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देवी भागवत महापुराण

Devi Bhagavata Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished889 पृष्ठ

अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५३

अ० २१ ] तृतीय स्कन्ध ३५३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
परिचिन्त्य धर्मं त्वं राजनीतिञ्च शाश्वतीम्।<br>कुरु कार्यं यथायोग्यं मा कृथा मतिमन्यथा॥ २५तुम धर्म तथा शाश्वत राजनीतिपर सम्यक् विचार कर लो, तत्पश्चात् यथोचित कार्य करो; इसके विपरीत कोई दूसरा विचार मत करो॥ २४-२५॥
सुहृदसि ममात्यर्थं हितं ते प्रब्रवीम्यहम्।<br>समानय सुतां राजन् मण्डपे तां सखीवृताम्॥ २६तुम मेरे परम मित्र हो, इसलिये तुम्हारे हितकी बात बता देता हूँ। अब तुम अपनी कन्याको उसकी सखियोंसहित स्वयंवर-मण्डपमें ले आओ॥ २६॥
सुदर्शनमृते चेयं वरिष्यति यदाप्यसौ।<br>विग्रहो मे तदा न स्याद्विवाहोऽस्तु तवेप्सितः॥ २७<br><br>अन्ये नृपतयः सर्वे कुलीनाः सबलाः समाः।<br>विरोधः कीदृशस्तेवं वृणोद्यदि नृपोत्तम॥ २८<br><br>अन्यथाहं हरिष्येऽद्य बलात्कन्यामिमां शुभाम्।<br>मा विरोधं सुदुःसाध्यं गच्छ पार्थिवसत्तम॥ २९यदि वह सुदर्शनको छोड़कर किसी दूसरेका वरण कर लेगी तो इसमें मुझे विरोध नहीं होगा। आप अपने इच्छानुसार उसके साथ विवाह कर दीजियेगा। हे राजेन्द्र! अन्य सभी नरेश कुलीन, शक्तिशाली एवं हर तरहसे समान हैं। अतः यदि इनमेंसे किसीको भी वह कन्या चुन लेती है तो विरोध ही क्या है? अन्यथा मैं बलपूर्वक आज ही इस सुन्दर कन्याका हरण कर लूँगा। हे नृपश्रेष्ठ! जाओ, इस कार्यको सुसम्पन्न करो और इस असाध्य कलहमें मत पड़ो॥ २७-२९॥
व्यास उवाच<br>युधाजिता समादिष्टः सुबाहुः शोकसंयुतः।<br>निःश्वसन्भवनं गत्वा भार्यां प्राह शुचावृतः॥ ३०<br><br>पुत्रीं ब्रूहि सुधर्मज्ञे कलहे समुपस्थिते।<br>किं कर्तव्यं मया शक्यं त्वद्वशोऽस्मि सुलोचने॥ ३१व्यासजी बोले— उस समय युधाजित्का यह आदेश पाकर सुबाहु शोकाकुल हो उठे और दीर्घ श्वास लेते हुए महलमें जाकर दुःखित हो अपनी पत्नीसे कहने लगे—हे सुधर्मज्ञे! हे सुनयने! अब पुत्रीसे कहो—‘स्वयंवर-सभामें इस समय घोर कलह उपस्थित हो जानेपर मुझे क्या करना चाहिये? मैं स्वयं कुछ नहीं कर सकता; क्योंकि मैं तो तुम्हारे वशमें हूँ’॥ ३०-३१॥
व्यास उवाच<br>सा श्रुत्वा पतिवाक्यं तु गत्वा प्राह सुतान्तिकम्।<br>वत्से राजातिदुःखार्तः पिता तेऽद्यापि वर्तते॥ ३२<br><br>त्वदर्थे विग्रहः कामं समुत्पन्नोऽद्य भूभृताम्।<br>अन्यं वरय सुश्रोणि सुदर्शनमृते नृपम्॥ ३३व्यासजी बोले— पतिकी यह बात सुनकर रानी अपनी पुत्रीके पास जाकर बोली—पुत्रि! तुम्हारे पिता राजा सुबाहु इस समय अत्यन्त दुःखी हैं। तुम्हारे लिये आये हुए नरेशोंमें भयंकर कलह उत्पन्न हो गया है, इसलिये हे सुश्रोणि! तुम सुदर्शनको छोड़कर अन्य किसी राजकुमारका वरण कर लो॥ ३२-३३॥
यदि सुदर्शनं वत्से हठात्त्वं वै वरिष्यसि।<br>युधाजित्त्वां च मां चैव हनिष्यति बलान्वितः॥ ३४<br><br>सुदर्शनं च राजासौ बलमत्तः प्रतापवान्।<br>द्वितीयस्ते पतिः पश्चाद्भविता कलहे सति॥ ३५<br>तस्मात्सुदर्शनं त्यक्त्वा वरयान्यं नृपोत्तमम्।हे वत्से! यदि तुम हठ करके सुदर्शनका ही वरण करोगी तो सैन्यबलयुक्त, प्रतापी तथा बलशाली वह युधाजित् तुमको, सुदर्शनको और हमलोगोंको मार डालेगा। तत्पश्चात् कलह हो जानेपर कोई दूसरा ही तुम्हारा पति होगा। अतः हे मृगलोचने! यदि तुम मेरा और अपना हित चाहती हो तो सुदर्शनको छोड़कर किसी अन्य श्रेष्ठ राजाका वरण कर लो॥ ३४-३५ ½॥

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 A

३५४श्रीमद्देवीभागवत[ अ० २१

| सुखमिच्छसि चेन्मह्यं तुभ्यं वा मृगलोचने।<br>इति मात्रा बोधितां तां पश्चाद्राजाप्यबोधयत्॥ ३६<br>उभयोर्वचनं श्रुत्वा निर्भयोवाच कन्यका। | इस प्रकार माताके समझानेके बाद पिताने भी उसे समझाया। उन दोनोंकी बातें सुनकर कन्या शशिकला निर्भय होकर कहने लगी॥ ३६ १/२॥ |
| कन्योवाच<br>सत्यमुक्तं नृपश्रेष्ठ जानासि च व्रतं मम॥ ३७<br>नान्यं वृणोमि भूपाल सुदर्शनमृते क्वचित्।<br>विभेषि यदि राजेन्द्र नृपेभ्यः किल कातरः॥ ३८<br>सुदर्शनाय दत्त्वा मां विसर्जय पुराद्वहिः।<br>स मां रथे समारोप्य निर्गमिष्यति ते पुरात्॥ ३९<br>भवितव्यं तु पश्चाद्वै भविष्यति न चान्यथा।<br>नात्र चिन्ता त्वया कार्या भवितव्ये नृपोत्तम॥ ४०<br>यद्भावि तद्भवत्येव सर्वथात्र न संशयः। | कन्या बोली—हे नृपश्रेष्ठ! आप ठीक कह रहे हैं किंतु आप मेरे प्रणको तो जानते ही हैं। हे राजन्! मैं सुदर्शनको छोड़कर और किसीका भी वरण नहीं कर सकती। हे राजेन्द्र! यदि आप राजाओंसे डरते हैं और बहुत घबड़ाये हुए हैं तो मुझे सुदर्शनको सौंपकर नगरसे बाहर कर दीजिये। वे मुझे रथपर बैठाकर आपके नगरसे बाहर निकल जायँगे। हे नृपश्रेष्ठ! जो होना है वह तो बादमें अवश्य होगा; इसके विपरीत नहीं होगा। अब आप होनीके विषयमें चिन्ता न करें; क्योंकि जो होना है वह तो निश्चितरूपसे होता ही है; इसमें संशय नहीं है॥ ३७—४० १/२॥ |
| राजोवाच<br>न पुत्रि साहसं कार्यं मतिमद्भिः कदाचन॥ ४१<br>बहुभिर्न विरोद्धव्यमिति वेदविदो विदुः।<br>विस्रक्ष्यामि कथं कन्यां दत्त्वा राजसुताय च॥ ४२<br>राजानो वैरसंयुक्ताः किन्नु कुर्युःसाम्प्रतम्।<br>यदि ते रोचते वत्से पणं संविदधाम्यहम्॥ ४३<br>जनकेन यथा पूर्वं कृतः सीतास्वयंवरे।<br>शैव धनुर्यथा तेन धृतं कृत्वा पणं तथा॥ ४४<br>तथाहमपि तन्वङ्गि करोम्यद्य दुरासदम्।<br>विवादो येन राज्ञां वै कृते सति शमं व्रजेत्॥ ४५<br>पालयिष्यति यः कामं स ते भर्ता भविष्यति।<br>सुदर्शनस्तथान्य वा यः कश्चिद् बलवत्तरः॥ ४६<br>पालयित्वा पणं त्वां वै वरयिष्यति सर्वथा।<br>एवं कृते नृपाणां तु विवादः शमितो भवेत्॥ ४७<br>सुखेनाहं विवाहं ते करिष्यामि ततः परम्। | राजा बोले—हे पुत्रि! बुद्धिमानोंको कभी ऐसा साहस नहीं करना चाहिये। वेदज्ञोंने कहा है कि बहुतोंसे विरोध नहीं करना चाहिये। पुत्रीको उस राजकुमारको सौंपकर कैसे विदा कर दूँ? मुझसे वैर साधे हुए ये राजागण न जाने कौन-सा अनिष्ट कर डालेंगे। इसलिये हे पुत्रि! यदि तुम पसन्द करो तो मैं कोई शर्त रख दूँ, जैसा कि पूर्वकालमें राजा जनकने सीतास्वयंवरमें किया था। हे तन्वंगि! जैसे उन्होंने शिव-धनुष तोड़नेकी शर्त रख दी थी, वैसे ही मैं भी कोई ऐसी कठोर शर्त रख दूँ जिससे ऐसा कर देनेपर राजाओंका विवाद ही समाप्त हो जाय। जो उस प्रतिज्ञाको पूरा करेगा, वही तुम्हारा पति होगा। सुदर्शन हो अथवा कोई दूसरा—जो भी अधिक बलशाली होगा, वह मेरी प्रतिज्ञा पूरी करके तुम्हारा वरण कर लेगा। ऐसा करनेसे राजाओंमें उत्पन्न कलह निश्चितरूपसे शान्त हो जायगा और उसके बाद मैं आनन्दपूर्वक तुम्हारा विवाह कर दूँगा॥ ४१—४७ १/२॥ |
| कन्योवाच<br>सन्देहे नैव मज्जामि मूर्खकृत्यमिदं यतः॥ ४८<br>मया सुदर्शनः पूर्वं धृतश्चेतसि नान्यथा।<br>कारणं पुण्यपापानां मन एव महीपते॥ ४९ | कन्या बोली—मैं इस सन्दिग्ध कार्यमें नहीं पहूँगी; क्योंकि यह मूर्खोंका काम है। मैंने अपने मनमें सुदर्शनका पहलेसे ही वरण कर लिया है, अब दूसरेको स्वीकार नहीं कर सकती। हे महाराज! पुण्य तथा पापका कारण तो मन ही है। इसलिये हे |

1897 श्रीमद्देवी....महापुराण [ प्रथम खण्ड ]—12 B