्त्री कहीं अम्बिका ही तो नहीं, जो सभी महाबली दानवोंका संहार कर रही है॥ २४॥ |
| उपायः कोऽत्र कर्तव्यो येन मे वशगा भवेत्।<br>न मन्त्रा वा मरालाक्षीसाधने सन्निधौ मम॥ २५ | इस अवसरपर मैं कौन-सा उपाय करूँ, जिससे यह मेरी वशवर्तिनी हो जाय? इस हंस-सदृश नेत्रोंवालीको वशमें करनेहेतु मेरे पास कोई मन्त्र भी नहीं है॥ २५॥ |
| सर्वमन्त्रमयी ह्येषा मोहिनी मदगर्विता।<br>सुन्दरीयं कथं मे स्याद्वशगा वरवर्णिनी॥ २६ | सर्वमन्त्रमयी, सबको मोहित करनेवाली, अभिमानमें मत्त रहनेवाली तथा उत्तम लक्षणोंवाली यह सुन्दरी किस प्रकार मेरे वशमें होगी?॥ २६॥ |
| पातालगमनं मेऽद्य न युक्तं समराङ्गणात्।<br>सामदानविभेदैश्च नेयं साध्या महाबला॥ २७ | अब युद्धभूमि छोड़कर पाताललोक जाना भी मेरे लिये उचित नहीं है। साम, दान तथा भेद आदि उपायोंसे भी यह महाबलशालिनी वशमें नहीं की जा सकती॥ २७॥ |
| किं कर्तव्यं क्व गन्तव्यं विषमे समुपस्थिते।<br>मरणं नोत्तमं चात्र स्त्रीकृतं तु यशोऽपहृत्॥ २८ | इस विषम परिस्थितिके आ जानेपर अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? स्त्रीके हाथों मर जाना भी उचित नहीं है; क्योंकि ऐसी मृत्यु यशको नष्ट करनेवाली होती है॥ २८॥ |
| मरणमृषिभिः प्रोक्तं सङ्गरे मङ्गलास्पदम्।<br>यत्तत्समानबलयोर्योधयोर्युध्यतोः किल॥ २९ | ऋषियोंने उस मृत्युको श्रेयस्कर कहा है, जो समरभूमिमें समान बलवाले योद्धाओंके साथ लड़ते-लड़ते प्राप्त हो॥ २९॥ |
| प्राप्तेयं दैवरचिता नारी नरशतोत्तमा।<br>नाशायास्मत्कुलस्येह सर्वथातिबलाबला॥ ३० | सैकड़ों वीरोंसे श्रेष्ठ, महाबलशालिनी तथा दैव-विरचित यह नारी मेरे कुलके पूर्ण विनाशके लिये यहाँ उपस्थित हुई है॥ ३०॥ |
| वृथा किं सामवाक्यानि मया योज्यानि साम्प्रतम्।<br>हननायागता ह्येषा किं नु साम्ना प्रसीदति॥ ३१ | मैं इस समय सामनीतिसे युक्त वचनोंका प्रयोग व्यर्थमें क्यों करूँ? क्योंकि यह तो संहारके लिये आयी हुई है, तो फिर सामवचनोंसे यह कैसे |
| ७०० | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| न दानैश्चालितुं योग्या नानाशस्त्रविभूषिता।<br>भेदस्तु विफलः कामं सर्वदेववशानुगा॥ ३२<br><br>तस्मात्तु मरणं श्रेयो न संग्रामे पलायनम्।<br>जयो वा मरणं वाद्य भवत्वेव यथाविधि॥ ३३ | प्रसन्न हो सकती है? अनेक प्रकारके शस्त्रोंसे विभूषित होनेके कारण दान आदिके प्रलोभनोंसे भी यह विचलित नहीं की जा सकती। भेदनीति भी निष्फल सिद्ध होगी; क्योंकि सभी देवता इसके वशमें हैं॥ ३१-३२॥<br>अतएव संग्राममें मर जाना श्रेयस्कर है, किंतु पलायन करना ठीक नहीं है। अब तो प्रारब्धके अनुसार विजय अथवा मृत्यु जो भी होना हो, वह हो॥ ३३॥ |
| व्यास उवाच<br>इति सञ्चिन्त्य मनसा शुम्भः सत्त्वाश्रितोऽभवत्।<br>युद्धाय सुस्थिरो भूत्वा तामुवाच पुरःस्थिताम्॥ ३४ | व्यासजी बोले— इस प्रकार अपने मनमें विचार करके शुम्भने धैर्यका सहारा लिया। अब युद्धके लिये दृढ़ निश्चय करके उसने अपने सामने खड़ी भगवतीसे कहा॥ ३४॥ |
| देवि युध्यस्व कान्तेऽद्य वृथायं ते परिश्रमः।<br>मूर्खासि किल नारीणां नायं धर्मः कदाचन॥ ३५ | हे देवि! युद्ध करो, किंतु हे प्रिये! इस समय तुम्हारा यह परिश्रम व्यर्थ है। तुम मूर्ख हो; क्योंकि युद्ध करना स्त्रियोंका धर्म कदापि नहीं है॥ ३५॥ |
| नारीणां लोचने बाणा भ्रुवावेव शरासनम्।<br>हावभावास्तु शस्त्राणि पुमाल्लक्ष्यं विचक्षणः॥ ३६ | स्त्रियोंके नेत्र ही बाण हैं, उनकी भौंहें ही धनुष हैं, उनके हाव-भाव ही शस्त्र हैं और रसज्ञ पुरुष उनका लक्ष्य है॥ ३६॥ |
| सन्नाहश्चाङ्गरागोऽत्र रथश्चापि मनोरथः।<br>मन्दप्रजल्पितं भेरीशब्दो नान्यः कदाचन॥ ३७ | अंगराग (शीतल चन्दन आदि) ही उनका कवच है, मनोकामना रथ है तथा धीरे-धीरे मधुर वाणीमें बोलना भेरी-ध्वनि है। अतएव स्त्रियोंके लिये अन्य शस्त्रोंकी कोई आवश्यकता नहीं रहती॥ ३७॥ |
| अन्यास्त्रधारणं स्त्रीणां विडम्बनमसंशयम्।<br>लज्जैव भूषणं कान्ते न च धाष्टर्यं कदाचन॥ ३८ | यदि स्त्रियाँ इनके अतिरिक्त अन्य अस्त्र धारण करें तो यह निश्चितरूपसे उनके लिये विडम्बना ही है। हे प्रिये! लज्जा ही नारियोंका आभूषण है, धृष्टता उन्हें कभी भी शोभा नहीं देती॥ ३८॥ |
| युध्यमाना वरा नारी कर्कशेवाभिदृश्यते।<br>स्तनौ सङ्गोपनीयौ वा धनुषः कर्षणे कथम्॥ ३९ | युद्ध करती हुई उत्तम नारी भी कर्कशाके सदृश दिखायी देती है। धनुष खींचते समय कोई स्त्री अपने दोनों स्तनोंको छिपानेमें कैसे सफल हो सकती है?॥ ३९॥ |
| क्व मन्दगमनं कुत्र गदामादाय धावनम्।<br>बुद्धिदा कालिका तेऽत्र चामुण्डा परनायिका॥ ४०<br><br>चण्डिका मन्त्रमध्यस्था लालनेऽसुस्वरा शिवा।<br>वाहनं मृगराडास्ते सर्वसत्त्वभयङ्करः॥ ४१ | कहाँ नारियोंकी मन्थरगति और कहाँ युद्धमें गदा लेकर दौड़ना। इस समय यह कालिका तथा दूसरी स्त्री चामुण्डा ही तुम्हें बुद्धि देनेवाली हैं। मध्यस्थ होकर चण्डिका मन्त्रणा देती है, कर्कश स्वरवाली शिवा तुम्हारी शुश्रूषामें रहती है और सभी प्राणियोंमें भयंकर सिंह तुम्हारा वाहन है॥ ४०-४१॥ |
| अ० ३१ ] | पञ्चम स्कन्ध | ७०१ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| वीणानादं परित्यज्य घण्टानादं करोषि यत्।<br>रूपयौवनयोः सर्वं विरोधि वरवर्णिनि॥ ४२ | हे सुन्दरि! वीणा-वादन छोड़कर तुम यह जो घण्टा-नाद कर रही हो, वह सब तुम्हारे रूप तथा यौवनके सर्वथा विपरीत है॥ ४२॥ |
| यदि ते सङ्गरेच्छास्ति कुरूपा भव भामिनि।<br>लम्बोष्ठी कुनखी क्रूरा ध्वांक्षवर्णा विलोचना॥ ४३<br><br>लम्बपादा कुदन्ती च मार्जारनयनाकृतिः।<br>ईदृशं रूपमास्थाय तिष्ठ युद्धे स्थिरा भव॥ ४४<br><br>कर्कशं वचनं ब्रूहि ततो युद्धं करोम्यहम्।<br>ईदृशीं सुदतीं दृष्ट्वा न मे पाणिः प्रसीदति॥ ४५<br><br>हन्तुं त्वां मृगशावाक्षि कामकान्तोपमे मृधे। | हे भामिनि! यदि युद्ध करना ही तुम्हें अभीष्ट है तो तुम सर्वप्रथम लम्बे ओठोंवाली, विचित्र नखोंवाली, क्रूर स्वभाववाली, कौए-जैसे वर्णवाली, विकृत आँखोंवाली, लम्बे पैरोंवाली, भयंकर दाँतोंवाली और बिल्लीसदृश नेत्रोंवाली कुरूप स्त्री बन जाओ। ऐसा ही विकराल रूप धारण करके तुम युद्धभूमिमें स्थिरतापूर्वक खड़ी हो जाओ और कर्कश वचन बोलो, तभी मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा; क्योंकि हे मृगशावक-सदृश नेत्रोंवाली! हे रतितुल्य सुन्दरि! सुन्दर दाँतोंवाली ऐसी रमणीको देखकर तुम्हें युद्धमें मारनेके लिये मेरा हाथ नहीं उठ पा रहा है॥ ४३—४५ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इति ब्रुवाणं कामार्तं वीक्ष्य तं जगदम्बिका॥ ४६<br><br>स्मितपूर्वमिदं वाक्यमुवाच भरतोत्तम। | व्यासजी बोले— हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ जनमेजय! उस कामातुर शुम्भको ऐसा बोलते हुए देखकर भगवती जगदम्बा मुसकराकर यह वचन कहने लगीं—॥ ४६ १/२॥ |
| देव्युवाच<br>किं विषीदसि मन्दात्मन् कामबाणविमोहितः॥ ४७<br><br>प्रेक्षिकाहं स्थिता मूढ कुरु कालिकया मृधम्।<br>चामुण्डया वा कुर्वैते तव योग्ये रणाङ्गणे॥ ४८<br><br>प्रहरस्व यथाकामं नाहं त्वां योद्धुमुत्सहे।<br>इत्युक्त्वा कालिकां प्राह देवी मधुरया गिरा॥ ४९ | देवी बोलीं— हे मन्दबुद्धि! कामबाणसे विमोहित होकर तुम इस प्रकार विषाद क्यों कर रहे हो? हे मूढ़! तुम पहले कालिका अथवा चामुण्डाके साथ ही युद्ध कर लो। ये दोनों देवियाँ ही समरांगणमें तुम्हारे साथ युद्ध करनेमें पूर्ण समर्थ हैं। मैं तो केवल दर्शक बनकर खड़ी हूँ। तुम इन दोनोंपर यथेच्छ प्रहार करो। मैं तुमसे लड़नेकी इच्छा नहीं करती॥ ४७-४८ १/२॥ |
| जह्येनं कालिके क्रूरे कुरूपप्रियमाहवे। | शुम्भसे ऐसा कहकर भगवतीने मधुर वाणीमें कालिकासे कहा—हे क्रूर कालिके! कुरूपाके साथ लड़नेकी इच्छावाले इस दानवको तुम युद्धमें मार डालो॥ ४९ १/२॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ता कालिका कालप्रेरिता कालरूपिणी॥ ५०<br><br>गदां प्रगृह्य तरसा तस्थावाजौ कृतोद्यमा।<br>तयोः परस्परं युद्धं बभूवातिभयानकम्॥ ५१<br><br>पश्यतां सर्वदेवानां मुनीनाञ्च महात्मनाम्। | व्यासजी बोले— भगवतीके इस प्रकार कहनेपर कालरूपिणी कालिका कालसे प्रेरित होकर बड़ी तेजीसे तत्काल गदा उठाकर सावधानीपूर्वक रणमें खड़ी हो गयीं। इसके बाद सभी देवताओं, मुनियों और महात्माओंके देखते-देखते उन दोनोंमें अतीव भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया॥ ५०-५१ १/२॥ |
| ७०२ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० ३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गदामुद्यम्य शुम्भोऽथ जघान कालिकां रणे॥ ५२<br>कालिका दैत्यराजानं गदया न्यहनद् भृशम्।<br>बभंजास्य रथं चण्डी गदया कनकोज्ज्वलम्॥ ५३<br>खरान्हत्वा जघानाशु दारुकं दारुणस्वना।<br>स पदातिर्गदां गुर्वीं समादाय क्रुधान्वितः॥ ५४ | शुम्भने अपनी गदा लेकर उससे कालिकापर प्रहार किया। भगवती कालिका भी अपनी गदासे दैत्यराज शुम्भपर तेज प्रहार करने लगीं। भयानक स्वरवाली चण्डीने गदासे उस दैत्यके सुवर्णमय चमकीले रथको चूर-चूर कर डाला और [शुम्भका रथ खींचनेवाले] गदहोंको मारकर उसके सारथिको भी मार डाला॥ ५२-५३ १/२॥<br>अब क्रोधमें भरे हुए शुम्भने अपनी विशाल गदा लेकर अट्टहास करते हुए पैदल ही पहुँचकर कालिकाकी दोनों भुजाओंके मध्यभाग (वक्षःस्थल)-पर प्रहार किया॥ ५४ १/२॥ |
| कालिकाभुजयोर्मध्ये प्रहसन्नहनत्तदा।<br>वञ्चयित्वा गदाघातं खड्गमादाय सत्वरा॥ ५५<br>चिच्छेदास्य भुजं सव्यं सायुधं चन्दनार्चितम्।<br>स छिन्नबाहुर्विरथो गदापाणिः परिप्लुतः॥ ५६ | तब कालिकाने उसके गदा-प्रहारको निष्फल करके शीघ्रतापूर्वक तलवार उठाकर शुम्भके चन्दनचर्चित तथा आयुधयुक्त बायें हाथको काट दिया॥ ५५ १/२॥<br>हाथ कट जाने तथा रथविहीन होनेके बावजूद भी रक्तसे लथपथ वह शुम्भ हाथमें गदा लिये हुए शीघ्रतापूर्वक कालिकाके पास पहुँचकर उनके ऊपर प्रहार करने लगा॥ ५६ १/२॥ |
| अचिरेण समागम्य कालिकामहनत्तदा।<br>काली च करवालेन भुजं तस्याथ दक्षिणम्॥ ५७<br>चिच्छेद प्रहसन्ती सा सगदं किल साङ्गदम्।<br>कर्तुं पादप्रहारं स कुपितः प्रययौ जवात्॥ ५८ | तब कालीने अपने करवाल (तलवार)-से उसके गदायुक्त तथा बाजूबन्दसे सुशोभित दाहिने हाथको हँसते-हँसते काट डाला॥ ५७ १/२॥<br>इसके बाद वह शुम्भ कुपित होकर कालिकापर पैरसे प्रहार करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आगे बढ़ा। तभी कालिकाने अपनी तलवारसे तुरंत उसके दोनों पैर भी काट डाले॥ ५८ १/२॥ |
| काली चिच्छेद चरणौ खड्गेनास्य त्वरान्विता।<br>सच्छिन्नकरपादोऽपि तिष्ठ तिष्ठेति च ब्रुवन्॥ ५९<br>धावमानो ययावाशु कालिकां भीषयन्निव।<br>तमागच्छन्तमालोक्य कालिका कमलोपमम्॥ ६० | हाथ-पैर कट जानेपर भी 'ठहरो-ठहरो' ऐसा कहता हुआ वह शुम्भ कालिकाको भयभीत करते हुए वेगपूर्वक दौड़ता हुआ उनकी ओर बढ़ा॥ ५९ १/२॥<br>उसे आते देखकर कालिकाने उसके कमलसदृश मस्तकको काट दिया, जिससे उसके कण्ठसे रक्तकी अजस्र धारा बहने लगी। मस्तक कट जानेपर पर्वततुल्य वह शुम्भ जमीनपर गिर पड़ा और उसके प्राण शरीरसे निकलकर तत्काल प्रयाण कर गये॥ ६०-६१ १/२॥ |
| चकर्त मस्तकं कण्ठाद्रुधिरौघवहं भृशम्।<br>छिन्नेऽसौ मस्तके भूमौ पपात गिरिसन्निभः॥ ६१<br>प्राणा विनिर्ययुस्तस्य देहादुत्क्रम्य सत्वरम्।<br>गतासुं पतितं दैत्यं दृष्ट्वा देवाः सवासवाः॥ ६२<br>तुष्टुवुस्तां तदा देवीं चामुण्डां कालिकां तथा। | दैत्य शुम्भको इस प्रकार प्राणविहीन होकर गिरा हुआ देखकर इन्द्रसहित सभी देवता भगवती चामुण्डा तथा कालिकाकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥ |