देवी भागवत महापुराण
Devi Bhagavata Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५
अ० २० ] प्रथम स्कन्ध १७५
| वर्षाणि नव राजेन्द्रः कुर्वन् क्रीडां मनोरमाम्।<br>प्रापासौ मरणं भूयो गृहीतो राजयक्ष्मणा ॥ ५३ | इस प्रकार पूरे नौ वर्षतक मनोहर क्रीड़ा करते हुए राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मारोगसे ग्रसित हो गये और अन्तमें मृत्युको प्राप्त हुए ॥ ५३ ॥ |
| मृते पुत्रेऽतिदुःखार्ता जाता सत्यवती तदा।<br>कारयामास पुत्रस्य प्रेतकार्याणि मन्त्रिभिः ॥ ५४ | उस समय पुत्रके मर जानेपर माता सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने मन्त्रियोंद्वारा पुत्रके सभी प्रेतकर्म सम्पन्न कराये ॥ ५४ ॥ |
| भीष्ममाह तदैकान्ते वचनं चातिदुःखिता।<br>राज्यं कुरु महाभाग पितुस्ते शन्तनोः सुत ॥ ५५<br><br>भ्रातृभार्यां गृहाण त्वं वंशञ्च परिरक्षय।<br>यथा न नाशमायाति ययातेर्वंश इत्युत ॥ ५६ | तत्पश्चात् एक दिन अत्यन्त दुःखी होकर सत्यवतीने भीष्मसे एकान्तमें कहा—हे महाभाग! हे पुत्र! अब तुम अपने पिता शन्तनुका राज्य सम्भालो और अपनी भ्रातृजायाको स्वीकार करो और अपने वंशकी रक्षा करो, जिससे महाराज ययातिका वंश नष्ट न हो जाय ॥ ५५-५६ ॥ |
| भीष्म उवाच<br>प्रतिज्ञा मे श्रुता मातः पित्रर्थे या मया कृता।<br>नाहं राज्यं करिष्यामि न चाहं दारसंग्रहम् ॥ ५७ | भीष्म बोले—हे माता! अपने पिताजीके लिये मैंने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे तो आप सुन चुकी हैं। अतः मैं न तो राज्य ग्रहण करूँगा और न तो विवाह ही करूँगा ॥ ५७ ॥ |
| सूत उवाच<br>तदा चिन्तातुरा जाता कथं वंशो भवेदिति।<br>नालसाद्धि सुखं मह्यं समुत्पन्ने ह्यराजके ॥ ५८ | सूतजी बोले—तब सत्यवती चिन्तित हो गयीं कि अब वंश कैसे चलेगा ? अपने कर्तव्यके प्रति यदि मैं उदासीन रहूँ तो अराजकताके व्याप्त होनेपर मुझे सुख कैसे प्राप्त होगा ? ॥ ५८ ॥ |
| गाङ्गेयस्तामुवाचेदं मा चिन्तां कुरु भामिनि।<br>पुत्रं विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रजं चोपपादय ॥ ५९<br><br>कुलीनं द्विजमाहूय वध्वा सह नियोजय।<br>नात्र दोषोऽस्ति वेदेऽपि कुलरक्षाविधौ किल ॥ ६०<br><br>पौत्रं चैवं समुत्पाद्य राज्यं देहि शुचिस्मिते।<br>अहं च पालयिष्यामि तस्य शासनमेव हि ॥ ६१ | [इस प्रकार माताको चिन्तित देखकर] भीष्मने उनसे कहा—हे भामिनि! आप चिन्ता न करें। विचित्रवीर्यकी पत्नीके गर्भसे क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न कराइये। किसी कुलीन विद्वान् ब्राह्मणको बुलाकर वधूके साथ नियोग कराइये। इसमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि वंशरक्षाका विधान वेदमें भी है। हे प्रसन्नवदने! इस प्रकार पौत्र उत्पन्न कराकर आप उसीको राज्य सौंप दीजिये, मैं उसके राज्यशासनका सम्यक् संरक्षण करता रहूँगा ॥ ५९—६१ ॥ |
| तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य कानीनं स्वसुतं मुनिम्।<br>जगाम मनसा व्यासं द्वैपायनमकल्मषम् ॥ ६२ | भीष्मकी वह बात सुनकर सत्यवतीने अपनी कुमारी अवस्थामें उत्पन्न अपने निर्दोष पुत्र द्वैपायन व्यासमुनिका स्मरण किया ॥ ६२ ॥ |
| स्मृतमात्रस्ततो व्यास आजगाम स तापसः।<br>कृत्वा प्रणामं मात्रेऽथ संस्थितो दीप्तिमान्मुनिः ॥ ६३ | स्मरण करते ही तपस्वी व्यासजी वहाँ आ पहुँचे और माताको प्रणाम करके वे तेजस्वी मुनि सामने खड़े हो गये ॥ ६३ ॥ |
| १७६ | श्रीमद्देवीभागवत | [ अ० २० |
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| भीष्मेण पूजितः कामं सत्यवत्या च मानितः।<br>तस्थौ तत्र महातेजा विधूमोऽग्निरिवापरः॥ ६४ | भीष्मने उनकी भलीभाँति पूजा की और माता सत्यवतीने भी आदर किया। उस समय महातेजस्वी व्यासजी वहाँ इस प्रकार सुशोभित हुए मानो धूमरहित साक्षात् दूसरे अग्निदेव ही हों॥ ६४॥ |
| तमुवाच मुनिं माता पुत्रमुत्पादयाधुना।<br>क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य सुन्दरं तव वीर्यजम्॥ ६५ | माता सत्यवतीने व्यासमुनिसे कहा—इस समय तुम विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें अपने तेजसे सुन्दर पुत्र उत्पन्न करो॥ ६५॥ |
| व्यासः श्रुत्वा वचो मातुराप्तवाक्यममन्यत।<br>ओमित्युक्त्वा स्थितस्तत्र ऋतुकालमचिन्तयत्॥ ६६ | माताका वचन सुनकर व्यासजीने उसे आप्तवाक्य माना और ‘ठीक है’—कहकर वे वहींपर ठहर गये और ऋतुकालकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ६६॥ |
| अम्बिका च यदा स्नाता नारी ऋतुमती तदा।<br>सङ्गं प्राप्य मुनेः पुत्रमसूतान्धं महाबलम्॥ ६७<br><br>जन्मान्धं च सुतं वीक्ष्य दुःखिता सत्यवत्यपि।<br>द्वितीयां च वधूमाह पुत्रमुत्पादयाशु वै॥ ६८ | जब अम्बिका ऋतुमती होकर स्नान कर चुकी तब उसने मुनि व्यासजीके तेजसे एक पुत्र उत्पन्न किया, जो महाबली और जन्मान्ध था। उस बालकको जन्मान्ध देखकर सत्यवतीको बड़ा दुःख हुआ। तब उन्होंने दूसरी वधू अम्बालिका से कहा कि तुम भी शीघ्र एक पुत्र उत्पन्न करो॥ ६७-६८॥ |
| ऋतुकालेऽथ सम्प्राप्ते व्यासेन सह सङ्गता।<br>तथा चाम्बालिका रात्रौ गर्भं नारी दधार सा॥ ६९<br><br>सोऽपि पाण्डुः सुतो जातो राज्ययोग्यो न सम्मतः।<br>पुत्रार्थं प्रेरयामास वर्षान्ते च पुनर्वधूम्॥ ७०<br><br>आहूय च ततो व्यासं सम्प्रार्थ्य मुनिसत्तमम्।<br>प्रेषयामास रात्रौ सा शयनागारमुत्तमम्॥ ७१<br><br>न गता च वधूस्तत्र प्रेष्या सम्प्रेषिता तया।<br>तस्यां च विदुरो जातो दास्यां धर्मांशतः शुभः॥ ७२ | ऋतुकाल प्राप्त होनेपर उस अम्बालिकाने व्यासजीसे गर्भ धारण किया। उससे उत्पन्न पुत्र भी पाण्डुरोगसे ग्रसित होनेके कारण राजा होनेके योग्य नहीं था। इसलिये माताने वधू अम्बालिकाको एक वर्षके बाद पुनः एक पुत्रके लिये प्रेरित किया। माता सत्यवतीने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीका आह्वानकर उनसे इसके लिये प्रार्थना की, परंतु उसने स्वयं न जाकर अपनी दासीको भेज दिया। उस दासीके गर्भसे धर्मके अंशसे युक्त शुभ विदुर उत्पन्न हुए॥ ६९—७२॥ |
| एवं व्यासेन ते पुत्रा धृतराष्ट्रादयस्त्रयः।<br>उत्पादिता महावीरा वंशरक्षणहेतवे॥ ७३<br><br>एतद्वः सर्वमाख्यातं तस्य वंशसमुद्भवम्।<br>व्यासेन रक्षितो वंशो भ्रातृधर्मविदानघाः॥ ७४ | इस प्रकार वंशकी रक्षाके लिये व्यासजीने धृतराष्ट्र आदि तीन महापराक्रमी पुत्र उत्पन्न किये। भ्रातृ-धर्मको जाननेवाले व्यासजीने ऐसा करके वंशकी रक्षा की। हे पुण्यात्मा मुनिजनो! इस प्रकार उनकी वंशोत्पत्तिसे सम्बन्धित समस्त कथानक मैंने आपलोगोंसे कह दिया॥ ७३-७४॥ |
इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणेऽष्टादशसाहस्र्यां संहितायां प्रथमस्कन्धे धृतराष्ट्रादीनामुत्पत्तिवर्णनं नाम विंशोऽध्यायः॥ २०॥