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देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished889 पृष्ठ
अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८७
पृष्ठ 696स्थायी लिंक
अ० २९] पञ्चम स्कन्ध ६८७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गदाशक्तिप्रहारैस्तु मातृः सर्वाः पृथक्पृथक्।<br>शक्तयस्तं शराघातैर्विब्यधुस्तत्प्रकोपिताः॥ १४<br><br>तस्य शस्त्राणि चिच्छेद चण्डिका स्वशरैः शितैः।<br>जघानान्यैश्च विशिखैस्तं देवी कुपिता भृशम्॥ १५ | उसके आघातसे कुपित होकर सभी देवियोंने बाणोंके प्रहारसे उसको बींध डाला। भगवती चण्डिकाने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उसके शस्त्रोंको काट डाला और अत्यन्त कुपित होकर वे अन्य बाणोंसे उस दानवको मारने लगीं॥ १३—१५॥ |
| तस्य देहाच्च सुस्राव रुधिरं बहुधा तु यत्।<br>तस्मात्तत्सदृशाः शूराः प्रादुरासन्सहस्रशः॥ १६<br><br>रक्तबीजैर्जगद्व्याप्तं रुधिरौघसमुद्भवैः।<br>सन्नद्धैः सायुधैः कामं कुर्वद्भिर्युद्धमद्भुतम्॥ १७ | अब उसके शरीरसे अत्यधिक रक्त निकलने लगा। उस रक्तसे उसी रक्तबीजके समान हजारों वीर उत्पन्न हो गये। इस प्रकार उस रुधिर-राशिसे उत्पन्न रक्तबीजोंसे सारा जगत् भर गया; वे सब कवच पहने हुए थे, आयुधोंसे सुसज्जित थे और अद्भुत युद्ध कर रहे थे॥ १६-१७॥ |
| प्रहरन्तश्च तान्दृष्ट्वा रक्तबीजाननेकशः।<br>भयभीताः सुरास्त्रेसुर्विषण्णाः शोककर्षिताः॥ १८<br><br>कथमद्य क्षयं दैत्या गमिष्यन्ति सहस्रशः।<br>महाकाया महावीर्या दानवा रक्तसम्भवाः॥ १९<br><br>एकैव चण्डिकात्रास्ति तथा काली च मातरः।<br>एताभिर्दानवाः सर्वे जेतव्याः कष्टमेव तत्॥ २०<br><br>निशुम्भो वाथ शुम्भो वा सहसा बलसंवृतः।<br>आगमिष्यति संग्रामे ततोऽनर्थो महान्भवेत्॥ २१ | उन असंख्य रक्तबीजोंको प्रहार करते देखकर देवता भयभीत, आतंकित, विषादग्रस्त और शोकसंतप्त हो गये। [वे सोचने लगे] इस समय रक्तबीजके रक्तसे उत्पन्न ये हजारों विशालकाय और महापराक्रमी दानव किस प्रकार विनष्ट होंगे? यहाँ रणभूमिमें केवल भगवती चण्डिका हैं और उनके साथमें देवी काली तथा कुछ मातृकाएँ हैं; केवल इन्हीं देवियोंको मिलकर सभी दानवोंको जीतना है—यह तो महान् कष्ट है। इसी समय यदि अचानक शुम्भ अथवा निशुम्भ भी सेनाके साथ संग्राममें आ जायगा, तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो जायगा॥ १८—२१॥ |
| व्यास उवाच<br>एवं देवा भयोद्विग्नाश्चिन्तामापुर्महत्तराम्।<br>यदा तदाम्बिका प्राह कालीं कमललोचनाम्॥ २२<br><br>चामुण्डे कुरु विस्तीर्णं वदनं त्वरिता भृशम्।<br>मच्छस्त्रपातसम्भूतं रुधिरं पिब सत्वरा॥ २३<br><br>भक्षयन्ती चर रणे दानवानद्य कामतः।<br>हनिष्यामि शरैस्तीक्ष्णैर्गदासिसुमुसलैस्तथा॥ २४ | व्यासजी बोले— [हे राजन्!] इस प्रकार जब सभी देवता भयसे व्याकुल होकर अत्यधिक चिन्तित हो उठे, तब भगवती अम्बिकाने कमलसदृश नेत्रोंवाली कालीसे कहा—हे चामुण्डे! तुम शीघ्रतापूर्वक अपना मुख पूर्णरूपसे फैला लो और मेरे शस्त्राघातके द्वारा [रक्तबीजके शरीरसे] निकले रक्तको जल्दी-जल्दी पीती जाओ। तुम दानवोंका भक्षण करती हुई इच्छानुसार युद्धभूमिमें विचरण करो। मैं तीक्ष्ण बाणों, गदा, तलवार तथा मुसलोंसे इन दैत्योंको मार डालूँगी॥ २२—२४॥ |
| तथा कुरु विशालाक्षि पानं तद्रुधिरस्य च।<br>बिन्दुमात्रं यथा भूम्यां न पतेदपि साम्प्रतम्॥ २५<br><br>भक्ष्यमाणास्तदा दैत्या न चोत्पत्स्यन्ति चापरे।<br>एवमेषां क्षयो नूनं भविष्यति न चान्यथा॥ २६ | हे विशाल नयनोंवाली! तुम इस प्रकारसे इस दैत्यके रुधिरका पान करो, जिससे कि अब एक भी बूँद रक्त भूमिपर न गिरने पाये; तब इस ढंगसे भक्षण किये जानेपर दूसरे दानव उत्पन्न नहीं हो सकेंगे। इस प्रकार इन दैत्योंका नाश अवश्य हो जायगा, इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है॥ २५-२६॥ |
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| ६८८ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २९ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| घातयिष्याम्यहं दैत्यं त्वं भक्षय च सत्वरा।<br>पिबन्ती क्षतजं सर्वं यतमानारिसंक्षये ॥ २७<br><br>इत्थं दैत्यक्षयं कृत्वा दत्त्वा राज्यं सुरालयम्।<br>इन्द्राय सुस्थिरं सर्वं गमिष्यामो यथासुखम्॥ २८ | जब मैं इस दैत्यको मारूँ, तब तुम शत्रुसंहाररूपी इस कार्यमें प्रयत्नशील होकर सारा रक्त पीती हुई शीघ्रतापूर्वक इसका भक्षण कर जाना। इस प्रकार दैत्यवध करके स्वर्गका सारा राज्य इन्द्रको देकर हम सब आनन्दपूर्वक यहाँसे चली जायँगी॥ २७-२८॥ |
| व्यास उवाच<br>इत्युक्ताम्बिकया देवी चामुण्डा चण्डविक्रमा।<br>पपौ च क्षतजं सर्वं रक्तबीजशरीरजम्॥ २९<br><br>अम्बिका तं जघानाशु खड्गेन मुसलेन च।<br>चखाद देहशकलांश्चामुण्डा तान्कृशोदरी ॥ ३० | **व्यासजी बोले—**भगवती अम्बिकाके ऐसा कहनेपर प्रचण्ड पराक्रमवाली देवी चामुण्डा रक्तबीजके शरीरसे निकले हुए समस्त रुधिरको पीने लगीं। जगदम्बा खड्ग तथा मुसलसे उस दैत्यको मारने लगीं और कृशोदरी चामुण्डा उसके शरीरके कटे हुए अंगोंका भक्षण करने लगीं॥ २९-३०॥ |
| सोऽपि क्रुद्धो गदाघातैश्चामुण्डां समघातयत्।<br>तथापि सा पपावाशु क्षतजं तमभक्षयत्॥ ३१ | अब वह रक्तबीज भी कुपित होकर गदाके प्रहारोंसे चामुण्डाको घायल करने लगा, फिर भी वे शीघ्रतापूर्वक उसका रुधिर पीती रहीं और उसका भक्षण करती रहीं॥ ३१॥ |
| येऽन्ये रुधिरजाः क्रूरा रक्तबीजा महाबलाः।<br>तेऽपि निष्पातिताः सर्वे भक्षिता गतशोणिताः ॥ ३२ | उस दैत्यके रुधिरसे उत्पन्न हुए अन्य जो भी महाबली और क्रूर रक्तबीज थे, उन्हें भी चामुण्डांने मार डाला। वे देवी उनका भी रक्त पी गयीं और उन सबको खा गयीं॥ ३२॥ |
| कृत्रिमा भक्षिताः सर्वे यस्तु स्वाभाविकॊऽसुरः।<br>सोऽपि प्रपातितो हत्वा खड्गेनातिविखण्डितः ॥ ३३ | इस प्रकार भगवतीने जब सभी कृत्रिम रक्तबीजोंका भक्षण कर लिया, तब जो वास्तविक रक्तबीज था, उसे भी मारकर उन्होंने खड्गसे उसके अनेक टुकड़े करके भूमिपर गिरा दिया॥ ३३॥ |
| रक्तबीजे हते रौद्रे ये चान्ये दानवा रणे।<br>पलायनं ततः कृत्वा गतास्ते भयकम्पिताः ॥ ३४<br><br>हाहेति विब्रुवन्तस्ते शुम्भं प्रोचुः सविह्वलाः।<br>रुधिरारक्तदेहाश्च विगतास्त्रा विचेतसः ॥ ३५<br><br>राजन्नम्बिकया रक्तबीजोऽसौ विनिपातितः।<br>चामुण्डा तस्य देहात्तु पपौ सर्वं च शोणितम्॥ ३६<br><br>ये चान्ये दानवाः शूरा वाहनेनातिरंहसा।<br>सिंहेन निहताः सर्वे काल्या च भक्षिताः परे॥ ३७ | तत्पश्चात् भयंकर रक्तबीजका वध हो जानेपर जो अन्य दानव रणभूमिमें थे, वे भयसे काँपते हुए भाग करके शुम्भके पास पहुँचे। उनका चित्त बहुत व्याकुल था, उनका शरीर रुधिरसे लथपथ था, वे शस्त्रविहीन हो गये थे और अचेत-से हो गये थे। वे हाय, हाय—ऐसा पुकारते हुए शुम्भसे कहने लगे—हे राजन्! अम्बिकाने उस रक्तबीजको मार डाला और चामुण्डा उसकी देहसे निकला सारा रुधिर पी गयी। जो अन्य दानववीर थे, उन सबको देवीके वाहन सिंहने बड़ी तेजीसे मार डाला और शेष दानवोंको भगवती काली खा गयीं॥ ३४–३७॥ |
| वयं त्वां कथितुं राजन्नागता युद्धचेष्टितम्।<br>चरितञ्च तथा देव्याः संग्रामे परमाद्भुतम्॥ ३८ | हे राजन्! हमलोग आपको युद्धका वृत्तान्त तथा संग्राममें देवीके द्वारा प्रदर्शित किये गये उनके अत्यन्त अद्भुत चरित्रको बतानेके लिये आपके पास आये हुए हैं॥ ३८॥ |